मेघवंश - ऐतिहासिक राजवंश

मेघवंश - ऐतिहासिक राजवंश एवं राजस्थान संबंध - साधना मेघवाल
लेखिका : डॉ साधना मेघवाल
असिस्टेंट प्रोफेसर(इतिहास),
डिपार्टमेंट ऑफ सोसिअल साइंसेज,
सरदार पटेल यूनिवर्सिटी ऑफ पुलिस,
सिक्योरिटी एंड क्रिमिनल जस्टिस, जोधपुर(राज.)

प्राचीन समय के वृहत्तर भारत में वर्तमान राजस्थान मध्य देश का भाग था।1 मौर्यों के सद्यः परवर्ती कुषाणों के इतिहास की जानकारी सर्वविदित है, लेकिन इनका शासन संपूर्ण भारत पर नहीं था। कुषाणों के पश्चात गुप्त वंश का उदय हुआ। कुषाणु और गुप्तों के बीच की अवधि भारतीय इतिहास में अंधकार युग के नाम से जानी जाती है। इस अवधि की ऐतिहासिक सामग्री का इतना अभाव है कि यह कहना असंभव है कि इस अंतराल में भारत में कितने राज्य थे और वे कौन-कौन से राजवंश थे जिन्होंने इस अवधि में राज्य किया। स्मिथ के शब्दों में2 कुषाण तथा आंध्र राजवंशों के नाश (सन 220 या 230 ईसवी के लगभग) और साम्राज्य भोगी गुप्त राजवंश के उत्थान के बीच का समय, जो इसके प्राय 100 वर्ष बाद है, भारतवर्ष के इतिहास में यह काल बिल्कुल सादा या अलिखित है।3 इस संबंध में जो कुछ सामग्री उपलब्ध है उसका पूर्ण विश्लेषण और विवेचन नहीं हुआ है।

मेघवंश - एक ऐतिहासिक राजवंश

विसेंट स्मिथ ने भारत के इतिहास का सिंहावलोकन करते समय, इस काल को फ्लीट तथा कीलहार्न का अनुकरण करते हुए बिल्कुल छोड़ दिया है। कुछ इतिहासकारों ने इस समय की इतिहास सामग्री का विश्लेषण करने का प्रयास किया है4, जिससे इस अवधि में वाकाटक, भारशिव और मेघवंश आदि राजवंश उजागर हुए हैं। “वह वाकाटकों के समय में कोसल में एक के बाद एक इस प्रकार 9 शासक हुए थे…. यह लोग मेघ कहलाते थे।5 मेघों की शासन सत्ता मध्यदेश में रही है, यह अब तक प्राप्त ऐतिहासिक सामग्री के अन्वेषण से सुस्पष्ट है एवं इनकी सत्ता की धुरी कौशांबी थी जो प्राचीन समय में कोसल प्रदेश में आती थी यहीं से इनकी सत्ता का विस्तार हुआ। अपनी सात या 9 पीढ़ियों के कारण ये लोग मूलतः विंध्य शक्ति के समय तक जबकि आंध्र पर विजय प्राप्त की गई थी अथवा उससे भी पहले भारशिवों के समय तक जा पहुंचते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार कोसला प्रदेश के सात विभाग थे (सप्तकोसला पुराणों में कहा गया है कि ये शासक बहुत शक्तिशाली और बहुत बुद्धिमान थे गुप्तों के समय में मेघ लोग हमें फिर कौशांबी के शासकों या गवर्नर के रूप में मिलते हैं जहां उनके दो शिलालेख मिले हैं।6 कौशांबी के शासन की सार्वभौम सत्ता कुषाणु से मेघों को हस्तांतरित हुई थी।

 मेघवंश - पुरातात्विक साक्ष्य

मेघ राजवंश की ऐतिहासिकता निर्विवाद बन चुकी है। इस राजवंश को उद्घाटित करने वाले कई शिलालेख एवं मुद्राएं प्राप्त हो चुकी हैं, जिस पर न्यूनाधिक शोधकार्य हो रहा है। जिसमें संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस एन राय एवं उनके साथियों द्वारा कौशांबी से प्राप्त शिलालेखों का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाना उल्लेखनीय है।7 प्रोफेसर अनंत सदाशिव अल्तेकर ने 1943 में इस वंश को संबोधित करने वाले कुछ सिक्कों का प्रकाशन जर्नल आफ न्यूमिसमैटिक सोसायटी आफ इंडिया में किया था।8 इस राजवंश को संबोधित करने वाली मुद्रा पर 1979 में प्रोफेसर अजय मित्र शास्त्री का गवेषणात्मक कार्य प्रकाश में आ चुका है।9 इसके साथ ही शांबी के घोषिताराम विहार की खुदाई से प्राप्त मूर्तियों और अभिलेखांकन पर भी गवेषणाएँ हो चुकी हैं। इन सब से यह सुस्पष्ट हो चुका है कि यह एक ऐतिहासिक राजवंश था। जिन विशेष स्थानों के सर्वेक्षण एवं समुत्खनन शोधों से यह स्थान प्रकाश में लाए गए हैं वे हैं उत्तर प्रदेश में स्थित कौशांबी, भीटा, गिंजा, फतेहपुर तथा मध्य प्रदेश में स्थित बंधोगढ़।10 

मौद्रिक साक्ष्य एवं आभिलेखिक साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए मिरासी ने ऐसी स्थापना की है कि मेघों की शासन सत्ता आधुनिक मध्य प्रदेश में स्थित बंधोगढ़ तक फैली थी जिसका अधिकांश भाग चेदि मंडल में सम्मिलित था। इनकी राजधानी कौशांबी में प्रतिष्ठित थी, जिसे प्राचीन वत्स जनपद की राजधानी होने का सुयोग प्राप्त हुआ था तथा जहां इन शासकों की अधिकांश मुद्राएं एवं प्रचुर संख्या में अभिलेख उत्खनित एवं सर्वेक्षित हुए हैं।11

 मेघवंश - सत्ता काल

कौशांबी के पुरातात्विक साक्ष्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि कौशांबी के शासन की सार्वभौम सत्ता कुषाणों से मेघों को हस्तांतरित हुई थी।12 इस राजवंश का प्रारंभ अजय शास्त्री की स्थापना के अनुसार प्रतिष्ठापक नरेश महाराज मेघ (महाराज मघ) के राजारोहण से माना जा सकता है।13 इस स्थापना का समर्थन प्रो. एस.एन. राय आदि इतिहासकारों ने किया है।14 प्रोफेसर एस एन राय ने राजवंश के नरेशों के बंधोगढ़ से प्राप्त से प्राप्त अभिलेखों और कौशांबी से प्राप्त अभिलेखों में प्रसंगित तिथियों का विश्लेषण करते हुए इनके शासन की सत्ता 129 इस्वी से लेकर 154  ईस्वी तक बंबंधोगढ़ से संबंधित माना है एवं 159 ईस्वी से लेकर 217 ईस्वी तक इसका संबंध कौशांबी से माना है।15 जिस समय मगध से मरुंड स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर रहे थे, मध्यदेश के कौशांबी और बघेलखंड प्रदेशों में मेघों का आविर्भाव हुआ। अभिलेखित साक्ष्य के आधार पर कहा जा सकता है कि मेघ राज्य की स्थापना 120 ईसवी के लगभग हुई। 200 ईस्वी तक यह फतेहपुर तक विस्तृत हो गया। लेकिन इसकी तीसरी शती ईसवी का इतिहास अंधकारमय है। मुद्राओं से हमें इस काल के कुछ मेघ राजाओं के नाम ज्ञात होते हैं जिनमें नव, धनदेव तथा रूद्र अंतिम लगते हैं।16 के पी जायसवाल ने पुराणों की संख्या को सही मानते हुए इस राजवंश के नौ शासक होना माना है।17 प्रोफेसर एस एन रॉय ने भी इस पर विमर्श किया है एवं ऐसी संभावना व्यक्त की है कि इस राजवंश का प्रतिष्ठापक का नाम मेघ या मघ था। मेघ नामक राजा का सिक्का मिल जाने के पश्चात अब इस वंश के संस्थापक के बारे में कोई संदेह नहीं रहा है परंतु उसके शासन, सत्ता का समय पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं है।
मेघ राजवंश के प्रमुख शासकों के शासन सत्ता की अवधि प्रोफेसर एस आर गोयल ने निम्न प्रकार से की है।
वासिष्ठीपुत्र भीमसेन    120 ई. से 140 ई. (हुविष्क के समय)
कौत्सीपुत्र पोठसिरि (प्रोष्ठश्री)  140 ई. से 170 ई.
भद्र मेघ     155 ई. से 175 ई.
शिव मेघ    175 ई. से 184 ई.
वैश्वरण     185 ई. से 205 ई.
भीम वर्मा    225 ई. से 225 ई.
इनके अलावा मेघवंशी के कई अन्य राजाओं के नाम भी मिलते हैं परंतु उनका तिथि व काल निर्धारण नहीं हुआ है वे हैं शत मेघ, विजय मेघ, पुर मेघ, युग मेघ, पुष्पश्री अथवा पुष्यश्री, नविक, नव ,धनदेव तथा रूद्र (रूद्र देव= रुद्र सेन) इत्यादि। इस प्रकार इन के शासन सत्ता का समय प्रथम शताब्दी से तीसरी शताब्दी तक बैठता है।

 पुरातात्विक साक्ष्य से काल निर्धारण

भारतीय इतिहास लेखन में जिस सामग्री का उपयोग किया गया है, वह किसी एक संवत को लेकर नहीं है विभिन्न नरेशों ने अपने अपने राज्य काल में विभिन्न संवतों का प्रचलन किया था। ऐसे में एक समेकित इतिहास लिखते समय इन सभी स्थानीय या प्रचलित संवतों का तालमेल बिठाया जाता है। हमारे इतिहास पुरोधाओं ने इस काम को सफलतापूर्वक किया है एवं आज काफी हद तक विवादरहित बन चुका है, फिर भी इस संबंध में अंतिम स्वीकार्य गवेषणा अभी भी अपेक्षित है। मेघ वंश के शासकों के शिलालेखों आदि पर जो तिथियां अंकित हैं, वे किस निश्चित समय को द्योतित करती हैं? इससे संबंधित प्रश्न विवाद ग्रस्त हैं। रायबहादुर दयाराम साहनी ने इसे गुप्त संवत से संदर्भित किया।18 तो के पी जायसवाल ने कलचुरी संवत से।19 फ्लीट महोदय ने भी गुप्त संवत से इसे संदर्भित किया।20 अमलानंद घोष ने स्थानीय स्थानीय संवत का ज़िक्र किया।21  मिराशी, दिनेश चंद्र सरकार, एमपी चक्रवर्ती, ए.एस अल्तेकर,22,  अजय मित्र शास्त्री आदि ने मेघ वंश के शिलालेखों एवं मुद्राओं आदि पर उत्कीर्ण तिथियों को शक संवत से संदर्भित माना है। जो तिथियां बंधोगढ़ अभिलेखों पर उत्कीर्ण हैं, वे संवत 51-52 व 76 तथा कौशांबी से प्राप्त सामग्री में संवत 81,83, 87,107, 122, 130 और 139 प्रसंगित24है।23 इस संवत की ठीक-ठाक पहचान की जाने पर उनकी शासन सत्ता का समय जाना जा सकता है। उनकी शासन सत्ता का समय जायसवाल के वाकाटकों के समय से लेकर गुप्तों के काल तक माना है। एमपी चक्रवर्ती ने स्तरीकरण के आधार पर इनका समय कुषाणों के समय के नितांत सन्निकट स्थापित किया है।24 जेएस नेगी ने भी मेघों को कुषाणों का सद्यः अनुवर्ती माना है एवं गुप्तों का पुरावर्ती।25

मेघ राजवंश का पतन

गुप्तों के उदय के समय हम कौशांबी को स्वतंत्र राज्य के रूप में पाते हैं। भिंटा से प्राप्त लेखों द्वारा वहाँ शासन करने वाले नरेशों - महाराज गौतमीपुत्र, शिव मघ तथा विशिष्टपुत्र भीमसेन का पता चलता है। मार्शल महोदय के अनुसार यह दूसरी या तीसरी सदी ईस्वी के शासक थे। शिव मेघ मेघों का स्मरण दिलाता है जो कौसल से तीसरी सदी में शासन करते थे। इस राजवंश का अंतिम ज्ञात शासक महाराज गौतमीपुत्र वृषध्वज था, जो चौथी सदी के प्रारंभिक भाग का शासक था, अतः संभव है कि समुद्र गुप्त प्रथम (गुप्त वंश) के काल में वहीं प्रयाग में शासन कर रहा हो।26

श्री कृष्ण ओझा आदि की संभावना है कि समुद्रगुप्त की ‘प्रयाग प्रशस्ति’ का रूद्र इसी मेघवंश का नरेश था, जिसको समुद्रगुप्त ने पराजित किया था। प्रोफेसर एस आर गोयल की स्थापना है कि कौशांबी के मेघों को हराकर ही गुप्तों ने अपनी शक्ति बढ़ाई थी।27 मेघवंश के उत्कीर्ण लेख लिपि शास्त्रीय दृष्टि से भी कुषाणोत्तर एवं गुप्तकालीन ठहरते हैं। अतः इतना तो निश्चित हो जाता है कि इनकी शासन सत्ता का समय कुषाणों के उत्तरकाल में स्थापित हो चुका था और गुप्तों के सम्राट समुद्रगुप्त के समय तक ये लोग शासनारूढ़ थे। यह अवधि दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से ईसवी चौथी शताब्दी तक बढ़ती है। जो संभावित या असेभावित दोनों हो सकती हैं। इस संदेह का निवारण किया जाना चाहिए। इनके अभिलेखों से प्राप्त तिथि को प्रचलित शक संवत से संदर्भित किए जाने पर इन शासकों की अवधि प्रथम शती से तीसरी शती तक तो निश्चित मानी जाती है एवं उनमें कोई बड़ा व्यतिरेक भी पैदा नहीं होता है। परंतु  इस तिथि अवधि में सभी मेघ नरेशों का तिथि क्रम समाहित नहीं होता है। अतः चौथी शताब्दी के बारे में व उससे आगे मेघ वंश की सत्ता पुनः अंधकार से आसन्न नजर आती है। अस्तु यह प्रश्न भी अभी तक अंतिम रूप से उत्तरित नहीं हो सका है। 

मेघ साम्राज्य के पतन के संभावित कारणों से गुप्त साम्राज्य का उदय होना भी एक प्रमुख कारण रहा है। अतः श्री कृष्ण ओझा द्वारा की गई स्थापना की प्रयाग प्रशस्ति का रुद्र इसी राजवंश से था, खूब बल मिलता है।

अपनी सत्ता खोने के पश्चात मेघ वंश के शासक विंध्य पहाड़ियों की तरफ पलायन कर गए। विंध्य क्षेत्र में बघेलखंड उनकी सत्ता का प्रमुख केंद्र था। उसके हाथ से निकल जाने के बाद वो उत्तरापथ की ओर कूच कर गए। दूसरी सदी के अंत होते-होते मेघों की सत्ता कौशांबी और बघेलखंड में क्षीण होती गई फिर भी वर्तमान राजस्थान से गुजरने वाले एक महापथ पर जो पटना व मथुरा से पेशावर की ओर जाता था, उस पर मेघों और यौद्धेयों के अधिकार में था।28 मेघों के पतन के पश्चात मध्यदेश के बड़े भाग पर गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ किंतु उसमें वर्तमान राजस्थान के किसी भाग पर उनका आधिपत्य ऐतिहासिक साक्ष्यों से पुष्ट नहीं हुआ है। वर्तमान राजस्थान में हर्षवर्धन के बाद में कई नए राजवंशो का उदय हुआ। इस युग में ये मेघवंश शासक कौम से शासित कौम में परिवर्तित हो गई। राजस्थान के विस्तृत भू-भाग में बसने वाली ‘मेघवाल’ जाति आज भी अपने को मेघवंशी ही कहती है। इस प्रकार वर्तमान में यह कौम हिंदू समाज के एक निम्न स्तर पर अवस्थित है। समय के साथ यह विखंडित और बिखरे हुए समाज में परिणत हो गई।

संदर्भ

 1. वर्मा, धीरेंद्र, मध्य देश - ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक सिंहावलोकन, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, 1955, पृष्ठ 9-10
 2. स्मिथ विंसेंट ए.,  द अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया, ऑक्सफोर्ड, यूनिवर्सिटी प्रेस, 1924, पृ. 292
 3. जयसवाल के.पी. भारतवर्ष का अंधकारयुगीन इतिहास (अनुवादक रामचंद्र वर्मा), नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, 2014 (वि.सं) पृ. 4
 4. गोयल, श्रीराम, गुप्त और वाकाटक साम्राज्यों का युग, कुसुमांजलि प्रकाशन, मेरठ
 5. जयसवाल  के.पी., वही, पृ. 161
 6. वही पृ. 161
 7. राय, एस.एन. भारतीय पुरालिपि एवं अभिलेख, शारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद, 2001, पृ. 205
 8. अल्तेकर, ए.एस., जर्नल न्यूमिसमैटिक सोसायटी आफ इंडिया, 4, पृ. 127
 9. शास्त्री, अजय मित्र, कौशांबी होर्ड ऑफ मघ कॉइन्स नागपुर विद्यापीठ मुद्रणालय, नागपुर, 1979
 10. राय, एस.एन, भारतीय पुरालिपि एवं अभिलेख, शारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद, 2001 पृष्ठ 201
 11. वही, पृ. 203
 12. वही, पृ. 205
 13. शास्त्री, अजय मित्र, कौशांबी होर्ड ऑफ मघ कॉइन्स, नागपुर विद्यापीठ मुद्रणालय, नागपुर, 1979, पृ. 42
 14. राय. एस.एन. पूर्वोक्त
 15. वही, पृ. 205
 16. गोयल, श्रीराम, गुप्त और वाकाटक साम्राज्यों का युग, पृ. 41
 17. जयसवाल, के.पी., भारत का अंधकारयुगीन इतिहास, (सन 150 ई. से 350 ई. तक पृ. 161
 18. साहनी, दयाराम, एपीग्राफिया इंडिका, भाग-1, पृ. 18, 24
 19. जयसवाल, के.पी., भारत का अंधकारयुगीन इतिहास, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, 2014 (वि.सं.)
 20. फ्लीट, कार्पस, इनस्क्रिप्शन इंडिका, भाग-3, पृ. 266
 21. अमृतानंद घोष, इंडियन कल्चर, भाग-1, पृ. 715-716
 22. अल्तेकर, ए.एस., वाकाटक गुप्त युग, वही, पृ. 17, 33
 23. प्रोफेसर राधेशरण, विंध्य क्षेत्र का इतिहास, (वृहत्तर महोलखंड) मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, 2001 पृष्ठ 167-169
 24. चक्रवर्ती, एन.पी., एपिग्राफिका इंडिका, भाग-31
 25. नेगी, जे.एस., वही भाग-31, पृ. 65- 66
 26. ओझा, श्री कृष्ण, प्राचीन भारत (78,अ.ऊ-605 अ.ऊ तक)  दिल्ली, पृ. 114
 27. गोयल, प्रो. एस.आर., गुप्तकाल और वाकाटक साम्राज्यों का युग, कुसुमांजलि प्रकाशन, मेरठ
 28. मोतीचंद्र, सार्थवाह, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, 1966, पृ. 98, 107

राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस, महिला पी.जी. महाविद्यालय, जोधपुर के साभार.
(उक्त सामग्री संबंधी फोटो कापियाँ आदरणीय ताराराम, जोधपुर ने उपलब्ध कराई हैं.)

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