मेदे, मद्र, मेग, मेघ

मेघ जाति, मेघ रेस या अपने मूल को जानने के इच्छुक मेघों को - मेदे (Mede), मद्र (Madra), मेग (Meg), मेघ (Megh) - ये शब्द हमेशा परेशान करते रहे हैं. वे सोचते रहे हैं कि क्या ये शब्द वास्तव में एक ही रेस, जाति समूह, जाति की ओर इशारा करते हैं? यहाँ स्पष्ट करना बेहतर होगा कि Ethnology जिसे हिंदी में मानव जाति विज्ञान कहा जाता है उसी के आधार पर कई जातियों को जाति शब्द के तहत कवर कर लिया जाता है. लेकिन वह जाति समूह को प्रकट करता है. यह इसलिए यहाँ प्रासंगिक है क्योंकि एथनेलॉजी को इस प्रकार से परिभाषित किया जाता है- ‘विभिन्न लोगों की विशेषताओं और उनके बीच के अंतर और संबंधों का अध्ययन.’ इस दृष्टि से यहाँ हिंदी के जाति शब्द का अर्थ जाति समूह या रेस से भी लेना चाहिए.

मेदे, मेदी, मेग, मेघ आदि शब्दों के बारे में कर्नल तिलक राज, श्री आर. एल. गोत्रा, डॉक्टर ध्यान सिंह और श्री ताराराम जी से कई बार बातचीत हुई. यहां-वहां से जो पढ़ा-जाना उसमें एक ही स्रोत पर कोई आलेख नहीं मिला था जो इस पहेली का समाधान करता हो. सारा पढ़ने का तो कोई दावा भी नहीं है. हालांकि यह महसूस होता रहा कि इन शब्दों के मौलिक अर्थ और सभी अर्थ छटाएँ इतिहास की पुस्तकों में नहीं हैं और उन्हें शास्त्रीय साहित्य जैसे- रामायण, महाभारत, पौराणिक कहानियों आदि के साथ मिलान करके देखना होगा. इस बारे में कर्नल तिलकराज जी से महत्वपूर्ण संकेत मिले कि इसे भाषा-विज्ञान की दृष्टि से भी परखना पड़ेगा ताकि इन शब्दों की यात्राओं को भली प्रकार से जाना जा सके. यह इतना सरल भी नहीं है कि जहाँ कहीं किसी जाति या जाति समूह के नाम में ‘म या M’ देखा तो उस पर टूट पड़े. इस प्रवृत्ति पर अंकुश के साथ एक गंभीर शोध सहित प्रामाणिक संदर्भों की ज़रूरत होती है. इतिहासकार की नज़र का होना तो ज़रूरी है ही.

तारा राम जी ने अभी हाल ही में लिखे अपने एक शोध-पत्र (Research Paper) की पीडीएफ भेजी है. यह आलेख इस बात की गवाही दे रहा है कि ये सभी शब्द (मेदे, मद्र , मेग , मेघ) मेघ प्रजाति (रेस) की ओर इंगित कर रहे हैं जो भारत के अलग-अलग भू-भागों में बसी हुई है. यह रेस कई जातियों में बँटी हुई है और ये जातियाँ एक दूसरे को पहचानती भी नहीं हैं. वे एक दूसरे को ज़रूर पहचाने ही, यह जरूरी नहीं क्योंकि भौगोलिक कारण अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं. लेकिन ज्यों-ज्यों दुनिया सिमट रही है त्यों-त्यों आपसी पहचान बढ़ेगी, ऐसा लगता है. अस्तु, ताराराम जी ने जो अपना शोध-पत्र अग्रेषित किया किया है उसमें विभिन्न इतिहासकारों और विद्वानों को संदर्भित किया है जो आलेख को विश्वसनीयता प्रदान करता है.

(इस आलेख में मेघों के राजनीतिक-सांस्कृतिक तंत्र पर चाणक्य (कौटिल्य) की टिप्पणी का उल्लेख है. इन दिनों इतिहास के जानकारों ने कौटिल्य की ऐतिहासिकता पर सवालिया निशान लगाए हैं. उसे ध्यान में रखते हुए यह कहना कठिन है कि चाणक्य की वो टिप्पणी कब की है). - भारत भूषण


‘मेदे (Mede), मद्र (Madra), मेग (Meg), मेघ (Megh)

(यह मूल आलेख का सार है)

लेखक : ताराराम, जोधपुर, राजस्थान
(श्री ताराराम जी 'मेघवंश : इतिहास और संस्कृति' के लेखक हैं)

सतलुज नदी के मुहानों और उसके आसपास के  इलाकों में पुराने समय से बसी हुई जाति को रामायण, महाभारत, पुराण और अन्य संस्कृत व पालि साहित्य में मद्र कहा गया है. सभी स्रोतों से यह स्पष्ट है कि प्राचीन काल में मद्र लोग शुतुद्रु नदी के किनारे भी बसे हुए थे, जिसे आजकल सतलुज नदी कहते हैं. शुतुद्रू के नाम से सतलुज नदी का वर्णन ऋग्वेद में दो बार हुआ है. वाल्मीकि रामायण में इस नदी के लिए शतद्रु शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ किया जाता है-  ‘शतधा द्रवति’ अर्थात 100 धाराओं वाली नदी. शुतुद्रु नदी का सम्बन्ध घनिष्ठ रूप से मेगों से रहा है. सिकंदर के आक्रमण के समय मेग (मेघ) जाति सतलुज नदी के मुहाने पर बसी हुई थी.

            कर्नल अलेक्जेंडर कनिंघम (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट्स, वॉल्यूम-2, पृष्ठ-10) ने पहली बार हमारा  ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि आज की  मेग (मेघ) जाति भारत की पुरानी और पहले बसी हुई जाति है और प्रमाण के साथ यह बताया कि सिकंदर के आक्रमण के समय इस जाति की बस्तियां सतलुज, रावी, चिनाब और झेलम आदि नदियों के मुहानों पर थीं. ग्रीक और ईरानी साहित्य के मेगार्सुस और संस्कृत के मेगद्रु व शुतुद्रु शब्दों के मूल में जाकर कनिंघम ने दावे के साथ यह प्रमाणित किया है कि सिकंदर के आक्रमण के समय मेग जाति मुख्यतः सतलुज नदी के आसपास बसी थी और वर्तमान सतलुज नदी का उल्लेख ‘मेगार्सुस’ नदी के नाम से हुआ है. सभी साहित्यिक और भौगोलिक सबूतों के आधार पर कर्नल एलेक्जेंडर कनिंघम ने यह स्पष्ट किया कि वर्तमान ‘सतलुज नदी’ का प्राचीन नाम मेगद्रु था, जो बाद में शुतुद्रू और शुतुद्रू से शतद्रु और शतद्रु से सतलज हो गया.

            पालि और संस्कृत के ग्रंथों में हुए वर्णन के अनुसार यह साफ़ होता है कि प्राचीन काल में सतलुज नदी के आसपास मद्र जाति (इस आलेख में जाति शब्द को रेस के अर्थ में लिया गया है) बसी थी, न केवल इस इलाके में बल्कि उतर में हिमालय के परे बहुत बड़े फैले हुए इलाके में मद्र जाति फैली हुई और बसी थी. इसी कारण से इन प्रदेशों को मद्र-देश कहा जाता था. ग्रीक और पर्शियन इतिहास के जानकारों ने इस इलाके में बसी जाति को मेदे (Mede) जाति का कहा है, जो उपनिषद, महाभारत, पुराण आदि संस्कृत ग्रंथों में वर्णित ‘मद्र' जाति से साम्यता रखती है यानि मेदे ही मद्र है और मद्र ही मेघ है. 

                वाल्मीकि रामायण में भरत जिस रास्ते से अयोध्या लौटता है, उस रास्ते में आने वाली नदियों का उल्लेख वाल्मीकि ने किया है, जिस में सतलुज का उल्लेख शतद्रु के नाम से हुआ है.  पुराणों में इस नदी का उल्लेख कहीं पर शुतुद्रू, कहीं पर शिताद्रु, कहीं पर सिताद्रू आदि के रूप में मिलता है. अलबरूनी ने इसे शतरुद्र कहा है, जिसे पंजाब में शतद्रु/सतलदर आदि भी बोला जाता है. स्कन्द-पुराण में इस नदी को शतरुद्रिका कहा गया है. इस नदी को सारंग भी कहा गया है. स्पष्ट यह है कि  इस नदी के लिए ऋग्वेद में इस्तेमाल शब्द शुतुद्रु से आज के सतलज शब्द की यात्रा कई सांस्कृतिक पड़ावों से होकर गुजरी है और ये शब्द इस नदी के मूल नाम मेगद्रु शब्द को संस्कृतनिष्ठ बनाने के फेर में साहित्य में प्रयुक्त हुए हैं. इस नदी का मूल या प्रारंभिक नाम, जैसा कि कनिंघम महोदय ने गवेषित (रिसर्च) किया, मेगद्रु रहा है. डियोनाइसिअस (Dionysius Periegetes) ने इस नदी (सतलुज नदी) के लिए Megarsus (Megandros) शब्द प्रयुक्त किया है, जो संस्कृत के मेगद्रु के समतुल्य है. इस नदी का उल्लेख एविएनस (Avienus) ने Cymander, प्लिनी ने Hesidros नदी के नाम से किया है. टोलेमी ने सतलुज नदी हेतु जराद्रस (zaradrus/ zadadrus) शब्द का प्रयोग किया है. कई अन्य ईरानी और ग्रीक इतिहासकारों ने इससे मिलते-जुलते शब्दों का प्रयोग इस नदी को संबोधित करने के लिए किया है. ईरान और फ़ारस में नदियों के नाम पर वहां के निवासियों का नामकरण करने की एक आम-परंपरा रही है, यथा भारत के लिए वे लोग हप्त-हिंदु शब्द प्रयुक्त करते हैं. इस प्रकार से ‘मेगद्रु नदी’ के मुहानों पर बसे हुए लोग ही आगे चलकर मेग कहलाये, जो वैदिक साहित्य में  मद्र और प्राचीन ईरानी व यूनानी साहित्य-इतिहास में मेदे (Mede) या मेदेस/मेडिज़ आदि के रूप में वर्णित किये गये हैं.

मेदे (Mede)  

मेदे (Mede) शब्द इतिहास में पहली बार ईसा-पूर्व 9वीं शताब्दी में असीरिया के दस्तावेजों में अमदाई (Amadai) के रूप में प्रकाश में आता है. प्राचीन काल में ‘मेदे’ प्रजाति अमर्दुस (Amardus) नदी के तट पर बसी हुई थी. वे ही बाद में मेदे/मडई (Mede/Madai) कहे जाने लगे. ईरानी परंपरानुसार Amadai शब्द में ‘अ’ विलुप्त कर लिए जाने पर वे इन्हें मैदे या मदे/मेदी  बोलते थे, इस प्रकार से अमर्दुस में प्रयुक्त ‘अ' विलुप्त हो कर मैदे शब्द रह गया. मेला पोम्पोनिउस (प्रथम शताब्दी ईस्वी) कैस्पियन सागर के पास एमेर्दी (Amardi) राष्ट्र का जिक्र करता है. असीरिया से प्राप्त दस्तावेजों के शब्द में ‘r’ अक्षर नहीं मिलता है, वरना ये शब्द पूरी तरह मिलते हैं. हरित कृष्णा देब एक शोध-आलेख ‘मेदे और मद्र (Mede and Madra)’ में यह स्पष्ट करते हैं कि हमें असीरिया के मेदेई (Madai) शब्द को मर्दा {ma(r)da} के समान लेना चाहिए, जो संस्कृत के मद्र शब्द की जाँच-पड़ताल (ये शब्द एक ही है) को युक्तियुक्त बनाते हैं.

     मेडिज़ के शुरुआती इतिहास  को जानने के लिए हेरोडोटस एक प्रमुख स्रोत है. वह वर्णन करता है कि लगभग 1700 ईस्वी पूर्व मेदेस ने असीरियन प्रभुत्व के विरुद्ध विद्रोह किया था. वे अलग-अलग गांवों में बिखरे हुए बिना किसी एक केन्द्रीय सत्ता के निवास करते थे. उनके प्रत्येक गाँव में एक न्यायधीश/ पञ्च होता था. हालाँकि वे दिओकेस (Deioces) के जैसी प्रतिष्ठा के नहीं थे, जिसे आसपास के गाँव वाले अपने विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थ के रूप में बुलाते थे, परन्तु उनके हर-एक ग्राम में उनका न्यायाधीश या पञ्च होता था, जो उनका मुखिया होता था. जब दिओकेस ने अपने आप को मध्यस्थता हेतु असमर्थ/ परिहार्य महसूस किया तो उसने मध्यस्थता करनी छोड़ दी. इससे अराजकता फैल गयी. इस अराजकता को समाप्त करने के लिए सभी मेडीस एक जगह एकत्रित हुए और देइओकेस को अपना राजा चुना. उसके बाद उसका पुत्र फ्रोर्तेस उनका राजा हुआ और उसने पर्शिया को जीत कर मेदी राज्य की सीमा पर्शिया तक फैलाई. उसने पड़ोस के असीरिया राज्य पर भी धावा बोला, जिसकी राजधानी उस समय निनेवेह थी, परन्तु उसे जीत नहीं मिली. फ्रोर्तेस के बाद क्याक्सारेस  सिंहासन पर बैठा. उसने लीडिया पर आक्रमण किया. इन सब की और बाद के राज-काज की ऐतिहासिकता प्रमाणित है.

            देइओकेस की प्रतिष्ठा या विश्वसनीयता उसकी ईमानदारी और इंसाफ़पसंदी से थी, उस समय मदे लोग भी ग्रीक लोगों की तरह छोटे-छोटे राज्यों में बँटे हुए थे और प्रत्येक राज्य का एक अधिपति होता था, जो उनका राजा होता था. प्रत्येक नगर उसके आदेशों की पालना करता था.  ईमानदारी और इंसाफ़पसंदी प्रत्येक मेदी का एक विशिष्ट गुण माना जाता था और मेडिज राज्य का राजा होने के लिए यह गुण प्रमुख अहर्ता (main qualification) थी. फ्रोर्तेस भी देइओकेस की तरह मेदी गण (Republic) का गण-प्रमुख था.

          नाबोनिदुस ने मेडीस के लिए मंदा (Manda) शब्द प्रयुक्त किया है. क्याक्सारेस ने 606 ईस्वी पूर्व में निनेवेह को समाप्त कर मदेइ राज्य की स्थापना की थी. हालाँकि प्रो. सायके का मानना है कि मदा और मेदाई अलग-अलग हैं. मदा अधिनायक (Authoritarian) है, वही मदई  गणतंत्रवादी (Republican) है.

            ओक्सुस नदी के दक्षिण में बसी जातियों को मुस्लिम लेखकों ने  मेद या मेंद कहा है. यह नाम मेदी या मंद्नेई के रूप में पंजाब के पुराने दस्तावेजों में भी उपलब्ध होता है. एलेग्जेंडर कन्निंघम उच्चारण भेद के अलावा इन्हें एक ही साबित करते हैं एवं वर्जिल का सबूत देते हुए बताते हैं कि सबसे पहले वर्जिल (Virgil) के उल्लेख में मेदस ह्य्दास्पेस (Medus Hydaspes) शब्द प्रयुक्त हुआ है, टोलेमी इसे यूथी मेडिया (Euthy-Media)  या सागल (Sagal) के नाम से उल्लेख करता है. इन सब सबूतों से साफ़ हो जाता है कि वर्जिल के समय यानि ईसा पूर्व पहली सदी में मेदी जाति पंजाब में निवासित (बसी हुई) थी. ईसा पूर्व की पहली सदी में जाट/ जट भी सिंध में आ चुके थे, जो कि ओक्सुस (Oxus) नदी पर उनके पुराने पड़ोसी और शत्रु थे. मसूदी (915-91 ईस्वी) इन्हें मिंद कहकर उल्लेखित (mention) करता है. मुस्लिम आक्रमणों के समय ये कठियावाड और अरावली की ओर जा बसे.

            अरियन (Arrian) इंडिका (I.1.3) में लिखा है  :-  ‘सिन्धु और काबुल नदियों के बीच में रहने वाले भारतीय पहले असीरिया के अधीन थे, उसके बाद मेडिज के और अंत में पर्शियन के और साइरस को कर अदा करते थे.’

            ईसा से पहले लगभग 7वीं सदी में  मेडिज ने असीरिया के विरुद्ध विद्रोह करके अपनी स्वतंत्र सत्ता कायम कर ली थी, अस्तु, सिन्धु-क्षेत्र में भी ईसा से 700 वर्ष पूर्व यहाँ मेडिज का शासन होना प्रमाणित होता है. इस सब साक्ष्यों से यह पुष्ट होता है कि ग्रीक-असीरिया के मेदे और सिन्धु-सागर (पंजाब) के मेद एक ही थे, जिन्हें भारत के पुराने शास्त्रीय-साहित्य (classical literature) में मद्र कहा गया है.

मद्र (Madra) 

‘मद्र’ भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित एक देश का नाम है, या उस देश के एक राजा का नाम है (बहुवचन में यह शब्द व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है). यह शिबी के एक पुत्र का भी नाम है जो मद्रों का पूर्वज था.  भारतीय साक्ष्यों में सबसे पहले हमें ऐतरेय ब्राह्मण और बृहदारण्यक उपनिषद् में मद्रों का सन्दर्भ मिलता है, जिसका रचना-काल वेदमतानुयायी  6ठी-7वीं शताब्दी होना अनुमानित करते हैं.  ब्राह्दारंयक उपनिषद में  वर्णित है कि यज्ञ-बलि के अध्ययन के लिए उद्दालक आरुणी मद्र-देश में पतंचल कप्य के घर जाता है. संख्यायन श्रोत सूत्र में उद्दालक का पुत्र श्वेतकेतु अपने पिता के पास मद्र देश जाता है. ऐतरेयब्राह्मण में पृथ्वी के अलग-अलग इलाकों पर पांच-प्रकार की शासन-व्यवस्था का उल्लेख किया गया है और बताया गया है कि हिमालय के आगे उत्तर में उत्तर-कुरु और उत्तर मद्रों के जनपद है. इन जनपदों को वैराज्य कहा गया है. वैराज्य राज्य अधिनायकवादी (राजतन्त्र) राज्यों से अलग राज्य हुआ करते थे, जिनमें शासक का चुनाव जनता करती थी.

            महाभारत में मद्र-देश को भारत का एक प्राचीन खंड कहा गया है. उसकी स्थिति झेलम नदी के पास बताई गयी है. पांडू की पत्नी माद्री वहीं की थी, जो शल्य की बहन थी और जिससे पांडू के नकुल और सहदेव नामक दो पुत्र हुए. भीष्म के मद्र देश जाने और पांडू के लिए माद्री का हाथ मांगने का वर्णन महाभारत में हुआ है. सावित्री का पिता अश्वपति भी मद्र का था. द्युतिमान मद्र देश का राजा था, जिसकी पुत्री विजया से सहदेव की शादी हुई थी. देवी भागवत में सुन्धवा को मद्र देश का राजा कहा गया है, पद्मपुराण के सृष्टि-खंड में श्री कृष्ण की 8 रानियों में एक लक्षणा मद्र राजा की पुत्री कही गयी है. ब्रह्मानंद पुराण में अत्री महर्षि की 10 पत्नियों में एक मद्रा थी, जिससे सोम नाम का एक पुत्र हुआ, महाभारत के कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण मद्र और बाह्लिकों की बुराई करता है. मद्र-नरेश अश्वपति की पत्नी मालवी, जो सावित्री की माँ थी, उससे 100 पुत्र पैदा हुए, वे मालव कहलाते थे. इस प्रकार से आख्यायनों और पौराणिक ग्रंथों में कई जगहों और कई संदर्भो में मद्रों का उल्लेख हुआ है. उनकी शासन सत्ता, राज्य और राजाओं के वर्णन के साथ-साथ उनके राज्यों की भौगोलिक स्थिति का वर्णन भी इन ग्रंथों में हुआ है, जो अर्रियन के वर्णन से मेल खाते हैं.

            मद्रों के राज्यों को वैराज्य कहा गया है.  कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वैराज्य राज्यों का उल्लेख है. कौटिल्य ऐसे राज्यों की दुर्दशा का भी वर्णन करता है और इस प्रणाली को वह अच्छी नहीं मानता है. यह विदित है कि कौटिल्य राजशाही को पसंद करता था, इसलिए उसने इन गणराज्यों को राजा-विहीन और दुर्दशा वाला वर्णित किया और इस शासन प्रणाली को अस्वीकृत किया. अगर हम वैराज्य शब्द की उत्त्पति पर गौर करें तो देखते हैं कि सायण ने ऐतरेयब्राह्मण के भाष्य में वैराज्य के सन्दर्भ में इसे ‘विशेषेण राजत्वं‘ शब्द से परिभाषित किया है. मार्टिन हौग, के. पी. जायसवाल और आर. सी. मजुमदार इसे राजा-विहीन शासन के समान मानते हैं और आर. शामाशास्त्री इसे विदेशी शासन के रूप में ग्रहण करते हैं.

            इस सन्दर्भ में ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 188वें सूक्त के मन्त्र 4 से 6 दृष्टव्य है:

‘प्राचीनं बहिर्रोजसा सहस्रवीरम स्त्रणन. यत्रादित्या विराजथ. (ऋग. 1.188.4)

विराट सम्राद्विभ्विः प्रभ्वीर्बहिविश्च भूयसीश्च याः. दुरो घृतान्यक्षरण . (ऋग. 1.188.5)

सुरुक्मे ही सुपेशसाधि श्रिया विराजतः. उषासावेह सीदताम. (ऋ ग. 1.188.4)

             इन मन्त्रों में हमें विराट और सम्राट शब्द मिलते हैं, जो विराज शब्द से जुड़े हैं, ये शब्द तेजस्वी, विभु और शोभा आदि अर्थ के द्योतक हैं. विराट शब्द ‘वैराज्य ‘ की उपमा प्राप्त करता है. इससे स्पष्ट है कि प्रारंभिक रूप में ‘वैराज्य’ शासन एक ख़ास तरह का था, जो अपने गुणों या प्रसिद्धि से जाना जाता था. ऋग्वेद में प्रयुक्त यही अर्थ ऐतरेयब्राह्मण (8) में लिया गया है, जहाँ राज्य विराट, सम्राट शब्द साथ-साथ आये हैं और ये शब्द शासन के स्वरूप का बखान करते हैं, अर्थात ऐसे राज्य जो अपने तेज और शोभा से शासन करते हैं. यह अभिजात्य-वर्ग (Aristocracy) या कुलीन तंत्र को इंगित करता है जैसा कि ग्रीक दार्शनिक इसे कहते हैं. स्पष्टतः वैराज्य राज्यों में सत्ता की शक्ति जनता/जनपद यानि कि लोगों के समूह में सन्निहित होती थी. शासन के स्वरूप का यह प्रतिदर्श (नमूना) उस समय हमें दुनिया के अन्य भागों में भी मिलता है, इसलिए वैराज्य का अर्थ राजा-विहीन राज्य नहीं होता है, बल्कि एक ऐसा राज्य जिसके शासन की बागडोर जनता के हाथ में थी अर्थात ‘वैराज्य' शब्द गणराज्य का अर्थ देता है. इस अर्थ में मद्रों में गणतंत्र-व्यवस्था प्रचलित थी, यह भली प्रकार से स्पष्ट होता है.

            मेदे लोगों ने ईसा-पूर्व 625 तक राजतन्त्र को अंगीकार कर लिया था. जातक कथाओं में वर्णित मद्रों की शासन-व्यवस्था इस बात की पुष्टि करती है. भगवान बुद्ध के समकालीन बिम्बसार ने मद्र राजकुमारी से शादी की थी, सम्भवतः वह अजातशत्रु की माँ थी. बुद्ध के समय मद्र की राजकुमारियां सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध रही हैं. इस प्रकार से यह तथ्य पुष्ट होता है कि असीरियन मेदे और भारतीय मद्र समकालीन थे. न केवल समकालीन थे, बल्कि वे एक ही मानव-समूह के लोग थे, यह भी स्पष्ट होता है.

        यह स्पष्ट है कि ऐतरेयब्राह्मण और ब्रहदारन्यकोपनिषद में बताए गए ‘उत्तर मद्र’ 700 वर्ष पूर्व एक गणतंत्रात्मक शासन के अधीन हिमालय के आगे बसे हुए थे. उनकी शासन प्रणाली भी मिडिया में उस समय रह रहे मेदे या मेदाई लोगों के सामान ही गणतंत्रात्मक थी. जब बाद में मिडिया में मेदे लोगों में राजतन्त्र प्रणाली को चुना तो भारत के उत्तर-मद्र लोगों में भी राजतन्त्र हावी रहा. भारतीय ग्रंथों में दर्ज हिमालय से परे उत्तर मद्रों का स्थान अर्रियन के मेदे लोगों के स्थान (अर्थात सिन्धु और काबुल नदी के बीच में अर्रियन जिन्हें मेदे कहकर वर्णित करता है, वे भारतीय साहित्य में मद्र के रूप में वर्णित है) से मिलता है. अतः इस साक्ष्य से मेदे और मद्र एक ही मानव-समूह प्रमाणित होता है.

            मेदे और मद्र की पहचान या समानता के लिए ये संकेत महत्वपूर्ण है. इन संकेतों से संतोषपूर्ण ढंग से मेदे और मद्र का तादाम्य और पहचान होती है. उनकी समानता या तादाम्य को उनके धर्म और दर्शन के विचारों से भी समर्थन मिलता है, जो ग्रीक/ पर्शियन ग्रंथों के साथ-साथ भारतीय वांग्मय (साहित्य) में बहुत मात्रा में मिल जाते हैं. प्राचीन काल में पंजाब को आरत्त देश भी कहा गया है, जिसे आर्य लोगों के लिए अच्छी जगह नहीं कहा गया है. इसे मद्र (मद्रका) और वाह्लिक लोगों से अधिवासित (Domiciled) भूमि कहा गया है. महाभारत में मलेच्चः कहा गया है. पाणिनी ने मद्रों को भद्र और Mangal कहा है. पाणिनी सम्भवतः मद्र देश का ही था और वह श्वेतकेतु के समय की बात कर रहा है. पाणिनी के बाद में भी पंजाब में मद्र लोगों के अधिवासन (Domiciliation) के संकेत मिलते हैं. यह देरिअस (Darius) के भारत पर आक्रमण के समय की अवधि बैठती है, जब पर्शियन यहाँ बसे. हिन्दुओं ने उसी अर्थ में उनके लिए मद्र शब्द का प्रयोग किया, जिस अर्थ में अकेमेनियन समय में ग्रीक लोग मेदे या पर्शियन शब्द का इस्तेमाल करते थे.

            महाभारत में वर्णित मद्र ही मेदे हैं, इस तथ्य की पुष्टि दुर्योधन द्वारा मद्र राजकुमार शल्य के सारथी के रूप में कर्ण को चुनने से भी होती है.

मेग/मेघ

मेघ या मेग भारत का एक प्राचीन राजनीतिक और सांस्कृतिक जातीय समूह है. कर्नल कन्निंघम ने इसे भारत की आदिम जाति कहा है. वेदों  में उल्लेखित शुतुद्रू नदी  (‘मेगाद्री’) का नाम उस नदी के मुहानों पर मेगों/ मेघों के निवासित होने के कारण ही पड़ा. मेगद्रु/ मेगाद्री नदी  को ही बाद में सताद्री और सतलज नदी कहा गया है. प्राचीन काल में मेग/ मेघ जाति का विस्तार मेगद्रु/ मेगाद्री नदी से मेघना नदी तक रहा है.  वर्तमान में यह जाति भारत के 10 राज्यों और 2 केंद्र शासित राज्यों में अधिसूचित अनुसूचित जातियों में शुमार है. भारत के 8 राज्यों में यह मेघ नाम से, दो राज्यों (छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश) में सिर्फ मेघवाल नाम से, महाराष्ट्र में मेघवाल व मेंघवार नाम से, गुजरात में मेघवाल, मेघवल, मेंघवार नाम से, राजस्थान में मेघ, मेघवाल, मेगवाल और मेंघवार नाम से, जम्मू-कश्मीर में मेघ व कबीरपंथी के नाम से, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा आदि में मेघ के नाम से अधिसूचित है. इन राज्यों में मेघ लोग भगत, आर्य-भगत, मेंह्ग (Menhg), कबीरपंथी, आदि अन्य नामों से भी जाने जाते है. मेघ शब्द व्यक्तिवाचक और गुणवाचक शब्द है और इसके साथ जुड़े ‘वाल’ का अर्थ ‘समूह’ या ‘वंशज’ से हैं. ‘पीपल ऑफ़ इंडिया-राजस्थान’ में  मेघ जाति की उत्पति या निकास एक ऐसे  ऋषि से हुआ बताया गया  है, जिसमें बादलों से वर्षा कराने की शक्ति थी, अस्तु उस ऋषि को मेघ कहते थे. मारवाड़ मर्दुम शुमारी में भी मेघ जाति की उत्पत्ति ‘मेघ ऋषि’ से होना उल्लेखित किया गया है और  ‘मेघ’ को ब्राह्मण उल्लेखित किया है. बॉम्बे गजेटियर में मेघवालों की उत्पति और उनकी प्राचीनता के बारे में उल्लेख है कि –-मेग, संभवतः तिमुर के मेगियन (Magians of Timur) है, जो रियासी जम्मू और अख़नूर की वृहद् जनसंख्या है, ये निम्न जाति  मूल-प्रजाति (pure race) है, दूसरी जगहों में यह बहिष्कृत या जाति-बाह्य है. ये संभवतः आर्यन के मेकी (Mekie) है और मेखोवल उनसे ही सम्बंधित है. ये सारस्वत ब्राह्मण होने का दावा करते है. बुर्नेस (Burnes) इन्हें दक्षिण थार की मूल प्रजाति (aboriginal race) मानता है. ये निचले- सिंध के मेहर (Mehar) और बलूचिस्तान के मेघरी (Meghari) हैं. ये प्लिनी ( Pliny ) के मेगरी (Megari) या मेगाल्लाए (Megallae) है और ये राजपूत-इतिवृत्त में मोकर (Mokar) हैं. पंजाब कास्ट्स में भी मेघ जाति की उत्पत्ति किसी मेघ नामक व्यक्ति से ही हुई बताई गई है. इन सब प्रसंगों में मेघ जाति अपना सम्बन्ध मेघ यानि बादल से जोडती है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है और इस जाति की मान्यता है कि इस धरती पर सबसे पहले मेघ ही हुआ, उसी की संतति में बाकी सभी जातियां है. राजस्थानी शब्दकोष में मेघ को एक वंश का नाम बताया गया है. आर्यों के भारत-आगमन से पूर्व यह मेघ भारत में निवासित रही एक प्राचीन आदिम-जाति है. राजपूतों के परिघटन के समय कई अन्य समूह भी इस जाति में शामिल हुए. मूलतः यह ऋग्वैदिक काल में सिन्धु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारों पर बसने वाला एक राजनैतिक और सांस्कृतिक समूह था, इस में कोई संदेह नहीं रह जाता है. 

ऐतिहासिक रूप से यह जाति मूलतः पंजाब (एकीकृत भारत)  की एक आदि-निवासी जाति है और आर्यों के भारत में आने से पहले सिन्धु-सागर यानि कि पंजाब की नदियों के मुहानों पर बस चुकी थी. मेघों को भारत (सिंध-सागर) में सबसे पहले बसने वाले पहले मानव समूह में रखा जाता है और उसे पंजाब की आदि-निवासी जाति कहा गया है. भारत में निवास करने वाली मानव-प्रजातियों को 1. प्राचीन तूरानी, 2. आर्य और 3. बाद के तूरानी व सिदियन, इन तीन भागों में विभक्त किया जाता है. इस वर्गीकरण के अनुसार  टक्का और मेग आदि सिंध-सागर के प्रारंभिक या मूल निवासी थे और वे मद्र कहलाते थे. प्लिनी के साक्ष्य से कन्निंघम बताते हैं कि ईसा की पहली शताब्दी में तक्षशिला का क्षेत्र अमंदा या अमंद्र कहा जाता था, जिसका उल्लेख मेदे (Mede) के प्रसंग में आ चुका है.

            इस पृष्ठभूमि में मेघ जाति के निवास की वर्तमान स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि आज भी इनकी जनसंख्या का सर्वाधिक घनत्व प्राचीन काल के मद्र देश के भू-भागों में या उसके इर्द-गिर्द ही है अर्थात विभिन्न घटनाओं ने उन्हें विस्थापित होने को मजबूर किया तो वे आसपास के क्षेत्रों में जा बसे. ग्रीक इतिहासकारों ने उन्हें मेगले कह कर उल्लेख किया है. प्लिनी ने नेचुरल हिस्ट्री की 6ठी जिल्द में इस जाति का उल्लेख ‘मद्र' के नाम से न करके मेगल्लाए (megallae) के नाम से किया है, जिसे आजकल मेग/ मेघ/ मेंघवार/ मेघवाल/ मेगवाल आदि नामों से संज्ञात करते हैं. मेगस्थनीज की इंडिका में भी इस जाति को मेगल्लाए कहा गया है. स्पष्टतः प्लिनी, अर्रियन और मेगस्थनीज आदि ने जिस मेगल्लाए जाति का वर्णन किया है, वे भारतीय लोग थे और वे सिकंदर के आक्रमण के समय सतलुज नदी और उसके आसपास बसे हुए थे, परन्तु मध्यकाल में उनका कहीं पर भी नामोल्लेख नहीं मिलता है ऐसाकन्निंघम ने लिखा है.

            इन संकेतों से यह स्पष्ट होता है कि मेगल्लाए शब्द वर्तमान मेग/ मेघ जाति का प्राचीन नाम है. मेगल्लाए शब्द को मल्लोई, मल्ल, मालव आदि के रूप में भी अनूदित किया गया है. वहीं पालि साहित्य से हमें ज्ञात होता है कि मल्ल पूर्वोत्तर भारत की एक प्राचीन क्षत्रिय जाति थी. यह भी ज्ञात होता है कि भगवान बुद्ध की समकालीन इस प्राचीन मल्ल जाति के उस समय पावा और कुशिनारा में प्रसिद्ध गणराज्य थे. पूर्वोत्तर की इस मल्ल जाति का पश्चिमोत्तर मेगल्लाए/ मल्लोई/ मल्ल या मालव से क्या सम्बन्ध था, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन महाभारत से यह सुपठित है कि मद्र-नरेश की महारानी, जो सावित्री की भी माँ थी, उससे उत्पन्न उसके 100 पुत्र मालव कहलाते थे. इस साहित्यिक साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि पश्चिमोत्तर के मेगल्लाए/ मल्ल/ मल्लोई/ मालव जाति प्राचीन मद्र जाति से ही निकली हुई जाति थी. मेगल्लाए या मल्लोई अपने मूल-स्थान से विस्थापित होने के बाद मध्यभारत में जा बसे. मध्यकाल में मालवा के नाम से प्रसिद्द भौगोलिक क्षेत्र इसी जाति के निवास-स्थान से पड़ा होगा, ऐसा स्पष्ट होता है. साथ ही पश्चिम में मारवाड़, जैसलमेर, बहावलपुर और भटनेर, बीकानेर आदि तक इस जाति के अधिनिवास के प्रमाण मिलते हैं. मध्य-काल में मारवाड़ का बाड़मेर क्षेत्र भी मालानी/ मलानी कहा जाता था. इसका कारण भी  इस क्षेत्र में उस समय मेगालाए/ मल्लोई लोगों से अधिवासित होना ही रहा है. जहाँ से बाद में राजपूत सत्ता का उदय होता है. वर्तमान समय में भी इन क्षेत्रों में मेघ प्रजाति (रेस) का सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व इन्हीं क्षेत्रों में है.’

मूल शोध-पत्र का पीडीएफ़ आप यहाँ इस लिंक मेद, मद्र, मेग, मेघ - पर पढ़ सकते हैं.


विकिपीडिया पर यह आलेख भी देखने लायक है-
Medes (इसे 06-09-2019 को देखा गया)

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