"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


10 April 2021

From Madra to Megh - मद्र से मेघ तक - 2

 डॉ वियोगी ने पौराणिक साहित्य से भी संदर्भ ले लिए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार मग या मद्र, भारत में शाक द्वीप यानि ईरान से आए। (नवल जी की पुस्तक में ‘शका’ छपा है। संभवतः यह शाक शब्द है।) इस द्वीप के मगों में चार जातियां थीं- मग, मगध, मानस और मंदगा अथवा मद्र यानी भारत की तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र यानी मद्र शूद्र थे। जैसा कि पहले बताया गया है मीडिया (Media region) के निवासी मीड (Mede) भारत में मद्र कहलाए। (कुछ अन्य विद्वानों ने लिप्यंतरण करते हुए Mede को ‘मेदे’ भी लिखा है)। मग या मघ एक ही जनजाति थी। पहली जनजाति में से दूसरी उभरी। हेरोडोटस (Herodotus) ने उन्हें मद्रों की एक शाखा बतलाया है, क्योंकि वे मूलरूप से अनार्य थे। भारत में मद्र शिल्पकार अथवा बुनकर के रूप में दिखते हैं, क्योंकि मगों का संबंध मद्रों से था, इसलिए वे बुनकर थे और पुजारी भी। इन्हीं परिस्थितियों में पश्चिम एशिया में मेघ जाति विकसित हुई क्योंकि उनके समाज में ऐसी ही परंपरा थी। मेघ, समाज के एक विशेष वर्ग का पुजारी है। मुख्यतया वे मातृदेवी की पूजा से जुड़े हैं जो जनजातीय परंपरा है। उनके अनेक गोत्र नाम ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं। जब कि उनसे संबंधित औडुंबरा या डूम वर्ग के लगभग सारे गोत्र ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं।

तीसरे दौर में भारत आए मेघों से संबंधित वर्ग को विदेशी और म्लेच्छ होने के कारण बहुत समय तक मान्यता नहीं मिली। दूसरी सदी में जब पार्थियन व शकों का राज्य था उन्हें द्विज की मान्यता मिली। इस सम्मानजनक स्थिति पर मज़बूत पकड़ बनाए रखने के लिए उन्होंने ब्राह्मण व ब्राह्मणवाद की बड़ी सेवा की। जातिवाद को मज़बूत करने के लिए कड़े कानून बनाए और स्मृतियों में जोड़े। उसी का परिणाम है कि गंगा घाटी में जातिवाद अपने अत्यंत घिनौने रूप में मिलता है।

‘गोत्र’ के बारे में बताते हुए नवल जी लिखते हैं कि भारत की जलवायु आर्यों के लिए गर्म थी। इसलिए उन्होंने यहां के वनों में आश्रम बना कर रहना शुरू किया। वे चरवाहे थे और गाएं चराते थे। अनेक ऋषि अपनी गायों को विशेष पहचान देने के लिए उनके कान काटकर खास निशानी लगाते थे ताकि उनकी पहचान की जा सके। उस निशान को गोत्र कहते थे। उसी गोत्र के आधार पर आश्रम और ऋषि की पहचान होने लगी। पहले चार गोत्र थे- अंग्रिश कश्यप, अथर्वा, वशिष्ठ तथा भृगु। बाद में चार और जुड़ गए - जगदग्नि, अत्रि, विश्वामित्र तथा अगस्त्य। उनमें अनार्य (ईरान से आए मग) वर्ग के ऋषि भी शामिल थे। जब जाति विभाजन कठोर हो गया और लोगों को यकीन हो गया कि आर्य ऋषियों के गोत्र वाले ही वास्तव में ब्राह्मण हैं और अब्राह्मण का अपना कोई गोत्र नहीं हो सकता तब इसी सिलसिले में यज्ञ करते हुए गोत्र नाम बोलने की परंपरा शुरू हुई। क्षत्रिय और वैश्य अपने पुरोहित का ही गोत्र नाम इस्तेमाल करने लगे। विभिन्न वर्णों में समान गोत्र नामों की यह वजह रही। गोत्र परंपरा से पहले पुरोहित और क्षत्रिय ख़ुद को एक ही वर्ग का नहीं मानते थे। इससे जातिवाद विकसित हुआ।

डॉ नवल के अनुसार विश्वामित्र व कण्व कश्यप अनार्य ऋषि थे। महाभारत के अनुसार कश्यप ही नागों (मग) के जनक थे। वशिष्ठ तथा विश्वामित्र का टकराव आर्य-अनार्य का ही टकराव प्रतीत होता है जो बहुत स्पष्ट भी नहीं है। बंगाल के चंदा नामक विद्वान के हवाले से वे लिखते हैं कि इस काल में ब्राह्मणों का लोभ बहुत बढ़ गया था। लोभ व हित साधना के लिए झूठी परंपराएं और निरर्थक अनुष्ठान प्रारंभ किए गए। सारी सामाजिक व धार्मिक व्यवस्था जैसे उनकी मुट्ठी में आ गई। यजमानों की प्रशंसा बहुत बढ़ा-चढ़ा कर की जाती थी। उन्हें लंबी आयु और अमर पद का लालच दिखाया जाता था। अहीन यज्ञ में 1000 गायें अथवा सारी संपत्ति दान करनी होती थी। गुप्त काल में धर्म व मंदिरों की लूट यथावत जारी रही।

डॉ नवल लिखते हैं, “मद्र अथवा मेघ समाज में प्राचीन काल से ही गणसंघ, गणतंत्र व्यवस्था की परंपरा थी। उनका प्रत्येक नागरिक एक बहादुर सैनिक तथा कुशल शिल्पकार होता था। उनमें राजऋषि परंपरा थी। वह जाति-पांति विहीन समाज था। वहां हर मनुष्य जन्म से ही बराबर था। वे प्रारंभ से असीरियन धर्म के मानने वाले थे। उसका आधार सांख्य दर्शन था। उसने बौद्ध व जैन धर्म को जन्म दिया था। यानी वे बौद्ध अथवा जैन धर्म के अनुयायी थे। बौद्ध धर्मी ब्राह्मणों के सबसे बड़े शत्रु थे। जब गुप्त युग में उनका बलात हिन्दूकरण किया गया तो उन्हें उसी शत्रुता के कारण चौथे वर्ण में धकेल दिया गया। इसका अन्य कारण भी था कि वे मूलरूप में बुनकर थे। क्योंकि बौद्ध-धम्म में मांसाहार की आज्ञा थी यहां तक कि उन्हें मृत पशु का मांस खाने की आज्ञा भी थी अतः मेघों को अछूत वर्ग में धकेल दिया गया। यानी एक भाई ने अपने ही भाई की यह दुर्गति की है।” “गुप्त भले ही उसी नाग समाज के राजा थे, मगर उनका भी आर्यकरण कर दिया गया और बौद्धों पर धार्मिक अनाचार करने में उन्होंने ब्राह्मणों का पूरा-पूरा साथ दिया।”

आधुनिक काल में जम्मू के क्षेत्र के प्राचीन निवासी मेघों की स्थिति बहुत खराब रही। वे बंधुआ मज़दूरों का जीवन जी रहे थे। काम के बदले उन्हें सूखी रोटी और उतरन मिलती। जिनके पास थोड़ी-बहुत ज़मीन थी उसे नैतिक-अनैतिक तरीकों से राजपूतों ने हड़प लिया। जम्मू व सिआलकोट के क्षेत्र में वे खेतिहार मज़दूर थे। अछूत होने के कारण वे घरों तथा मंदिरों में प्रवेश करने का साहस नहीं कर सकते थे। कुओं से पानी नहीं ले सकते थे। वे अधिकतर बुनकर, खेत मज़दूर और कारख़ानों में मज़दूर थे। लेखक काहण सिंह बिलौरिया ने लिखा है, "मेघ निचली जातियों के पुजारी हैं।" भूमि सुधारों के कारण उनमें से कुछ को ज़मीनें अलॉट हुई हैं। वे खेती करने लगे हैं।

प्रो. हरिओम शर्मा अपनी रचना 'हिस्ट्री आफ जम्मू एण्ड कश्मीर' में लिखते हैं- “उच्च शिक्षा तथा नौकरियों में आरक्षण के कारण अनेक मेघ ऊंची श्रेणी के पदों आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस., डॉक्टर, इंजीनियर, बैंक प्रबंधक सेवाओं के पदों तक पहुंच गए हैं।"

कुछ अभिलेखों से प्रमाण मिले हैं कि अनेक मेघ ठाकुर जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के राज्यों में शासक रहे हैं। पठानकोट के पठानिया राजवंश का संबंध मद्र या मेघ समाज के साथ था। उन्हें मूल रूप से औडुंबरा पुकारा जाता था। उसी से डूम शब्द बना। मुग़लों के शासन काल में पठानिया प्रसिद्धि प्राप्त शासक थे। वे राजपूत पुकारे जाते थे। सिखों के शासन काल तक वे सत्ता में रहे। मद्र तथा मेघों की तरह यह एक बुनकर जाति थी।

मेघों के इतिहास  का यह बहुत ही संक्षिप्त वर्णन है। बेहतर होगा कि डॉ नवल वियोगी की मूल पुस्तक ‘मद्रों और मेघों का प्राचीन और आधुनिक इतिहास’ ध्यान से पूरी पढ़ी जाए और ख़रीद कर पढ़ी जाए। फिर से अनुरोध है उनकी मेहनत का सम्मान होना चाहिए।

पुस्तक का नाम: मद्रों और मेघों का प्राचीन व आधुनिक इतिहास

लेखक - डॉ नवल वियोगी

प्रकाशक - सम्यक प्रकाशन, 32/3, पश्चिम पुरी, 

नई दिल्ली-110063

खरीद के लिए संपर्क - मोबाइल - 9810249452, 9818390161


03 April 2021

From Madra to Megh - मद्र से मेघ तक -1

डॉ नवल वियोगी ने मेघों की लगभग पूरी कथा लिख डाली। यह बात समझी जा सकती है कि उनके द्वारा इकट्ठी की गई जानकारी पूरे मेघ समाज तक जल्द पहुंचने वाली नहीं है। यह चिट्ठा एक कोशिश है कि नवल जी ने जो खोजा-पाया है उसकी कहानी का सार मेघनेट के पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश की जाए। यह स्कैच मात्र है। बेहतर होगा कि उनकी लिखी पुस्तक ‘मद्रों और मेघों का प्राचीन और आधुनिक इतिहास’ पूरी पढ़ी जाए और ख़रीद कर पढ़ी जाए। उनकी मेहनत की क़द्र की जानी चाहिए।

‘मेघ’ (जनजाति) शब्द की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों ने कई अनुमान लगाए गए हैं। लेकिन जाति नाम के तौर पर यह शब्द कब और कैसे अस्तित्व में आया इसका कुछ उत्तर डॉ नवल की पुस्तक में मिल जाता है। इसका मद्र, मग, मागी, मीडिया (दक्षिणी ईरान का क्षेत्र) से संबंध है ऐसा इतिहासकार ने बताया है। 

मद्र नामक जनजाति ईरान के मीडिया प्रदेश में रहती थी। उनके पुजारी या पुरोहित मग कहलाते थे। उनकी भाषा अमेगीर (Emagir) थी। वे मग बेबीलोनिया और काल्डिया में भी पुजारी थे। वहीं से इनका भारत में आगमन हुआ था। नस्ली तौर पर वे द्रविड़ थे। मीडिया में गोल सिर वाले अल्पाइन अथवा कसाहट लोगों के साथ दीर्घकाल तक रहने के कारण उनमें संकरण हुआ। उनके समाज में राजऋषि परंपरा थी। शासक राजा धार्मिक मुखिया भी होता था। इसलिए मग धीरे-धीरे पुजारी बन गए।

उनका समाज गणतांत्रिक था। जहां प्रत्येक नागरिक बराबर था। उनकी सामाजिक परंपराओं के अनुसार सभी नागरिक बहादुर सैनिक होते थे और कुशल शिल्पी भी। मद्रों का संबंध जोहाक नाग राजपरिवार के साथ था। मद्र भारत में जोहाक या तक्षक नाग परिवार की एक शाखा के रूप में हैं। अर्थात मद्रों और मगों दोनों का संबंध उस जोहाक या नाग परिवार के साथ था जो गांधार और तक्षशिला के शासक थे। 2500-2100 ई.पू. जब आर्य ईरान आए तब वहां के शासक बन गए। उनमें पशु-वध से जुड़ी यज्ञ परंपरा थी। मग राजऋषि उनकी यज्ञ परंपरा से जुड़े और उनके पुजारी बने। 

मगों का भारत में पहला आगमन तब हुआ जब आर्यों ने ईरान पर आक्रमण किया। जीवन रक्षा के लिए वे कई अन्य ईरानियों के साथ भारत भू-भाग में आ गए। वे अपना असीरियन धर्म भी साथ लाए। यह सांख्य दर्शन पर आधारित था। इसी में से बौध और जैन धर्म आए। ये बराबरी और भाईचारे पर आधारित थे। आर्यों ने 1650 ई.पू. भारत पर आक्रमण किया तब मग भी उनके साथ भारत आए। मगों ने ऋग्वेद की रचना और जाति आधारित व्यवस्था निर्माण में मदद की। मग द्रविड़ थे लेकिन आर्यों के साथ रहने के कारण ख़ुद को आर्य समझने लगे थे। लेकिन आर्यों ने उन्हें आर्य नहीं माना।

मीडिया के मग पुरोहित तंत्र विकसित करने की ओर प्रवृत्त रहे। ईरान में कोई यज्ञ उनके बिना नहीं होता था। उन्होंने ज्योतिष विद्या विकसित की। वे सपनों के आधार पर भविष्य बताते थे। इन्हीं कलाओं की सहायता से वे राजाओं-महाराजाओं की निकटता प्राप्त कर पाए। अंधविश्वासी होने के साथ-साथ वे झूठा दिखावा भी करते थे। इससे उन्हें राजनीति में घुसपैठ करने और समाज में महत्व पाने का अवसर मिला। तभी एक हादसा हो गया। अख़माइन राजवंश के राजकुमार डेरियस प्रथम के सिंहासनारूढ़ होने में गोमत नामत मशहूर राजऋषि मग नेता बाधा बन गया। नतीजतन उसकी और उसके मागी साथियों की हत्या कर दी गई। उन्हें सबक सिखाने के लिए एक मेगाफ़ोनिया नाम का पर्व मनाया जाने लगा। किसी एक मग को पकड़ कर उसे 5 दिन के लिए ईरान की राजगद्दी पर बिठाया जाता। उसके बाद उसे फांसी दे दी जाती। इस दिन मगियों को कई तरह से अपमानित किया जाता। जिससे वे अपने घरों में छिप जाते। बरसों के अपमान से दुखी होकर 521 ई.पू. के आसपास वे मग बलुचिस्तान, सिंध, गुजरात व विन्ध्याचल के रास्ते मगध में चले गए। यहां भी 5-6 सौ साल तक वे हिंदू समाज का हिस्सा नहीं बन सके। उन्हें म्लेच्छ, मग, विदेशी, यवन, पारसी कहकर पुकारा गया। आखिर उन्हें दूसरी सदी में ब्राह्मण के तौर पर मान्यता मिल गई। लेकिन आर्यों ने उन्हें ख़ुद से नीचे रखा। वे मग, शांकल, कश्यप अथवा कान्यकुब्ज ब्राह्मण कहलाए। डॉ वियोगी ने बताया है कि भविष्य पुराण में उन म्लेच्छ ब्राह्मणों के 10 गोत्र बताए हैं- कश्यप, उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्निहोत्री, द्विवेदी, पांडेय, चतुर्वेदी। आगे चल कर इन्हीं ब्राह्मणों ने हिंदू धर्म को ऊंचाइयों तक पहुंचाया। हिंदू धर्म के कठोर नियम बनाए और पूर्व ग्रंथों में उन्हें जोड़ा।

डॉ वियोगी ने बताया है कि प्राचीन काल में, पश्चिम एशिया से तीन प्रमुख अनार्य जनजातियां आईं- जोहाक अथवा तक्षक नाग, हाइक्सोस अथवा इक्ष्वाकु, यादव अथवा पंचजन्य। ये सभी मूल रूप से एक ही थे। तीनों ही सिंधु घाटी के बसाने वाले थे। अस्थाना शशि और हेरोडोटस के हवाले से बताया गया है कि मीडिया के मीड तथा भारत के मद्र भिन्न नहीं थे। वे मग या मागी मद्रों की ही एक शाखा थे।

उशीनर गणराज्य का एक भाग झंग मधियाना (मग से मधियाना) कहा जाता था। यह दोआब के दक्षिणी भाग में था। उशीनर जन मद्रों से संबंधित थे। यानी मद्र या मग मीडिया की तरह यहां भी एक साथ ही निवास करते थे। आगे चल कर मद्रों ने सिआलकोट (शांकल) पर दीर्घ काल तक राज किया। कौरवों-पांडवों के साथ उनके वैवाहिक संबंध होते थे। सिकंदर के आक्रमण (326 ई.पू.) के समय मद्र अथवा पौरुष उस क्षेत्र में निवासित थे। यहीं से मद्रों के पौराणिक और इतिहासिक सूत्र मिलने लगते हैं।

मगों की एक मुख्य शाखा ने आगे बढ़कर भारत के मध्य-पूर्व में शासन किया। वे चेदि पुकारे जाने लगे थे। उन्हीं की एक शाखा ने मगध पर शासन किया। जरासंध चेदि वंश का प्रसिद्ध राजा था जिसे राक्षस या असुर कहा गया है। कृष्ण और पांडवों के साथ युद्ध में वह मारा गया। चेदियों की एक शाखा ने दक्षिण कोसल व कलिंग पर अधिकार जमाया, नंदों और अशोक महान से युद्ध किया। उन्हीं की एक शाखा थी खारवेल या महामेघवाहन। उसने दक्षिण-पूर्व में बहुत ही शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया। ये लोग जैन धर्म के अनुयायी और उसके रक्षक थे। उनकी एक शाखा ने 129 ई.-217 ई. तक कोसंबी में शासन किया। वे बौद्ध धम्म के अनुयायी थे। उनमें 9 बड़े राजा और छोटे 10 राजा हुए। प्रमुख राजाओं के नाम थे- मघ, भीमसेन, मद्रमघ व प्रोष्ठाश्री, भट्टदेव, कौत्सीपुत्र, शिवमघ प्रथम, वेश्रवण, शिवमघ द्वितीय, तथा भीम वर्मन। उनके शिलालेख और मुद्राएं मिली हैं। उनके आखिरी राजा को समुद्रगुप्त ने पराजित किया था। मध्यकाल (Medieval period) में मेघों की एक शाखा ने मध्य भारत में शासन किया।

(ब्लॉगर का नोट: ऊपर के विवरण से जाना जा सकता है कि ‘मग’ से ‘मेघ’ शब्द की यात्रा सदियों में तय हुई है। मग से मघ बनते हुए इसे 129 ई. से 217 ई. के दौरान कोसंबी में देखा गया है। घ, ध, भ जैसी महाप्राण ध्वनियां भारतीय हैं। ग के घ हो जाने के इस परिवर्तन की भाषा वैज्ञानिक व्याख्या कहीं न कहीं मिल जाएगी। कहा जाता है कि बुद्धकाल ही भूतकाल है। यानि ब का भ और ध का त हो जाना किसी उच्चारण प्रवृत्ति की वजह से है। ‘कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी’ वाली बात है। मीड, मेदे, मेगी, मग, मद्र, मेद, मेध, मध्य, मेघ, मेंग, मींग, मेंह्ग, आदि शब्द एक ऐसी प्राचीन जनजाति की ओर इशारा करते हैं जिसकी सैंकड़ों शाखाएं, वर्ग और जातियां हैं। ये दक्षिण-पश्चिम एशिया के बहुत बड़े भू-भाग में निवासित हैं।)