23 February 2018

Social Media: A Freedom - सोशल मीडिया: एक आज़ादी

सोशल मीडिया ने आम और साधारण लोगों को इज़हार की आज़ादी दी है. बहुतों ने तो अपने न्यूज़ चैनल बना लिए हैं. कुछ के लिए सोशल मीडिया क्रेज़ बन चुका है. यह मीडिया आपके विचारों या आपके प्रोडक्ट का विज्ञापन है. जिन समाचारों को तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया (गोदी मीडिया) नहीं दिखाता वो सोशल मीडिया पर मिल जाते हैं.
मनोरंजन और पारिवारिक ईवेंट्स को एक तरफ़ रख दें तो पाएँगे कि सोशल मीडिया पर वैचारिक कंटेंट बहुत अधिक होता है. राजनीति में सक्रिय लोगों ने अपने वैचारिक उत्पादों को इस बड़ी मार्कीट में उतारा है. यहाँ वैचारिकी और उसके फलसफ़ों की भरमार है. उनकी इतनी वैरायटी है कि कभी वहाँ राजनीति प्रमुख हो जाती है, कभी सामाजिक या धार्मिक मुद्दे उठने लगते हैें. हालाँकि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर आप एक विचार पसंद करते हैं तो फेसबुक के इंजिन आपको ख़ुद ही आपके पसंदीदा ग्रुपों, पेजिज़ और विज्ञापनों तक ले जाने लगते हैं. आपका दायरा उसी के अनुसार बनने लगता है. नए दायरे ढूँढने के लिए आपको ख़ास कोशिशें करनी पड़ती हैं.
व्यक्ति का मन कभी-कभी विचारों की भरमार के प्रति रिएक्ट करने लगता है. सोचना पड़ता है कि इतनी तरह की इतनी सारी ‘क्रांतियां’ मेरे दायरे में जब हो रही हैं तो किस क्रांति पर ख़ास ध्यान दिया जाए. किसी विचार की अति हो जाने पर मानव मन बोर हो जाने की हालत में पहुँच जाता है. कुछ लोग अपने दोस्तों को सूचित करते देखे गए कि वे सोशल मीडिया से कुछ दिन या हमेशा के लिए विदा ले रहे हैं. ऐसा वैचारिक अपच की वजह से होता है. सोशल मीडिया पर बैठी विरोधी विचारधारा के सोशल लठैत कई बार इन्नोवेटिव गालियों और हिंसक भाषा से शरीफ़ क्रांतिकारियों में दहशत पैदा करके उन्हें थका देते हैं. हिंसक वीडियोज़ को अपलोड करने का शौक सोशल मीडिया के शरीर में एक नया कैंसर है. फेसबुक ने ऐसे वीडियोज़ पर एक फिल्टर लगा कर अच्छा काम किया है.
यह सोशल मीडिया ख़ासकर पूँजीपतियों, औद्योगिक घरानों द्वारा दी गई एक सुविधा मात्र है. इसे जब चाहे सीमित या समाप्त किया जा सकता है. तब सोशल मीडिया के एडिक्ट लोगों पर क्या ग़ुज़रेगी पता नहीं. उन्हें इसके विकल्पों की तलाश कर लेनी चाहिए.
यहाँ नुक्कड़ बैठकों और ज़मीनी कार्य की अहमियत दिखाई देने लगती है.
हर शाख पर है वैचारिक क्रांति


13 February 2018

National Conference, Sheikh Abdullah and Meghs - नेशनल कान्फ्रेंस, शेख अब्दुल्ला और मेघ

Sheikh Abdullah
जम्मू कश्मीर के मेघ भगतों की सामाजिक और आर्थिक हालत पंजाब, हरियाणा और हिमाचल में बसे मेघों की तुलना में बेहतर है. इसकी वजह है. ऐसा क्यों हुआ इसका कारण सबसे पहले मुझे डॉक्टर ध्यान सिंह के थीसिस ‘“पंजाब में कबीर पंथ का उद्भव और विकास” नामक शोधग्रंथ से मिला जिसमें डॉक्टर सिंह ने उल्लेख किया था कि शेख अब्दुल्ला द्वारा लागू भूमि सुधारों के कारण बहुत से मेघ जमीनों के मालिक बन गए और उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ. यही कारण है कि वे सामाजिक अत्याचार का कम शिकार हुए. नेशनल कांफ्रेंस की नीतियों के कारण उन्हें निश्चित रूप से लाभ हुआ. पिछले कुछ वर्षों के दौरान जम्मू कश्मीर में मेघ भाजपा के प्रभाव में आए और उन्होंने BJP और पीडीपी को वोट देकर सत्ता में बिठाया. मेरी राजनीतिक समझ की बहुत सीमाएं हैं लेकिन पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल का एक वीडियो देखा है जो बहुत अच्छा लगा. उसे नीचे एंबेड कर रहा हूं. इसमें भूमिसुधारों को लेकर शेख अब्दुल्ला की भूमिका पर कुछ प्रकाश डाला गया है. इस वीडियो के कंटेंट का अध्ययन करने की ज़रूरत है.



12 February 2018

Our Professionals - हमारे प्रोफैशनल


जब कोई मेघ भगत अपने बेहतरीन कार्य के लिए जाना जाता है, मान्यता पा कर सुर्ख़ियों में आता है तो मेघ समाज गौरवान्वित महसूस करता है. पिछले महीने पता चला था कि श्री रवि भगत को केंद्र सरकार ने उनकी बेहतरीन प्रशासनिक सेवाओं के लिए दिल्ली बुला कर शाबाशी दी है.
The Tribune समाचार पत्र ने अपने 11 फरवरी के अंक में ‘पंजाब के पैडमैन’ के तौर पर रवि भगत के बारे में एक स्टोरी छापी है (इन दिनों अक्षय कुमार की फिल्म Padman चर्चा में है). नितिन जैन द्वारा की गई स्टोरी बहुत रुचिकर है. इसमें बताया गया है कि फिल्म बनाने वालों को यह विचार तो बाद में आया उससे पहले पंजाब के ज़िला फरीदकोट, अमृतसर और लुधियाना में उपायुक्त रह चुके एक आईएएस अधिकारी रवि भगत ने ग्रामीण और गरीब महिलाओं को माहवारी के दौरान इस्तेमाल होने वाले सस्ते सेनेटरी नेपकिंस उपलब्ध कराने की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर दिया था. यह आलेख आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं - Punjab’s ‘Padman’ has rendered yeoman service

अब रवि भगत के बहाने से कुछ कहना भी है.
गर्व महसूस करते हुए सोच रहा हूँ कि रवि के कार्य को जो मान्यता (recognition) मिली है उसके पीछे उसकी कितनी मेहनत लगी होगी. निश्चय ही उसने अन्य के मुकाबले ज़्यादा और उम्दा कार्य किया है. इस संदर्भ में स्नेहलता कुमार को भी याद किया जा सकता है.
हमारे समाज के अन्य  प्रोफेशनल भी जानते हैं कि सफलता के लिए प्रोफेशन पर फोकस रखना, अपनी बुद्धि का अधिकतम और कई गुणा इस्तेमाल करना, अपने फील्ड के बारे में गहन अध्ययन करना बहुत ज़रूरी है. समाज में उनका कंपीटिशन उनके साथ है जिनके पास बहुत शैक्षणिक पूँजी है. उनके पास बहुत बुद्धिजीवी हैं. हमारा समाज अभी शैक्षणिक पूँजी के निर्माण की प्रक्रिया में है.
प्रोफेशनल सफलता के लिए ज़रूरी है कि फ़ालतू की क्रांतिकारिता से बचा जाए. बिरादरीवाद आपकी बहुत मदद नहीं करता. ये चीज़ें नॉन-प्रोफेशनल्ज़ के लिए छोड़ दें.