22 September 2019

Santram BA, Commitment against casteism - संतराम बीए, जातिवाद के खिलाफ प्रतिबद्धता


हम भारतीय जब किसी मशहूर आदमी का नाम सुनते हैं तो आदतन उसकी जाति ढूंढते हैं. संतराम बीए जैसे व्यक्तित्व के बारे में मैंने भी यही किया था. एक पुस्तक के एक पन्ने की फोटो हाथ लगी थी और उसमें संतराम जी के नाम के साथ ‘मेघ’ शब्द लगा था जिसे केंद्र में रख कर मैंने उस पर ब्लॉग लिखा. होना यह चाहिए कि जब महत्वपूर्ण और असाधारण कार्य करने वाले किसी महापुरुष की बात हम करें तो उसकी बात उसके संपूर्ण कार्य के संदर्भ में करें. जिसने अपना जीवन-संघर्ष और कार्य विस्तार से दर्ज कर दिया है उसके कार्य को शुरू से आखिर तक देखना चाहिए. संभव है कि उसने जिस माने हुए सत्य के साथ कोई काम शुरू किया हो अंत में वो उसी सत्य के खिलाफ़ खड़ा दिखे. उस सत्य का इस्तेमाल और ज़िंदगी का तजुर्बा उसे ऐसा बना सकता है. उसके जीवन में उसकी जाति के अलावा भी ऐसा बहुत कुछ होता है जिसे ध्यान से पढ़ा और देखा जाना चाहिए. उनका साहित्य उनके पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए सीढ़ी का काम करता है. 
संतराम बीए की यह फोटो चारु गुप्ता जी के आलेख में मिली जिसे संतराम जी की दुहिता
मधु चढा जी के सौजन्य से प्रकाशित किया गया है. आप दोनों का आभार.
संतराम जी पर लिखे पिछले ब्लॉग में मैंने भारत सरकार की वेबसाइट का लिंक लगाया था जिस पर उनकी आत्मकथा उपलब्ध थी. एक दिन देखा कि वो लिंक गायब था. इससे थोड़ी तकलीफ हुई. फिर से लिंक की तलाश शुरू की तो एक शोधकर्ता चारु गुप्ता के एक आलेख की पीडीएफ मिली. “Speaking Self, Writing Caste - Recovering the life of Santram B.A.” इससे  अच्छी जानकारी मिली. इसमें कई देशी-विदेशी लेखकों द्वारा बहुजन लेखकों की आत्मकथाओं की विशेषताओं का विश्लेषण दिया गया है जो पढ़ने योग्य है. इसके लिए चारु गुप्ता का आभार. अंग्रेज़ी में लिखे अपने आलेख के शुरू में ही चारु गुप्ता ने इस बात का उल्लेख किया है कि जाति के कारण संतराम जी के साहित्य को हिंदी साहित्य के हाशिए पर रख दिया गया. संतराम जी ने सौ के लगभग पुस्तकें-पुस्तिकाएँ लिखीं. संतराम जी शिक्षित और अध्ययनशील व्यक्ति थे. विज्ञान की जानकारी ने उन्हें तर्कशील बनाया. लेकिन उस समय का हमारा समाज वैज्ञानिक तर्क के साथ खड़ा नहीं था. शायद आज हो.

हमें जानना चाहिए कि संतराम ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की पुस्तक ‘जात पात उन्मूलन’ (एनीहिलेशन ऑफ कास्ट) का हिंदी अनुवाद करके उसे प्रकाशित कराया था. उनकी आत्मकथा से मालूम पड़ता है कि वे हिंदू दायरे में रह कर जातिप्रथा में सुधार की बात करते थे. उनका चिंतन गांधी और अंबेडकर दोनों से प्रभावित था. उनका रास्ता आर्य समाज और आदधर्म आंदोलन के बीच से गुजर रहा था. उनकी आत्मकथा ‘मेरे जीवन के कुछ अनुभव’ जाति प्रथा को चुनौती देती पुस्तक है. वे उसमें लिखते हैं कि यदि आप जाति प्रथा के खिलाफ कोई संघर्ष करते हैं तो आप ही की जाति के लोग आपके खिलाफ खड़े हो जाते हैं, यहां तक कि आपके परिवार के लोग भी. संतराम अपने समय के ऐसे लेखक थे जिनके आलेख उस समय की कई जानी-मानी पत्रिकाओं में छपे. उन्होंने उर्दू पत्रिका ‘क्रांति’ और हिंदी पत्रिका ‘युगांतर’ का संपादन किया. इनके ज़रिए वे जातपात तोड़क मंडल (JPTM) का संदेश देते रहे. स्वतंत्रता के बाद वे होशियारपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘विश्वज्योति’ से जुड़े रहे.

अपनी साधारणता को साथ रखते हुए किसी असाधारण समस्या पर अपनी बात रखना ऐसी कथा है जो बहुजन साहित्य की खास पहचान है. इसे इस संदर्भ में भी देख लेना चाहिए कि संतराम जी ने अपने जीवनकाल में मानवाधिकारों की स्थापना अंग्रेज़ी शासन के दौरान होते देखी थी जिसने बाद में भारतीय संविधान में जगह पाई.

संतराम जी के जीवन बारे में प्रसिद्ध बहुजन लेखक कंवल भारती का यह हिंदी में लिखा आलेख आप ज़रूर पढ़ लीजिए जो फार्वर्ड प्रेस में छपा था. इसमें उनके जीवन-संघर्ष से जुड़ी बहुत मार्मिक बातें वर्णित हैं. इस आलेख से पता चलता है की संतराम जी और राहुल सांकृत्यायन मित्र थे. उनकी मित्रता आर्यसमाज के दायरे से बाहर व्यक्तिगत जीवन तक थी. राहुल सांकृत्यायन ने ही संतराम जी की बिटिया का नाम गार्गी रखा था.

आज संतराम जी का जीवन संघर्ष हमारे लिए एक उदाहरण के रूप में मौजूद है जिसे जानने के बाद हम अपने बारे में बेहतर तरीके से सोचने लगते हैं. चारु गुप्ता का आलेख एक शोध-आलेख (Research Paper) है. उसका अपना महत्व है. लेकिन जो अन्य जानकारियां हमें यहां-वहां से मिलती हैं या पुस्तकों में दर्ज हुई हैं वह हमें तत्कालीन व्यवस्था की बड़ी तस्वीर देती हैं. उसका ऐतिहासिक महत्व है. तब से लेकर आजतक उन परिस्थितियों में कुछ परिवर्तन ज़रूर आया होगा. उसके पीछे कई लोगों और आंदोलनों की भूमिका रही होगी. उसे भी देखा जाना चाहिए.

प्रजापति समाज ने संतराम जी को उनकी जीवनी में उल्लिखित ‘कुम्हार’ शब्द के आधार पर अपनाया है और उन्हें सम्मान दिया है. मुझे उनके जाति नाम में ‘मेघ’ शब्द का उल्लेख आकर्षित कर गया यह अपनी जगह है. मिल रही जानकारी के अनुसार संत राम जी का कुछ साहित्य संभवतः अभी तक अप्रकाशित है. उसमें दर्ज उनके जीवन अनुभव भी प्रकाश में आने चाहिएँ ताकि हम अपनी आज की जीवन-परिस्थितियों के आलोक में कुछ और भी सीखें और आज की जरूरतों के हिसाब से उन्हें बदलें या ख़ुद को ट्यून करें.

आदरणीय संतराम बीए जी के बारे में इतना कुछ जान लेने के बाद मैं सोच में पड़ा हूं कि क्या फर्क पड़ता है यदि संतराम जी मेघ हैं या प्रजापति समाज से हैं. सच्चाई यह है कि हम जिस वृहद् समाज में रह रहे हैं वहां जाति एक हक़ीक़त है और हर व्यक्ति अपनी जाति को लेकर अकेला खड़ा है. जातिवाद की यही खासियत है कि वो एक जाति के भीतर खड़े एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से अलग कर देता है चाहे वो व्यक्ति जातिवाद के खिलाफ़ ही आंदोलन क्यों न कर रहा हो. वो अकेला हो जाता है. इसका असर समाज के उस हिस्से पर भी पड़ रहा है जो जातपात के कारण अभी तक फ़ायदे में रहा.

14 September 2019

King Meghvahana - राजा मेघवाहन

आगे बढ़ने से पहले कृपया नोट कर लें कि मैं इतिहासकार नहीं हूं. मैं अपनी जाति का इतिहास ढूंढता रहा हूं. इस सिलसिले में जो मिला, अच्छा-बुरा, सही-गलत वो सब यहां इकट्ठा हुआ. इसलिए यदि मैं किसी इतिहास संबंधी अवधारणा को गलत मान बैठा हूं या उसे गलत साबित करने की कोशिश की है तो उसका कारण मेरे पढ़े हुए इतिहास के उलट किसी इतिहास का मौजूद होना है.  अब आगे चलें.

जम्मू-कश्मीर के निवासी मेघ और अन्य बहुत से मेघ अपने इतिहास को ‘राजतरंगिणी’ के राजा मेघवाहन में देखते हैं. पता नहीं उनमें से कितने लोगों ने राजतरंगिणी का मूल पाठ (संस्कृत में) पढ़ा. संस्कृत में लिखी राजतरंगिणी मैंने नहीं पढ़ी लेकिन अंग्रेज़ी और हिंदी में अनूदित अंश (तृतीय तरंग के) पढ़े जो मेघवाहन से संबंधित हैं और मैं मानता हूं कि उसमें राजा मेघवाहन का जितना उल्लेख किया गया है वह राजा और उसकी शासन प्रणाली के वर्णन के  लिहाज़ से अपर्याप्त है. राजतरंगिणी के लेखक पं.कल्हण आज के अर्थ में इतिहासकार नहीं थे. लेकिन बहुत से ऐतिहासिक संदर्भों को उन्होंने अपने नज़रिए से रिकार्ड किया. 12वीं शताब्दी में इतिहास लेखन की कोई परंपरा नहीं थी उस काल में कल्हण का कार्य महत्वपूर्ण रहा होगा. आज के इतिहास लेखन से जैसी अपेक्षा हो सकती है वैसी कल्हण से नहीं होनी चाहिए. राजतरंगिणी की लेखन शैली पौराणिक कथा शैली से प्रभावित है.

श्री जोगेश चंदर दत्त ने ‘राजतरंगिणी’ का जो अंग्रेज़ी अनुवाद किया है उसी की पीडीएफ फाइल मेरी नज़र में पहले आई. उसमें बहुत स्पष्ट लिखा था कि राजा मेघवाहन जिस कालखंड में थे उसमें बौधमत का बहुत प्रभाव था. राजा के अलावा उसकी रानियों ने भी बौद्ध मठों का निर्माण करवाया था. उस नेरेशन से तब के जम्मू-कश्मीर में बौद्धमत की व्यापकता का उल्लेख मिलता है. जीवों के प्रति करुणा का भाव फैलाने में मेघवाहन की भूमिका को राजतरंगिणी में सराहा गया है. 

हफ्ता-भर पहले ‘मेघ-चेतना’ के लगभग दस साल तक संपादक रहे श्री एन.सी. भगत ने ‘मेघ-चेतना’ के किसी पुराने अंक में से 4 पृष्ठों की फोटो कॉपी मुझे दी. उसमें प्रकाशित एक आलेख मेघवाहन के बारे में था. उस आलेख के शुरू में ही छपा था “मूल पाठों का सारांश, पंडित कल्हण लिखित कश्मीर के राजाओं का इतिहास, राजतरंगिणी की तृतीय तरंग के आरंभ में ही साक्षात जिनेंद्र भगवान के तुल्य प्रभु मेघवाहन का प्रसंग शुरू होता है.यह रुचिकर था. इसे “आचार्य जैन मुनि श्री विमल मुनि जी महाराज श्री दर्शन मुनि जी महाराज” के सौजन्य से छापा गया था. उक्त आलेख दोनों मुनिजनों ने मिल कर लिखा या पहले वाले मुनि जी महाराज ने लिखा यह स्पष्ट नहीं है. श्री दर्शन मुनि जी महाराज का नाम (संभवतः दर्शन भगत था) लेकिन यह मानने का मेरे पास पर्याप्त कारण है कि जैन दायरे में उनका नाम सुदर्शन मुनि रहा होगा जिनसे मैं कालेज के दिनों में जैन धर्मशाला, सैक्टर-18, चंडीगढ़ में श्री सत्यव्रत शास्त्री जी के साथ मिलने गया था. उक्त आलेख के स्कैन इस ब्लॉग के अंत में दिए गए हैं. श्री सुदर्शन मुनि ऊधमपुर, जम्मू के रहने वाले थे.

मेघ-चेतना’ पत्रिका में छपा उक्त आलेख किसी पौराणिक कथा से कम नहीं. आलेख के शीर्षक में लिखा है - “साक्षात् जिनेंद्र भगवान के तुल्य प्रभु मेघवाहन”. आगे पहले पैराग्राफ में ही लिखा गया है कि “प्राणी मात्र पर दया करने वाले बोधिसत्वों की महिमा को भी उस उत्तम विचार संपन्न राजा ने अपने गंभीर तथा उदात्त चरित्र से परास्त कर दिया.” ऐसा कह कर मेघवाहन को जैनमत का गौरव कहा गया है ऐसा प्रतीत होता है. जोगेश चंदर दत्त के अंग्रेजी अनुवाद में लिखा गया है कि महामेघवाहन बौधमत के अनुयाई थे और उनकी रानियों ने बौद्ध विहार बनवाए थे. यानि दोनों संदर्भों के नेरेशन में तनिक भिन्नता है. 

मेघवाहन को प्रभु जिनेंद्र तुल्य मानना एक सद्भावनापूर्ण सोच है पर ज़रा संभल कर. ओडिशा (जिसे पहले उड़ीसा, Odissa कहा जाता था) में एक महामेघवाहन राजवंश रहा है जिसकी परंपरा में खारवेल जैसे सम्राट जैनमत के अनुयायी थे. अभी तक मेरी नज़र में ऐसा कुछ भी नहीं आया जो कश्मीर के मेघवाहन और ओडिशा के महामेघवाहन बीच कोई तर्कपूर्ण संबंध बिठाता हो. अलबत्ता एक आलेख (यथा 13-09-2019 को देखा गया) ऐसा है जो दोनों को एक साथ रखता है. वहां मेघवाहन और महामेघवाहन को लेकर स्पष्टता की ज़रूरत है.  

अब सवाल रह जाता है कि क्या राजा मेघवाहन ‘मेघ’ नस्ल के थे. राजतरंगिणी में इस बारे में स्पष्ट तो कुछ लिखा नहीं है लेकिन यह ज़रूर लिखा है, “We are ashamed to relate the history of this good king to vulgar men, but those who write according to the Rishis do not care for the taste of their hearers.” इसे अब कोई दिल पर ले ले या नकार दे यह आज उसकी मर्ज़ी पर है.

धार्मिक, इतिहासिक, सामाजिक विषयों पर लिखे ग्रंथों को जब पढ़ना हो तो उनके लेखकों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि को जानना-समझना बहुत ज़रूरी है. उसके बिना आप उनकी रचनाओं के गूढ़ कथ्य को सही सदर्भों में नहीं जान सकते. कल्हण कश्मीरी ब्राह्मण/पंडित थे और रामायण तथा महाभारत के जानकार थे. विकिपीडिया पर कल्हण के बारे में काफी कुछ कहा गया साथ ही यह जानना ज़रूरी है कि इतिहास के बारे में विकिपीडिया बहुत विश्वसनीय स्रोत नहीं है, तथापि कल्हण को इस लिंक से थोड़ा जान लीजिए. यह लिंक 13-09-2019 को देखा गया है.

कल्हण अपनी ‘राजतरंगिणी’ को पौराणिक शैली से मुक्त नहीं रख पाए. इसका एक उदारण मेघवाहन के संदर्भ में उनकी निम्नलिखित टिप्पणी से मिल जाता है, “From that time none violated the king's order against the destruction of animals, neither in water, nor in the skies, nor in forests did animals kill one another.” “...nor in forests did animals kill one another” जैसी बात कहना एक बहुत ही काल्पनिक स्थिति की बात है जिसमें अतिश्योक्ति है और अतिरंजना भी वरना प्रकृति में एक जीव भोजन है दूसरे जीव का.

जहाँ तक करुणा (tenderness) और अहिंसा (non-violence) की बात है करुणा बौधमार्ग की महत्वपूर्ण जीवन शैली है और अहिंसा जैनमार्ग की. बौधमत राज्य की रक्षा और आत्मरक्षा के लिए हिंसा के प्रयोग की अनुमति देता है.

अंत में मेघों का इतिहास जानने के इच्छुक मेघजनों को कह सकता हूँ कि 'राजतरंगिणी' के राजा मेघवाहन की कहानी में मेघों के इतिहास का कोई सिरा नज़र नहीं आता. यदि किसी को नज़र आ जाए तो उसे लिखना चाहिए.

ये लिंक भी देखे जा सकते हैं

Rajtarangini (PDF) (Page 36-37)

नरेंदर सहगल की पुस्तक व्यथित जम्मू-कश्मीर के पृष्ठ 25 पर प्रतिभाशाली मेघवाहन का उल्लेख हुआ है.






09 September 2019

Aryan Invasion? - आर्यों का आक्रमण?

डीएनए रिपोर्टों ने अभी तक पढ़ाए जा रहे इतिहास में कई जगह निशान लगा कर बताया है कि हुज़ूर यहाँ-यहाँ कुछ गड़बड़ है. 2018 में राखीगढ़ी में 4500 साल पुराने (हड़प्पा सभ्यता के समय के) नरकंकाल मिले. डीएनए रिपोर्ट आने से पहले ही तब मीडिया मालिक (पत्रकारों के अवतार में) अपने-अपने सिद्धांतों के साथ टूट पड़े. “ये हमीं है, यह हमारा है, वो सभ्यता हमारी थी, हमने उसे नष्ट नहीं किया था, हम सिंधुघाटी के ही हैं, हमीं ने उसे विकसित किया था, आर्य आक्रमण का सिद्धांत गलत है, अंग्रेज़ों ने हमारे इतिहास को गलत लिखा”. (यानि अंग्रेज़ों के जाने के 70 साल बाद आज तक पढ़ाए जा रहे इतिहास में यदि कुछ गलती है तो उसके ज़िम्मेदार अंग्रेज़ हैं, वग़ैरा).

अब सितंबर 2019 में उन कंकालों की डीएनए और अवशेषों  के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं तो मीडिया फिर उस पर झपट पड़ा कि इसमें यह मेरा है, तुम्हारा क्या है, हम तो पहले से ही कह रहे थे, तुम्हारा तो सिद्धांत ही गलत था, कोई आक्रमण नहीं हुआ बल्कि बाहरी लोग थोड़े-थोड़े करके आए थे, कुछ उधर से इधर आए और कुछ इधर से उधर गए (ऐसी कई बातें और उनसे जुड़े सवाल अपेक्षित थे इसलिए डीएनए रिपोर्ट अपनी सीमाएँ बता गई है और कई स्पष्टीकरण दे गई है) लेकिन सवाल मुख्यतः उस इतिहास पर उठाया जा रहा है जो बच्चों को बताता रहा है कि भारत के लोग असभ्य थे और उन्हें सभ्य बनाने के लिए आर्य लोग बाहर से यहाँ आए थे. डीएनए रिपोर्ट यह भी बता रही है कि दक्षिण एशिया की किसानी यहाँ के स्थानीय लोगों ने ही शुरू की थी. उसका कोई संबंध ईरान या पश्चिम से नहीं है. यानि भारत प्रायद्वीप की सभ्यता यहाँ के स्थानीय बाशिंदों ने ही विकसित की थी.
फिर वो आर्यवर्त क्या चीज़ है? ऊपर उठा हाथ पूछ रहा है कि आर्य का तात्पर्य रेस (नस्ल) से है या श्रेष्ठ से है, यदि श्रेष्ठ से है तो श्रेष्ठता का सिद्धांत कहाँ से आया, किसने पढ़ाया? आज के भारत में जातीय श्रेष्ठता का औचित्य क्या है? उससे अधिक प्रखर सवाल यह हो सकता है कि जातीय श्रेष्ठता पर आधारित व्यवस्था क्यों है.

इसी संदर्भ में कुछ विद्वान यह बात दोहरा रहे हैं कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने लिखा है कि आर्य बाहर से नहीं आए बल्कि वो यहीं के हैं. इस उद्धरण को भी मीडिया मालिक भुनाते फिर रहे हैं. प्रकारांतर से वे उस धारणा को झुठलाना चाहते हैं जो बहुत प्रचारित हो चुकी है कि ‘ब्राह्मण विदेशी’ है. इसी संदर्भ को दूसरे विद्वान कहते हैं कि अंग्रेज़ों के आने से पहले ही भारत के कुछ लोगों ने ख़ुद को बाकियों से श्रेष्ठ कहना शुरू किया था. "आर्य बाहर से नहीं आए" वाली बात को वे डॉ. आंबेडकर की राष्ट्रनिर्माण संबंधी अवधारणा से जोड़ कर देखते हैं और मानते हैं कि भारत में रहने वाले सभी लोग भारत के ही हैं. सभी को मिल कर एक राष्ट्र का निर्माण करना है और उसमें जातीय श्रेष्ठता वाली सोच को बाधा बन कर नहीं आना चाहिए.

फिलहाल संदर्भित रिपोर्ट यह स्थापित कर रही है कि पहले जो पढ़ाया जाता था कि प्राचीन विकसित सभ्यता का विकास बाहर से आए लोगों ने किया वो ग़लत है. वास्तव में वो विकास मूलनिवासियों ने किया था.

अब मेघों के लिए दो शब्द. 'मूलनिवासी' नाम के तहत जो मेघ पहले असहज महसूस कर रहे थे वे अब सहज हो कर बैठ सकते हैं. 

16 August 2019

भाषाशास्त्र में समाजशास्त्र की मिलावट है - Philology is adulterated with Sociology

कहते हैं कि माँ बोली (मातृभाषा) सबसे मीठी और प्यारी भाषा होती है. जब भाषाविज्ञान की कक्षाओं में पढ़ाया गया कि संस्कृत उत्तर भारत की सब भाषाओं की जननी है और बाकी सब भाषाएं भ्रष्ट (अपभ्रंश) भाषाएँ हैं तो अजीब-सा लगा था बल्कि तकलीफ हुई थी. पंजाबी को जिस वर्ग में रखा गया उस वर्ग का नाम ही ‘पैशाची’ रखा गया. कारण समझ में नहीं आता था कि देश भर की इतनी भाषाओं का अपमान करने की ऐसी क्या जरूरत पड़ गई. क्या ‘संस्कृत से इतर’ भाषाएँ या ‘भारत में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाएँ’ कह कर नहीं पढ़ाया जा सकता था? वैदिक संस्कृत का भी विकास हुआ है. कालिदास आदि की उस विकसित संस्कृत को ‘अपभ्रंश संस्कृत’ कहने की युक्ति और उक्ति नहीं सूझी और न ही हिंदी साहित्य को ‘अपभ्रंश साहित्य’ कहा गया.

पिछले कुछ वर्षों के दौरान भाषा विज्ञान में नई खोजों के सदके जानकारी में आया कि संस्कृत भारत की सब भाषाओं की तो क्या किसी एक अन्य भाषा की भी जननी नहीं है. प्राकृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा प्रमाणित हो चुकी है जिसकी बोलियों में पाली, मागधी आदि आती हैं. इस निष्कर्ष पर पहुँचाने वाले ऐतिहासिक और पुरातत्त्वशास्त्रीय (आर्कियॉलोजिकल) संदर्भ और प्रमाण उपलब्ध हैं.

भारत की अन्य भाषाओं के लिए पूर्ववर्ती भाषा विज्ञानियों ने हीनार्थक शब्दों का प्रयोग क्यों किया? कहीं उन शब्दों में सामाजिक संरचना में व्याप्त उच्चता-हीनता की भावना का कोई कोड (कूट) तो नहीं था या यह किन्हीं भाषाओं में शूद्रता स्थापित करने की युक्ति तो नहीं थी?

पिछले दिनों डॉ.राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र’ पढ़ी. भाषा का समाजशास्त्र इस बात का जवाब दे रहा है कि मागधी प्राकृत के साथ संस्कृत के आचार्यों ने दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया है. वास्तव में भाषाई स्थापनाओं (उदाहरण के लिए ‘अपभ्रंश भाषा’ जैसी स्थापना) के कुछ विकृत रूप इतने अधिक प्रचारित कर दिए गए हैं कि उनमें कुछ भी नया जोड़ना या उसमें सुधार की बात उठाना हो तो बहुत से तार्किक सबूतों की ज़रूरत होती है. इसकी भी जांच करनी होगी कि संस्कृत के नाटकों में निम्न श्रेणी के पात्र और महिला पात्र प्राकृत में और उच्च श्रेणी के पात्र संस्कृत में ही क्यों बात करते हैं. पात्रों के बीच भाषा की यह दूरी क्या संकेत करती है इसकी ईमानदार व्याख्या होनी चाहिए.

भाषा में निहित समाजशास्त्र को समाजशास्त्र के नज़रिए से ही परखना पड़ेगा कि वो ‘तत्सम’ और ‘तद्भव’ वाला मकड़जाल क्या है. कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘तद्भव’ शब्द ही वास्तव में ‘तत्सम’ हैं और उन्हें संस्कृत में अनूदित करके उनके संस्कृत रूप को ‘तत्सम’ बता दिया गया हो?

भारत में मुंडा भाषाओं का अपना एक परिवार है जिसमें लैंगिक नस्लवाद नहीं है यानि उनमें प्रत्येक शब्द का लिंग निर्धारण नहीं किया जाता. लेकिन संस्कृत और उसके संपर्क में आई भाषाओं में यह घुसा है. “ईंट या कंप्यूटर ऐसी चीजें नहीं है जिनकी पूँछ उठाकर उनका लिंग निर्धारण किया जाए कि यह शब्द पुलिंग है या स्त्रीलिंग.” 

डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह का यह स्पष्ट मत है कि ‘धातुओं का निर्णय शब्दों को मथने के बाद किया गया है. यानी शब्द उसकी धातु की खोज से पहले विद्यमान थे. इसलिए शब्दों की बनावट की व्याख्या करने वाला ‘धातु’ नामक तत्त्व प्राकृतिक नहीं, कृत्रिम है.’

समाजशास्त्रीय संदर्भों में संस्कृति और अतीत का गौरव उन लोगों के लिए आकर्षण का विषय हो सकता है जिनको व्यवस्था ने बहुत सुख सुविधाएं दे रखी थीं और दी हुई हैं. वंचित लोग किसी सांस्कृतिक गौरव को नहीं ढोते. वे तिरस्कार को ढोते रहे हैं.

जहाँ तक शब्द भंडार का सवाल है पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार और रंगकर्मी बलवंत गार्गी ने एक बार कॉफी पीते हुए मुझे कहा था कि ‘किसी गाँव में तरखाण (बढ़ई) के पास जाओ. वो बताएगा कि कौन-सी लकड़ी की किस गंध को क्या कहते हैं’. इससे ही अहसास हो जाता है कि बढ़ई के पास जो शब्द भंडार है वो संस्कृत और नागर संस्कृति वाली साहित्यिक भाषाओं में नज़र नहीं आता. दरअसल वो भाषाएँ श्रमसंस्कृति के शब्द भंडार के मुकाबले बहुत दरिद्र हैं. ज़रा दिमाग़ पर ज़ोर डालिए और बताइए कि बढ़ई या तरखाण (कारपेंटर) को संस्कृत में क्या कहते होंगे?

संस्कृत की धारा से अलग विकसित भारत की मुख्य भाषाओं के लिए ‘अपभ्रंषता’ की हीन दृष्टि क्यों? मूल पंजाबी भाषा का पता पूछना हो तो वह साहित्यक पंजाबी में या पंजाबी व्याकरण की किताबों में नहीं मिलेगा. उसे बहुत ध्यानपूर्वक पंजाब के रोज़मर्रा के ग्रामीण जीवन में प्रयुक्त शब्दों और ध्वनियों में से चुन-चुन कर इकट्ठा करना पड़ेगा. इस विषय में कार्य करते हुए आप जल्दी ही जान जाएँगे कि पंजाबी संस्कृत और पर्शियन से प्रभावित तो हुई है (उनके कई शब्द यहाँ बस गए हैं) लेकिन पंजाबी का मूल स्वरूप प्राकृत और पाली भाषा वाला है. तुहाड्डा (तुम्हारा), थोड्डा (तुम्हारा) शब्द इसके उदाहरण हैं. पंजाबी में दुद्द (जिसे ‘दुद’ की तरह भी उच्चारित किया जाता है) बोलना पारंपरिक रूप से आसान है. दुग्ध नकली शब्द है लेकिन पढ़ाया यह गया कि दुग्ध से बिगड़ कर दुद्द हो गया है. संस्कृत के ‘दुग्ध निर्मित’ शब्द और ‘दुद्दों बण्या’ (दूध से बना) या ‘दुद्द तों बण्या’ (दूध से बना) शब्दों का विकास एक ही पटरी पर नहीं है. ‘दुग्ध निर्मित’ की पटरी अलग है. पंजाब की बोलियों के मूल में बैठे प्राकृत और पाली के शब्द ही ‘तत्सम’ हैं, इसमें संदेह कैसा?

(इस आलेख का प्रेरणा स्रोत डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र है.’ डॉ. सिंह का हृदय से आभार.)

यह लिंक भी देखें :-


10 August 2019

Megh, Meghs and Many Meghs - मेघ, मेघ और मेघम्मेघ

मेघ रेस के बारे में जानकारी जैसे-जैसे बढ़ी उसे इस ब्लॉग पर एकत्रित किया जाता रहा, जैसे कि जम्मू से लेकर कर्नाटक तक मेघ रेस के लोग बसे हुए हैं. मेघवारों के इतिहास से पता चला कि मेघ रेस के लोग बिहार में भी रह रहे हैं. कर्नल कन्निंघम से पता चला कि मेघ नॉर्थ-ईस्ट में भी हैं. जानकारी इकट्ठा करके ब्लॉग लिखता हूं क्योंकि जिज्ञासु शायद उन्हें पढ़ने आ जाते हैं.

दूसरी ओर यह भी दिखता है कि सोशल मीडिया पर लोग इस चीज को लेकर बहस करते हैं कि क्या वाकई ‘मेघ’ एक रेस है? क्या अन्य प्रदेशों में बसे हुए मेघ, मेघवाल और मेघवार लोग एक ही रेस के हैं? बहस करने वालों को इस बात की भी तकलीफ़ होती है कि जो लोग राजस्थान से पंजाब में आकर बसे हैं और जिन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र मिलता है क्या वे भी मेघ हैं या कोई और हैं? कई बार सोशल मीडिया पर उनकी बहस बेस्वादी हो जाती है. वे मामले को कोर्ट तक ले जाने की बातें करने लगते हैं. उनकी मर्ज़ी. इस बहस के पीछे विषय की जानकारी का अभाव हो सकता है. उस अभाव की पृष्ठभूमि में गरीबी (poverty), भौगोलिक दूरी (distance), अनपढ़ता (illiteracy) और गतिहीनता (immobility) दिख सकती है.

पिछले दिनों रतन लाल गोत्रा जी से बातचीत हो रही थी तो उन्होंने लगभग 20 साल पुरानी एक बात सुनाई. उनका छोटा भाई अपने बिज़नेस के सिलसिले में कश्मीर में अनंतनाग जाया करता था जहाँ से वो क्रिकेट बैट बनाने में इस्तेमाल होने वाली विल्लो लकड़ी मँगवाता था. लकड़ी बेचने वालों का एक बड़ा बुज़ुर्ग वहाँ बैठा रहता था. उसने बताया था कि ‘हमारे बुज़ुर्ग जुलाहे थे और हमारे गोत्र आपके (मेघों के) गोत्रों जैसे हैं. हम यहाँ कसबी कहलाते हैं. मुसलमान बनने के बाद हमें यहाँ की मुस्लिम परंपरा के अनुसार कसबी कहा जाने लगा. आप हमारे अपने ही बंदे हो’. उस बुज़ुर्ग का अपना गोत ‘गोत्रा’ था. जम्मू के श्री दौलतराम (कुमार ए. भारती के पिता जी जो भारत विभाजन के बाद दिल्ली में रिसेटलमेंट अधिकारी के तौर पर कार्य कर चुके थे) ने रतन लाल गोत्रा जी को बताया था कि ज़िला मीरपुर (जो अब पाकिस्तान में है और मुज़फ्फ़राबाद के पास है) के इलाके के कसबी हमारे ही लोग हैं. (कसबी फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ हैः- कारीगर artisan, शिल्पी  artificer, व्यापारी trader). कहने का भाव यह कि धर्म परिवर्तन के कारण नामऔर सरनेम बदल सकते हैं लेकिन पुरखों की परंपरा एक ही रही हो सकती है. हाँ, नाम बदल जाने से पहचान कुछ कठिन हो जाएगी. शब्दों का खेल बहुत टेढ़ा है. नाम या उसकी भाव पर आधारित ध्वनि बदलने से, शब्दों के अनुवाद या अनुसृजन से, क्षेत्र बदलने से, बस्ती, खेत, मैदान, पहाड़, नदी, जंगल, व्यवसाय आदि बदलने से पहचान बदल सकती है. मनुस्मृति ने व्यवसाय बदलने की गुंजाइश पर पाबंदी लगा दी थी इसलिए व्यवसाय आधारित जाति की वही पहचान चलती रही जब तक कि जातियों के खंड करके (उनके भीतर विभाजन करके) उनके खंडों को अलग-अलग नाम नहीं दे दिए गए. इसलिए अपने मूल की पहचान को समझते हुए चलना एक ज़रूरत हो सकती है. 


इस बारे में मैंने जो पहले लिखा है उसे दोहरा रहा हूं कि राजस्थान की ओर से आए हुए जो मेघ रेस के लोग अबोहर-फाजिल्का के इलाके में बसे हुए हैं वो हजारों की तादाद में हैं. उनका जाति संबंधी फैसला राजनीतिक निर्णय के तहत पहले से हो चुका है और उन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र कई दशाब्दियों से दिया जा रहा है. मेरा विचार है कि यह बात बहुत स्पष्ट है और विधि सम्मत भी.

02 August 2019

Megh Organisations, Siwan (Kaithal) - मेघ संगठन, सीवन (कैथल)

पिछले दिनों सुनने में आया था कि भगत महासभा नामक संगठन ने पेहोवा, हरियाणा में समुदाय का सम्मेलन किया था. संगठन के तौर पर भगत महासभा का हरियाणा में यह पहला सम्मेलन था. उसी कार्यक्रम में फैसला किया गया कि अगला कार्यक्रम मेघ जन की बड़ी आबादी वाले शहर सीवन में 28-7-2019 को किया जाएगा.

समझ नहीं आता कि इसे इत्तेफाक कहा जाए या पहचानने की चूक कि 28 जुलाई 2019 को सीवन के जिस सम्मेलन में हम पहुंचे वह 'भगत महासभा' का था जिसमें इस सभा के ऑल इंडिया प्रेसिडेंट राजकुमार प्रोफेसर खुद मुख्य अतिथि थे. बैनर पर उस दिन की तारीख के साथ "आर्य (मेघ) सभा सीवन और मेघ महासम्मेलन" लिखा था. भगत महासभा की इकाई यहां सक्रिय थी जिसने यह कार्यक्रम आयोजित किया था. जो मेहरबान मुझे चंडीगढ़ से सीवन ले गए थे उनके साथ मैं सबसे अगली पंक्ति के कोने में बैठ गया. वहाँ से बिना रुकावट बने फोटो लिए जा सकते थे. थोड़ी देर के बाद भगत महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार अपनी टीम के साथ आए जिसमें जम्मू, पंजाब, हरियाणा से कई और 1-2 राजस्थान से आए हुए सज्जन थे. उनके गले में हार थे और उन्होंने अगली कतार में बैठे हम सभी से प्रेम पूर्वक हाथ मिलाया. फिर उसके बाद हमें डिस्टर्ब किए बिना उनकी टीम के लिए सबसे आगे कुर्सियों की कतार लगाई गई. एक गणमान्य सज्जन ने मुझे भी आगे की कतार में आने के लिए कहा. मैंने मना किया. ('वहां गले में हार पड़ने का खतरा है,'' यह बात मैंने धीरे से अपने प्रिय मित्र ओमप्रकाश गडगाला जी के कान में कही थी. तब तक हमारे लिए "जाते थे जापान पहुँच गए चीन" जैसी स्थिति थी. 

कार्यक्रम शुरू होने पर अतिथियों का परिचय दिया गया तब स्पष्ट हो गया कि कार्यक्रम का आयोजन भगत महासभा की पेहोवा-सीवन की स्थानीय इकाई ने किया था. चंडीगढ़ से चल कर सीवन के ओम पैलेस में जा बैठने तक मुझे जिस आयोजक संस्था के आयोजन स्थल के पते के बारे में जो पता था उसका पता भी यही था (वेरी सॉरी कह रहा हूँ). यहां ऑल इंडिया मेघ सभा की सीवन शाखा के कार्यकर्ता मौजूद थे. सब को एक साथ देख कर मुझे अच्छा ही लगा.

एक बात शुरू में कहता चलूं कि हॉल पूरा भरा हुआ था (लगभग तीन-चार सौ की केपेसिटी रही होगी). महिला सहभागियों का काफी संख्या में आना उत्साहवर्धक था. महिलाओं की सहभागिता और ज़्यादा होनी चाहिए. मंच पर केवल डायस और माइक था और मंच संचालक की कुर्सी थी. वक्ता लोग श्रोताओं के साथ या आगे की कतार में बैठे थे. नाश्ते और भोजन का भी अच्छा प्रबंध था.

भगत महासभा जम्मू में सक्रिय सामाजिक संगठन है. पंजाब में इसकी गतिविधियां समय-समय पर देखी गई हैं. वक्ताओं ने इस अवसर पर जो कहा उसका सार नीचे दिया गया है :-

मेघ समाज के लोग एक मज़बूत और निरंतर आगे बढ़ने वाले (डायनेमिक) संगठन और सक्रिय, गतिशील तथा परिणाम उन्मुख नेतृत्व की जरूरत महसूस करते हैं जो सारे मेघ समाज को (इस संदर्भ में जम्मू, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़) में वैचारिक और संगठनात्मक नेतृत्व दे सके. मेघ समाज विभिन्न स्थानों पर विभिन्न नामों में बंटा हुआ है. जैसे मेघ, भगत, आर्य मेघ, आर्य भगत, कबीरपंथी, जुलाहा आदि. धर्म के नजरिए से मेघ आर्यसमाजी, कबीरपंथी, सिख, राधास्वामी, निरंकारी, सनातनी, डेरे, गद्दियां आदि में बँटे हुए दिखते हैं. वक्ताओं ने अपने समुदाय में शिक्षा के प्रसार के लिए और अधिक जोर देने के साथ-साथ धार्मिक नजरिए से बंटे-बिखरे दिख रहे समाज को सामाजिक संगठनों के माध्यम से इस प्रकार जोड़े रखने की जरूरत पर बल दिया कि समाज अपनी राजनीतिक आवश्यकताओं के लिए हर हाल में इकट्ठा रहे. धार्मिक और राजनीतिक विचारधाराएं जो समाज की एकता को खंडित करती हैं उसके बारे में समुदाय को शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाए ताकि अपेक्षित सियासी लाभ मिल सके. इस संदर्भ में एक वक्ता ने 'मेघ-धर्म' का भी उल्लेख किया जिसकी अवधारणा (कन्सेप्ट) की व्याख्या ज़रूरी है (इस बारे में सोशल मीडिया पर काफी बहस हो चुकी है.)

जो मेघ छात्र शहरों में पढ़ने जाते हैं उनके रहने की व्यवस्था के लिए धर्मशालाएं बनाने की बात उठी. लुधियाना में उपलब्ध ऐसी धर्मशाला का उदाहरण दिया गया. सीवन में किए जा रहे ऐसे प्रयास की जानकारी दी गई जिसका मामला काफी आगे तक पहुँचा हुआ है.

कुछ वक्ताओं ने बताया कि समाज के लोग अक्सर पूछते हैं कि 'मेघ कौन होते हैं'. कई वक्ताओं ने अपने-अपने तरीके से इसका उत्तर दिया. एक वक्ता ने कहा कि 3000 साल पहले हमारे मकान पक्के होते थे, आज बहुत से मकान कच्चे हैं. ऐसा क्यों और कैसे हुआ इसकी संक्षेप में जानकारी दी गई.

पूर्व एमएलए श्री बूटा सिंह ने कहा कि लगभग सभी सामाजिक संगठनों के संविधान में लिखा रहता है कि यह संगठन गैर-राजनीतिक है जबकि सच्चाई यह है कि बिना राजनीतिक (सरकारी) सहायता के समाज का विकास बेहतर तरीके से नहीं हो पाता. राजनीतिक पार्टियों के नाम पर समाज बंट जाता है. दरअसल किसी राजनीतिक पार्टी से टिकट प्राप्त उम्मीदवार को सामाजिक संगठनों के समर्थन की जरूरत होती है और सामाजिक संगठनों की इसमें समुचित सहभागिता होनी चाहिए. (उनका इशारा इस ओर था कि सामाजिक संगठन अपने संविधान का उल्लंघन किए बिना भी सियासी माहौल बनाने और वोट मोबिलाइज़ करने का कार्य कर सकते हैं और प्रेशर ग्रुप (दबाव समूह) बन सकते हैं.)

जम्मू से आए एक प्रतिनिधि ने कहा कि संगठनों को अपने कार्य और कार्य प्रणाली में इतना मजबूत होना चाहिए कि राजनीतिक नेतृत्व को उनकी जरूरत महसूस हो. एक सुझाव यह था कि मेघ समाज के जम्मू, पंजाब और हरियाणा में बने सामाजिक संगठनों की एक कन्फेडरेशन बनाई जाए तो लाभ होगा.

भगत महासभा के अध्यक्ष श्री राजकुमार और ऑल इंडिया मेघ सभा के अध्यक्ष डॉ. सुरिंदर पाल, ऑल इंडिया मेघ सभा की सीवन शाखा के अध्यक्ष राजिंदर सिंह तहसीलदार ने अपने-अपने संगठनों के बारे में विस्तृत जानकारी दी और मेघ समाज के लिए निरंतर कार्य करते रहने का संकल्प दोहराया.

प्रमुख प्रतिनिधियों की सूची इस प्रकार है :-
(सर्वश्री) बोध राज भगत (राष्ट्रीय उपाधयक्ष, भगत महासभा  जम्मू कश्मीर) पवन भगत (चेयरमैन), मोहिंदर भगत (प्रदेश अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर), तरसेम भगत (सहअध्यक्ष), सीता राम भगत, जय भगत, नरेश भगत, सुशील भगत, भगत महासभा पंजाब के प्रदेश अधयक्ष, राजेश भगत (राजू), प्रो रंजीत भगत, रमेश परम्मानन्द, मोहन लाल हैप्पी, सत पाल भगत, विनय भगत, कुलदीप भगत, दर्शन डोगरा, संतोख भगत, डॉ ध्यान सिंह भगत और भक्ष्य नंद भारती (राजस्थान). अंत में अलग-अलग राज्यों से आए मेघ समाज के प्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया और स्मृतिचिह्न भेंट किए गए. (इस अवसर पर कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की गई थी तथापि यह नामों की ऊपर दी गई सूची जम्मू से प्रकाशित न्यूज़ पोर्टल  www.earlyindianews.com से ली गई है जिसका लिंक यहाँ है.)












31 July 2019

A matter for consideration - मुद्दा तवज्जो के लिए

ख्यालों के जंगली घोड़ों को बाँधना नहीं चाहता. मुद्दा बार-बार किसी बहाने से सामने आ जाता है इस लिए यह नोट तैयार करके कुछ लोगों को विचारार्थ दिया है. बाकी समय बताएगा.

जब हमारे मेघ समाज के सबसे पहले शिक्षित हुए दो-एक लोगों मे से एक एडवोकेट हंसराज भगत और अन्य प्रबुद्ध जनों ने मेघ समुदाय को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने के लिए महत्वपूर्ण प्रयत्न किए थे तब की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां आज की परिस्थितियों से इस मायने में अलग थीं कि उस समय ‘अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)’ की सूचियाँ बनाने की कोई बात नहीं हो रही थी. अपने समाज के लिए कुछ राजनीतिक और आर्थिक सुविधाएँ  जुटाने के लिए हंसराज भगत के प्रयासों के बाद सर छोटूराम की सरकार का लिया गया फैसला उचित ही था कि आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन और सामाजिक व्यवस्था द्वारा सीमाओं में बाँधे गए मेघों को अनुसूचित जातियों की सूची में रखा गया. भूलना नहीं चाहिए कि मेघों के अत्यंत खराब आर्थिक और सामाजिक हालात का मुख्य कारण जम्मू में फैली प्लेग की महामारी और अकाल की स्थितियाँ भी रहीं. अंग्रेज़ों के शासन के दौरान औद्योगीकरण ने मेघों को भी बड़े पैमाने पर बेरोज़गार कर दिया. मेघ कृषक, कृषि श्रमिक और बुनकर रहे हैं.

मेघ कब से बुनकरी का कार्य कर रहे हैं इसकी ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती. लेकिन इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि यह समाज कभी क्षत्रिय रहा है. ये प्रमाण पौराणिक कहानियों और इतिहास दोनों में मिल जाते हैं.

आज की स्थिति यह है कि मेघ कबीरपंथी भी हैं जो एक सामाजिक आंदोलन का प्रभाव है. हथकरघा (खड्डियों) का व्यवसाय बर्बाद हो जाने के बाद वे कई अन्य व्यवसायों में भी गए. मेघ कबीर की वाणी से जुड़े रहे हैं क्योंकि अपने व्यवसाय की झलक उन्हें कबीर की वाणी में मिलती थी. कई मेघ पंजाब के सेंसस रिकॉर्ड में कबीरपंथी के तौर पर दर्ज हैं.

यह सवाल मेघ (भगत, कबीरपंथी) समुदाय के लोगों के ज़ेहन में उठता रहा है कि क्या वे ओबीसी के लिए क्वालीफाई करते हैं विशेषकर कबीरपंथी नाम के तहत? कई शिक्षित मेघजनों यह मानते हैं कि यदि अनुसूचित जातियों की सूचियाँ बनाते समय ओबीसी के वर्गीकरण का विकल्प उपलब्ध रहा होता तो एडवोकेट हंसराज भगत पंजाब की मेघ जाति को उसी में शामिल करने की सिफ़ारिश करते. लेकिन उन्होंने मेघों के अत्यधिक आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के कारण उस समय अनुसूचित जातियों में उन्हें रखे जाने का विकल्प चुना जिसमें कुछ आर्थिक सुविधाएँ संभावित थीं.

उसके बाद के समय में मेघों को सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का लाभ मिला है और उनमें एक मध्यम वर्ग उभरा है. यह वर्ग अनुसूचित जाति का कहलाने से बहुत सकुचाता है लेकिन नौकरी या कोई अन्य लाभ पाने के लिए वो जाति प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करता है. वो यह चाहता है कि किसी तरह ‘अनुसूचित जाति’ नाम की पहचान से पीछा छूटे. इस समान्यतः शिक्षित वर्ग में सामाजिक और राजनीतिक जागृति आई है. उनके परिवारों से अन्य जातियों में शादियाँ होती हैं. इस वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी है. लेकिन जो इनके स्तर तक नहीं पहुँचे और जिनकी संख्या काफी अधिक है, उनका क्या? 

जो मेघ गाँवों में रह रहे हैं उनकी संख्या बड़ी है. उन्हें जाति का डंक अधिक झेलना पड़ता है. वे पर्याप्त रूप से जागरूक, शिक्षित और संगठित नहीं हैं. उनका प्रतिनिधित्व करने वाला कोई मज़बूत बुद्धिजीवी वर्ग नहीं मिलता. लेकिन कई शहरों में मेघों के छोटे-छोटे सामाजिक संगठन हैं जिन्हें उनकी बात करनी चाहिए. सोचा जाना चाहिए कि क्या वो अति पिछड़े हुए मेघ समाज के लोग आरक्षण का लाभ उठाने की हालत में हैं? ज़मीनी सच्चाई यह है कि एक तरफ उनका शिक्षा का स्तर बहुत कम है और दूसरी तरफ़ सरकारी नौकरियाँ लगभग ख़त्म हो चुकी हैं. जो बचा-खुचा आरक्षण है उसके प्रावधानों को अदालतों के फैसलों ने इतना कमज़ोर कर दिया है कि वे कारगर नहीं रहे. प्राइवेट सैक्टर में आरक्षण की बात अभी दूर की कौड़ी है.

तुलना करें तो पंजाब में अनुसूचित जातियों के लिए जो आरक्षण के प्रावधान हैं उनके तहत कुछ विशेष जातियों में एक विशेष अनुपात में वो आरक्षण बाँट दिया गया है. ओबीसी को प्रोमोशन में आरक्षण नहीं मिलता. दूसरी तरफ पिछले कई दशकों से कई हथकंडे अपना कर अनुसूचित जातियों के लिए प्रोमोशन के रास्ते बंद ही किए गए हैं. प्रोमोशन में आरक्षण से संबंधित उच्चतम न्यायालय के आदेशों को लागू न होने देने के पीछे प्रशासनिक कारण हो सकते हैं.

भारत के कई राज्यों के बुनकर और कृषि श्रमिक समुदाय ओबीसी में शामिल हैं. (उनकी सूचियाँ एकत्रित की जा सकती हैं). यह एक आधार है जिस पर मेघ समुदाय को ओबीसी में शामिल करने के लिए आवेदन किया जा सकता है. इससे पैदा होने वाले हालात में आरक्षण को लेकर कितना नफा-नुकसान होगा उसका सही आकलन तो नहीं किया सकता लेकिन सामाजिक स्टेटस में होने वाले परिवर्तन को आसानी से समझा जा सकता है. जाति व्यवस्था में जिस स्थान को मेघ अपना समझते रहे हैं और जो उन्हें नहीं मिल पाया उसकी उपेक्षा कैसे की जा सकती है? मेघ जाति क्या है यह बात देश के भीतरी भागों (गाँवों) के लोग नहीं जानते लेकिन यदि उन्हें बताया जाए कि मेघ अनुसूचित जाति में आते हैं तो मेघों को उन जातियों के साथ जोड़ कर देखा जाता है जिनका हिस्सा वो हैं नहीं. गाँवों की यह स्थिति उनके मन में हीनता की भावना पैदा करती है. यदि मेघ जाति ओबीसी में शामिल हो जाती है तो कई दुराग्रहपूर्ण स्थितियों से निजात मिल सकेगी.

एक बात और भी. हम अपनी मौजूदा हालत में अक़सर संतुष्ट हो चुके होते हैं. उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन की आहट से हम आशंकित हो उठते हैं. लेकिन जहाँ हम हैं वहाँ तो हैं ही, बस, उससे थोड़ा बेहतर हो जाए तो वो ज़रूर बेहतर ही होगा उसके लिए कोशिश होनी चाहिए.

कबीर के संदर्भ

पढ़ी-लिखी जमात में कबीर एक समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए जिनका मुख्य कार्य हिंदू धर्म में फैले जातिवाद का विरोध था. जातिवाद को चुनौती देने वाले कई संतजन जान पर खेल गए. 

लगभग सभी ओबीसी जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) या शब्दों का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें जुलाहे, कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली आदि. इसी आधार पर कबीर का महिमा मंडल 'दलित साहित्य' की सीमाएँ तोड़ कर 'ओबीसी साहित्य' तक पहुँचा है. यानी कबीर को अब ओबीसी का प्रतिनिधि साहित्यकार कहा जाता है.

मेघ सदियों से कपड़ा बुनने का कार्य करते आ रहे हैं. वे कबीर की वाणी से इस आधार पर भी प्रभावित रहे हैं कि कबीर ने जो अध्यात्म की शिक्षा दी वो कपड़ा बनाने के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (शब्दों) के साथ भी थी.



विशेष नोट
मेघ समाज के लोग चाहे किसी भी नाम से अपनी पहचान रखते हों (जैसे मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा, आर्य, पंजाबी जाट आदि) लेकिन वे अनुसूचित जाति के तौर पर अपनी जातीय पहचान से हर तरह से असंतुष्ट हैं. वे ओबीसी के तौर पर अपनी पहचान को बेहतर पाएँगे ऐसा कई मेघजनों का मानना है. यह नोट कई लोगों से विचार-विमर्श के बाद बनाया गया है जो समझते हैं कि मेघ समाज को ओबीसी में शामिल करने के लिए कोशिश अवश्य की जानी चाहिए. यह नोट केवल मेघ समाज के भीतर विचार-विमर्श के लिए तैयार किया गया है. - भारत भूषण, चंडीगढ़)


08 July 2019

Your narrative and your theme - आपका कथ्य और आपकी कथा

कुछ जगह ‘मेघ-इतिहास Megh History’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है. उसका आशय ‘मेघों का इतिहास’ रहा होगा ऐसा मैं मानता हूँ. ‘मेघ-इतिहास’ का दूसरा अर्थ ‘बड़ा इतिहास’ हो सकता है. यहाँ ‘आर्य-भक्त’ या ‘आर्यों का भक्त’ वाली प्रयुक्ति याद हो आती है. यह समास पद्धति का कमाल है. इन शब्दों के बारे में यह किसी वैयाकरणिक (ग्रामेरियन) का नेरेटिव है. इस बारे में आपके मन में जो चल रहा है यदि उसे आप लिख देते हैं तो वो आपका नेरेटिव होगा. शब्द का अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि उसके विभिन्न प्रयोगों की कथा में उसका अर्थ क्या-क्या रहा है. शब्द का वो यात्रा वृत्तांत या ‘कथा’ किसी भाषाविज्ञानी का ‘नेरेटिव’ है. इस बारे में हर व्यक्ति का नेरेटिव अलग हो सकता है. यह तो बात हुई दो-तीन शब्दों के ‘नेरेटिव’ की. इसके आगे अब दूसरी कथा है.

पंजाब में 'आप' पार्टी के एक बड़े पदाधिकारी डॉ. शिवदयाल माली ने गढ़ा, जालंधर की आर्य-समाज में सेमिनार का आयोजन किया था जिसमें अपनी बात रखने का मुझे भी मौका मिला. मेरा विषय था- ‘मेघों का पीछोकड़ (अतीत, इतिहास)’. इस विषय पर कहने के लिए काफी कुछ था लेकिन समय की पाबंदी थी, मैंने बात को सीमित रखा. ख़ासकर आर्य-समाज के साहित्य में मेघों के उल्लेख पर मैंने अपनी बात रखी.

मेघों में कहीं-कहीं एक अवधारणा बनी हुई है कि उनके इतिहास का उदय ‘आर्य-समाज’ के शुद्धिकरण आंदोलन के साथ होता है. इसकी वजह है. मेघों की शिक्षा का पहला प्रबंध ‘आर्य-समाज’ संस्था ने किया था जिसके साथ-साथ ‘आर्य-समाज’ ने उन्हें यह भी बताया-पढ़ाया कि मेघों का उद्धार ‘आर्य-समाज’ ने कैसे किया और उसके साथ कौन-सी सामाजिक और धार्मिक कड़ियां जुड़ती थीं. राजनीतिक कड़ियां तो थी ही नहीं और अगर थीं तो वे सवर्ण समाज से जुड़ी  थीं. आशय यह कि जो इतिहास मेघों को पढ़ाया गया वो उतना ही था जितना ‘आर्य-समाज’ ने अपने मिशन को गौरवान्वित करने के लिए लिखा और बताया. लेकिन दूसरी ओर ऐसे इतिहासकार भी हो चुके थे जिन्होंने मेघ (रेस) के ऐसे संदर्भ अपनी पुस्तकों में दिए थे जिनसे मेघों की उपस्थिति दो-अढाई हज़ार वर्ष पहले के इतिहास में नज़र आती थी. मेघों के बारे में आर्य-समाजियों का नेरेटिव अधिकतर ‘शुद्धीकरण’ की संकरी गली में आता-जाता रहा. उससे बाहर के मेघों की बात नहीं हुई. ‘सिंह सभा आंदोलन’ से जुड़ कर जो मेघ सिख बने ‘आर्य-समाज’ के नेरेटिव ने उनसे दूरी बनाए रखी.

‘आर्य-समाज’ द्वारा पढ़ाए गए इतिहास की परंपरा को बढ़ाते हुए मैंने प्रो. कस्तूरी लाल सोत्रा को देखा-सुना-पढ़ा है उनके अलावा कुछ अन्य बुजुर्ग भी इसी कथा के पक्षधर होंगे. इस बारे में मेरी रुचि रहेगी कि क्या उनमें से किसी ने कुछ लिखा भी है. सोत्रा जी ने यहां-वहां कुछ लिखा है. आजकल वे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं.

मेघों के लोक-गायक रांझाराम के बारे में कहा जाता है कि वे ‘मेघों की कथा’ सुनाते थे और उस कथा को सिकंदर (Alexander The Great) से जोड़ते थे. कलाकार का अपना थीम होता है जिसे वो अपनी कथा में बताता है. रांझाराम क्या कथा कहते थे उसका कोई विवरण उपलब्ध नहीं है. तो इस तान को यहीं तोड़ते हैं कि संभव है रांझाराम ने सिकंदर और पोरस (पुरु) की वे कथाएं जानी-सुनी हों जो हमें अन्य स्रोतों से अब मिली हैं. यहाँ जान लेना अच्छा होगा कि पोरस का पुरु के रूप में जो महाभारतीकरण और पौराणीकरण हुआ है वो एक अलग ही कथा है. किसी के लिए वो रोचक हो सकती है.

मेघों के बारे में एक कथा श्री आर.एल. गोत्रा जी की है जिसे उन्होंने दो शीर्षकों से लिखा है ‘Meghs of India’ और ‘Pre-historic Meghs’. इनमें वैदिक और ऐतिहासिक दोनों प्रकार के संदर्भ हैं. गोत्रा जी ने कई जगह स्पष्ट कर दिया है कि इतिहासिक संदर्भ अपनी पृष्ठभूमि के साथ अधिक उपयोगी होते हैं. पौराणिक संदर्भ बात को उलझा देते हैं ('पुराण' शब्द धोखेदार है. कुछ पुराण अंग्रेज़ों के शासन काल में लिखे गए. हो सकता है कुछ पुराण आज लिखे जा रहे हों. मतलब कि ज़रूरी नहीं कि पुराण बहुत पुराने हों). यदि अपने बारे में किसी ने खुद अपनी कही हो तो उसका अलग ही महत्व होता है. आपको और आपकी पृष्ठभूमि को आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता. अपने बारे में अपना इमानदार लेखन आपका इतिवृत्त (इतिहास) होता है. आपके बारे में अन्य का लेखन उनकी आपके बारे में कम जानकारी के कारण पूर्वग्रह (prejudice) और पूर्वाग्रह (bias) से ग्रस्त और अधूरी समझ वाला हो सकता है. इस सब का परिणाम आपके बारे में एक ऐसी छवि का निर्माण हो सकता है जो आपका सत्य ना हो.

पिछले दिनों कर्नल तिलकराज जी ने बताया था कि भार्गव कैंप (जिसे मैं कभी-कभी अनधिकारिक रूप से ‘मेघनगर’ कह देता हूं) वहां रहने वाले लोगों के जीवन के बारे में किसी ने पुस्तक (संभवतः थीसिस) लिखी है. मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने जो थोड़ा-सा बताया (मुझे उनके थोड़ा बताने से बहुत शिकायत है) उसका सार यह था कि इस पुस्तक में मेघों को बहुत ‘सहनशील’ बताया गया है. मैंने ख़ुद कहीं लिखा है कि ‘मेघ समाज कमोबेश एक संतुष्ट समाज है’. मेरे वैसा कहने के पीछे मेघ समाज के व्यापक जीवन के कई संदर्भ समेटने की एक कोशिश थी अन्यथा पूरा समाज संतुष्ट कैसे हो सकता है. लेकिन ‘सहनशील’ शब्द से मेरा माथा ठनका. इसे ठनकने की आदत है. कोई पूरा समुदाय ‘सहनशील’ कैसे हो सकता है? यह किसकी कथा है? और ऐसी क्यों है? मेघ समाज क्या समाज के रूप में कभी प्रतिक्रिया नहीं करता? क्या मेघों के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ कि उनकी सहनशीलता (बरदाश्त) की ताकत जवाब दे गई हो? इन सवालों के जवाब उक्त पुस्तक को पढ़ने के बाद ही मिल सकते हैं. कर्नल तिलकराज द्वारा दिए संकेत से यह तो स्पष्ट है कि एक नई कथा का जन्म हुआ है.

‘सहनशील’ शब्द बहुत मुलायम, नाज़ुक और सौम्य अभिव्यक्ति है जिसमें किसी की शिक्षा, ग़रीबी, मूलभूत संसाधनों की कमी आदि से उठे क्रंदन को छिपाया जा सकता है. फिर भी लिखने वाले की नीयत पर शक नहीं करना चाहिए. लेकिन जो लिखा गया है उसका व्यापक अध्ययन करके अपना नेरेटिव बताया जाना चाहिए.

कबीरपंथ के बैकड्रॉप में मेघों के बारे में डॉ. ध्यान सिंह का पीएचडी की डिग्री के लिए लिखा शोध-ग्रंथ बहुत महत्वपूर्ण है. यह मेघों से संबंधित कई कथाओं को ख़ुद में समेटे हुए है. प्रत्यक्षतः यह सबसे पहले डॉ. सिंह का है लेकिन मुख्य रूप से डॉ. सेवा सिंह का है जो शोध के कार्य में ध्यान सिंह जी के गाईड थे. ज़रूरी नहीं कि इसमें जो जिस तरह से लिखा गया है वो डॉ. ध्यान सिंह का ही हो. इसमें सेवा सिंह जी का नेरेटिव शामिल है. ग़ौर से देखें तो शोधकर्ता और गाईड में यदि मतभेद हो तो अधिकतर मामलों में शोधकर्ता को गाईड के आगे नतमस्तक होना पड़ता है. ख़ैर. इस शोधग्रंथ में पौराणिक कथाओं, आर्य-समाज आंदोलन, सिंह सभा आंदोलन, कबीरपंथी आंदोलन आदि के नेरेटिव से काफ़ी कुछ शामिल किया गया है. शोधग्रंथ के लिए प्रयुक्त पुस्तकों की सूची अकसर बहुत लंबी होती है तो यह मान कर चलना चाहिए कि उसमें अनेक नेरेटिव शामिल किए गए हैं. लेकिन सबसे रुचिकर यह है कि मेघों पर किए गए शोध का शीर्षक ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास’ ही क्यों रखा गया. क्या मेघों की कथा का संबंध कबीरपंथ से है? है तो कितना है और कब से है? उसका एक स्पष्टीकरण तो इस तथ्य में मिल जाता है कि जब यह शोध हुआ (सन् 2008 में प्रस्तुत) तब तक कई जगह मेघों ने ख़ुद को जनगणना के आंकड़ों में ‘कबीरपंथी’ भी लिखवाया हुआ था. मेघ समाज के अपने कबीर मंदिर थे और कबीर साहब की पूजा का प्रचलन था. कहने का तात्पर्य यह कि ‘कबीरपंथ’ नाम का सामाजिक आंदोलन मेघ समाज में दस्तक दे चुका था. उसके रूप-स्वरूप पर अलग से बहस हो सकती है. साथ ही एक बात का नोटिस लिया जाना चाहिए कि मेघ समाज के शैक्षिक-सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की कथा को छोड़ दें तो मेघों के जीवन और व्यवसाय में हुई उन्नति और नए व्यवसायों में उनकी कुशलता और प्रोफेशनल स्किल के बारे में दर्ज की गई पहली सकारात्मक टिप्पणियाँ भी डॉ. सिंह के शोधग्रंथ में आई हैं. मेघों की लोक-परंपराओं का पहला लेखा-जोखा इसी शोधग्रंथ में मिलता है. इसके अलावा याद रहना चाहिए कि लेखक का कोई भी कार्य अंतिम नहीं होता. आशा करनी चाहिए कि आगे चल कर डॉ. ध्यान सिंह वो नरेटिव लिखेंगे जो उनका ख़ुद का होगा जिसे वो साधिकार लिखना चाहेंगे.

जागते रहिए. अपना नेरेटिव अपनी कथा ख़ुद, मतलब 'ख़ुद' लिखिए. अपना कथ्य (थीम) ख़ुद तय कीजिए और दर्ज कीजिए. भोजपुरी में जीने का आशीर्वाद यों दिया जाता है- "जिअजागऽ". जिओ और जागते हुए जिओ.
अपने बारे में बोलिए और लिखिए.



28 June 2019

इतिहास का नया नजरिया - A new point of history

सदियों से वैदिक पौराणिक इतिहास को चुनौतियां नहीं मिली, एक तरफा इतिहास लिखा जाता रहा, लेकिन शिक्षा के प्रचार-प्रसार को धन्यवाद देना पड़ेगा कि कई परंपरागत अवधारणाओं और स्थापनाओं को चुनौती देने के लिए कई विद्वानों ने सप्रमाण अपनी बात कही है जिसकी एक समृद्ध परंपरा इन दिनों दिखने लगी है. इसका एक सशक्त उदाहरण फार्वर्ड प्रेस में छपा एक आलेख है जिसमें डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सिंह के शोध के बारे में कुमार बिंदु का एक आलेख है जो पढ़ने लायक है. उसका लिंक नीचे दिया गया है. 

24 June 2019

Jat Dharma and Megh Dharma - जाटधर्म और मेघधर्म

जाट समुदाय में सक्रिय राजनीतिक संगठन ‘यूनियनिस्ट मिशन’ के अग्रणी श्री राकेश सांगवान से कई मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है. जाट समुदाय के लोग अपने आत्मविश्वासी स्वभाव के कारण पहचाने जाते हैं. जहाँ तक शिक्षा और जानकारी का सवाल है वे कुल मिला कर अभी तीसरी पीढ़ी तक आए हैं जो शिक्षित है. जाति व्यवस्था के आखिरी पायदानों पर खड़े अन्य समुदायों की तरह वे सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्रों में संघर्षरत हैं. हरयाणा जैसे राज्य में वे सत्ता का स्वाद चख कर उसे खो चुके हैं इसलिए उनमें अधिक बेचैनी है. उन्होंने जो खोया है वो बेशकीमती था. ख़ैर.
Rakesh Sangwan राकेश सांगवान
राकेश सांगवान जी ने पाखंड के खिलाफ काफी मुखर हो कर लिखा है जिसका विरोध उनके ही बीरदारी भाइयों ने उन्हें नास्तिक कह कर किया. संभवतः इसी वजह से राकेश जी ने मंशा जताई कि वे आने वाले साल में धन्ना भगत की जयंती पर सिख धर्म अपना लेंगे ताकि कोई उन्हें नास्तिक न कह सके. जाटों के लिए सिखी अनजानी चीज़ नहीं है. जाटों ने सिखी का जी-जान से निर्वाह किया है और वे ख़ुद भी सिखी की जान हैं. उनकी दलील है कि सिखी मीरी-पीरी और पाखंड रहित किरत पर आधारित है जिसे अध्यात्म कहा जाता है. उनकी पोस्ट पढ़ कर मेरे मन में कई विचार कौंधने लगे जिसे कमेंट के तौर पर उन्हें भेजा है. उसी कमेंट को अपने पाठकों के साथ साझा कर रहा हूँ :- “
आपकी यह पोस्ट पढ़ने के बाद कई बातें याद हो आईं. खुशवंत सिंह ने कहीं कहा है कि सिखी का मतलब जाट ही है (उनके ओरिजिनल शब्द याद नहीं लेकिन अर्थ यही था.)
आपकी पोस्टों पर कई लोग आपको नास्तिक कहते रहे हैं. नास्तिक या तर्कशील होना कोई अवगुण या गाली नहीं है. जो लोग इस शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं वास्तव में वे धर्म की अवधारणा (कंसेप्ट) को लेकर भ्रम में है. आदमी धर्म की शरण में नहीं जाता बल्कि वो धर्म यानी किसी आचार-व्यवहार, गुण और विचार को ओढ़ता है. उस ओढ़ने को धर्म कह दिया जाता है. कोई बता रहा था कि ‘धर्म’ की अवधारणा ‘धम्म’ की अवधारणा से अलग है. फिर आपकी यह बात सही है कि धर्म-धर्म खेलना है तो धर्म पकड़ना ही पड़ेगा. एक घुंडी यह है कि यदि कोई कहता है कि वो किसी खास धर्म में जा रहा है तो प्रतिक्रिया बड़ी होती है. यदि वो कहता है कि मेरी गुरु नानक या गुरु गोविंद सिंह या खालसा पंथ में आस्था है तो प्रतिक्रिया की प्रकृति (narrative कह सकते हैं) बदल जाती है. आप की पोस्ट पर कई लोगों ने कमेंट करके जाटधर्म का उल्लेख किया है. एक सज्जन ने कहा है कि जाटधर्म, बौद्धधर्म और सिखधर्म में कोई अंतर नहीं है. सिखिज़्म के लिए ‘सिखी’ शब्द का प्रयोग किया जाता है जो बहुत सटीक है. जीवन शैली के संदर्भ में मुझे सिखी और जाटिज़्म को एक समझने में कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन जब सरकारी फॉर्म में धर्म लिखने की बात आती है तो जाटधर्म या जाटिज़्म शब्द के सरकारी संदर्भ कहीं नहीं मिलते. जाहिर है कि जाटों के इतिहास में जाटधर्म ना तो परिभाषित है और ना स्थापित. उसे जैसे-तैसे परंपरागत हिंदू शब्द के अर्थ में फिट किया गया है. बुद्धिज्म के साथ भी यही हुआ लेकिन नवबौधों ने और सिखों ने अपनी अलग धार्मिक पहचान बनाने की प्रभावी कोशिशें की हैं जो जारी हैं. क्या दलित भी जाटधर्म में आते हैं? मेरा मानना है कि आते हैं क्योंकि इन सभी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में बौधमत है. एक धर्म से दूसरे धर्म में ‘भागने’ का जहां तक सवाल है यह सवाल उन लोगों की सोच से पैदा होता है जिनके दिल में धर्म नाम की चीज का डर इतना बैठा दिया गया है कि ‘धर्म बदलने’ के नाम से ही उनकी धमनियों का चलता रक्त रुकने लगता है. बिना जाने कि धर्म डरने की नहीं बल्कि धारण करने की चीज है. यदि हम धर्म को प्रेत बना लेंगे तो वह पक्का पीछे पड़ेगा वरना धर्म का काम नहीं कि वो इंसान के पीछे पड़े बल्कि यह इंसान का काम है कि वो किसी इंसानी गुण का पीछा करे और उस धर्म को धारण कर ले. सिखी की विशेषता यह है कि वो स्थापित है - समाज में भी, धार्मिक क्षेत्र में भी और राजनीति में भी.” यहाँ स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मैंने इस मुद्दे को महत्व क्यों दिया है. पहली बात यह कि कुछ मेघ सिखी में हैं. दूसरे, धर्म को लेकर मेघों की नई पीढ़ी में बेचैनी और उलझन है. तीसरे, पढ़ी-लिखी पीढ़ी परंपरागत धर्म पर कड़े सवाल ज़ोर से उठाने लगी है. इसके अलावा सोशल मीडिया पर और अन्यथा भी ‘मेघ धर्म’ और ‘मेघ मानवता धर्म’ पर चर्चाएँ होती रही हैं. हो सकता है अन्य जातियों में भी अपने धर्म की पहचान करने की प्रवृत्ति हो. इन जानकारियों का मुझ पर असर हुआ है. इसलिए यह सब लिख डाला.

07 June 2019

Your Cultural Capital - आपकी सांस्कृतिक पूँजी


जून का पहला हफ्ता है. सुबह के पौने पाँच बजे हैं. पक्षियों की 'गुड मॉर्निंग' और 'हैलो-हाय' शुरू हो चुकी है और मैं व्हाट्सएप खोल कर बैठ गया हूँ. एक ग्रुप है जिसमें रात की 'गुड नाइट' से पहले मेघ-जन एक दूसरे को तल्ख़ी और ज़िम्मेदारी से पूछ रहे थे कि- "तुम बताओ, तुमने बिरादरी के लिए क्या किया." इस सवाल पर लंबी बातचीत आख़िर 'गुड नाइट' पर ही ख़त्म होनी थी, हो गई. रात को जो सवाल सो गया था उसका प्रभात भी होना था, हुआ. समाचार-पत्र जैसा सुप्रभात. दशकों पहले समाचार-पत्रों में एक विज्ञापन आया करता था जिसमें खूबसूरत-सा एक राजनीतिक नारा होता था- "यह मत सोचो कि देश ने तुमको क्या दिया, यह सोचो कि तुमने देश को क्या दिया है." नारे का महकता गुलाब सीधा दिल पर आ गिरता था और दिल से आवाज़ आती थी, "सच्ची यार, आदमी को सोचना तो येई चइये कि उसने देश को क्या दिया." बच्चों का और युवाओं का बहुत कुछ देने को दिल कर आता है लेकिन क्या दें इसकी समझ नहीं होती. बात एक वलवला बन कर दिल में रह जाती है. मोटा-मोटी हम जो कार्य करते हैं वो हम देश को देते हैं और हमें जो मिलता है वो देश से मिलता है. सिंपल. सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पूँजी के क्षेत्र में यदि कोई बिरादरी गरीबी रेखा से कुछ ऊपर हो तो एक-दूसरे से कोई तीखे तेवर से नहीं पूछेगा कि 'तुमने बिरादरी के लिए क्या किया.' गरीबी रेखा से नीचे है तभी यह सवाल बनता है. तो...चलो जी वहाँ....वो...देख लेते हैं एक नेता ने कम्युनिटी सेंटर बनवा दिया, श्मशान घाट में बेंच बनवा दिए और शानदार वाशरूम भी, नेता ने एक सामाजिक संगठन खड़ा कर दिया, कबीर मंदिर बनवा दिए, सालाना शोभायात्राएँ निकाल दीं, वगैरा. लेकिन चुनाव में बिरादरी ने उसे जिताया नहीं, हराया भी नहीं बल्कि हरवा दिया. यह सांस्कृतिक और राजनीतिक पूँजी के अभाव की वजह से होता है. इसे वोटिंग वाले लोकतंत्र में किसी बिरादरी के वोटों के बिखराव यानि सियासी ग़रीबी के रूप में पहचाना जाता है. व्हाट्सएप ग्रुप में हो या वो सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गली-नुक्कड़ वाली चिल्लर बहस में हो, उसमें जब कोई पूछता है कि 'तुमने बिरादरी के लिए क्या किया' तो इसे झगड़ा नहीं बल्कि सूचनाओं के आदान-प्रदान की प्रक्रिया का हिस्सा मानना चाहिए. यह एक-दूसरे को और ख़ुद को जानकारियाँ दे कर मज़बूत करने की कोशिश होती है. ढीले ढँग से इसे 'केंकड़ाना टाँग खिंचाई' कह देते हैं लेकिन यह शुरुआती संघर्ष है जो अलग-अलग तौर-तरीक़े से होता है और दिखता ज़रूर है. यहाँ तक कि चलते-चलते ताने मारने वाले एक तरह से आपको अपने भीतर से मिलती ताकत का स्रोत बनने लगते हैं. यदि आपने अपनी बिरादरी (बीरदारी) के लिए सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पूँजी के रूप में कुछ भी संचय करने की दिशा में कार्य किया है तो पक्की बात है कि आपने देश के लिए कुछ किया है और देश को कुछ दिया है. चलिए 'पूँजी' के अर्थ जान लेते हैं. (आगे जो लिखने जा रहा हूँ उसके बारे में दिल में एक डर-सा है. काश इसे सरल शब्दों में लिख सकता. परिभाषाओं के साथ अधिक छेड़-छाड़ नहीं हो सकती क्योंकि ये महीन धागे के अनुशासन में बुनी होती है.)

छात्र जीवन से ही परिभाषाओं के बोझिल शब्दों से डरता हूँ. लेकिन अब शब्दों की जमा पूँजी ने डर कम कर दिया है. लेकिन शब्दों की व्हेट लिफ़्टिंग आज भी करनी पड़ती है.😉

1. तो, सभ्याचारक पूँजी (cultural capital) की परिभाषा को समझते हुए चलना ज़रूरी है जिसे कुछ ऐसे समझाया गया है:- सभ्याचारक पूंजी में एक व्यक्ति की सामाजिक संपत्ति (तालीम, अक़्ल, बोल-वाणी और पोशाक का स्टाइल आदि) शामिल होते हैं जो एक स्तरीकृत (stratified) समाज में सामाजिक गतिशीलता (social mobility) को बढ़ावा देती है. (यानि आप उनकी मदद से समाज में अपना काम-काज आसानी से कर सकते हैं). (यह) सभ्याचारक पूँजी रिवाज़ों की एक अर्थव्यवस्था (विनिमय प्रणाली) के भीतर एक सामाजिक रिश्ते के रूप में कार्य करती है, और इसमें बिना फ़र्क के सभी चीज़ें और प्रतीकात्मक सामान (symbolic goods) शामिल होते हैं, जिसे समाज विरल और प्राप्त करने लायक समझता है. विनिमय (एक्सचेंज) की एक प्रणाली के भीतर एक सामाजिक रिश्ते के रूप में, सभ्याचारक पूंजी में एकत्रित सभ्याचारक ज्ञान शामिल होता है जो सामाजिक हैसियत (social status) और ताकत देता है. (यहाँ पूँजी को ज्ञान, गुण, अभिव्यक्ति, प्रभावोत्पादकता, प्रस्तुतीकरण आदि के रूप में भी देखें).☺

2. सियासी पूंजी राजनीतिक सिद्धांत में इस्तेमाल एक रूपक (metaphor) यानी रूपक है जो रिश्तों, विश्वास, सद्भावना, और राजनेताओं या पार्टियों और अन्य हितधारकों (stakeholders), जैसे घटकों के बीच प्रभाव के ज़रिए बनी ताक़त और संसाधनों के संचय की अवधारणा के लिए उपयोग किया जाता है. राजनीतिक पूंजी को एक प्रकार की मुद्रा के रूप में समझा जा सकता है, जिसका इस्तेमाल मतदाताओं को जुटाने, नीति सुधार, या अन्य राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है. हालाँकि, पूंजी का शाब्दिक रूप नहीं है, लेकिन सियासी पूंजी को अक्सर एक तरह के ऋण, या एक संसाधन (resource) के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसे बैंक किया जा सकता है (संभाल कर रखा जा सकता है, उस पर भरोसा किया जा सकता है), खर्च या गलत तरीके से खर्च किया जा सकता है, निवेशित (invest) किया जा सकता है, खोया जा सकता है और बचा कर भी रखा जा सकता है.

कुछ विचारक प्रतिष्ठित (reputational) पूँजी और प्रतिनिधि (representative) राजनीतिक पूंजी में अंतर करते हैं. प्रतिष्ठित पूंजी एक राजनेता की विश्वसनीयता और दृढ़ता को संदर्भित करती है. इस तरह की पूँजी को निरंतर नीति पोज़िशनिंग करके और वैचारिक नज़रिए को बनाए रख कर संचित किया जा सकता है.