25 April 2019

From Hind to Hindu - हिंद से हिंदू तक

कहते है कि ह्यूनसांग ने ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग किया था और कि ‘हिंदू’ शब्द का पहला प्रयोग राधाकांतदेव बहादुर रचित 'शब्दकल्पद्रुम' नामक शब्दकोश में हुआ था जो संस्कृत का काफी पुराना शब्दकोश है हालाँकि इसका प्रकाशन 19वीं शताब्दी में हुआ था. संभव है संस्कृत के अस्तित्व में आने से पहले भारत में उपलब्ध शब्द 'हिंद' (जैसे- हिंदकुश) को संस्कृत में अनुवाद करके 'हिंदू' बना दिया गया हो या किसी उच्चारण प्रवृत्ति के चलते वो ‘हिंदू’ बन गया हो. हिंदकुश शब्द अशोक के समय से पहले का है. यह भाषाविज्ञानियों की स्थापना है.

अपनी स्थापना के साथ ही ‘हिंदू महासभा’ ने ‘हिंदू’ शब्द को विस्तारपूर्वक नए अर्थ के साथ शस्त्र और शास्त्र की तरह उठाया. 1915 से पहले भी लोग ‘हिंदू’ शब्द को जानते थे लेकिन एक क्षेत्र विशेष के लोगों के अर्थ में. कबीर ने भी लिखा - ".....हिंदुअन की हिंदुआई देखी तुरकन की तुरकाई." ये दोनों शब्द क्षेत्र का संकेत देते हैं।

इसमें एक दूसरा फैक्टर भी है. द्रवड़ियन भाषाओं में आखिरी वर्ण के साथ अंत में उ की मात्रा का उच्चारण होता है जिसकी वजह से वे 'बुद्ध' को 'बुद्धु' उच्चारित करते हैं. तीसरे, जिसे निकृष्ट पुरुष की तरह संबोधित करना हो उसके नाम के पीछे ‘उ’ या ‘ऊ’ की मात्रा उच्चारित करने की बुरी ही सही लेकिन एक परंपरा है, उदाहरण के लिए रामू, परसु, मंगलु या मंगलू आदि. यह किसी व्यक्ति को क्षुद्र या पतित करार देने की युक्ति है.

‘हिंदू’ शब्द को काला, चोर, ठग आदि के अर्थ में भी जाना जाता रहा है. इस नज़रिए से देखें तो ‘हिंदू महासभा’ और उसके संगठनों ने ‘हिंदू’ शब्द को व्यापक अर्थ दे कर उसे ग्राह्य बनाने का प्रयास किया और उसे धर्म की सीमा तक खींच ले गए. इस तरह उन्होंने मनुवादी व्यवस्था की व्यापक सीमाओं को स्थापित करने का प्रबंधन किया और अब तक कर रहे हैं. लेकिन उनकी  व्यवस्था से आया जातिवाद उनके गले की फांस बनता जा रहा है. उनके ‘हिंदू’ शब्द को जातिवाद से अलग करना कठिन कार्य है.

‘हिंदू’ शब्द के बारे में यदि ऊपर बताई सरल बात पकड़ में न आए तो यह आलेख आप देख सकते हैं.

16 April 2019

Meghvahana and Megh - मेघवाहन और मेघ


राजतरंगिणी और मेघ लिखते समय और इतिहास का दर्शन समझते हुए कल्हण की राजतरंगिणी के बारे में कुछ समझा भी और कुछ सवाल भी मन में उठे थे. ख़ैर !

जो मेघजनमेघवाहनका नाम सुन करराजतरंगिणीमें अपने इतिहास की प्यास बुझाने आते रहे थे वे ख़ुद को रेगिस्तान में महसूस करते थे. वही अनुभव मेरा भी है. इस पुस्तक मेंमेघवाहनके बारे में जो लिखा गया है उसका सार यह है कि मेघवाहन का पिता उसी युधिष्ठिर का पड़पोता (great grandson) था जिसे गांधार के राजा गोपादित्य ने शरण दी थी. वो सन 25 ईस्वी में उठान पर था और उसने 34 वर्ष तक राज किया. (यह इस शर्त पर यहाँ लिख दिया है कि कोई मुझ से युधिष्ठिर की जन्म-मरण तिथि न पूछे) उसका विवाह असम की एक वैष्णव राजकुमारी अमृतप्रभा से हुआ था, जब कश्मीर का राजा संधिमति अनिच्छुक (unwilling king) साबित हुआ तो उसके कश्मीरी मंत्री (कश्मीरी ब्राह्मण) मेघवाहन को (संभवतः अफ़गानिस्तान से) कश्मीर ले आए थे. मेघवाहन ने पशुवध पर प्रतिबंध लगा दिया, उसने बौद्ध मठ (मोनेस्ट्री) की स्थापना की, उसकी रानियों ने बौद्ध विहार और मठ बनवाए, जिससे उसके बौध राजा होने का संकेत मिलता है. मेघवाहन श्रेष्ठ राजा था, उसने ब्राह्मणों को संरक्षण दिया था.

मेघों का इतिहास जानने के इच्छुक मेघजनों को कह सकता हूँ कि राजतरंगिणी के मेघवाहन की कहानी में मेघों के इतिहास का कोई सिरा नज़र नहीं आता. वैसे भी मेघवाहन को पौराणिक कथाओं के साथ हैशटैग किया गया है जो सोद्देश्य किया गया है, ज़ाहिरा तौर पर यह इतिहास में बहुत कन्फ्यूज़न पैदा करता है. इस बारे में विकिपीडिया पर भरोसा करना अपनी ईमानदारी पर शक करने से भी बुरा है.

बेहतर है कि राजतरंगिणी के 'मेघवाहन' को समय की धारा में बह जाने दीजिए. वैसे आपकी कोशिशों को रोकने की मेरी मंशा नहीं है.


13 April 2019

The Philosophy of History - इतिहास का दर्शन

कहा जाता है कि पहले धर्म विकसित होता है और दर्शन यानी फ़लसफ़ा बाद में. यही बात इतिहास के दर्शन पर भी लागू होती है. पहले इतिहास अस्तित्व में आता है और बाद में उसकी विशेषताओं या दोषों के आधार पर उसका फ़लसफ़ा लिखा जाता है. साधारण शब्दों में कहें तो इतिहासकारों द्वारा लिखी गई सामग्री को समझने के लिए जो तरीक़े विकसित किए जाते हैं उनको ‘इतिहास का दर्शन’ कह दिया जाता है.

इतिहास का अर्थ है वे घटनाएं और कार्य जो इंसानी ज़ात के अतीत को (कालक्रमानुसार भी) बताते हैं. इसके दो भाग होते हैं -  पहला - ‘वास्तव में क्या हुआ’ उसका विश्लेषण, और दूसरा - जो हुआ उसका अध्ययन, विवरण और व्याख्या. इसकी बुनियाद पुरात्त्व संबंधी प्रमाण, पुस्तकीय दस्तावेज़, प्रत्यक्ष स्थिति और अनुमान पर खड़ी होती है.

आज के अर्थ में जिसे इतिहास कहते हैं वैसा इतिहास लिखने की परंपरा भारत में नहीं थी. पहली ऐतिहासिक संदर्भों वाली कल्हणकृत पुस्तक राजतरंगिणी को माना जाता है जिसे बाहरवीं शताब्दी की रचना कहा गया है. इसे भारत में इतिहास लेखन का पाषाणयुग कहा जा सकता है. इसकी अपनी सीमाएँ थीं. इसकी प्रामाणिकता के बारे में आप एक हद तक ही आश्वस्त हो सकते हैं. इसमें पौराणिक संदर्भ बड़ी मात्रा में हैं. कहने का तात्पर्य यह कि 2री से 4थी शताब्दी के बीच संस्कृत में जो साहित्य रचा गया उसे प्रत्यक्ष के साथ गड्डमड्ड करके एक अलग तरह का कथात्मक रूप देने की कोशिश की गई जिसे दुनिया में इतिहास लेखन की मिथ पद्धति के तौर पर ही जाना जाता है.
दूसरा समय वो था जब किसी समय किसी क्षेत्र में पैदा हुए विजेता को ही इतिहास लिखने या लिखवाने का राजकीय या धार्मिक अधिकार था. 'राजतरंगिणी' के बाद भी इस सिलसिले में मिथ (पौराणिक कथाओं) में इतिहास पिरोने की परंपरा जारी रही. यहाँ तक कि कई बार उन्हें आंशिक इतिहास कहना भी कठिन हो जाता है, हालाँकि उनमें ऐतिहासिक संकेत होते हैं या हो सकते हैं. उनमें विजेता वर्ग की कबीलाई कथाएं, परंपराएं और व्यवहार (संस्कृति, सभ्यता) शामिल रहता है. इतिहास लेखन की इस पद्धति में इंसान की प्राकृतिक गरिमा एक संयोग का विषय बन कर रह जाती है. उससे यह जानना कठिन हो जाता है कि तर्कसंगत क्या है और नैतिक रूप से स्वीकार्य क्या है.

18 वीं शताब्दी में 'इतिहास का दर्शन' एक जबरदस्त परिवर्तन से गुज़रा. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के साथ ही ईश्वरीय और धर्म शास्त्रीय नज़रिए को बहुत बड़े स्तर पर चुनौती मिली. इसके साथ ही इतिहास में मिश्रित मिथ और उनकी लेखन शैली पर प्रश्नचिह्नों की बौछार हो गई और वे गलने लगे. अब इतिहास को लेकर एक नया नज़रिया और दर्शन विकसित हो रहा है :-  

“इतिहास सिर्फ वो नहीं है, जिसे शासकों ने लिखवाया है और जो लिखा गया है बल्कि इतिहास वो भी है जिसे हमारे पुरखों ने सहा है और जो लिखा नहीं गया है.”

यानि जो इतिहास लिखा नहीं गया वो अस्तित्व में है. यह दर्शन एक नए इतिहास का निर्माण कर चुका है  जिसका दर्शन बाद में पुनः लिखा जाएगा.