"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


18 April 2021

H.E. Babu Parmanand Ji - महामहिम बाबू परमानंद जी

महामहिम बाबू परमानंद जी
(10-08-1932 से 24-04-2008)

    डॉ नवल वियोगी की पुस्तक 'मद्र और मेघों का प्राचीन और आधुनिक इतिहास' का 9वां अध्याय देखा जो पूरा बाबू परमानंद जी के बारे में है. पहले पैरा में ही लिखा है कि महामहिम बाबू परमानंद जी मेघ समुदाय से थे. स्वभाविक ही इससे एक सुखद आश्चर्य और खुशी हुई.

     मेरे परिचित एक सज्जन श्री विजय भगत का भी उस अध्याय में उल्लेख है जो बाबू परमानंद जी के निजी सहायक रहे. उनका साथ काफ़ी लंबा रहा है. विजय भगत की बाबू जी से जुड़ी यादों को भी इस अध्याय में स्थान मिला है. मैंने तुरत विजय को फोन किया और बाबू जी के बारे में अधिक जानकारी ली.

    प्रत्येक समुदाय अपने भीतर से उभरे ऐसे महान व्यक्तित्वों की खोज करके उनकी स्मृतियों को बनाए रखने का उपक्रम करता है जिन्होंने लोगों के कष्टों-कठिनाइयों को कम करके उनके उत्थान का काम किया. उन्हें याद करना और नमन करना समाज के अपने हित में होता है. ऐसा ही एक व्यक्तित्व श्री संतराम बीए भी थे जिन्हें एक पुस्तक में मेघ जाति का लिखा गया था. उसी के आधार पर मैंने कुछ ब्लॉग लिखे. जानकारियां लेते हुए पता चला कि प्रजापति समुदाय नियमित रूप से उनका जन्मदिन मनाता है जबकि मेघ समुदाय में ऐसी कोई परंपरा नहीं है. एक सज्जन श्री हंसराज फोंसा के द्वारा एक पोस्ट पर किए कमेंट के उत्तर में मैंने लिखा था कि संतराम बीए चाहे प्रजापति समुदाय से हों या मेघ समुदाय के, वह इतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता जितना यह कि उन्होंने अपने जीवन में  पूर्ण समाज के लिए कैसा और कितना कार्य किया है. 

    बाबू परमानंद जी के बारे में भी कुछ वैसी ही बात है. विजय भगत जी ने बताया है कि बाबू जी सभी समुदायों के लिए खूब काम करते थे. वे राज्यपाल के पद पर भी रहे. उन्होंने हर तरह से लोगों की सेवा और मदद की. वे बताते हैं कि इतने सारे जाति विभाजनों के बीच आज नहीं कहा जा सकता कि बाबू परमानंद मेघ थे. अब क्योंकि नवल वियोगी जी दस वर्ष से बाबू जी को जानते थे और उनके नज़दीकी रहे हैं इसलिए मैं नवल जी की बात को महत्व देता हूं. विजय भगत भी बाबू जी के बहुत करीबी रहे हैं और मेघ समुदाय के हैं इसलिए उनकी जानकारी किनारे नहीं की जा सकती. मुमकिन है कि नवल ने बाबू जी को इस नज़रिए से मेघ बताया हो कि बाबू जी की जाति वर्तमान जातिगत ढांचे में आने से पहले कभी 'मग' ट्राइब में मग या मद्र आदि नामों के तहत रही थी.

    जो भी हो, मैं बाबू परमानंद को अपने समुदाय का मानकर चलना बेहतर समझूंगा. यदि कोई अन्य जाति समूह उन्हें अपना बताता है तो हमें उनकी स्थिति के साथ अपनी पहचान स्थापित करने से कोई परहेज़ नहीं करना चाहिए. अपनेपन की कोई जाति नहीं होती. जानकारी के अनुसार विधायक के तौर पर बाबू जी ने मेघ जाति के लिए ख़ूब काम किया था. उनकी स्मृति कायम रखी जानी चाहिए.

 बाबू परमानंद जी को सादर नमन.





10 April 2021

From Madra to Megh - मद्र से मेघ तक - 2

 डॉ वियोगी ने पौराणिक साहित्य से भी संदर्भ ले लिए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार मग या मद्र, भारत में शाक द्वीप यानि ईरान से आए। (नवल जी की पुस्तक में ‘शका’ छपा है। संभवतः यह शाक शब्द है।) इस द्वीप के मगों में चार जातियां थीं- मग, मगध, मानस और मंदगा अथवा मद्र यानी भारत की तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र यानी मद्र शूद्र थे। जैसा कि पहले बताया गया है मीडिया (Media region) के निवासी मीड (Mede) भारत में मद्र कहलाए। (कुछ अन्य विद्वानों ने लिप्यंतरण करते हुए Mede को ‘मेदे’ भी लिखा है)। मग या मघ एक ही जनजाति थी। पहली जनजाति में से दूसरी उभरी। हेरोडोटस (Herodotus) ने उन्हें मद्रों की एक शाखा बतलाया है, क्योंकि वे मूलरूप से अनार्य थे। भारत में मद्र शिल्पकार अथवा बुनकर के रूप में दिखते हैं, क्योंकि मगों का संबंध मद्रों से था, इसलिए वे बुनकर थे और पुजारी भी। इन्हीं परिस्थितियों में पश्चिम एशिया में मेघ जाति विकसित हुई क्योंकि उनके समाज में ऐसी ही परंपरा थी। मेघ, समाज के एक विशेष वर्ग का पुजारी है। मुख्यतया वे मातृदेवी की पूजा से जुड़े हैं जो जनजातीय परंपरा है। उनके अनेक गोत्र नाम ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं। जब कि उनसे संबंधित औडुंबरा या डूम वर्ग के लगभग सारे गोत्र ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं।

तीसरे दौर में भारत आए मेघों से संबंधित वर्ग को विदेशी और म्लेच्छ होने के कारण बहुत समय तक मान्यता नहीं मिली। दूसरी सदी में जब पार्थियन व शकों का राज्य था उन्हें द्विज की मान्यता मिली। इस सम्मानजनक स्थिति पर मज़बूत पकड़ बनाए रखने के लिए उन्होंने ब्राह्मण व ब्राह्मणवाद की बड़ी सेवा की। जातिवाद को मज़बूत करने के लिए कड़े कानून बनाए और स्मृतियों में जोड़े। उसी का परिणाम है कि गंगा घाटी में जातिवाद अपने अत्यंत घिनौने रूप में मिलता है।

‘गोत्र’ के बारे में बताते हुए नवल जी लिखते हैं कि भारत की जलवायु आर्यों के लिए गर्म थी। इसलिए उन्होंने यहां के वनों में आश्रम बना कर रहना शुरू किया। वे चरवाहे थे और गाएं चराते थे। अनेक ऋषि अपनी गायों को विशेष पहचान देने के लिए उनके कान काटकर खास निशानी लगाते थे ताकि उनकी पहचान की जा सके। उस निशान को गोत्र कहते थे। उसी गोत्र के आधार पर आश्रम और ऋषि की पहचान होने लगी। पहले चार गोत्र थे- अंग्रिश कश्यप, अथर्वा, वशिष्ठ तथा भृगु। बाद में चार और जुड़ गए - जगदग्नि, अत्रि, विश्वामित्र तथा अगस्त्य। उनमें अनार्य (ईरान से आए मग) वर्ग के ऋषि भी शामिल थे। जब जाति विभाजन कठोर हो गया और लोगों को यकीन हो गया कि आर्य ऋषियों के गोत्र वाले ही वास्तव में ब्राह्मण हैं और अब्राह्मण का अपना कोई गोत्र नहीं हो सकता तब इसी सिलसिले में यज्ञ करते हुए गोत्र नाम बोलने की परंपरा शुरू हुई। क्षत्रिय और वैश्य अपने पुरोहित का ही गोत्र नाम इस्तेमाल करने लगे। विभिन्न वर्णों में समान गोत्र नामों की यह वजह रही। गोत्र परंपरा से पहले पुरोहित और क्षत्रिय ख़ुद को एक ही वर्ग का नहीं मानते थे। इससे जातिवाद विकसित हुआ।

डॉ नवल के अनुसार विश्वामित्र व कण्व कश्यप अनार्य ऋषि थे। महाभारत के अनुसार कश्यप ही नागों (मग) के जनक थे। वशिष्ठ तथा विश्वामित्र का टकराव आर्य-अनार्य का ही टकराव प्रतीत होता है जो बहुत स्पष्ट भी नहीं है। बंगाल के चंदा नामक विद्वान के हवाले से वे लिखते हैं कि इस काल में ब्राह्मणों का लोभ बहुत बढ़ गया था। लोभ व हित साधना के लिए झूठी परंपराएं और निरर्थक अनुष्ठान प्रारंभ किए गए। सारी सामाजिक व धार्मिक व्यवस्था जैसे उनकी मुट्ठी में आ गई। यजमानों की प्रशंसा बहुत बढ़ा-चढ़ा कर की जाती थी। उन्हें लंबी आयु और अमर पद का लालच दिखाया जाता था। अहीन यज्ञ में 1000 गायें अथवा सारी संपत्ति दान करनी होती थी। गुप्त काल में धर्म व मंदिरों की लूट यथावत जारी रही।

डॉ नवल लिखते हैं, “मद्र अथवा मेघ समाज में प्राचीन काल से ही गणसंघ, गणतंत्र व्यवस्था की परंपरा थी। उनका प्रत्येक नागरिक एक बहादुर सैनिक तथा कुशल शिल्पकार होता था। उनमें राजऋषि परंपरा थी। वह जाति-पांति विहीन समाज था। वहां हर मनुष्य जन्म से ही बराबर था। वे प्रारंभ से असीरियन धर्म के मानने वाले थे। उसका आधार सांख्य दर्शन था। उसने बौद्ध व जैन धर्म को जन्म दिया था। यानी वे बौद्ध अथवा जैन धर्म के अनुयायी थे। बौद्ध धर्मी ब्राह्मणों के सबसे बड़े शत्रु थे। जब गुप्त युग में उनका बलात हिन्दूकरण किया गया तो उन्हें उसी शत्रुता के कारण चौथे वर्ण में धकेल दिया गया। इसका अन्य कारण भी था कि वे मूलरूप में बुनकर थे। क्योंकि बौद्ध-धम्म में मांसाहार की आज्ञा थी यहां तक कि उन्हें मृत पशु का मांस खाने की आज्ञा भी थी अतः मेघों को अछूत वर्ग में धकेल दिया गया। यानी एक भाई ने अपने ही भाई की यह दुर्गति की है।” “गुप्त भले ही उसी नाग समाज के राजा थे, मगर उनका भी आर्यकरण कर दिया गया और बौद्धों पर धार्मिक अनाचार करने में उन्होंने ब्राह्मणों का पूरा-पूरा साथ दिया।”

आधुनिक काल में जम्मू के क्षेत्र के प्राचीन निवासी मेघों की स्थिति बहुत खराब रही। वे बंधुआ मज़दूरों का जीवन जी रहे थे। काम के बदले उन्हें सूखी रोटी और उतरन मिलती। जिनके पास थोड़ी-बहुत ज़मीन थी उसे नैतिक-अनैतिक तरीकों से राजपूतों ने हड़प लिया। जम्मू व सिआलकोट के क्षेत्र में वे खेतिहार मज़दूर थे। अछूत होने के कारण वे घरों तथा मंदिरों में प्रवेश करने का साहस नहीं कर सकते थे। कुओं से पानी नहीं ले सकते थे। वे अधिकतर बुनकर, खेत मज़दूर और कारख़ानों में मज़दूर थे। लेखक काहण सिंह बिलौरिया ने लिखा है, "मेघ निचली जातियों के पुजारी हैं।" भूमि सुधारों के कारण उनमें से कुछ को ज़मीनें अलॉट हुई हैं। वे खेती करने लगे हैं।

प्रो. हरिओम शर्मा अपनी रचना 'हिस्ट्री आफ जम्मू एण्ड कश्मीर' में लिखते हैं- “उच्च शिक्षा तथा नौकरियों में आरक्षण के कारण अनेक मेघ ऊंची श्रेणी के पदों आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस., डॉक्टर, इंजीनियर, बैंक प्रबंधक सेवाओं के पदों तक पहुंच गए हैं।"

कुछ अभिलेखों से प्रमाण मिले हैं कि अनेक मेघ ठाकुर जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के राज्यों में शासक रहे हैं। पठानकोट के पठानिया राजवंश का संबंध मद्र या मेघ समाज के साथ था। उन्हें मूल रूप से औडुंबरा पुकारा जाता था। उसी से डूम शब्द बना। मुग़लों के शासन काल में पठानिया प्रसिद्धि प्राप्त शासक थे। वे राजपूत पुकारे जाते थे। सिखों के शासन काल तक वे सत्ता में रहे। मद्र तथा मेघों की तरह यह एक बुनकर जाति थी।

मेघों के इतिहास  का यह बहुत ही संक्षिप्त वर्णन है। बेहतर होगा कि डॉ नवल वियोगी की मूल पुस्तक ‘मद्रों और मेघों का प्राचीन और आधुनिक इतिहास’ ध्यान से पूरी पढ़ी जाए और ख़रीद कर पढ़ी जाए। फिर से अनुरोध है उनकी मेहनत का सम्मान होना चाहिए।

पुस्तक का नाम: मद्रों और मेघों का प्राचीन व आधुनिक इतिहास

लेखक - डॉ नवल वियोगी

प्रकाशक - सम्यक प्रकाशन, 32/3, पश्चिम पुरी, 

नई दिल्ली-110063

खरीद के लिए संपर्क - मोबाइल - 9810249452, 9818390161