04 October 2011

Original Aarti- Om Jai Jagdish Hare – ओम जय जगदीश हरे- आरती का मूल रूप


श्रद्धाराम फिल्लौरी
(चित्र विकिपीडिया के साभार)
अगस्त, 2011 में दिल्ली में आयोजित एक हवन में शामिल होने का अवसर मिला. हवन के अंत में आरती गाई गई- ओम् जय जगदीश हरे. सब ने इसे बहुत भावपूर्वक गाया. मेरे लिए कई पंक्तियाँ नई थीं. कुछ बहुत नई नहीं थीं जैसे इसका अंतिम भाग- कहत शिवानंद स्वामी.... आरती के बाद पंडित से पूछा कि क्या इस आरती के लेखक का नाम जानते हो. उसने अनभिज्ञता प्रकट की.  

यह वर्ष 1971 की बात है जब मुझे डॉ. सरन दास भनोट से इस आरती के रचयिता की जानकारी मिली थी.

इस आरती को पंजाब के विद्वान साहित्यकार श्रद्धाराम फिल्लौरी ने सन् 1870 में लिखा था. उस समय के एक छोटे-से कस्बे फिल्लौर में जन्मे श्रद्धाराम की लिखी आरती आज पूरे भारत और विदेशों में गाई जाती है. ये हरफ़नमौला रमल भी खेलते थे. फिल्म 'पूरब और पश्चिम' ने इस आरती को सिनेमा का ग्लैमर दिया लेकिन इस आरती की पंक्तियाँ- ....तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा मूल आरती में नहीं है. जहाँ तक दृष्टि जाती है इस फिल्म के बाद इस आरती के स्वरूप को तेज़ी से बदलते देखा है. स्वामी शिवानंद जैसे अग्रणी वेदांती के साथ कब इस आरती को जोड़ दिया गया पता ही नहीं चला लेकिन यह अज्ञान से उपजा प्रक्षिप्त अंश है. 

ख़ैर ! कभी-कभी कोई भजन इतना लोकप्रिय हो जाता है कि विद्वानों की लापरवाही और जन-कीर्तन की बेपरवाही का शिकार हो जाता है. आप इसे जैसे पहले गाते रहे हैं उसे गाते रहिए. इस आरती का शुद्ध रूप केवल जानकारी के लिए यहाँ दे रहा हूँ.


आरती

ओम् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का
सुख-सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति

दीनबंधु दुःखहर्ता, तुम रक्षक मेरे.
करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पडा तेरे

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा


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02 October 2011

Rock garden- A fairyland in Chandigarh - रॉक गार्डन- चंडीगढ़ का परीलोक

It is said that after Taj Mahal the Rock Garden of Chandigarh (the city beautiful) is the most popular tourist place in India. Here I am posting few photographs of it. This has made Chandigarh very popular abroad. The pictures here are mainly of third phase of Rock Garden. I captured these pictures in my mobile. You may use it.

The foundation of this city was laid down in the year 1950 by J.L. Nehru. Therefore, this city has no ancient monuments, even most of the ‘most ancient temples’ in its vicinity were constructed during our life time. Us people, born in 1951 were naturally included in ‘the most ancient’ :))

कहते हैं कि भारत में ताजमहल के बाद सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल सुंदर नगरी चंडीगढ़ का रॉक गार्डन है. इसके कुछ चित्र आपके लिए यहाँ लगाए जा रहे हैंरॉक गार्डनसे चंडीगढ़ शहर को विदेशों में बहुत प्रसिद्धि मिली है. इसमें दिए गए चित्र मुख्यतः इसके तीसरे फेज़ के हैं. ये चित्र मैंने मोबाइल से खींचे हैं. आप इनका प्रयोग कर सकते हैं.

इस शहर की आधारशिला वर्ष 1950 में जवाहर लाल नेहरू ने रखी थी. अतः इस शहर में प्रचीन स्मारक आदि नहीं हैं. यहाँ तक कि इसके आसपास के अति प्राचीन मंदिरों में से अधिकतर हमारे जीवन काल में ही बनाए गए हैं. 1951 में पैदा हुए हम लोग स्वाभाविक ही 'अति प्राचीन' में शामिल हो गए .

रॉक गार्डन 


टूटी वस्तुओं से बनी आकृतियाँ
 
कचरे और टूटी चूड़ियों से बनी आकृतियाँ

तीसरे चरण का कार्य चल रहा है

तीसरे चरण का वैभव देखने योग्य है

इसके निर्माता नेक चंद का 'दीवाने आम'

कुछ पेड़ ऐसे भी

एक बरामदे की भित्तियाँ

घोड़े चढ़े आकाश (अभी निर्माणाधीन)

किसी ठूँठ को ऐसा सम्मान नहीं मिला
टूटे कप-प्लेटों से बने झगड़ालू मानव समूह

Within Rock Garden, but no rock. It is real.

तिलिस्म का आनंद

विस्मय का जादू

प्राणवान पत्थर

सदा चौकस


अकड़ू समुदाय

झरना है तो..... 

तलैया पर पहाड़ की छाया
कलात्मक स्तंभ

पत्थर बन चुकी सीमेंट की बोरियों का भव्य उपयोग
Rock Garden : Wikipedia

Nek Chand Saini: Creator of Rock Garden




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01 October 2011

Dr. Dhian Singh - Known history of Megh Bhagats - मेघ भगतों का इतिहास


Emergence and Evolution of Kabir Panth in Punjab
पंजाब में कबीर पंथ का उद्भव और विकास

Are you searching for history/known history of Megh Bhagats? 
Yes, this thesis of Dr Dhian Singh can
guide you through

An enthusiastic young man Mr. Dhian Singh from Kapurthala (Punjab), pioneered research on history of Megh Bhagat community in the backdrop of emergence and evolution of Kabir Panth in Punjab. This was very important from the point of view that his work helps in reconstruction of history of Dalit communities which has been destroyed and corrupted. Researcher Dr. Dhian Singh and director of this research work Dr. Seva Singh have, within the limitations, put in tireless efforts using research methodologies while pursuing intensive study, visits and interviews. Use of libraries for research work is a common thing. Dr. Dhian Singh undertook intensive touring of Jammu-Kashmir, Punjab, Haryana and Rajasthan at his own expense. His hard work together with diligence of his Director helped his thesis through for Ph.D degree in the year 2008.

For the past two years I had been requesting Dr. Singh to help  make his thesis on line for the benefit of others. Now on 08-02-2011 he gave me his thesis which was scanned and blogged. It is in the form of PDF file. To make it easy to read please press ‘ctrl’ and +.

I hope that, now, the desire of Meghs will be satiated with regard to their eternal questions as to who they are, who were their ancestors and what they used to do.

This thesis will help change the conventional thinking of Megh community which has been divided in so many names and religions that their social and political integration seems to be a distant dream. This thesis will help the community grow a sense of unity.

Finally big thanks to you Dr. Seva Singhji and Dr. Dhian Singhji. You have done a work of great importance. 
कपूरथला (पंजाब) के एक उत्साही युवक ध्यान सिंह ने पंजाब ने कबीर पंथ के उद्भव और विकास की पृष्ठभूमि में मेघ भगत समुदाय के इतिहास पर शोध करने का बीड़ा उठाया था. यह कार्य बहुत महत्वपूर्ण इसलिए था कि जिन दलित समुदायों का इतिहास नष्ट-भ्रष्ट किया जा चुका हो उनका इतिहास कैसे लिखा जाए. शोध के लिए पुस्तकालयों का उपयोग करना एक सामान्य बात है. शोधछात्र के तौर पर ध्यान सिंह ने और उनके निर्देशक डॉ सेवा सिंहडी.लिट्. ने शोध सामग्री को देखते हुए विचार-विमर्ष के बाद मान्य पद्धतियों (methodologies) की सीमाओं में रहते हुए गहन अध्ययन के अतिरिक्त यात्रा और साक्षात्कार का सहारा लेने का निर्णय लिया. ध्यान सिंह जी ने इसके लिए जम्मू-कश्मीर, पंजाबहरियाणा और राजस्थान के दौरे किए. उनके परिश्रम और निर्देशक के मार्गदर्शन से कार्य बखूबी हुआ और शोधग्रंथ वर्ष 2008 में पी.एच.डी. की डिग्री के लिए स्वीकार कर लिया गया. यह अपनी तरह का पहला कार्य है.

मैं दो-एक वर्ष से डॉ ध्यान सिंह से आग्रह कर रहा था कि वे अपने शोधग्रंथ को अन्य के लाभ के लिए ऑन-लाइन करें. अब 08-02-2011 को उन्होंने यह शोधग्रंथ मुझे सौंपा और मैंने उसकी स्कैनिंग कराने के बाद उसे एक ब्लॉग का रूप दे दिया.

मुझे आशा है कि अब हमारे मेघ भाइयों की यह जिज्ञासा शांत हो जाएगी कि हम कौन हैंकहाँ से आए हैं और हमारे पुरखे क्या करते थे.

सब से बढ़ कर यह शोधग्रंथ मेघ भगत समुदाय की पारंपरिक सोच को बदलने में सहायक होगा जिसे इतने नामों और धर्मों में बाँट दिया गया है कि उनमें सामाजिक और राजनीतिक एकता दूर का सपना लगती है. इसे पढ़ने के बाद इस समुदाय में एकता की भावना बढ़ेगी.

अंत में डॉ ध्यान सिंह और डॉ सेवा सिंह जी को कोटिशः धन्यवाद. आपने बहुत महत् कार्य को संपन्न किया है. यह शोधग्रंथ सात पीडीएफ फाइलों के रूप में नीचे दिया गया है. इन पर क्लिक करें और पढ़ें. फाइल खोलने के बाद स्क्रीन पर बड़ा पढ़ने के लिए ctrl और + को दबाएँ. पीडीएफ फाइल पर भी ऊपर दाएँ हाथ (+) और (-) के चिह्न हैं उनका भी प्रयोग किया जा सकता है. यह पीडीएफ़ फाइल एक बार खोलने से न खुले तो दूसरी बार क्लिक कर के खोलें. 

पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास
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Key words: History of Meghs, History of Megh Bhagats, History of Kabir Panthis, Pujnabi Kabir Panthis, Megh Bhagat, Thesis, मेघ भगत, शोधग्रंथ,  

Megh churn-2 - मेघ मथनी-2

अखरोट में बंद इतिहास उर्फ़ मेघ मथनी
(एक सुझाव है कि इस प्रहसन के बीच में दिए लिंक्स को आप अवश्य देखें लेकिन पोस्ट पढ़ने के बाद)

दो मेघ मिल कर बाते करें और मेघ मधाणी (मथनी) न चले ऐसा कम होता है. मेघ मधाणी से मैं बहुत डरता हूँ. लेकिन जब मिस्टर मेघ (तनिक तुनक मिज़ाज) के माथे पर प्रज्ञा की सभी सात रेखाएँ मौजूद हैं तो डर काहे का. हमने चाटी उठा कर सिर पर रख ली. मथनी चली मिस्टर मेघ के घर...कुछ यों-

मैं मि. मेघ, सुना है आप मेघों के प्राचीन इतिहास के बारे में बहुत जानते हैं.

मिस्टर मेघ वाक़ई जानना चाहते हो या चाय पीने आए हो? आज मेघणी घर नहीं सो चाय नहीं मिलेगी.

मैं नहीं...नहीं...नहीं, मैं वाक़ई जानने के लिए आया हूँ....

मिस्टर मेघ ख़ुद भी पढ़ा करो कभी. लेकिन पूछते हो तो बताता हूँ.

मैं   जी मेहरबानी.

मिस्टर मेघ (लंबी साँस लेकर) हमारा इतिहास वेदों में लिखा है...

मैं लेकिन सर जी, वेदों में तो कोई इतिहास है ही नहीं.

मिस्टर मेघ इतिहास न सही, संकेत तो हैं.

मैं जी.

मिस्टर मेघ फिर टोकोगे?

मैं सॉरी.

मिस्टर मेघ मैं जो इतिहास बताता हूँ वह गंभीर बात है. हा..हा..ही..ही.. की गुंजाइश नहीं इसमें....तो कुछ विद्वानों के अनुसार वेद में कहे गए वृत्र उर्फ़ प्रथम मेघ उर्फ़ अहि (नाग) मेघ से शुरू होता है हमारा इतिहास और आगे चल कर सिंधुघाटी पता नहीं किस ने बीच में डाल दी है. कहते हैं कि इस सभ्यता का विकास अफ्रीकी मूल के लोगों ने किया था. तो समझ लो उनका रंग कैसा रहा होगा. और पता है प्रचीन काल में कभी भारत को पूर्वी इथियोपिया कहा जाता था?

मैं   क्या कह रहे हैं आप?

मिस्टर मेघ मैं बिना सबूत के बात नहीं करता. क्योंकि इस सभ्यता के लोग काले थे और ईश बुद्ध भी इसी सभ्यता के थे और भगवान महावीर भी. इसी लिए मध्य एशिया से आए काले-भूरों को इनके नाम से चिढ़ मचती थी.

मैं पता नहीं आप नई-नई बातें कहाँ से लाते हैं. परंतु यह तो बताइये कि सिंधु घाटी के लोग वेदा-वादी करने वालों से हारे कैसे?

मिस्टर मेघ बेवकूफ़! वेदा-वादी तो उन्होंने यहाँ आकर सीखी. तुम उनसे इसलिए हारे क्योंकि तुम पालते थे भैंसे, हिरन और बकरियाँ और हमलावर कबीलों के पास थे पालतू घोड़े. और हाँ....यदि वेद गोरों ने लिखे, तो फैसला करना होगा कि सिंधुघाटी पहले थी या गोरे यहाँ पहले आए.

मैं वे तो कहते हैं कि वे काले लोगों की सभ्यता सिंधुघाटी की पैदाइश हैं न कि मध्य एशिया की.

मिस्टर मेघ तो फिर ऐसे समझने की कोशिश करो कि भारत में रहने वाले सभी गोरे कौन हैं और कि भारत के हैं या नहीं. ज़रा इस बात को जान लो कि वे अपने साथ वहाँ की अपनी औरतों को नहीं लाए होंगे. सिंधुघाटी सभ्यता सोने की चिड़िया थी और यहाँ की औरतें दूध से नहाती थीं. भारत भर की औरतें यह आशीर्वाद देती हैं कि दूधों नहाओ और पूतों फलो. यह इशारा है कि सिंधुघाटी की औरतें अपना इतिहास नहीं भूली हैं.

मैं लेकिन प्रभु, अब तो सभी भारत के हो चुके हैं. कालों और गोरों का ख़ून हज़ारों साल से एक-दूसरे में खूब मिक्स हुआ है हा...हा...हा...हा. ज़्यादातर तो भूरे हो चुके हैं. उसमें भी बहुत सी शेड्स हैं हा...हा...हा...हा.

मिस्टर मेघ (आँखें तरेर कर) इंटेलिजेंट हो क्योंकि नागवंशी हो, लेकिन बात करने की तमीज़ नहीं. भारत में गोरे कहाँ हैं? गरमी के कारण काले-भूरे हो गए हैं और अंग्रेज़ भी उन्हें भूरा कहते हैं और इनसे दूर रहने में भलाई समझते हैं. तुमने मुझे रंगों में उलझा दिया है, कौवे ! मैं इतिहास की बात कर रहा था और तू मेरे मुँह से नस्लभेदी, रंगभेदी टिप्पणियाँ निकलवा रहा है.

मैं जी...जी...जी, आप इतिहास की बात कर रहे थे.

मिस्टर मेघ तो मध्य एशिया से आए लोग हुए भूरे, और आदिवासी या असली मूलनिवासी हुए काले.....हाँ तो मैं कहाँ था.

मैं   इतिहास में....इतिहास में हम कहाँ हैं?

मिस्टर मेघ हाँ..हाँ..हाँ..वह इतिहास ही है और यह भी इतिहास है. हमारी पहली लड़ाई क्या थी यार, समझ लो कि बहुत बड़ा पंगा था सिकंदर दि ग्रेट के साथ. खोता था लेकिन वह भी घोड़े लाया था अपने साथ. बौध धर्म की लोकप्रियता उसे यहाँ खींच लाई थी.

मैं (मैं बिफरा) मुझे शक है.

मिस्टर मेघ अरे ओ अनपढ़! सिकंदर के रास्ते में जो एरिया था वहाँ कौन था? सिंधुघाटी के लोग. मतलब मेघवंशियों का गढ़. झेलम और चिनाब के बीच में पुरु या पोरस का ही तो राज था न? राजा पुरु हमारा आदमी था. उसका असली नाम पौरुष मेघ था. ससुरों ने उसका नाम बिगाड़ कर पुरु कर दिया. ग़ैर बिरादरियाँ उस पर अपना कब्ज़ा जमाती हैं जबकि उस एरिया में एक ही लड़ाकी कौम थी और उसका नाम था 'मेघ', वृत्र की संताने. बाद में बड़ी मार पड़ी उनको.

मैं   आपकी बात पर विश्वास कौन करेगा?

मिस्टर मेघ न करे. रानी रूठेगी अपना सुहाग लेगी.

मैं   मुहावरा ग़लत हो गया.

मिस्टर मेघ फ़िक्र नहीं....सच्चाई अटल है.

मैं आगे बताएँ सर जी, यह असुर-वसुर क्या चीज़ है?

मिस्टर मेघ पहले जो लोग वेदा-वादी कर रहे थे उन्होंने हमारा इतिहास नष्ट किया. यार इतिहास तो जीतने वाला ही लिखवाता है न? हमें बेवकूफ बनाने के लिए पुराणा-पुराणी भी शुरू कर दी और कामयाब हुए. पहले हमारी रोटी और शिक्षा छीनी और बाद में रोटी के साथ हमें जो पुराणों की कहानियाँ परोसीं, हमें खानी पड़ीं. हम ने मान लिया कि हम बुरे हैं, असुर हैं, राक्षस हैं. थाने में थानेदार का कहा सत वचन होता है. मानना पड़ता है न. लेकिन दूसरी ओर रावण हमारा आदमी था. लंका सिंधुघाटी के लोगों ने बनाई थी. लंका राक्षसों की हो गई और रावण प्रतापी राजा था सो पुराणा-पुराणी करने वाले उसे अपना बताने लगे कि जी वो तो हमारा आदमी है. ओए, बता राम का रंग क्या था?

मैं जी काला.

मिस्टर मेघ और कृष्ण का?

मैं जी काला.

मिस्टर मेघ तो कुछ समझा क्या?

मैं जी नहीं.

मिस्टर मेघ अरे ओ कम अक़्ल, उन्होंने कालों को कालों के हाथों मरवाया. कालों में एकता की बुद्धि नहीं थी.  

मैं   भूल जाइये न पुराणों को. अब तक तो गंगा, यमुना, ब्यास, सतलुज में बहुत-सा पानी बह चुका है. और कहीं हम हैं इतिहास में सर जी?

मिस्टर मेघ बिल्कुल हैं, और बहुत हैं. लोमड़ी इतिहासकारों ने जिस-जिस काल को अंधकार काल’, डार्क पीरियड/डार्क एज या क्लासिकल एज कहा है, उस-उस काल में मेघवंशी सत्ता में थे और यहाँ खूब प्रगति हुई. हमारे बहुत से राजे-महाराजे हो ग़ुज़रे हैं. महाराजा महाबली, सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य...और क्या-क्या नाम गिनाऊँ.

मैं हाँ, उस बारे में मैं थोड़ा जानता हूँ. परंतु अंधकार काल का क्या मतलब?

मिस्टर मेघ सीधी सी बात है कि गोरों-भूरों के हाथों से जब-जब सत्ता का गुड़ छिना उनके जीवन में अंधकार छा गया था.

मैं   लेकिन हमारे जीवन में जो प्रकाश हुआ उसका क्या?

मिस्टर मेघ उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ. उसे भूल जाओ.

मैं   (मैं फिर बिफरा) क्यों भूल जाओ?

मिस्टर मेघ क्यों कि तुम्हें प्रकाश को संभाल कर रखने की आदत नहीं....एकता रखते ही नहीं.

मैं   यह प्रकाश और एकता कहाँ से आ गए? आप विषय से भटक गए हैं.

मिस्टर मेघ तू निरा भगत है, पृथ्वी पर जीने का सुंदर तरीका कुदरत ने बनाया है एकता का. इतिहास उसी से बनता है. बुरा मत मानना, देश भर के मेघवंशियों ने अलग-अलग मरने का रास्ता पकड़ा.

मैं हाय..हाय..कैसे कह लेते हैं आप ऐसी दिल दुखाने वाली बातें? यह बताइये कि मेघों में काले-गोरे-भूरे सभी हैं. कोई-कोई तो यूनानी लगते हैं, एकदम सिकंदर के फौजी. उनका क्या? वे सभी दलित कैसे हो गए.

मिस्टर मेघ बात यूँ है मोहन प्यारे कि सिंधुघाटी सभ्यता के लोग अमन पसंद थे और प्राइवेसी उन्हें बड़ी पंसद थी. पड़ोसी कहीं आवाज़ न सुन ले इसलिए घर भी एक दूसरे से दूर बनाते थे. गाँव भी दूर-दूर बसाए. इकट्ठे न रहने की पुरानी आदत....घर पक्के बनाते थे और समझ लो कि सोते थे खुले आसमान के नीचे, अपने बड़े-बड़े खेत-खलिहानों में. यही बात है कि दले गए.

मैं   क्या मतलब है आपका?

मिस्टर मेघ (मिस्टर मेघ को यह सवाल बहुत नागवार ग़ुज़रा. खीझ कर बोले) कई रंगों के हमलावर आए....कई कलर मिक्स हो गए. बेवकूफ़!! वह समय ही ऐसा था. कलर मिक्स, तकदीर फ़िक्स. तुम देश के 'काले-भूरे' तो समझते हो, मेघों के 'काले-गोरे' नहीं समझते क्या? अब दफ़ा हो जाओ.

मैं   बस..बस..आख़िरी सवाल. हमें मेघ क्यों कहा जाता है.

मिस्टर मेघ (अब मिस्टर मेघ ने लंबे इतिहास जैसी साँस ली. कुछ रुक कर दार्शनिक अंदाज़ में बोले) क्योंकि हम आज भी आसमानी हैं और सारी दुनिया के हैं. इंद्र से ऊँचा आसन है हमारा. हमारी मर्ज़ी, जब चाहे बरसें, और दुनिया पर छाए रहते हैं. सूर्यवंशी और अग्निवंशी हैं. यही है 'मेघ इतिहास' इन नटशेल. और तुम्हारा आने वाला कल बहुत चमकदार है. हुण..तूँ..भई..जा.

इतना कह कर मिस्टर मेघ ने बातचीत में दिए घावों पर अच्छी खासी मरहम लगा दी. मेरा आने वाला कल उज्जवल है, इतिहास प्रकाशमय है. मेरे पास उनकी बातों पर विश्वास करने के कई कारण हैं.

यह तय है कि मेघवंशियों का चमकता इतिहास नष्ट हो चुका है लेकिन मैं उसे ढूँढता हूँ. मेरी जानने की इच्छा प्रबल है तो अखरोट खाने वाले मिस्टर मेघ की बताने की क्षमता कमाल है. वे मेघ इतिहास की खोज में अपने दिमाग़ पर ज़रूरत से अधिक ज़ोर दे चुके हैं. कोई इतिहासकार उनकी बात माने या न माने उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता. इतिहास को जहाँ शून्य कहा गया है वहाँ वे 10 लिखते हैं. इसमें ग़लत क्या है? अगर इतिहास का पन्ना मिट चुका है तो उस पर लिखने का हक़ उन्हें है. आप मेघ हैं तो अपना हाथ आज़माएँ. आपको खाली स्थान भरोका अभ्यास है, तो समझ लीजिए आप स्वयंसिद्ध इतिहासकार हैं. संभव है आपके लिखे पर कल ऐतिहासिक शोध की मोहर लग जाए.

  
(इस रचना में प्रयुक्त अधिकतर संदर्भ पुस्तकों और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री पर आधारित हैं. सभी लिंक्स दिनांक 02-01-2012 को देखे गए हैं.)