अतीत की पड़ताल

Sh. R.L. Gottra
इस विषय पर श्री आर.एल. गोत्रा जी का पॉडकास्ट यहाँ उपलब्ध है जो पंजाबी में है.

सन् 1998 में सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद तीन चार साल मैंने बिजनेस किया, बिजनेस के बाद धार्मिक पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं. चारों वेद पढ़े, उपवेद पढ़े, मनुस्मृति पढ़ी और गुरुइज़्म से संबंधित कुछ पुस्तकें पढ़ीं. इस्लाम पढ़ा, इसाईयत पढ़ी, सिखिज़्म पढ़ा, और सभी धर्मों के बारे में पढ़ने के बाद मैंने अंदाजा लगाया कि हमें धार्मिक किताबें इस नज़रिए से पढ़नी चाहिएँ कि उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है. इसके बिना हम यह नहीं समझ सकते कि किस मत-मतांतर के साथ क्या कुछ जुड़ा हुआ है और उनके लिखने वाले कौन थे और लिखने वालों की सूचना के स्रोत क्या थे और उनके लेखन का आधार क्या था.


मैंने सबसे पहले यह विश्लेषण किया कि पहले बुनियाद की ओर जाया जाए और जाना जाए कि लिखने वाले की पृष्ठभूमि क्या थी और उसकी सूचनाओं के स्रोत क्या थे; उसकी मानसिकता क्या थी; और उसका व्यक्तिगत इतिहास क्या था; ताकि पता चले कि उसकी जानकारी कितनी और क्या थी और उसके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (biases) क्या थे. इन बातों का विशेष तौर ध्यान में रखते हुए मैंने पिछले 15 वर्ष में काफी अध्ययन किया है. इस अध्ययन के आधार पर मैंने यह देखा है कि 185 ईसापूर्व शुरू हुई जब एक साज़िश/कार्य नीति के तहत शुंग डायनेस्टी यानि ब्राह्मणों का राज्य स्थापित हुआ. उसके बाद 300 वर्ष तक कई पौराणिक चीज़ें रची गईं. वे क्या हैं इसका पता हमें डॉ. अंबेडकर की ‘राइटिंग्ज़ एंड स्पीचिज़’ से पता चलता है. इसके अतिरिक्त जो विदेशी स्वतंत्र खोजी हैं जिन्होंने हमारे हमारे भारतीय पुस्तकालयों में आकर अध्ययन किया जैसे वेंडी डोनिगर (Wendy Doniger) है जिसने हिंदुओं के बारे में लिखा है, Religion caste and politics in India में काफी कुछ जैफ्रेलॉट (Christophe Jaffrelot) ने लिखा है. ये बहुत ज्ञानवान थे और उन्होंने अपने विषय पर बहुत गहरा अध्ययन किया था. इसके अलावा यह कहूंगा कि डॉक्टर सुरेंद्र ‘अज्ञात’ जिन्हें ‘अज्ञात’ के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने भी बताया है कि अतीत में जो धार्मिक साहित्य रचा गया उसमें क्या कुछ था.

मैंने अपने अध्ययन में पाया की विशेष कर 185 ईसापूर्व  जो भी शासक वर्ग भारत में हुए, जिसकी शुरुआत होती है शुंग डायनेस्टी के पुष्यमित्रशुंग से, जो भी आक्रमणकारी आए उन्होंने श्रमिक वर्गों को गुलाम बनाया और उन्हें अपने शासन-प्रशासन में कैसे प्रयोग करना है उसके बारे में साहित्य लिखा. जहाँ तक सच्चे साहित्य की बात है तथ्य यह है कि बाहरवीं शताब्दी से पहले कोई इतिहासकार नहीं मिलता जो बताता हो कि सच्चा इतिहास क्या था. लेकिन आज के रिसर्च स्कॉलरों ने वेद, पुराणों का गहन अध्ययन और विश्लेषण करके और उनके लेखकों की मानसिकता का विश्लेषण करके उनकी सोच और उस सोच के आधार का अध्ययन करके बताया है कि उनके लेखन के पीछे मंशा क्या थी. उससे मैंने जाना कि उक्त साहित्य के ज़रिए भारत के श्रमिक वर्ग को मानसिक रूप से गुलाम बना लिया गया. मानसिक गुलाम बनाने के सिलसिले में पहले उन्हें शिक्षा से वंचित कर दिया गया. जो लोग सदियों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी अशिक्षित और अपने मालिक के गुलाम रह जाते हैं वे दिमाग़ी ग़ुलामी के शिकार हो जाते हैं. उन्हें जो भी उल्टा-सीधा बताया जाता है (सीधा तो कम ही बताया है) उसी के अनुसार उनकी सोच बनती चली जाती है. (उनके मालिक जानबूझ कर विभिन्न मत-मतांतर बनाते रहे).

वैसे तो सभी विदेशी आक्रमणकारियों ने यह कार्य किया लेकिन आर्य सनातनी लोगों का प्रभाव बहुत गहरा पड़ा जिसे बाद में 18वीं शताब्दी में आकर हिंदू शब्द (जिसका अर्थ पर्शियन और अरबी में क्या निकलता है उसे आप जानते ही हैं) के रूप में स्वीकार कर लिया. यह नाम मुग़लों ने दिया था जिसका अर्थ बहुत अपमानजनक था. ख़ैर, उस अर्थ को पीछे धकेलते हुए उन्होंने इसे इसलिए स्वीकार कर लिया क्योंकि शासकों ने उनके दिमाग में बिठा दिया कि तुम हिंदू हो. स्वामी दयानंद ने जिन्होंने 19वीं शताब्दी के आखिरी दशकों में आर्यसमाज की स्थापना की थी उन्होंने यह माना है कि हिंदू शब्द मुगलों द्वारा दी गई एक गाली है.

उसके बाद बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में जब मिंटो मार्ले सुधार आए. इससे यह बात स्पष्ट हो गई कि आने वाले समय में प्रशासन में वही लोग कार्य कर सकते थे (चाहे हिंदू हों, मुस्लिम हों, सिख हों, ईसाई हों) जो पढे लिखे हों. उस समय देश में केवल 3% लोग पढ़े-लिखे थे (जैसा कि 1901 के जनसंख्या आंकड़ों से पता चलता है). उस समय शिक्षा पर एकाधिकार ब्राह्मणों का था जो उस समय लगभग अढ़ाई प्रतिशत थे और अन्य आधा प्रतिशत दुकानदार वगैरा थे जो लिखना, पढ़ना, बोलना जानते थे लेकिन उन्हें विद्वान कहना कठिन था. ऐसी परिस्थितियों में पहले मुसलमानों ने, फिर सिखों ने, सिंह सभा ने और बाद में हिंदुओं ने एक आह्वान किया कि चलो भाई हम आपको (निम्न जाति वालों को) पढ़ाते हैं वैसे यह काम सबसे पहले महात्मा फुले ने किया था जिन्होंने सबसे पहला स्कूल जो सबके लिए उपलब्ध था वह महाराष्ट्र में खोला था. मिंटो मार्ले सुधारों के तहत सरकार में प्रतिनिधित्व के लिए दो योग्यताएं रखी गई थीं. पहली योग्यता थी कि शिक्षित होना ज़रूरी था और दूसरा अचल संपत्ति का मालिक होना ज़रूरी था. निम्न जातियों के पास अचल संपत्ति इसलिए नहीं थी क्योंकि एक लैंड एलियनेशन एक्ट उस समय भारत में लागू था जिसकी वजह से दस्तावेजों में उनके नाम पर कोई जमीन नहीं थी. पंजाब का भूमि एलियनेशन एक्ट बताता है कि शूद्रों अतिशूद्रों के पास कागजों में कोई संपत्ति नहीं होती थी. इसलिए वे वोटर नहीं बन सकते थे. इसलिए दूसरी योग्यता उनका शिक्षित होना हो सकती थी जिससे उन्हें शिक्षा देने वाले वर्ग उनके वोट का लाभ उठा सकते थे. इसी मंशा से मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च सभी ने उन्हें कहना शुरू किया कि चलो आओ, हम तुम्हें पढ़ाते हैं. उनकी ऐसी सोच के पीछे उनका स्वार्थ था जिसके कारण हमें शिक्षित होने का मौका मिल गया. हमारे लोगों ने बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में स्कूलों में जाना शुरु किया. लेकिन अफसोस है कि उन स्कूलों में भी, जैसा कि मेरे ताया जी, जिनकी मृत्यु कुछ वर्ष पूर्व 2011 में 101 साल की आयु में हुई थी, बताया करते थे कि जब वो आर्समाज के स्कूलों में जाते थे तो उन्हें अलग लाइन में बिठाया जाता था और उनके पानी पीने का प्रबंध भी अलग से था. हालांकि आर्यसमाज कहती रही कि उन्होंने अछूतोद्धार का आंदोलन चलाया था लेकिन उस आंदोलन की पोल-पट्टी उस समय के चश्मदीद ने खोल दी. ऐसी बातें सुनकर तो हमें उस आंदोलन का कहीं अता-पता नहीं मिलता. इनकी वह स्वार्थपूर्ण कार्यनीति आज़ादी के बाद भी जारी रही.

प्रत्येक धर्म ने छोटी कही जाने वाली जातियों में अपने सेल बनाकर अपने राजनीतिक प्रयोजनों को पूरा करने की कोशिश की है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर धर्म ने हमें क्या दिया?  बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के संविधान के तहत हमें मुफ्त शिक्षा का अधिकार मिला था जिससे हमारी शिक्षा का प्रारंभ हुआ और आगे चलकर हम जान सके की पहले क्या होता रहा है और आज क्या हो रहा है और क्या होना चाहिए. सरकारी नौकरियों में हमें जो आरक्षण के तहत नौकरियाँ मिलीं उनके तहत हम कंडक्ट रूल्स से बंधे हुए थे और हमें जो पता होता भी था उसके बारे में हम कुछ बोल नहीं पाते थे. लेकिन रिटायरमेंट के बाद मेरे जैसे कई लोगों ने बोलना शुरू किया. हमारी और हमारी पीढ़ी के बाद के लोग अब शिक्षा प्राप्ति के बाद उस मानसिक गुलामी को समझने लगे हैं और खुलकर बोलने लगे हैं. ध्यान रहे कि इस नई पीढ़ी से पहले की लगभग 3 पीढ़ियों को इन धार्मिक संगठनों ने मानसिक गुलाम बना कर रखा था. इस तथ्य को भूलना नहीं चाहिए. यही कारण था कि हमारी पिछली तीन पीढ़ियों में मानसिक जागरूकता नहीं आ पाई. इससे हमें यही शिक्षा मिली कि सबसे बड़ी गुलामी मानसिक गुलामी ही होती है चाहे वह राजनीतिक पार्टी की गुलामी है, चाहे धर्म की गुलामी है, चाहे छोटे-छोटे मत-मतांतरों की गुलामी है. हम अभी भी काफी हद तक उस गुलामी में फंसे हुए हैं हालांकि कुछ आज़ाद सोच वाले पढ़े-लिखे ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट और रिसर्च स्कॉलर हमें अपनी जाति में मिलते हैं जो समझते हैं कि मानसिक आज़ादी क्या है. उनसे ही कोई ढंग की बात हमें सुनने को मिलती है. विशेष बात यह है कि जब तक मानसिक गुलामी से पीछा नहीं छूटता तब तक हम लोग इतिहास से भी कोई सबक नहीं ले सकते. अपने उक्त इतिहास से हमें यह सबक मिलता है कि जिस प्रकार शरीर के विकास के लिए अच्छे भोजन की जरूरत होती है उसी प्रकार मानसिक सेहत के लिए शिक्षा जरूरी होती है जो मन की खुराक का काम करती है. शिक्षा भी वो सामान्य शिक्षा नहीं जो स्कूलों में पढ़ाई जाती है. यह भी देखना पड़ता है कि उस शिक्षा की शुरूआत क्या है, शिक्षा का पाठ्यक्रम निर्धारित करने वाले कौन लोग थे जो नहीं चाहते थे कि हम मानसिक गुलामी से आजाद हों. उन्होंने अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार पाठ्यक्रम की पुस्तकें लिखीं और लिखवाईं और हमें रिसर्च की ओर नहीं जाने दिया. लेकिन जब हम स्वतंत्रत तौर पर रिसर्च करने की कोशिश करते हैं तब हमें पता चलता है कि जिन कौमों ने तरक्की की है वे वही कौमें हैं जो मानसिक तौर पर आजाद थीं जैसे यूरोपियन देशों में होता है. वहां लोगों ने शिक्षित होकर तर्क के आधार पर अपने ज्ञान का भंडार विकसित किया. चीन का उदाहरण भी हमारे सामने है.

पूरी दुनिया का इतिहास यही बताता है कि जो लोग मानसिक रूप से विकसित हुए हैं उन्होंने ही तरक्की की है. इसके बगैर तरक्की नहीं हो सकती. जहां तक व्यवसाय का सवाल है तो व्यवसाय समय-समय पर बदलते रहते हैं. डॉक्टर अंबेडकर ने अपनी ‘राइटिंग्ज़ और स्पीचिज़’ में यह बताया है के 19 वीं शताब्दी के हर दशक में दो-दो बड़े अकाल पड़े जिसके कारण कई लोगों के व्यवसाय तबाह हो गए. उदाहरण के तौर पर 17वीं शताब्दी में एक औद्योगिक क्रांति आई. उस समय भारत में कपड़ा बनाने का उद्योग सबसे अधिक विकसित था. सबसे पहले उस औद्योगिक क्रांति ने हमारे यहां के बुनकरों के काम-धंधे को बर्बाद कर दिया. तब उन्होंने खुद को जीवित रखने के लिए कुछ भी खाया, यहां तक कि मरे हुए जानवर भी. हमने बुजुर्गों से सुना है कि महाराजा रणजीत सिंह के समय अकाल के दौरान लोगों ने घास-फूस तक खाया और कहीं-कहीं मरे जानवरों का मांस भी खाया लेकिन आगे चलकर मांस खाना बंद भी कर दिया गया.

उसके बाद सामाजिक और आर्थिक उन्नति के साथ कृषि का काफी विकास हुआ जो भारत का मुख्य व्यवसाय रहा है. उस प्रगति और शिक्षा के कारण लोगों की सोच में परिवर्तन आना शुरू हो गया.

अब आवश्यकता इस बात की है कि मानसिक गुलामी जहां भी, जिस रूप में भी है उससे जितना जल्दी हो सके पार पाया जाए. ऐसा इसलिए क्योंकि जो धार्मिक षड्यंत्र या रणनीतियां तैयार करके जारी की गई हैं उन्हें समझना बहुत जरूरी है. डॉक्टर नवल वियोगी ने अपनी पुस्तक ‘इंडिजिनस पीपल ऑफ इंडिया’ में लिखा है कि यह 'आत्मा-परमात्मा', 'पुनर्जन्म', 'पिछले जन्म के कर्मों का सिद्धांत' भी एक प्रकार का षड्यंत्र है और इसका प्रयोजन यह था कि मजदूरों और श्रमिक वर्गों को फालतू के सिद्धांतों में उलझा कर रखा जाए ताकि वे तबके कहीं असल बात को समझ कर विद्रोह करने पर न उतर आएँ. हमें इतिहास से इन बातों को समझना होगा ताकि मानसिक गुलामी की जंजीरों को हम लोग समझ सकें और उन्हें तोड़ने के काबिल हो सकें.

जिस प्रकार सत्रहवीं शताब्दी में एक औद्योगिक परिवर्तन हुआ था उसी प्रकार अब 21वीं शताब्दी में आकर बहुत बड़े वैज्ञानिक परिवर्तन हो रहे हैं. मेघ भगतों ने सियालकोट में रहते हुए स्पोर्ट्स और सर्जिकल का काम सीखा था और उसमें महारत हासिल की थी. लेकिन आज स्थिति यह है कि चीन इन दोनों व्यवसायों से संबंधित अपने सस्ते उत्पाद पूरी दुनिया में और भारत में उतार चुका है जो बहुत सस्ते हैं. उसकी वजह से हमारे समाज के एक बहुत बड़े कारीगर वर्ग का जबरदस्त नुकसान हुआ है. उनमें से कइयों को रिक्शा चलाना पड़ रहा है या वे कहीं मज़दूरी करने लगे हैं जबकि वे प्रशिक्षित मजदूर थे. चीन की मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने हमारे जालंधर में स्पोर्ट्स गुड्स आदि के कार्य में लगे कई मजदूरों को बेरोजगार कर दिया है.

यानी रोजगार बदलते रहे हैं तो धर्म बदलते रहे हैं. सिंधु घाटी सभ्यता और सप्तसिंधु क्षेत्र में कभी बौध सभ्यता का बोलबाला था. वहां के लोग आज के पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, पाकिस्तान का बहुत बड़ा क्षेत्र, राजस्थान, गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र के क्षेत्र में बिखर गए हुए हैं और वे नहीं जानते कि उनका पिछोकड़ (अतीत, मूल) पहले एक ही था. वे आज खुद को अलग-अलग समझते हैं. इससे हमें यह सबक भी सीखना पड़ेगा कि हम इस बात पर विचार करें कि यदि पहले हमारा मूल एक था तो आज हम उत्तर-पश्चिमी भारत में एक क्यों नहीं हो सकते. वे सही सोच के साथ अपने मूल को समझते हुए, इतिहास को समझते हुए आपस में नई और सांझी सोच विकसित कर सकते हैं और अपना कुछ सँवार भी सकते हैं.

आगे अब एक और खतरा मंडरा रहा है. जैसे पिछली टेक्नोलॉजी ने हमारे व्यवसाइयों को बर्बाद किया उसी प्रकार आने वाले समय में रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या ऑटोमेशन जैसी टेक्नोलॉजी और कंप्यूटर आधारित या आने वाले समय की और विकसित टेक्नोलॉजी हमारे व्यवसाइयों को बहुत दूर तक प्रभावित करेगी. उसे ध्यान में रखते हुए बच्चों की शिक्षा निर्धारित करने की आवश्यकता होगी. आज सौ लोग एक काम को करते हैं कल उसे एक रोबोट ही कर देगा. शासक वर्ग उसी के लिहाज से शिक्षा में परिवर्तन भी कर रहा है लेकिन वो शिक्षा सभी के लिए उपलब्ध नहीं है. हमें अपने बच्चों की करियर काउंसलिंग का प्रबंध खुद ही करना होगा, करियर काउंसलिंग के प्रशिक्षण कक्ष माइक्रो लेवल (मोहल्ला स्तर) तक ले जाने होंगे ताकि हम अपने बच्चों को  शिक्षा के अनिवार्य तौर-तरीकों की ओर ले जा सकें ताकि आने वाले समय को संवारा जा सके. अन्यथा, आने वाला समय आपके लिए बेरोजगारी की एक अन्य गंभीर समस्या लेकर आ रहा है. यदि आपके आर्थिक मामले सुलट गए तो आगे चलकर और भी बहुत कुछ ठीक हो जाएगा.

बच्चों में एक अच्छी मानसिकता विकसित करने में तीन  बातों की बहुत बड़ी भूमिका रहती है- परिवार, समाज और आस-पास का वातावरण. पारिवारिक स्तर पर माता-पिता समय निकालकर बच्चों को सही शिक्षा दें/दिलवाएं.

सामाजिक और देश के वातावरण संबंधी प्रवृतियों (ट्रेंड्स) पर विशेष नज़र रखने की ज़रूरत होगी. इस समय देश में जो वातावरण है वो विकास की दिशा में जा रहा नहीं दिखता. कोई भी राजनीतिक पार्टी ले लीजिए वो विकास की जगह अन्य खामियां सिस्टम में ला रही है. उदाहरण के लिए चुनावी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा रहा है. यह तीन तरीके से किया गया है. धर्म, जाति और विवेकहीन राजनीति. इस पर एक पुस्तक भी है ‘रिलीजियन, कास्ट एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया’ (Religion, Caste, and Politics in India) जिसे जैफ्रेलॉट (Christophe Jaffrelot) ने लिखा है. इस पुस्तक ने हमारे यहां के वातावरण पर काफी प्रकाश डाला है. इस रिसर्च स्कॉलर ने भारत की राजनीति को गहरी नज़र से देखकर काफी कुछ लिखा है. पिछले चुनावों के दौरान जो परिवर्तन हुए हैं उसका पर्याप्त संकेत इस पुस्तक में दे दिया था. ध्यान रहे यह पुस्तक पिछले चुनावों से काफी पहले लिख दी गई थी लेकिन लेखक द्वारा बताए गए परिवर्तन उसके बाद स्पष्ट रूप में देखे गए. उसकी तब की कही गई बातें निहितार्थ से (implicitly) अब सामने आ रही हैं.

इन सब बातों से निष्कर्ष निकलता है कि धार्मिक लोगों, राजनीतिक लोगों और बिरादरीवादी लोगों के शिकंजे में मत आओ. पहले अपनी तरक्की का प्रबंध करो. मेरा अनुभव और मेरी ऑब्ज़रवेशन भी यही कहती है. मैं नौकरी के सिलसिले में देशभर में काफी घूमा हूं, देश से बाहर भी गया हूं, मैं क्लास वन इंटेलिजेंस ऑफिसर के तौर पर रिटायर हुआ. मेरी नेचर ऑफ जॉब ऑब्ज़रवेशन से ही संबंधित थी. इसलिए अपने अध्ययन और ऑब्ज़रवेशन से जो जाना है उससे प्राप्त अनुभव को ही व्यक्त किया है.

आर.एल. गोत्रा
माडल हाऊस, जालंधर.

(यह श्री गोत्रा की मेघनेट से पंजाबी में हुई बातचीत का उन्मुक्त हिंदी अनुवाद है)

1 comment:

  1. सन् 1998 में सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद तीन चार साल मैंने बिजनेस किया, बहुत बढ़िया पोस्ट
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