मेघ-सभ्यता


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हमारा जो भी इतिहास मिलता है वो हमने नहीं लिखा दूसरों ने लिखा और वो जो लिखना चाहते थे वो उन्होंने अपने आत्मगौरव (self pride) के लिए लिखा और उसे अपने हक़ में भुनाने के लिए लिखा. इसीलिए क्लासरूम में पढ़ाए जाने वाले इतिहास में हमें अपना कुछ नहीं मिलता. मेघ जाति सदियों तक शिक्षा से वंचित रही. अपना अतीत पूछती रही. दूसरों ने जितना बताया उतना मानती रही. शिक्षित होने के साथ मेघों को नई जानकारियाँ मिलने लगी है. वैज्ञानिक सोच आने लगी है.

मेघों को यदि मानवजाति विज्ञान (Ethnology) के अनुसार देखना हो और मूलनिवासी की कसौटी पर कसना हो तो ऐसे उल्लेख मिल जाते हैं जो प्रमाणित करते हैं कि मेघों ने आर्यों से पहले आकर सिंधु दरिया के आसपास अपनी बस्तियाँ बसाईँ. मेघों को कोलारियन ग्रुप का कहा गया है जो सेंट्रल एशिया से इस क्षेत्र में आ कर बसा था. जो समूह सबसे पहले आ कर बसा उसे ईरान में तूरानियन (तूरान नामक स्थान के लोग) कहा गया है. वो तूरानियन ग्रुप मंगोलॉयड था. यह ग्रुप ईरान की ओर से हो कर नहीं आया. 'तूरानियन' को संस्कृत में किरात कहा गया. दूसरा कोलारियन मंगोलॉयड ग्रुप असम की ओर से भारत में आया और उसका संपर्क द्रविड़ियन रेस से हुआ. उस ग्रुप को संस्कृत में निषाद कहा गया. जो उत्तर-पश्चिम में कोलारियन ग्रुप बसा वो आर्यों और मुग़लों के संपर्क में आया. इस कोलारियन ग्रुप के लोगों का रंग आमतौर पर गेहुँआ होता है. लेकिन इनमें बहुत गोरे और काफी साँवले रंग के लोग भी पाए जाते हैं. यह रक्तमिश्रण की कहानी है जो पूरे विश्व में एक फिनॉमिना है. लेकिन कोलारियन एक ऐसा सांस्कृतिक ग्रुप है जिसकी अपनी एक सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था थी.

मेघों का आर्यसमाज में आना-जाना हुआ तो उन्होंने वेदों का गुणगान सुना और माना. धर्म में वेदों-पुराणों की इतनी महिमा गाई गई कि हम आदतन अपना पिछोकड़ (इतिहास) वहीं ढूँढने की कोशिश करते हैं. लेकिन एक बात को समझने की ज़रूरत है कि आर्य ब्राह्मणों ने जो साहित्य लिखा वो अपने आत्मगौरव के लिए लिखा है. उसमें दूसरों की जगह कम है. यह बात भी समझ लेनी ज़रूरी है कि यदि वेदों-पुराणों में इतिहास ढूँढने की बात करनी हो तो पहले यह निर्धारित करना ज़रूरी है कि वेद लिखे कब गए थे. अब भाषाविज्ञानी इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि संस्कृत भारत की सब से पुरानी भाषा नहीं है. दूसरे यह भी जानना पड़ेगा कि वेदों में नायक कौन है और खलनायक कौन है. वेदों में इंद्र आर्यों का हीरो है. उसके विरोध में जो लोग खड़े हैं वे असुर और राक्षस हैं जिन्हें आजकल मूलनिवासी कहा जाता है. मूलनिवासियों को वैदिक और पौराणिक कथाओं में निहायत गंदे तरीके से दिखाया गया. वे मूलनिवासी लोग यूरेशिया की ओर से आए आक्रमणकारी आर्यों से अपने दरियाओं के पानी, जंगलों और ज़मीन की हिफाज़त कर रहे थे. वे नए दुश्मन का सामना कर रहे थे जो बहुत बर्बर था. कहते हैं कि लगभग 500-600 वर्ष तक चले युद्धों के बाद वे आर्य यहाँ के दरियाओं और उसके आसपास की ज़मीन पर कब्ज़ा जमाने में कामयाब हो गए और हारे हुए लोगों को उन्होंने गुलाम बना लिया जैसा कि उन दिनों रिवाज़ था. उस जीत का बखान और अपना गौरवगान आर्यों ने वेदों और उसके बाद लिखे अपने ग्रंथों में दर्ज किया. हारे हुए लोगों में मेघवंशी भी थे. वेदों में बताई गई उन कथाओं की पड़ताल करके हमारे अपने समाज के श्री आर.एल. गोत्रा ने एक लंबा आर्टिकल ‘Meghs of India’ शीर्षक से लिखा जिसकी तारीफ़ ताराराम जी भी करते हैं जिन्होंने ‘मेघवंश : इतिहास और संस्कृति’ नामक पुस्तक लिखी है.

Meghs of India में किया गया अध्ययन बताता है कि आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र के लोग एक ‘वृत्र’ नाम के पुरोहित नरेश के अनुगामी थे या उसके प्रभाव-क्षेत्र में बसे थे. काबुल से लेकर दक्षिण में नर्बदा नदी तक उसका प्रभाव था. ऋग्वेद में उसे प्रथम मेघ, अहिमेघ भी कहा गया है. बहुत से मेघवंशी वृत्र को अपना वंशकर्ता मानते हैं. एक जाट नेता मनोज दूहन ने भी कहीं लिखा था कि वृत्र उनका वंशकर्ता है. क्योंकि वृत्र को अहि यानि नागमेघ भी कहा गया इससे पता चलता है कि मेघवंशियों और नागवंशियों का कभी निकट संबंध रहा होगा.

मेघऋषि को लेकर एक समस्या सोशल मीडिया पर उभरी है. लोगों में मेघवंश और मेघवंशी जातियों को लेकर शंकाएँ हैं. हो सकता है यह समस्या नहीं होती अगर हिंदू व्यवस्था के तहत जातियाँ न होतीं. लेकिन हिंदू व्यवस्था (वास्तव में ब्राह्मणीकल व्यवस्था) के लागू होने के कारण वंश या रेस का कई जातियों में बँटवारा हुआ. आज मेघवंश के तहत आने वाली मेघवाल, मेघवार, मेघ आदि जातियाँ निश्चित रूप से जाति के रूप में अलग-अलग हैं. नागवंशी जातियों की भी काफी बड़ी संख्या है.

दूसरी समस्या मेघऋषि की पूजा और उसके नाम पर हाल ही में स्थापित मंदिर हैं. जो लोग सनातनी परंपरा से प्रभावित हैं वे मेघऋषि को पूज्य देव के रूप में स्थापित रहे हैं. अन्य विचारधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे. इस समस्या का समाधान नहीं सुझाया जा सकता. भारतीय संविधान से मशविरा करना पड़ेगा.

इतिहास में लिखे 'अंधकार युग' (dark period या dark ages) के बारे में पढ़ें तो पता चलता है कि आधुनिक इतिहासकारों के.पी. जायसवाल, नवल वियोगी, एस.एन. रॉय-शास्त्री ने ऐसे राजाओं के सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन किया है जिनके नाम के साथ ‘मेघ’ शब्द सरनेम की तरह लगाया जाता था. ‘मेघ’ सरनेम वाले जो राजा थे उनसे पहले और बाद के राजाओं का इतिहास मिला लेकिन ‘Megh’ सरनेम वाले राजाओं का इतिहास नहीं मिला. उनके शासनकाल को अंधकार काल कहा गया. ज़ाहिर है कि परंपरावादी इतिहासकार उन राजाओं के बारे में लिखना ही नहीं चाहते थे. लेकिन आधुनिक और ईमानदार इतिहासकार इस पर और अधिक रोशनी डाल रहे हैं.

अपने पिछोकड़ के बारे में जानना हो तो लोकगीत उसमें मदद करते हैं. अभी तक की जानकारी के अनुसार मेघ समुदाय के अपने लोकगीत नहीं हैं. इसका ज़िक्र डॉ. ध्यान सिंह ने अपने थीसिस में किया है. एक बार श्री आर.एल. गोत्रा जी ने बताया था कि हमारे एक लोकगायक राँझाराम हुए हैं जो कथावाचक थे और कई कथाओं के साथ-साथ मेघों की कथा भी सुनाते थे. इसकी पुष्टि कर्नल तिलकराज जी ने भी की. राँझाराम जी मेघों की कथा को सिकंदर से जोड़ते थे. कैसे जोड़ते थे, वो कथा क्या थी उसका रिकार्ड नहीं मिलता. फिलहाल इस बात का इतना महत्व तो है कि मेघों की कथा में सिकंदर है. सैनी और जाट सहित कई समुदाय पोरस को अपना आदमी बताते हैं. और तथ्य यह भी है कि सिकंदर के रास्ते में मेघों की घनी बस्तियाँ थीं. उस युद्ध में मेघों की कोई भूमिका न रही हो, ऐसा हो नहीं सकता. बाकी आपकी कल्पना पर छोड़ रहा हूँ. अच्छी कल्पना कीजिएगा. प्रसंगवश हमारे कमाल के लोकगायक राँझाराम जो थे वो श्री सुदेश कुमार, आईएएस के पिता श्री तिलकराज पंजगोत्रा के फूफा थे.

मेघों के अतीत का एक और महत्वपूर्ण पन्ना है उनका आर्यसमाज द्वारा शुद्धिकरण. अब पढ़े-लिखे लोग हँस कर पूछते हैं कि क्या हमें कीड़े पड़े हुए थे जो हमारा शुद्धिकरण किया गया. पिछले दिनों श्री ताराराम जी ने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर द्वारा प्रकाशित की गई पुस्तक के एक सफ़े की फोटोकापी मुझे भेजी जिस पर ऐसा कुछ लिखा था जो चौंकाने वाला था. लिखने वाला सही था या नहीं, पता नहीं, उसमें लिखा है, “1901 में पहली बार आर्य-भक्त भाइयों ने समाज में आना प्रारंभ किया. उस समय इन मेघों का हिंदुओं के साथ मिल बैठ कर एक स्थान पर संध्या-हवन आदि में सम्मिलित होना आश्चर्यजनक था.” मेघों के शुद्धिकरण की बात वहाँ की गई है. इससे एक सवाल तो खड़ा होता है कि क्या शुद्धिकरण से पहले मेघों का धर्म कुछ और था कि उनका हिंदुओं के साथ बैठना आश्चर्यजनक हो गया? इस विषय को एक सवालिया निशान के साथ यहीं छोड़ रहा हूँ. आर्यसमाज ने मेघों की शिक्षा के लिए जो शुरुआती प्रबंध किया उससे मेघों को बहुत फायदा हुआ इसमें शक नहीं होना चाहिए. लेकिन एक बात साफ कर लेनी चाहिए कि नैतिकता (Morality) और सभ्य व्यवहार से क्या कोई समुदाय ख़ाली हो सकता है चाहे उसकी पहचान किसी धर्म से न भी हो? क्या नैतिकता सिखाने का हक़ सिर्फ़ धर्म को ही है? मेरा विचार है कि जब हमारे पुरखों को किसी धार्मिक स्थान में जाने नहीं दिया जाता था तो उन्हें नैतिकता का पाठ कौन पढ़ाता था. हमारे समाज में उन दिनों माताएँ किस धर्म के आधार पर अपने बच्चों को सिखाती थीं कि झूठ मत बोलो, पशु-पक्षियों पर दया करो, दिल में करुणा रखो, बूढ़ों-बुज़ुर्गों की सेवा करो वगैरा वगैरा. वो कौन-सी सभ्यता (civility) थी जो हमारे पुरखों के ख़ून में रची-बसी थी? यहाँ धर्म और सभ्यता को इसलिए अलग-अलग कर के देख रहा हूँ क्योंकि सभ्य व्यवहार धर्म के माध्यम से ही आए यह ज़रूरी नहीं. हमारी पृष्ठभूमि में कोई तो सभ्यता ज़रूर रही होगी जिसने सदियों से हमें सभ्य व्यवहार सिखाया है. थोड़ा याद कीजिए कि क्या हमारे समाज में महिलाओं को सती कर डालने की परंपरा थी? नहीं. क्या हमारे यहाँ विधवा विवाह की कोई समस्या थी? नहीं. क्या हमारे यहाँ दहेज हत्याओं की कोई समस्य़ा थी? नहीं. मैंने कई साल पहले पढ़ा था कि मेघ अदालतों में नहीं जाते. वजह थी कि हमारी एक अपनी पंचायत जैसी न्याय प्रणाली थी. कभी सुना नहीं कि उस व्यवस्था के अधीन किसी को क्रूर सज़ा सुनाई गई हो. अगर हुक्कापानी बंद करने की बात छोड़ दें तो मेघ अपनी न्याय प्रणाली से संतुष्ट थे. इन सभी ख़ासियतों को आप ‘मेघ-सभ्यता’ कह सकते हैं. ऐसी ‘मेघ-सभ्यता’ जिसमें इंसानियत सबसे सुंदर रंगों में खड़ी दिखाई देती है.

अब कुछ बेसिक से सवालों पर अपनी राय दे रहा हूँ. क्या मेघऋषि से ही हमारा वंश चला? बच्चा भी कहेगा कि मेघऋषि का भी कोई बाप ज़रूर रहा होगा. हाँ भई ज़रूर रहा होगा. बच्चे की बात में सच्चाई है और उसे मान लेने में भलाई है. वैसे भी मेघऋषि हारे हुए पुरोहित नरेश की कहानी है. आप चाहें तो मेघऋषि के प्रति आँखें मूँद कर चलते रह सकते हैं.

बड़ा मशहूर डायलॉग है कि ‘मेघों में एकता नहीं हो सकती’. यह सच्चाई है कि सियासी पार्टियाँ और धर्म या डेरे बनाने वाले लोग यह काम लोगों में एका लाने के लिए नहीं करते. उन्हें वोट, पैसा और आपकी सेवा चाहिए. इसके लिए ज़रूरी है कि पार्टियाँ और धर्म-डेरे आपको आपस में बाँट लें. आप जिसके यहाँ जाते हैं उसका ठप्पा या स्टिकर जाने-अनजाने में आप पर लग जाता है. जब ठप्पे और स्टिकर अलग-अलग हो गए तो पहचान अपने आप अलग हो गई और एकता की भैंस भी पानी में चली गई. मेघों के अपने कई छोटे-छोटे सामाजिक संगठन बने हुए हैं. सभी चौधरी हैं. वे इकट्ठे नहीं हो सकते. चलिए इस बात को एक ही बार में मान लें कि बिरादरी के तौर पर मेघों में एकता नहीं हो सकती. तो क्या कोई दूसरा रास्ता है? हाँ है जिसे अपनाया जाना चाहिए. मेघों में कार्य कर रही सियासी पार्टियों और सामाजिक संगठनों को आपसी कंपिटीशन और गतिविधियाँ बढ़ानी चाहिएँ. इससे निश्चय ही बेहतर रिज़ल्ट निकलेगा और वो मेघ-भगत समाज के लिए लाभकारी होगा. शुभकामनाएँ.

जय मेघ, जय भारत.
भारत भूषण भगत, चंडीगढ़.

(यह आलेख डॉ. शिवदयाल माली द्वारा गठित 'मेघ जागृति मंच' के 21-05-2017 को आयोजित कार्यक्रम के लिए लिखा गया था. मैं चाहते हुए भी कारणवश इसमें भाग नहीं ले सकूँगा. रिकार्ड के लिए इसे यहाँ रख लिया है.)

विशेष नोट - इसी तरह का एक सेमिनार 30 अगस्त, 2015 को जालंधर में हुआ था जिसकी शुरुआत मैंने इस प्रकार की थी, "पहली बात यह है कि मैं इतिहासकार नहीं हूँआपकी तरह अपना इतिहास जानने में मेरी रुचि थीमैंने जो पढ़ा उसके नोट्स बनाता रहामेरे नोट्स इतिहासकारों की देन हैंआपका इनसे सहमत होना ज़रूरी नहीं हैये नोट्स अब आपकी सेवा में हैं." ऊपर प्रस्तुत जानकारी पर भी मेरी यह टिप्पणी उसी प्रकार से लागू है.

(2)
मेघ: लोक-परंपराएं और वैदिक पुराकथा
ताराराम,
जोधपुर (राजस्थान) 


विषय की पृष्ठभूमि -  मेघ या मेग भारत का एक अति प्राचीन राजनीतिक और सांस्कृतिक जातीय समूह है. कर्नल कन्निंघम ने इसे भारत की आदिम जाति कहा है. वेदों  में उल्लिखित मेगाद्री नदी का ‘मेगाद्री’ नाम उस नदी के मुहानों पर मेघों के बसे होने के कारण ही पड़ा. मेगाद्री नदी को ही बाद में सताद्री और सतलज नदी कहा गया है. प्राचीन काल में मेघ जाति का विस्तार मेगाद्री नदी से मेघना नदी तक रहा है.  वर्तमान में यह जाति-समूह भारत के 10 राज्यों और 2 केंद्र शासित राज्यों में अधिसूचित अनुसूचित जातियों में शुमार है. भारत के 8 राज्यों में यह मेघ नाम से, दो राज्यों (छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश) में सिर्फ मेघवाल नाम से, महाराष्ट्र में मेघवाल व मेंघवार नाम से, गुजरात में मेघवाल, मेघवल, मेंघवार नाम से, राजस्थान में मेघ, मेघवाल, मेगवाल और मेंघवार नाम से, जम्मू-कश्मीर में मेघ/कबीरपंथी के नाम से, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा आदि में मेघ के नाम से अधिसूचित हैं. इन राज्यों में मेघ लोग भगत, आर्य-भगत, कबीरपंथी, रिखी या रिखिया  आदि अन्य नामों से भी जाने जाते हैं. मेघ शब्द व्यक्तिवाचक और गुणवाचक शब्द है और इसके साथ जुड़े ‘वाल’ का अर्थ ‘समूह’ या ‘वंशज’ से हैं. ‘पीपल ऑफ़ इंडिया-राजस्थान’ में  मेघ जाति की उत्पत्ति या निकास एक ऐसे ऋषि से हुआ बताया गया है, जिसमें बादलों से वर्षा कराने की शक्ति थी, अस्तु उस ऋषि को मेघ कहते थे. मारवाड़ मर्दुम शुमारी में भी मेघ जाति की उत्पत्ति ‘मेघ ऋषि’ से होना बताया गया है और  ‘मेघ’ को ब्राह्मण उल्लेखित किया है. बॉम्बे गजेटियर में मेघवालों की उत्पत्ति और उनकी प्राचीनता के बारे में उल्लेख है कि –-मेग, संभवतः तिमुर के मेगियन ( Magians of Timur ) हैं, जो रियासी जम्मू और अख़्नूर की वृहद् जनसंख्या है, ये निम्न जाति  मूल-प्रजाति (pure race) है, दूसरी जगहों में ये बहिष्कृत या जाति-बाह्य हैं. ये संभवतः आर्यन के मेकी ( Mekie ) है और मेखोवल उनसे ही सम्बंधित है. ये सारस्वत ब्राह्मण होने का दावा करते हैं. बुर्नेस (Burnes) इन्हें दक्षिण थार की मूल प्रजाति (aboriginal race) मानता है. ये निचले सिंध के मेहर (Mehar) और बलूचिस्तान के मेघरी (Meghari) है. ये प्लिनी (Pliny) के मेगरी (Megari) या मेगाल्लाए (Megallae) हैं तथा मेगास्थनीज की Indica में इनका उल्लेख मेघल्लाए के नाम से हुआ है. और ये राजपूत-इतिवृत्त में मोकर (Mokar) हैं.  पंजाब कास्ट्स में भी मेघ जाति की उत्पत्ति किसी मेघ नामक व्यक्ति से ही हुई बताई गई है. ऋग्वेद के बालखिल्य सूक्त में आने वाला मेघ शब्द एक अनिश्चित आशय का शब्द है. निरुक्त में इसे बादल के अर्थ में लिया गया है. इन सब प्रसंगों में मेघ जाति अपना सम्बन्ध मेघ यानि बादल से जोड़ती है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है. और इस जाति की मान्यता है कि इस धरती पर सबसे पहले मेघ ही हुआ, उसी की संतति में बाकी सभी जातियां हैं. राजस्थानी शब्दकोष में मेघ को एक वंश का नाम बताया गया है. मेघ आर्यों के भारत-आगमन से पूर्व भारत में बसी हुई एक प्राचीन आदिम-जाति है. राजपूतों के परिघटन के समय कई अन्य समूह भी इस जाति में शामिल हुए. मूलतः यह ऋग्वैदिक समय में सिन्धु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारों पर बसा हुआ एक राजनीतिक और सांस्कृतिक समूह था.
भारत की विभिन्न जातियों की लोक-कथाओं में इसके बारे में तरह-तरह की कथायें प्रचलित हैं, जिसका सम्बन्ध ऋग्वेद में प्रयुक्त मेघ, वृत्र और इंद्र आदि से किसी न किसी रूप से जुड़ा हुआ है. यह जानना रुचिकर है कि ऋग्वेद में कई प्रसंगों में इसका उल्लेख हुआ है. मेघों में प्रचलित या उनके बारे में प्रचलित कथा-कहानियों  में साफ़ तौर पर वैदिक आधारभूमि दृष्टिगोचर होती है. वेदों में जिन पात्रों का वर्णन है या उल्लेख है, वे केवल रूपक नहीं है; बल्कि उनका लौकिक सन्दर्भ भी सिद्ध होता है और न्यूनाधिक रूप से उनकी ऐतिहासिकता प्रकट होती है. उनका ऐतिहासिक निरूपण जन-मानस में प्रचलित लोक-कथाओं के माध्यम से संधारित (conform) किया जा सकता है. मेघ, वृत्र, पणि, असुर, दास, दस्यु आदि ऐसे ही पात्र है. ये शब्द ऋग्वेद में बार-बार आये हैं और देश के कोने-कोने में इन्हें कथा और कहानियों के माध्यम से आज तक संजोकर रखा गया है. ‘निरुक्त’ में मेघ के 30 नामों का उल्लेख है, जिसमें वृत्र को भी मेघ कहा गया है. (अद्रिः, ग्रावा, गोत्रः, बलः, अश्न:, पुरुभोजा:, बलिशान:, अश्मान, पर्वतः, गिरिः, वज्रः, चरुः,वराहः, शम्बरः, रौहिनः, रैवतः, फलिग:, उपरः, उपल:, चमसः, अहिः, अभ्रं, बलाहकः, मेघः, दृतिः, ओदनः, वृशधि:, वृत्रः, असुरः, कोश इति त्रिंशन्मेघ्नामानि, निरुक्त,1.10) मेघ हेतु प्रयुक्त ये शब्द रूपक मात्र ही नहीं है, बल्कि इन शब्दों का लौकिक अर्थ और सन्दर्भ भी है, जिसे बाद की कथा-कहानियों में भी उकेरा गया है, इन शब्दों में से अधिकांश शब्द मेघ जाति की उपजातियों (clans) के द्वारा आज भी धारण किये जाते हैं, यथा अद्रि से आद्रा, ग्रावा से गरावा/गारवा, गोत्र से गोत्रा, बल से बल और बाला, उपल से उपल और उपला, अहि से अहीनिया, रौहीन से रोहिणा और रोहिन आदि-आदि. ये सभी जातियां अपना आदि-पुरुष ‘मेघ’ को ही मानते हैं. क्या ऋग्वैदिक मेघ ही इस मेघ जाति का आदि पुरुष रहा है? यह एक बहुत बड़ी गुत्थी है. आलेख में लोक में प्रचलित इस मेघ या मेघवाल के ‘मेघ’ शब्द के अर्थ को ऋग्वेद में आये मेघ और वृत्र शब्द के सन्दर्भ में समझने का एक लघु प्रयास किया गया है. चूँकि इस बारे में किसी भी प्रकार का अनुसन्धान (रिसर्च) नहीं हुआ है, अतः प्रस्तुत आलेख की अपनी बाध्यताएं हैं. यह इस सन्दर्भ में शोधार्थियों का ध्यान आकर्षित करने का एक संकेत भर है. इसकी प्रामाणिकता और ऐतिहासिकता भविष्य के शोध पर भी टिकी है अर्थात यह कोई अंतिम गवेषणा नहीं है.
सिन्धु-घाटी के लोग-  निरुक्त में मेघ को असुर कहा गया है और आर्यों के आगमन के पूर्व वे सिन्धु नदी और उसकी सहायक नदियों के मुहानों पर और पर्वतों पर बसे हुए थे. आर्यों के आदिम देश को लेकर मुख्यतः चार सिद्धांत प्रतिपादित हुए हैं. ये हैं - यूरोप का सिद्धांत, मध्य-एशिया का सिद्धांत, उत्तरी ध्रुव का सिद्धांत और सप्त-सैन्धव का सिद्धांत. इनमें से अंतिम दो सिद्धांतों को अधिक समादर नहीं मिला है और अभी तक यह प्रश्न विवादास्पद ही रहा है कि आर्य किस प्रदेश के निवासी थे. प्रस्तुत शोध-पत्र का प्रत्यक्षतः यह विषय नहीं है. अतः ये यहाँ विवेचनाधीन नहीं है. हम इस बात को लेकर संतुष्ट हैं कि आर्यों का सम्बन्ध भारत के बाहर के देशों से था और ये भारत में आक्रमणकारी के रूप में आये. किन्तु यह निर्विवाद रूप से माना जाता है कि आर्य सीधे ही भारत में नहीं आये, अपितु आदिम स्थान से उनका पहला अभिगमन बाल्ख प्रदेश के समीप हुआ. यहाँ ये पर्याप्त समय तक रहे. वेद और अवेस्ता की धार्मिक एवं सांस्कृतिक समानता को देखते हुए यह मानना अनुचित नहीं होगा कि जहाँ अन्य आर्य जातियां आदिम देश से ही मूल जाति से अलग हो गईं, वहां वैदिक एवं ईरानी आर्य काफी समय तक साथ-साथ रहे. यह समय बाल्ख प्रदेश में निवास का था.
इतिहास पुस्तकों से हमें जानकारी मिलती है कि वैदिक आर्य बाल्ख प्रदेश से सप्त-सिन्धु की ओर आये. बाल्ख-प्रदेश से सिन्धु-प्रदेश में आने तक उनको किन-किन बाधाओं या जातियों से संघर्ष करना पड़ा, इसकी जानकारी भी अत्यल्प है. परन्तु, यह गवेषित है कि वैदिक आर्यों के सप्त-सिन्धु प्रदेश में आगमन से पूर्व यहाँ एक संस्कृति विकसित थी, जिसे हम ‘सिन्धु घाटी की सभ्यता’ कह सकते हैं. आर्य लोग घुमक्कड़ थे, स्थायी रूप से एक जगह नहीं रहने वाले वैदिक आर्यों के विरुद्ध सिन्धु घाटी के लोग मोहनजोदड़ो और हड़प्पा नामक दो बड़े-बड़े नगरों में रहते थे, जो एक विकसित नगरीय संस्कृति थी. आर्यों का मेघों, असुरों, पणियों, दासों या दस्युओं आदि से अनवरत संघर्ष चला. वृत्र नाम का असुर आर्यों के विरोधी दल का सबसे बड़ा पराक्रमी नेता था.
स्पष्टतः वैदिक आर्यों के सप्त-सिन्धु प्रदेश में प्रवेश का सिन्धु-सभ्यता के लोगों ने कड़ा विरोध किया. आक्रमणकारी एवं गृह-विहीन आर्यों के विरुद्ध नगर और दृढ़ पुरों वाले इन लोगों का विरोध निश्चय ही उग्र था, जिसकी स्पष्ट तस्वीर इंद्र और वृत्र के संघर्ष में दिखती है. यह ध्यातव्य है कि सिन्धु-घाटी की सभ्यता के लोगों का सम्बन्ध असीरिया की सभ्यता के लोगों से था और सिन्धु-घाटी के लोगों और असीरिया के लोगों में कई बातों में समानता होने के कारण वैदिक आर्यों ने उन्हें असुर कहा. प्रो. डी.डी. कोसाम्बी का मत है कि यदि असुरों को असीरियन नहीं भी माने, तब भी उन्हें मनुष्य मानना उपयुक्त है. अर्थात ऋग्वेद में प्रयुक्त वृत्र या मेघ मनुष्य ही थे. अतः आर्यों के द्वारा प्रयुक्त ‘असुर’ शब्द को हम सिन्धु-घाटी के लोगों के लिए प्रयुक्त ही मानेंगे.
लोक-कथाओं में मेघ- भारत की कई जन-जातियों में वृत्र, जिसे मेघ राजा कहा गया है, उसकी कई कथा-कहानियां आज भी प्रचलित हैं. मेघ, जिसे ऋग्वेद में बादल या असुर कहा गया है, उसे कई जन-जातियां एक व्यक्ति-रूप ‘मेघ’ व वर्षा से सम्बंधित देवता या ऋषि मानती हैं. वे इसे केवल बादल का ही प्रतीक नहीं मानती हैं. मेघ जाति मेघ को सिर्फ बादल ही नहीं मानती, बल्कि इसे अपना आदि पुरुष मानती है एवं जाति के नामकरण का कारण भी इसे ही मानती है. गोंड (बोही, पंडरिया ज़मींदारी) में प्रचलित कथा में सूरज और चन्द्रमा को मेघ राजा और मेघ रानी की पुत्रियों के रूप में कहा गया है. बिजली उनकी तीसरी पुत्री कही गयी है. यह प्रतीकात्मक प्रतीत होता है, परन्तु इन जातियों में मेघ को लेकर जो परम्परायें प्रचलित हैं, वे इन प्रतीकों को व्यक्तिरूप और सामाजिक-गठन का रूप देती हैं; यथा: विवाह से पूर्व वधु के घर कार्य करना, वधु के हल्दी आदि लगाना और वधु के सुसराल पहुँचाने से पहले वर द्वारा वधु का मुंह नहीं देखना आदि इस कहानी के माध्यम से कहा गया है, जो इन जन-जातियों और अन्य आदि-निवासियों में आज भी परंपरा के रूप में प्रचलित है.
भील जन जाति में ‘मेघ राजा’ को कालो वारो या कि काला वायरा (हवा) कहा जाता है और उसे वर्षा का देवता माना जाता है. उनमें प्रचलित कहानी में काली बादली (Dark Cloud) मेघ राजा की पत्नी है. बारी मेघ (Twelve Rains), गजन घोटो (Thunder House), थोथी वीजल (Limping Lightning), काली वीजल (Dark Lightning) उनकी संतति है. इनकी कहानी में मेघ राजा के किसी यात्रा के समय दो देवताओं से युद्ध का जिक्र है और कहा गया है, सैनिकों के खून की जितनी भी बूँदें गिरतीं उतने ही सैनिक पैदा हो जाते थे. यह इंद्र और वृत्र के युद्ध की झलक है. वे काली हवा के पास गए, काली हवा बादलों के साथ आई और भयंकर बरसात करने लगी, जिससे सैनिकों के घाव से बूंदें धुल जाती और नए सैनिक पैदा होने बंद हो गए और अंत में राजा पराजित हो गया. बैगा जन-जाति (कसैकुंड, कवर्धा-स्टेट) में भी मेघ राजा और मेघ रानी की कहानी प्रचलित है और उनके दरबार का जिक्र है. इस कहानी में भीमसेन, दुर्होदानो (दुर्योधन) आदि पात्रों का भी जिक्र किया जाता है. गुजरात के इतिहास में सिद्धराज सोलंकी के द्वारा खुदवाए गए तालाब में मायो नामक मेघ के प्राणोत्सर्ग से ही जल की आवाप्ति सुनिश्चित हो सकी, साथ ही मातंग मेघ के द्वारा गिरनार पर तपस्या और जल की बाढ़ आना आदि मध्यकालीन कथाएं भी मेघों के जल से संबंध को सुनिश्चित करती हैं जो वेदों की पुरा कथाओं से मेल खाती सी लगती है. गुर्जर जाति में मेघ को. मेघ-बाबा’ के रूप में पूजा जाता है. वह इंद्र और मेघ दोनों के प्रतीकात्मक स्वरूप बनाकर मेघ की पूजा-अर्चना करती है. प्रतीकात्मक रूप में इंद्र को उल्टा लटकाती है और उसके सामने मेघ का प्रतीक बनाकर पूजती है. यह इंद्र और मेघ के प्रति इस जाति की धारणा को व्यक्त करता है. वहीं मेघ, मेघवाल, मेघवार जाति तो मेघ को अपना आदि पुरुष ही मानती है, वे इसे रिखी या ऋषि की उपमा भी देते हैं. उनकी मान्यता में मेघ न तो असुर है और न आसुरी शक्ति का प्रतीक है, बल्कि सृष्टि का प्रथम पुरुष है. इन विभिन्न जन-जातियों में प्रचलित मेघ का जल से सम्बन्ध है और उनके लिए वह जल का देवता है, हालाँकि वेद में मेघ को असुर कहा गया है और जल-वर्षण को रोकने वाली या जल की बाधक शक्ति के रूप में उसका निरूपण है. इंद्र उससे जल को मुक्त कराता है. वहां जल का देवता इंद्र है. वेद में मेघ के प्रति श्रृद्धा नहीं है, वहीं इन जातियों में मेघ के प्रति अगाध श्रृद्धा है.
वृत्र और मेघ की वैदिक अवधारणा- वैदिक साहित्य में वृत्र को भी असुर कहा गया है. यास्क ने सर्वप्रथम निरुक्त में वृत्र सम्बन्धी जिज्ञाषा में इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया कि ‘मेघ’ रूपी वृत्र को विद्युत रूपी वज्र से आहत करके इंद्र ने जल को मुक्त किया. निरुक्त का लेखक यास्क प्रश्न करता है- ‘को वृत्र?’ अर्थात वृत्र कौन? और इसके जबाब में लिखता है- ‘वृत्रो मेघ इति नैरुक्तास्त्वाष्ट्रोसुर इत्यैतिहासिका’. इसमें न्यूनाधिक रूप से वृत्र के बारे में उस समय प्रचलित रही दो परम्पराओं का दिग्दर्शन होता है. वह पूर्वपक्ष को रखने के बाद ऐतिहासिकों की मान्यता को भी रखता है, जिनके अनुसार वृत्र एक असुर था. वह तवष्टा का पुत्र था. इस पर इससे अधिक विमर्श न करते हुए, वह इस परंपरा की अनदेखी करता है और नकारता है. यास्क निरुक्त की परंपरा का पालन करता है और उसी अनुरूप इसका यत्र-तत्र वर्णन करता है. सायण भी निरुक्त की विचार-परंपरा का अनुगमन करता है. परन्तु, निरुक्त में उल्लेखित इस वर्णन से भी यह स्पष्ट है कि आदि काल से ही वेद की पुराकथाओं (mythology) की व्याख्या को लेकर दो परम्पराएँ विद्यमान थीं- एक ऐतिहासिक परंपरा (historical school) और दूसरी नैसर्गिक या प्राकृतिक परंपरा (naturalistic school). प्राकृतिक परंपरा का अनुगमन करने वाले वेदों के प्रतीकवाद को दृष्टिगत रखकर वेदमंत्रों का अर्थ करते हैं. यास्क और सायानाचार्य इस परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसके पश्चात् मैकडोनल, ओल्डेनबर्ग, पेरी, ब्लूमफील्ड आदि कई विद्वान इस परम्परा का समर्थन करते हैं. इस परम्परा को प्रतीकवाद भी कह सकते हैं, लेकिन यह रूपक या प्रतीकवाद सब जगह और सब सन्दर्भों में उपयुक्त नहीं बैठता है. क्योंकि घटनाएँ और घटनाओं के पात्र सब जगह रूपक या प्रतीक ही नहीं है. इंद्र और वृत्र के सन्दर्भ में तो यह प्रतीकवाद धराशायी होता हुआ दिखता है एवं ऐतिहासिकों की परंपरा सभी तरह से सही ठहरती है.
ऋग्वेद में वृत्र का उल्लेख कई मन्त्रों और प्रसंगों में मिलता है. जिनकी मान्यता है कि ऋग्वैदिक मन्त्रों में आये हुए नाम या पात्र रूपक या प्रतीक है, उनके विचार में वृत्र एक बाधा है. यह नकारात्मक या आसुरी प्रवृतियों हेतु प्रयुक्त रूपक या नाम है. उनका यह भी मानना है कि जिस समय आर्य अपने मूल निवास या आदि प्रदेश में थे, तब उनका जीवन कठिन था और विभिन्न तरह की बाधाओं का सामना करते थे. उन बाधाओं के लिए उन्होंने एक शब्द चुना और उन्हें ‘वृथ्र’ नाम दिया. यह नाम अवेस्ता में सुरक्षित है. और, जब बाल्ख प्रदेश से ईरानी और वैदिक आर्य अलग-अलग हो गए, तब भी वह धारणा उनके दिमाग में चलती रही और वैदिक आर्यों का जब सिन्धु प्रदेश में आव्रजन हुआ तो उसी वृथ्र को ऋग्वेद में वृत्र कहकर संबोधित किया. लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है कि ऋग्वेद में आये हुए वृत्र का सम्बन्ध मेघ या जल से सम्बंधित है, जबकि अवेस्ता के वृथ्र का जल से कोई सम्बन्ध नहीं है. दूसरी बात यह है कि अवेस्ता का वृथ्र ‘बाधा’ है, वहीं ऋग्वेद का वृत्र ‘बाधक’ है. साथ ही, ऋग्वेद का वृत्र एक वचन में ही नहीं बल्कि कई स्थलों पर बहुवचन में भी प्रयुक्त हुआ है. ऋग्वेद में वृत्र के नपुंसक लिंग के  बहुवचन के ‘वृत्राणि’ शब्द का प्रयोग प्रायः उन दैत्यों के साथ हुआ है, जो वृत्र के मित्र थे और वृत्र से कम भयंकर भी थे. एकवचन में उल्लेखित ‘वृत्र’ इंद्र का मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं एवं बहुवचन में प्रयुक्त ‘वृत्राणि’ गौण प्रतिद्वंद्वी है या अन्य प्रतिद्वंदियों के गण या समूह है.
वृत्र को मेघ भी कहा गया है, उसके अनुसार ‘वृत्र अर्थात मेघ जल को रोक लेता है, वर्षण नहीं करता. इंद्र, जो कि वर्षण का देवता है, अपने वज्र से अर्थात विद्युत से मेघ को विदीर्ण कर जल धाराओं को बरसाने के लिए मुक्त कर देता है’. इस मत के अनुसार ‘पर्वत’ अथवा गिरी जहाँ जल संचित रहता है, मेघ ही है. ऋग्वेद में अन्यत्र भी पर्वत का अर्थ मेघ ही है. इस प्रतीकात्मकता में आमतौर पर पर्वत का अर्थ ‘मेघ’ होता है, किन्तु फिर भी ओल्डेनबर्ग की स्वीकृति है कि इंद्र-वृत्र युद्ध में वर्णित पर्वत मेघ नहीं, अपितु वैदिक ऋषि की दृष्टि में वास्तविक पर्वत थे. इसी भांति इंद्र द्वारा विमुक्त नदियां भी सूक्ष्म न होकर पार्थिव है, विशेषकर विपाशा और शुतुद्रि (मेगाद्री). कर्नल एलेग्ज़ेंडर कनिन्घम ने शताद्री को मेघों की नदी कहा है, इसका मूल नाम मेगाद्री ही था. मेगाद्री अर्थात मेघों की नदी और ये मेघ लोग यहाँ के आदि-निवासी थे. निरुक्त में मेघ के 30 नामों (अद्रिः, ग्रावा, गोत्रः, बलः, अश्न:, पुरुभोजा:, बलिशान:, अश्मान, पर्वतः, गिरिः, वज्रः, चरुः,वराहः, शम्बरः, रौहिनः, रैवतः, फलिग:, उपरः, उपल:, चमसः, अहिः, अभ्रं, बलाहकः, मेघः, दृतिः, ओदनः, वृशधि:, वृत्रः, असुरः.) का उल्लेख है, जिसमें वृत्र भी को भी एक मेघ ही कहा गया है. स्पष्ट यह है कि  ऐतिहासिक परम्परा की दृष्टि से ये शब्द रूपक मात्र ही नहीं है, बल्कि इन शब्दों का लौकिक अर्थ और सन्दर्भ भी है और इस दृष्टि से वृत्र या मेघ उस कालावधि में व्यक्ति-विशेष ही ठहरते है, न कि कोई प्रतीकात्मक बाधा.
वृत्र, जिसे इंद्र ने अपने वज्र से मारा, उसे असुर कहा गया है. ऋग्वेद के कई मन्त्रों में वृत्र का मानव के रूप में उल्लेखित किया गया है.
परम्परा के अनुसार इंद्र और वृत्र के युद्ध का रोचक वर्णन कई स्थलों पर हुआ है. इंद्र-वृत्र युद्ध के सन्दर्भ में उल्लेखित झंझावत (storms) एवं विद्युत आदि अपरोक्ष रूप से बहुत ही कम आते है, अधिकतर परोक्ष रूप में आते हैं. ऋग्वेद में किसी भी स्थल में इंद्र को स्पष्टतः जल-वर्षण करने वाला नहीं कहा है. प्रो. कार्पेंतियर (Charpentier) के अनुसार इंद्र देवता झंझावत या ग्रीष्मकालीन उष्णता का देवता न होकर एक जातीय नेता था, जो समय के आदिम जनों का देवता बन गया. बाल्ख से भारत में आने तक इंद्र को अनेक जातियों से युद्ध करना पड़ा, तथा भारत में भी उसे सहज प्रवेश नहीं मिला. उसे सिन्धु-घाटी के लोगों से लड़ना पड़ा. वृत्र मेघ उनमें सबसे प्रबल शत्रु था. आर्यों के भारत में बस जाने के बाद भी यदा-कदा विद्रोह करने वाली जातियों का भी उसे दमन करना पड़ा. ऋग्वेद में इन समस्त विरोधी जातियों के लिए ‘दास’ शब्द का भी प्रयोग हुआ है. आदिम घुमक्कड़ और सरल जीवन में पद-पद पर आर्यों को अनेकानेक कठिनाइयों और बाधाओं का सामना करना पड़ा. उन कठिनाईयों और बाधाओं को आज हम दुर्भाग्य, आपत्ति अथवा विघ्न आदि कई शब्दों से व्यक्त करते हैं और जानते हैं. अवेस्ता में ‘वृथ्र’ शब्द बाधाओं के लिए प्रयुक्त हुआ है. बाल्ख-प्रदेश से जब ईरानी और वैदिक आर्य अलग-अलग हो गए, तब भी उनके मन-मस्तिष्क में वह अवधारणा चलती रही, यही कारण है कि सप्त-सिन्धु में प्रवेश करने पर सामने आने वाली हर बाधा को उन्होंने वृत्राणि कहकर संबोधित किया. चाहे ये बधाएं प्राकृतिक रही हों या मानवीय. यही कारण है कि अवेस्ता में वृथ्र (vrera) तथा ऋग्वेद में वृत्र अथवा वृत्राणि शब्द मिलते हैं. शब्द साम्यता के साथ ही इन दोनों शब्दों के अर्थ और सन्दर्भ में जो सबसे महत्त्वपूर्ण भेद भी मिलता है, ऋग्वेद में वृत्र प्रायः जल या जल-वर्षण से सम्बंधित है, वहीं अवेस्ता में वृथ्र का जल से सम्बन्ध नहीं मिलता है. साथ ही ऋग्वेद का वृत्र ‘बाधा’ मात्र नहीं है, बल्कि ‘बाधक’ भी है और एक व्यक्ति के रूप में भी ज्ञाप्त होता है.
इंद्र के शत्रुओं को दैत्य मानकर भी उल्लेखित किया गया है. वृत्र व शम्बर आदि इंद्र के प्रमुख शत्रु वर्णित किये गए हैं. ऋग्वेद में इंद्र का प्रमुखतम प्रबल शत्रु वृत्र ही है. वृत्र का वध करने के कारण ही इंद्र को वृत्रहन की उपाधि मिली. इंद्र के शत्रुओं के जो अन्य नाम मिलते हैं, उन में अहि, शुष्ण, पणि अर्बुद, बल, रोहिण, व्यंस, अहीशुव, विश्वरूप, स्वर्भानु, उरण, अश्न, पिशाची, शंडिका, क्रिवी, शम्बर, पिपु, नमुचि, धुनि, चुमुरी, वर्चिन, कुयव, कर्णज, पनेय, कुवयच, इली-बिश, नार्मर, नव-वास्त्य, मृगय, वृष-शिप्र, मख, अनर्शाने, पद-ग्रभी, रुधिका, दृभीक, वंग्रद आदि कई हैं.
जहाँ निरुक्त में वृत्र के बारे कहा गया है, ‘तत्को वृत्रो? मेघ इति नैरुक्तास्त्वाष्ट्रोसुर इत्यैतिहासिकाः. (निरुक्त, 2-16) वहाँ स्पष्टतः वृत्र एक ऐतिहासिक व्यक्ति था. वह एक मेघ था. ऐतिहासिकों के मतानुसार वृत्र वस्तुतः कोई पार्थिव व्यक्ति था. जिसके साथ इंद्र का संघर्ष वास्तविक युद्ध का परिचायक है. ऋग्वेद में वृत्र को एक व्यक्ति मानकर उसके माता और पिता का उल्लेख भी मिलता है. जिसके अनुसार वृत्र की माता दानु थी और उसके पिता का नाम त्वष्ट्र था. बुद्ध प्रकाश के अनुसार इंद्र आर्यों का युद्ध नेता था व वृत्र दस्यु थे. वे इंद्र को एक व्यक्ति मानते हैं. उनके अनुसार वृत्रासुर असीरिया, सीरिया या शाम का प्रसिद्ध दलपति था. रामगोविंद त्रिवेदी का कथन है कि ‘अवेस्ता से ज्ञात होता है कि बेबीलोन नगर को आर्यशून्य करने के लिए वृत्र ने अद्विशूर नाम की देवी की उपासना की थी, किन्तु प्रयत्न में असफल रहा. फ़ारस के राजा साइरस ने जैसे टाइगर्स नदी का प्रवाह रोककर बेबीलोन को जीतने का निश्चय किया था .....’ (हिंदी ऋग्वेद की भूमिका) ऐ.ब्रा.(8.18) के उद्धरण से स्पष्ट है कि दस्युओं द्वारा आर्यजन अभिप्रेत थे. वृत्र को अहि कहने का तात्पर्य है कि उसके अनुगामीजन सर्पपूजक थे. (हिंदी ऋग्वेद की भूमिका), अन्यत्र बुद्धप्रकाश ने वृत्रों को प्राग्वैदिक (pre-historic) भारतीय जाति माना है, जिसे मेगास्थनीज ने अपनी इंडिका पुस्तक में “Veretatae” कहा है. इंद्र द्वारा वृत्र का वध करना ब्रह्महत्या माना गया है. इससे यह साबित होता है कि वृत्र ब्राह्मण था. मेघ जाति भी अपने इस आदि-पुरुष मेघ को ब्राह्मण ही मानती है. इंद्र को वर्षण का देवता मानने वाले विद्वान वृत्र को ‘मेघ’ मानते हैं.


वैदिक इंडेक्स आदि के लेखकों ने यह भी सिद्ध करने का प्रयास किया है कि वेद में आर्यों और दस्युओं के युद्धों का वर्णन है. यह सर्व-संज्ञात है कि वेद में दासों के साथ युद्ध करने का वर्णन मिलता है. इन्द्र और वृत्र के युद्ध का तो रोचक वर्णन ऋग्वेद और पुराण में मिलता है. वृत्र को असुरों का राजा कहा गया है. वृत्र मेघ का नाम है या कि वृत्र एक मेघ है. इसे प्रथम मेघ, अहि मेघ आदि नामों से भी संबोधित किया गया है. अगर इस युद्ध को रूपक या अलंकारिक भाषा में मान लिया जाय तो इन दोनों का परस्पर संघर्ष प्राकृतिक युद्ध के जैसा है. परन्तु दधीचि, इन्द्र, वृत्र, मेघ, असुर आदि रूपक मात्र ही नहीं हैं, ये उस समय के इतिहास-पुरुष हैं और इनमें इतिहास छुपा पड़ा है. इतिहास की दृष्टि से इसकी गवेषणा का कार्य अभी भी वांछित है. इतिहासकार का काम इन कथा-कहानियों से इतिहास के सूत्र ढूँढ़ना है.


वेद में देव और असुर दो वर्गों का वर्णन हुआ मानते हैं. कुछ देव दोनों वर्ग में उल्लेखित किये गए हैं. उसके मतानुसार असुर शब्द अशुभचिंतक या दुष्ट लोगों (malevolent beings) के लिए प्रयुक्त हुआ है. असुरों में भी दो वर्ग थे- अच्छे और बुरे, जिन असुरों को अच्छा कहा गया, वे आदित्य कहे गए और बुरे, जिन्हें दानव कहा गया है, जिनका नेता वृत्र था. असुर का मूल अर्थ मालिक (lord) के जैसा है, परन्तु अनुप्रयोग में इसका अर्थ बलशाली या बलवान व्यक्ति या अतिमानव या मायावी होता है. ऋग्वेद में वरुण, मित्रवरुण, आदित्य आदि समूहों के लिए असुर शब्द का प्रयोग हुआ है. इंद्र, अग्नि, सूर्य और संभवतः रूद्र आदि के लिए भी असुर शब्द का प्रयोग हुआ है. द्यौस के लिए भी लिए भी हुआ है। यह सिद्ध है कि असुरों को देवों से अलग किया जा सकता है. यह भी प्रस्तावित किया जा चुका है कि इंडो-ईरानियन लोगों के अलग-अलग धर्म में बंटने के कारण भारत में असुर और ईरान में अहुर का अलग विकास हुआ. ब्रद्के (P. Von Bradke) ने हौग के सिद्धांत का परिमार्जन करते हुए असुर का अर्थ highest lordship से लिया है और बताया कि असुर शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग द्यौस के लिए किया गया है. रुडोल्फ ओटो (Rudolf Otto) हौग के मत का अनुसरण करते हुए स्पष्ट करता है कि एक असुर धर्म था, जो ईरानियों और वैदिक आर्यों के अलग-अलग होने से पहले अस्तित्व में था. भारत में उस धर्म को वैदिक ‘देव’ धर्म ने अवशोषित कर लिया गया, परन्तु ईरान में वह शुद्ध रूप से अस्तित्व में रहा, जिससे ज़रौसुस्त्र धर्म का उद्भव हुआ. एमिले  बेंवेनिस्ते(Emile Benveniste) भी इंडो-ईरानियन संस्कृति को असुर-पूजक मानने वालों में है जो अहुर मज़्दा को असुर परिवार का सदस्य मानती है. यू. वेंकटकृष्णा राव (U. Venkatakrishna Rao) के अनुसार पूर्व-काल में असुर पूजे जाते थे. उसके अनुसार अहुर मज़्दा और संस्कृत के असुरोमहा में साम्यता है एवं अमरकोश में पूर्व-देवों की सूची में असुर उसका पर्यायवाची शब्द है. आर.एन. दांडेकर (R. N. Dandekar) का मत है कि असुर शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया गया है जो रहस्यमय सर्वोच्च शक्तियों से संपन्न थे. असुर शब्द की निष्पत्ति असु+र से हुई है जिसका भाषाई अर्थ हुआ, वह व्यक्ति जो असु (शक्ति) संपन्न हो और यह शब्द जीवन-शक्ति को इंगित करता है. असुरों की विशेष शक्ति ही माया कहलाती थी. वैदिक धर्म में इंद्र और असुर के बीच दुश्मनी असुर और असीरियन नामों के संदेह से लोक-कथाओं में बढ़-चढ़ गयी. जेम्स दर्मेसतेटर(James Darmesteter) का सुझाव है कि इंडो-ईरानियन भाषा में देव (god) के लिए तीन शब्द हैं- असुर, याग्ता और देव, इसमें असुर सर्वोच्च देव है. याग्ता वह देव है जिसे बलि दी जाए और देवता का अर्थ अभाषित (shining). देव शब्द ही बिगड़ कर दैत्य बना. आर.जी. भंडारकर एवं के.आर.वी राजा (R.G. Bhandarkar and K.R.V. Raja) जैसे कई विद्वानों ने असुर शब्द को सेमेटिक भाषा के अस्सुर से सम्बंधित माना है. के. आर. वी. राजा ने पहली बार सन् 1908 में सुझाव दिया कि भारतीय-आर्यों ने असुर शब्द असीरिया से ग्रहण किया है. सन् 1918 में आर. वी. भंडारकर ने उसी परिप्रेक्ष्य में सिद्ध किया कि ऋग्वेद का असुर शब्द ईश्वर (देव) का द्योतक है, लेकिन कुछ अपवादों में कभी-कभी देव का विरोधी और मनुष्यों का शत्रु रूप में भी प्रयुक्त हुआ है. असुर शब्द पूर्व में देव के लिए प्रयुक्त रहा व बाद में घुमक्कड़ आर्यों के खूंखार मानव-दुश्मनों के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा और बाद में पुरा-कथाओं (mythology) में देवताओं के सूक्ष्म दुश्मनों के रूप में प्रयुक्त होने लगा. पतंजलि और शतपथ ब्राह्मण के आधार पर ए. बनर्जी और शास्त्री (A. Banerji-Sastri) के मत में असुर शब्द की उत्पत्ति असीरियन से ही हुई है.


ऋग्वेद में अग्नि के सम्बन्ध में आये मन्त्र में असुर शब्द में अग्नि को असुर कहा गया है. 6 बार अग्नि के लिए, दो बार सावित्री के लिए, दो बार वरुण के लिए, दो बार मित्रवरुण के लिए,  रूद्र के लिए, ध्योस के लिए, आर्यमन के लिए, पूसन के लिए, प्रजन्य के लिए, मनुष्य के लिए असुर शब्द का प्रयोग चार मन्त्रों में हुआ है. उन्हें संतति की वृद्धि या रक्षा करने वाला कहा भी गया है. वरुण के साथ असुर का प्रयोग ऋग्वेद में हुआ है जिसमें उसे (असुर को) राज करने वाला बुद्धिमान राजा कहा गया है.


इतिहास-अन्वेषण की दृष्टि से पुराणों पर काफी कुछ कार्य हुआ है और उससे भारत का प्राचीन इतिहास उजागर हुआ है, परन्तु वेदों में वर्णित घटनाओं और नामों पर इतिहास-अन्वेषण की दृष्टि से किंचित-मात्र भी अन्वेषण नहीं हुआ है. इन पर शोध कर हम अपने इतिहास को और अधिक रोशन कर सकते हैं.


संदर्भों और उद्धरणों सहित उक्त आलेख के संभावित अपडेटिड वर्शन आप इस लिंक पर देख सकते हैं - मेघ: लोक-परंपराएं और वैदिक पुराकथा