22 May 2018

From Tribal Life to Caste System - क़बीलाई जीवन से जाति व्यवस्था तक

दिनांक 04 मार्च 2018 को मेघ जागृति फाउँडेशन, गढ़ा, जालंधर द्वारा आयोजित एक समारोह में अपनी बात रखते हुए डॉ. ध्यान सिंह और प्रो. के.एल. सोत्रा इस बात पर एकमत थे कि मेघ मूल रूप से एक जनजाति थी जिसे शुद्धिकरण के ज़रिए हिंदू दायरे में लाया गया था. जैसा कि बताया जाता है कि मुग़लों ने सप्तसिंधु क्षेत्र के लोगों को हिंदू कहा था और उस अर्थ में मेघ पहले भी ‘हिंदू’ थे. लेकिन शुद्धिकरण के समय तक हिंदू शब्द अपना एक अलग राजनीतिक अर्थ पाने लगा था.
इस बीच यह जानना रुचिकर रहा कि भारत में जनजाति किसे कहते हैं. किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करने के निम्नलिखित आधार बताए गए हैं-
आदिम लक्षण, विशिष्‍ट संस्‍कृति, भौगोलिक पृथक्‍करण, समाज के एक बड़े भाग से संपर्क में संकोच, पिछडापन. (देखें यह लिंक . एक अन्य लिंक National Commission for STs से)

किसी खास क्षेत्र में उनका निवास होना भी एक शर्त है जिसे भौगोलिक पृथक्करण के तहत रखा गया है. जनजातीय लक्षणों में मेघों की देहुरियाँ और उनके द्वारा मृत पूर्वजों (वड-वडेरों) की पूजा और देरियों पर चौकी देना आदि का अध्ययन करना होगा. मेघ संस्कृति के तहत उनके सामाजिक रस्मो-रिवाज़, उनके अपने लोक-गीत (जो मेरे अनुमान के अनुसार नहीं के बराबर होंगे), उनकी बोलचाल की भाषा जो मूलतः इंडो-तिब्बतन भाषा समूह की है जो डोगरी और स्यालकोटी शैली में बोली जाती है, उसका अध्ययन ज़रूरी है. उसकी शब्द संपदा, उच्चारण और वाक्य विन्यास अपनी विशिष्ट पहचान रखता है. इस बात की भी पड़ताल करनी चाहिए कि मेघों की भाषा में साधारण पंजाबी के मुकाबले पाली-प्राकृत के शब्द कितनी मात्रा में हैं. यह तो निश्चित है कि पंजाबी के मुकाबले मेघों की भाषा में संस्कृत मूल के शब्द कम है. आर्यसमाज के संपर्क में आने के बाद मेघों की भाषा में संस्कृत के कुछ शब्द आए हो सकते हैं. वैसे भाषा के तौर पर पंजाबी काफी दूर तक संस्कृत और पर्शियन दोनों से प्रभावित हुई है लेकिन अनुमान है कि मेघों की जनसंख्या की लोकेशन के अनुसार उनकी पंजाबी का पर्शिनाइज़ेशन अधिक हुआ होगा. (इस पर भाषाविज्ञान की शोध पद्धति के अनुसार शोध ज़रूरी है).
‘भौगोलिक पृथक्करण’ के नज़रिए से मेघ भगत अधिकतर जम्मू के तराई क्षेत्र में ही रहे हैं. 18वीं और 19वीं शताब्दी में कुछ मेघ परिवार रोज़गार की तलाश में स्यालकोट की ओर गए और 1947 में भारत विभाजन के कारण वे ज़्यादातर पंजाब में आए. उन्होंने अपनी भौगोलिक सीमाओं को लाँघा तो था लेकिन वैसा कठिन परिस्थितियों की वजह से और रोज़गार की तलाश में किया गया था. कई मानव समूह ऐसी परिस्थितियों में अपने मूल स्थान से पलायन करते देखे गए हैं.
जम्मू में समाज के बड़े भाग से संपर्क न होने का मुख्य कारण मेघों की आर्थिक गुलामी थी. उनकी आंतरिक परंपराएँ भी थीं. उनकी शादियाँ अपने समुदाय से बाहर नहीं होतीं थीं. इनके सामाजिक रीति-रिवाज़ों, उत्सवों, त्योहारों, भोज आदि में दूसरे समुदायों के लोग भाग नहीं लेते थे. उनकी आबादी की भौगोलिक स्थिति भी संभवतः इसका कारण रही होगी. सामाजिक अलगाव की वजह समय की ज़मीन में बहुत गहरी होती है. खोदते जाइए बहुत कुछ मिलेगा, वो भी जिसका आज कुछ ख़ास महत्व नहीं है.
मेघों के पिछड़ेपन का इतिहास भारत की अन्य जनजातियों के इतिहास से अलग नहीं है. सदियों से चले आ रहे सिस्टम की वजह से अशिक्षा, नियमित आय न होना और आर्थिक निर्भरता, तंग भौगोलिक घेरा और उस घेरे में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों की दूसरों के द्वारा लूट, वन संसाधनों का नाश (मेघों के प्राकृतिक निवास वाले जंगलों के दो बार जलने की बात कही जाती है). अकाल और प्लेग जैसी आपदाओं ने भी समय-समय पर मेघों के समग्र जीवन को बुरी तरह बर्बाद किया जो उनके पिछड़ेपन की एक और बड़ी वजह रही.
फिलहाल ऊपर किसी बात के होते हुए भी आज मेघ समुदाय शुद्धिकरण की प्रक्रिया के बाद जनजातीय स्थिति से निकल कर मनुवादी जातीय परंपरा में शामिल हो चुका है. मेघों के इतिहास का यह एक ख़ास मोड़ रहा. जहाँ तक नज़र देखती है जातीय व्यवस्था में आ कर मेघों को कुछ लाभ हुआ है. आगे चल कर जातियों का सिस्टम किस राह पर ले जाएगा वो देखने वाली बात होगी.         

03 May 2018

The Stupa of Sirsa - सिरसा का थेहड़ (स्तूप)

जब पिताजी की तब्दीली टोहाना से सिरसा हुई तो उस समय टोहाना में बीती अपनी किशोरावस्था की बहुत सारी चमकती और रोशनी में दमकती यादें लेकर मैं सिरसा गया था. पिता जी पीडब्ल्यूडी में सब-डिविज़नल इंजीनियर थे. उनके कार्यालय के साथ ही बना एक साफ़-सुथरा रिहाइशी आवास मिला. सामने बंसल थिएटर और पीछे गिरजाघर. सिरसा के एक अच्छे (आर.एस.डी.) हाई स्कूल में मेरा दाखिला हुआ. वहाँ के स्कूली जीवन में एक सहपाठी केवल कृष्ण नारंग के साथ विशेष मित्रता रही. काफी वर्षों बाद उन्होंने चंडीगढ़ में मुझे ढूंढ लिया था. जहाँ तक सिरसा में रिश्तेदारी का संबंध था तो वहाँ मेरी सबसे बड़ी बहन श्रीमती कांता के जेठ श्री संतराम जी थे जो वहाँ पोस्टमास्टर के पद पर थे. 

एक बार केवल कृष्ण सहित हम तीन मित्र बैठे थे. अचानक कार्यक्रम बना कि सिरसा के दूसरे किनारे पर घूम कर आया जाए. वहां गए तो वहां एक टीला-सा था. केवल कृष्ण ने बतलाया कि वह थेहड़ है. थेहड़ का मतलब मैंने टीला समझा. हम तीनों ने फैसला किया थेहड़ के ऊपर जाएँगे. हालांकि ऊपर जाने का कोई रास्ता नहीं था लेकिन चढ़ाई का एक आसान रास्ता जाँच कर हम जैसे-तैसे टीले पर चढ़ गए. ऊपर थोड़ी-सी सपाट जगह थी. वहाँ से नज़रें घुमा कर ‘फतेह’ किए टीले पर से शहर को देखा और फिर नीचे उतरना शुरू करने वाले थे कि दाएँ हाथ थोड़ा नीचे थेहड़ में एक दरार या कह लीजिए कि एक खोह बनी हुई थी जिसमें पत्थर की मूर्ति जैसा कुछ नजर आया. लेकिन वह ऊपर की सतह से 10-15 फीट नीचे रहा होगा, ऐसा कुछ याद है. मैंने दोनों साथियों से कहा कि वहां कोई मूर्ति नजर आ रही है. लेकिन वो कोई पहुँचने लायक जगह नहीं थी क्योंकि वहाँ ढलान सीधी थी जिसे देखते ही गिरने का डर लगता था.

ख़ैर! हम लोगों ने टीले से उतरना शुरू किया. ढलान पर हमारी चाल तेज़ होने को हो रही थी और सँभलना पड़ रहा था. केवल कृष्ण का हाथ मैंने थामा हुआ था. जब अधिकतर ढलान हम उतर चुके थे तो केवल ने तेज़ चलने का रिस्क ले लिया. वे नियंत्रण खो बैठे और आखिर वे गिर कर घिसटते हुए सपाट जमीन तक गए. उनके चेहरे पर भी कुछ खरोंचे आई थीं. वहां से संतराम जी का निवास नज़दीक था. वहाँ गए जहाँ संतराम जी ने एक पड़ोसी डॉक्टर से उनकी मरहम-पट्टी कराई. थेहड़ पर चढ़ने के एडवेंचर की यादें आज भी काफी गहरी हैं.

पिछले दो-तीन साल के दौरान 'थेहड़' शब्द का असली अर्थ पता चला. मेघों के इतिहास के जानकारों को पढ़ते हुए पता चला कि थेहड़ का संबंध बौध सभ्यता और बुद्धिज़्म  से है. इसका साधारण अर्थ स्तूप है. इसीलिए यह मन में कभी-कभी उभरता रहा. कल 02-05-2018 को प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी और इतिहास के जानकार डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने फेसबुक पर सुजाता (जिसने बुद्ध को खीर खिलाई थी) के स्तूप पर पोस्ट डाली तो मेरी स्मृतियाँ झनझना उठीं. थेहड़ की यादें काफी तेज़ी से मन पर उभर आईं. उस पोस्ट पर काफी जानकारी देने के बाद डॉ. सिंह ने लिखा था कि- “इतिहास में विहारों के जलाए जाने पर विमर्श होते रहे हैं, मगर स्तूपों को मिट्टी से ढँकवाए जाने का विमर्श शेष है.”

उनकी फेसबुक पोस्ट पर मैं सिरसा के थेहड़ का ज़िक्र करने के लिए जैसे मजबूर-सा हो गया. मैंने लिखा, “सन 1966 में मैं सिरसा में था. विद्यार्थी था. तब शहर के बाहर एक बड़ा-सा टीला था जिसे स्थानीय भाषा में 'थेहड़' कहा जाता है. पता नहीं आज वह किस हालत में है. उसमें एक जगह दरार में मैंने सफेद पत्थर की एक मूर्ति सी देखी थी. अधिक जानकारी नहीं है. वहां कुछ खुदाई हुई या नहीं मैं नहीं जानता.” वहीं श्री जसवीर सिंह नाम के एक युवा ने मुझ से उस स्थान का ब्यौरा माँगा. जो याद आया वो सब बता दिया. यह भी बता दिया कि बहुत अधिक जानकारी नहीं है फिर भी एक पुराने मित्र से पूछ कर कुछ बता सकता हूँ. फिर मैंने केवल कृष्ण नारंग से फोन पर बात की और जो जानकारी उनसे मिली वो इन शब्दों में वहीं पोस्ट कर दी, “धन्यवाद जसवीर सिंह जी. अभी-अभी मेरे बचपन के दोस्त केवल कृष्णा नारंग से मेरी बातचीत हुई है और उन्होंने बताया है कि उस मोहल्ले का नाम थेहड़ मोहल्ला ही है. वह क्षेत्र कुछ साल पहले ASI की नजर में आ गया था और डेढ़ महीना पहले वहां पर खुदाई का काम हुआ है. थेहड़ के पास 400-500 घरों की एक बस्ती बस गई थी जिसे वहां से हटाकर कहीं शिफ्ट किया गया है. और जैसा कि अक्सर होता है 15 साल पहले वहां किसी आदमी ने एक मूर्ति के पाए जाने की बात उड़ा दी थी जिसे (उस मूर्ति को) सारे शहर में घुमाया गया था. शायद मंदिर भी बना लिया गया हो.” थेहड़ वाली ज़मीन पर रह रहे लोगों ने आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा खुदाई के खिलाफ कोर्ट केस किया हुआ है जिससे संबंधित एक लिंक नीचे दिया गया है. जसवीर सिंह जी ने गूगल मैप पर जा कर पुष्टि की कि अब वहाँ पीर बाबा थेहड़ मोहल्ला है और ये स्थान घग्गर नदी (जिसे कुछ विद्वान सरस्वती भी मानते है) से मात्र 10 किमी की दूरी पर ही है.
अमर उजाला में छपा चित्र 
केवल कृष्ण जी से पता चला कि बंसल थिएटर और हमारे निवास के बीच जो सड़क थी वहाँ फ्लाईओवर बन चुका है जबकि बंसल थिएटर की जगह अब एक मॉल बन गया है. जहाँ हम रहते थे वो बिल्डिंग लगभग वैसी ही है. उसके लॉन को बढ़िया बना दिया गया है. गिरजाघर वहीं है और वैसा ही है. उम्मीद है वहाँ के राडार जैसे मोर अभी वहीं होंगे.

थेहड़ भी तो वहीं है. उसका अतीत अब पहचान पा रहा होगा. बौध सभ्यता के कदमों के निशान ढूँढे जा रहे होंगे. श्रमण संस्कृति झाँक रही होगी.



लिंक-

28 April 2018

Dying process - मरने की प्रक्रिया

जरूरी नहीं कि सांसे थम जाने पर स्टेथस्कोप में जिंदगी की निशानियाँ ढूंढी जाएँ. उसके बिना भी जिंदगी की धड़कनों को सुना, देखा और महसूस किया जा सकता है. जिंदगी की उन कई निशानियों को एक बहुत ही सुंदर कविता में चित्रित किया गया है  जिसे कभी मशहूर चित्रकार पाब्लो पिकासो की कविता के तौर पर मशहूर कर दिया गया था. लेकिन बाद में पता चला कि यह कविता एक ब्राज़ीली कवियत्री मार्था मेरिडोस ने लिखी थी और उसे साहित्य के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित गया था. उसका अंगरेज़ी पाठ नीचे है. यह कविता धड़कन पर रखे स्टेथोस्कोप की-सी आवाज़ देती है.


You start dying slowly...
if you do not travel,
if you do not read,
If you do not listen to the sounds of life,
If you do not appreciate yourself.

You start dying slowly...
When you kill your self-esteem;
When you do not let others help you.

You start dying slowly...
If you become a slave of your habits,
Walking everyday on the same paths…
If you do not change your routine,
If you do not wear different colors
Or you do not speak to those you don’t know.

You start dying slowly...
If you avoid to feel passion
And their turbulent emotions;
Those which make your eyes glisten
And your heart beat fast.

You start dying slowly...
If you do not change your life when you are not satisfied with your job, or with your love,
If you do not risk what is safe for the uncertain,
If you do not go after a dream,
If you do not allow yourself,
At least once in your lifetime,
To run away from sensible advice…

24 April 2018

The Illusion of Purification - शुद्धिकरण का छलावा

‘शुद्धिकरण’ शब्द सुनने में कितना ही पवित्र शब्द क्यों न लगे लेकिन जब-जब यह किसी पिछड़े समुदाय के संदर्भ में प्रयोग हुआ है, तब-तब अपमानजनक और शरारतपूर्ण सिद्ध हुआ है. किन्हीं धार्मिक संस्थाओं के हाथों में इसे राजनीतिक औज़ार के रूप में देखा गया है.
मेघ समुदाय के संदर्भ में इसका प्रयोग बीसवीं शताब्दी के शुरू में आर्यसमाज ने अपने ‘शुद्धीकरण’ नामक आंदोलन के दौरान किया था. इसमें आर्यसमाज ने मेघों, डूमों, महाशयों आदि का शुद्धिकरण करने का दावा किया था. शुद्धिकरण का मूल प्रयोजन था मूलनिवासी कबीलों के लोगों को इस्लाम या ईसाईयत की ओर झुकने से रोकना या उनसे बचाते हुए मनुवादी सिस्टम में लाना.
डॉ. ध्यान सिंह ने अपने शोधग्रंथ ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास’ में आर्यसमाजी तथा अन्य विद्वानों की लिखी किताबों के हवाले से लिखा है कि हज़ारों (तीस हज़ार से छत्तीस हज़ार तक उनकी गिनती बताई जाती है) मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें हिंदू दायरे में लाया गया था. वहां इस्तेमाल किए गए ‘हिंदू’ शब्द के व्यापक अर्थ में स्थिति को तौला जाए तो मेघ पहले भी हिंदू ही थे और कई अन्य हिंदू कबीलों की तरह एक कबीलाई जीवन जी रहे थे. यहाँ "पहले भी हिंदू ही थे" से तात्पर्य है कि मुग़लों के समय में सप्तसिंधु क्षेत्र के लोगों को हिंदू कहा गया था. यदि ‘हिंदू’ शब्द को किसी ‘धर्म’ से जोड़ने की बात है तो ‘हिंदू’ शब्द की जगह उसे मनुस्मृति वाला ‘मानव-धर्म’ कहना बेहतर होगा जिसे ‘ब्राह्मणवाद’ कहा जाता है लेकिन ‘मनुवाद’ के नाम से उसे बेहतर तरीके से व्यक्त किया जाता है.
मेघों के शुद्धिकरण को लेकर एक 80 वर्षीय मेघ प्रो. के.एल. सोत्रा जी से कई बार फोन पर बातचीत हुई. एक आर्यसमाजी की लिखी पुस्तक में छपे फोटोज़ के आधार पर वे कहते हैं कि मेघों के शुद्धिकरण की सच्चाई दरअसल दूसरी है. उनके अनुसार कुल सात-एक परिवारों का शुद्धिकरण किया गया था जो इस्लाम क़बूल कर चुके थे. वे बताते हैं कि मेघों की शिक्षा का प्रबंध आर्यसमाज ने बड़े स्तर पर करने का बीड़ा उठाया था जिससे मेघ समुदाय के सामाजिक जीवन को एक गति मिली. प्रो. सोत्रा के कुछ परिजन आज भी पाकिस्तान में रहते हैं. सोत्रा जी बताते हैं कि उनके परिजनों ने आज तक इस्लाम नहीं अपनाया. वे अपनी जीवन शैली के साथ पाकिस्तान में जी रहे हैं. सोत्रा जी बताते हैं कि मेघ कभी भी बड़े पैमाने पर इस्लाम या ईसाइयत में नहीं गए. 1947 में स्यालकोट से लगभग सभी मेघ परिवार भारत आ iगए. गिनती के मेघ ही स्यालकोट में रह गए थे. वे सब हिंदू थे. पब्लिक मेमोरी (लोक स्मृति) में दूर-दूर तक कहीं नहीं है कि मेघों ने कभी बड़े पैमाने पर इस्लाम ग्रहण किया हो. तो आर्यसमाज से जुड़े लेखकों के प्रकाशित साहित्य में क्यों लिखा गया कि हज़ारों-हज़ार की संख्या में मेघों का शुद्धिकरण किया गया था? पहली नज़र में यह उनके प्रचारात्मक कार्य का हिस्सा लगता है. उसके पीछे राजनीतिक कारण भी रहे हो सकते हैं जैसा कि डॉ. ध्यान सिंह ने अपने शोधग्रंथ में उल्लेख किया है कि शुद्धिकरण से स्यालकोट के क्षेत्र में हिंदू-मुसलमान जनसंख्या का अनुपात बदल गया. वे यह भी बताते हैं कि जम्मू के क्षेत्र में मेघ कबीलाई जीवन जी रहे थे. उनके शुद्धिकरण का एक ही अर्थ था कि उन्हें शुद्धिकरण की प्रक्रिया से हिंदू घेरे में लाया जाए. संभव है उनमें कुछ ऐसे इने-गिने मेघ भी रहे हों जिन्होंने इस्लाम अपना लिया था. वैसे शुद्धिकरण को लेकर आज भी कई पढ़े-लिखे मेघ कड़ुवाहट के साथ पूछते हैं कि ‘क्या हमें कीड़े पड़े हुए थे कि हमारा शुद्धिकरण किया गया था?’ वे जानते हैं कि उन्होंने या उनके पूर्वजों ने कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिसकी वजह से उनका अन्यथा शुद्धिकरण किया जाता.
बात शुद्धिकरण की हो रही है. शुद्धिकरण क्यों किया जाता है इसकी जानकारी एक जाट नेता श्री राकेश सांगवान से मिली. उन्होंने सितंबर 2017 में बताया कि रोहतक में खाप पंचायत नाम से पंचायत का एक फ़रमान जारी गया था और पंचायत का विषय था 'मूला जाटों का शुद्धीकरण और जाट - मूला जाटों के बीच आपसी रिश्ते शुरू करवाना'. इस पर श्री राकेश सांगवान की निम्नलिखित टिप्पणी शुद्धिकरण के राजनीतिक पक्ष को प्रभावी तरीके से रेखांकित करती है.

“पहली बात तो ये जो शुद्धीकरण शब्द ही बड़ा अटपटा सा है। जाट चाहे किसी भी धर्म सम्प्रदाय में गया या उसने जो भी अपनाया, उसने अपनी जाति कभी नहीं छोड़ी, जहाँ भी गया जाति साथ ही ले गया, और सिर्फ़ जाट ही नहीं इस देश में जिस भी जाति के व्यक्ति ने जो भी धर्म अपनाया वह अपनी जाति उस धर्म में साथ ही ले गया। अब समझ नहीं आता कि कौन किसका किस आधार पर शुद्धीकरण चाहता है? यदि इनका आधार सिर्फ़ धर्म को लेकर ही शुद्धीकरण है तो फिर इस खाप पंचायत के नाम पर सिर्फ़ जाट को ही क्यों टार्गट किया गया? खाप पंचायत सभी जातियों की होती हैं और सभी धर्मों में सभी जातियाँ हैं, फिर इस पंचायत में सिर्फ़ जाट और मूला ही टार्गट क्यों? और जाट-मूला जाट के नाम पर पंचायत में विश्व हिंदू परिषद, बंसल, परमार, शर्मा आदि का क्या काम? और यदि तुम्हारा इस शुद्धीकरण का आधार धर्म ही है तो फिर तुम्हारे इस शुद्धीकरण के टार्गट पर मूला जाट यानी मुस्लिम जाट ही क्यों, तुम्हारी ख़ुद की जातियाँ क्यों नहीं? और क्या सिर्फ़ हिंदू होना ही शुद्धता है? ये सर्टिफ़िकेट किस लैब्रॉटॉरी से जारी हुआ?
शुद्धीकरण और आपसी रिश्तेदारी, दोनों में बहुत फ़र्क़ है इसलिए जाट चाहे किसी धर्म मज़हब पंथ से ताल्लुक़ रखता हो उसे ऐसे विवादित विषयों से परहेज़ ही रखना चाहिए। ऐसे मुद्दों से तो हमारे रहबर-ए-आज़म सर छोटूराम भी दूरी रखते थे, जब भी धर्म का मुद्दा उठता तो उनका एक ही जवाब होता कि धर्म निजी मामला है इसे दूसरे पर मत थोपो। जो भी ठेकेदार इस शुद्धीकरण की बात करे उसे कह दो कि शुद्धीकरण और धर्म के बोझ से हम जाटों को माफ़ी दे दो, हम जाटों को तुम अपनी साज़िशों का मोहरा ना बनाओ। जो करना है पहले तुम अपने से शुरू करो, पहले अपनी जातियों का शुद्धीकरण कर लो, और जहाँ तक जाट-मूला जाटों की आपसी रिश्तेदारी का मामला है वह हमारा आंतरिक मामला है उसे हम जाट ख़ुद देख लेंगे।”

मेघ भी स्यालकोट के क्षेत्र में शुद्धिकरण से बावस्ता हुए थे. वहाँ तब अंगरेजों का शासन था. अंग्रेजों की उदारवादी नीतियों के तहत समाज की निम्न जातियों को प्रतिनिधित्व देने पर विचार किया जा रहा था (शायद आपको साइमन कमिशन याद हो) और उसके तहत एक योग्यता यह भी रखी गई थी कि प्रतिनिधित्व ऐसे लोगों को दिया जाएगा जो पढ़े-लिखे हों. इस दौरान मिशनरी स्कूल पिछड़ी और निम्न जातियों को शिक्षित करने का कार्य शुरू कर चुके थे. आर्यसमाज ने भी फैसला किया कि ग़ैर-हिंदुओं को जितना जल्दी हो सके ‘हिंदू’ दायरे में लाया जाए और हिंदू जातियों में उनका स्थान भी परंपरा के अनुसार निर्धारित कर दिया जाए ताकि आने वाले समय में वे हिंदू के नाम पर सवर्णों के अधीन खड़े दिखें. इस व्यवस्था को शिक्षा से वंचित मेघ कितना जानते थे पता नहीं लेकिन उस समय के साहित्य से जानकारी मिलती है कि मेघों ने शुद्धिकरण की वास्तविकता को पहचान लिया था. वे महसूस कर रहे थे कि शुद्धिकरण ने सामाजिक व्यवस्था में उनकी प्लेसिंग तो बदली नहीं. यह तर्कशीलता मेघों की शक्ति के रूप में देखी जा सकती है. लेकिन क्या शुद्धिकृत मेघ 'आर्य-भक्त' और 'द्विज' का अर्थ भली भाँति जानते थे? यह सवाल बहुत महत्पूर्ण है.
1947 में पाकिस्तान बनने के बाद स्यालकोट से अधिकांश मेघ भारत आ गए. इसके साथ ही उनके संदर्भ में आर्यसमाज का शुद्धिकरण का एजेंडा पृष्ठभूमि में चला गया. (ऊपर मूला जाटों के शुद्धिकरण संबंधी इंगित की गई हलचल में उसे फिर से ज़िंदा होते देखा जा सकता है.). 'शुद्धिकृत' तबकों को स्वभाविक ही कांग्रेसी वोटर की पहचान मिली. कांग्रेस का प्रतिनिधित्व (आरक्षण) के प्रति उस समय जो नज़रिया था उससे उन्हें फ़ायदा हुआ. ‘हिंदुस्तान’ में पहले जैसे शुद्धिकरण आंदोलन की जरूरत नहीं थी और न ही उन निम्न जातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में शासन-प्रशासन में प्रतिनिधित्व देने की ज़रूरत महसूस की गई. शुद्धिकृत जनसमूहों को उनके मुख्यधारा(?) में दाख़िल होने के भ्रम के साथ उनको परंपरागत निम्न सामाजिक स्तर पर छोड़ दिया गया. जहाँ तक राजनीतिक क्षेत्र का सवाल है म्युनिसिपल कमेटियों और म्युनिसिपल कार्पोरेशंस में उन्हें कुछ प्रतिनिधित्व मिला.
लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि शुद्धिकरण का लक्ष्य क्या 15% सवर्णों का केवल अपना धार्मिक-राजनीतिक एजेंडा था? क्या उसका उद्देश्य शुद्धिकृत लोगों के सामाजिक स्तर में बेहतरी नहीं था? क्या शुद्धिकरण कर के जगाई गई उनकी आर्थिक और राजनीतिक अपेक्षाएँ महत्वहीन हो गईं? क्या 'मुख्यधारा' का मतलब महज़ सवर्णों का वर्चस्व था? शुद्धिकरण अपने धार्मिक-राजनीतिक मायने चाहे खो चुका है लेकिन उसके सामाजिक पहलू को नए संदर्भों में तो देखा ही जाएगा.