26 September 2018

Megh Sialkotia? No, you are wrong - मेघ सियालकोटिया? नहीं, आप ग़लत कह रहे हैं.

(कल मेघ समाज का नाम रोशन करने वाली आईएएस अधिकारी स्नेह लता कुमार से काफी लंबी बातचीत हुई. काफी देर से जानता हूं कि अपने मेघ समाज के बारे में उनकी सोच में एक नया नज़रिया है जिस पर ध्यान दिया जाना बहुत जरूरी है. यह पोस्ट उनसे हुई बातचीत के बाद लिखी गई है.)

Sneh Lata Kumar
स्वभाविक है कि जब अपने समाज के पुराने इतिहास के बारे में बातचीत हो तो उसमें समाज के पुराने इतिहास की बात ज़रूर होगी. लेकिन वो इतिहास लगभग गुम है. फिलहाल इस बात पर तो चर्चा होती ही है कि हम कहां से चले थे या हम कहां के हैं और यहाँ कब से हैं. ऐसे सवाल इस लिए मन में उठते हैं क्योंकि हमें तारीखों से भारी इतिहास पढ़ने की आदत पड़ी हुई है. हमें अपनी सभ्यता, सभ्याचार और परंपराओं का इतिहास नहीं पढ़ाया जाता. जो पढ़ाया जाता है वो ऐसी भाषा के साहित्य से प्रेरित है जिसका आम आदमी से कोई रिश्ता नहीं रहा. कहीं-कहीं तो वो इतिहास कही जाने वाली पौराणिक कहानियो और इतिहास का मिक्सचर-सा है और उसे धार्मिक जामा ओढ़ा दिया गया है ताकि सवाल न उठें. लेकिन सवाल तो उठते हैं.

पंजाब में बसे मेघों के लिए वह सवाल और भी अहम हो जाता है क्यों कि सियालककोट (पाकिस्तान) से आए हुए उन्हें अभी सत्तर बरस हुए हैं और वे अपने बुज़ुर्गों से देश के बंटवारे की दुख देने वाली बातें सुनते हैं. लेकिन उनकी उत्सुकता इस बात में भी रहती है कि उन्हें ऐसे हालात से कितनी बार गुज़रना पड़ा, उनके वंशकर्ता पुरखों की जड़े कहाँ थीं? धरती पर कहाँ उनके पाँव पड़े, कहाँ से उखड़े, कहाँ जमे आदि? यह सवाल इस नजरिए से ज़रूरी है क्योंकि हाल ही में किसी ने अनजाने मे या गलती से मेघ भगतों को रिफ़्यूजी (शरणार्थी) कहा था जो सिरे से गलत है. 


Dr. Dhian Singh, Ph.D.
भारत के अन्य कई समुदायों की तरह मेघ समुदाय के लोग भी समय-समय पर एक से दूसरी जगह गए हैं. मेघों के जम्मू से सियालकोट जाने की बात डॉक्टर ध्यान सिंह के शोधग्रंथ में उल्लिखित है. उन्होंने यह महत्वपूर्ण बात रिकार्ड की है कि मेघ समुदाय के बहुत से लोग रोजगार की तलाश में सियालकोट की ओर गए और वहाँ बस भी गए. वहाँ रोजगार के अधिक अवसर और नियमित आय के बेहतर साधन उपलब्ध थे. उनका वहाँ जाना एक मानवीय आवश्यकता थी और स्वभाविक भी. इक्का-दुक्का परिवारों ने अन्य कारणों से जम्मू रियासत से बाहर जा कर अंगरेज़ों द्वारा शासित सियालकोट के इलाके में पनाह ली. 

1947 में भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ. पाकिस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र बन गया. सामान्य मेघ (जिनका इस्लाम से केवल पड़ोसी का रिश्ता था) भारत में आ गए और कई शहरों, क़सबों और गाँवों में बसे. अपनी ज़मीनों आदि के बदले भारत में उन्हें कुछ क्लेम या ज़मीन मिल गई. शुरुआती संघर्ष के बाद उनका सामान्य जीवन शुरू हुआ. 

कुछ मेघों का मानना है कि उनका इतिहास भारत विभाजन के बाद पंजाब में आ बसने के बाद ही शुरू होता है या उसे उसके बाद शुरू हुआ माना जाना चाहिए. लेकिन इसका अर्थ यह होगा कि भारत विभाजन से पहले यह समुदाय कहीं था ही नहीं और अचानक पंजाब में उभर आया था. जैसा कि ऊपर कहा गया है मेघ रोज़गार की तलाश में जम्मू से सियालकोट गए थे. इस नज़रिए से नहीं कहा जा सकता कि इनका मूलस्थान सियालकोट था. आज भी इनकी अधिकतर जनसंख्या जम्मू में है. इतिहास के ज्ञात तथ्यों के अनुसार मेघों का मूलस्थान जम्मू-कश्मीर का क्षेत्र है जहाँ ये अधिक संख्या में बसे हैं. उसे डुग्गर का क्षेत्र कहा जाता है. बहुत से मेघ उसी क्षेत्र के नाम पर अपना सरनेम 'डोगरा' लिखते हैं. लॉर्ड कन्निंघम की मानें तो ‘त्रिगर्त’ शब्द के तहत डुग्गर क्षेत्र जालंधर तक फैला है. जालंधर में रहने वाले कुछ मेघ अपने नाम के साथ 'डोगरा' लगाते हैं. ‘सियालकोटी मेघ’ या ‘हम सियालकोट से आए थे’ जैसे शब्द अर्थहीन और तर्कहीन है. 

मेघ भगत जम्मू-कश्मीर के हैं और वही उनका तथ्यात्मक मूलस्थान है. क्षेत्र के आधार पर वे डोगरे तो हैं ही.

22 September 2018

Megh Chetna - मेघ चेतना अप्रैल-जून 2018


ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका मेघ-चेतना का माह अप्रैल-जून 2018 का अंक ऑनलाइन प्रकाशित कर दिया गया है. यह निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है.