16 January 2020

A Story in Loop - गुंजलिका में एक कथा

इतिहास का प्रवाह और भाषा का प्रवाह दो ऐसी रेखाएँ हैं जो एक दूसरे से लिपट कर चलती हैं. यदि एक रेखा छिटक कर अलग दिखती है तो दूसरी उसके व्यवहार की ओर इशारा कर देती है. मेघ’ शब्द की तलाश में निकले लोग ‘म’, ‘मे’, ‘में’ का पीछा करते कहाँ-कहाँ पहुँचे इसका कुछ अनुभव हुआ है.

शब्दकोश में ‘मेघ’ शब्द ढूँढने पर उसके अर्थ की व्यापकता को हम देख सकते हैं. ‘नागमेघ’ के तो कहने ही क्या. ‘मेघ’ शब्द धरती के किस कोने में किस अर्थ में इस्तेमाल हुआ यह दूसरी खोज है. नागवंश में से मेघवंश की उत्पत्ति तीसरी धारा है और उनकी जनसांख्यिकीय स्थिति के साथ उनका बड़े पैमाने पर एक जगह से अन्य जगहों पर जाना एक अन्य तरह की कथा है जो प्रशिक्षित और अनुशासित अध्ययन की मांग करती है.

जब मैंने कहीं पढ़ा था कि ओडिशा में भी कुछ लोग मेघ ऋषि (जिसे ऋग्वेद के आधार पर वृत्रासुर, नागमेघ, असुर मेघ भी माना गया) को अपना पूर्वज मानते हैं तब संदर्भों को संभाल कर रखने की आदत नहीं थी. बस जानकारी लेकर खुश हो लेते थे. कुछ भी हो इतना आभास तो हो ही रहा था कि ओडिशा में है तो उत्तर-पूर्व में मेघवंश, नागवंश की उपस्थिति ज़रूर होगी. ‘मेघालयराज्य ध्यान खींचता रहा. लॉर्ड कन्निंघम ने भी कहा था कि चीन की ओर से मेघों का प्रवेश असम (अविभाजित असम) में हुआ होगा. यह बात भूलती नहीं थी. कैसे भूलती. हमारे पुरखों ने धरती के एक बड़े भू-भाग को तय किया है. वे कोल भी कहलाए (कोलारियन थे), कोरी, निषाद आदि के रूप में वे दक्षिण भारत के संपर्क में आए.

अरबी, तुर्की, फारसी, फ्रेंच, अंग्रेजी आदि मेंकी ध्वनि नहीं है. तो यहमेघध्वनि शुद्ध भारतीय ध्वनि ठहरती है. श्री आर.एल. गोत्रा और श्री के.एल. सोत्रा में वैचारिक भिन्नता कितनी भी क्यों हो दोनों ने इस बात को कहा है कि मेघों के लिएमेंगशब्द भी इस्तेमाल हुआ है. इसकी एक वेरिएशन 'मेंह्गा' (जैसे एक नाम 'मेंह्गाराम') के रूप में मिलती है जिसका प्रयोग कबीले के रूप में किया गया प्रतीत होता है. सोत्रा जीमेंगशब्द को ही असली मानते हैं. तो हम बारस्तामेंगसेमेघतक पहुँचे और फिर सेमेंगतक आते हैं, ‘मुग़ल एम्पायरनामक पुस्तक के ज़रिए जो आशीर्बादी लाल श्रीवास्तव ने लिखी है. उसके दो पृष्ठों की फोटो कापियाँ श्री ताराराम जी ने भेजी हैं. इनके संदर्भ से ज्ञात होता है कि अविभाजित बंगाल (जिसमें आज का बांग्लादेश भी शामिल था) में एक नदी का नाममेघनाहै (आपको याद होगा सतलुज नदी का नाममेगारससथा जिसके किनारों परमेगयामेघबसे थे). मेघना नदी अब बांग्लादेश में है और यही भारत की दो बड़ी नदियों ब्रह्मपुत्र और गंगा का अधिकांश पानी समुद्र तक पहुँचाती है. इस पुस्तक में बंगाल और बरमा (म्यांमार) के बीच एकअराकानराज्य का उल्लेख है जिसके शासकों के नामों में तीम नाम होते थे जिनमें से एक नाम मुस्लिम होता था. जैसे-

“(Meng Doulya (1481-1491)=Mathu Shah, Meng Yangu (1491-1498)=Mahamed Shah, Meng Ranoung (1493-94)=Nori Shah, Chhalunggathu (1494-1501)=Shekmodulla Shah, Meng Raja (1509-13)=Ili Shah, Meng Shou (1515)=Jal Shah, Thajat (1515-1521)=Ili Shah, Meng Beng (1581-58)=Sri Surya Chandra Dharma Raja Jogpon Shah, Meng Phaloung (Sekendar Shah 1671-1593), Meng Radzagni=Selim Shah (1598-1612), Meng Khamaung=Hussain Shah (1612-1622).)”

इन शासकों के नामों से पहले लगेMeng (मेंग) शब्द का अर्थक्यूट’ (प्यारा, निपुण, प्रवीण, कुशल) जैसा मिल रहा है लेकिन पहली नज़र में लगता है कि इसे टाइटल की तरह इस्तेमाल किया गया है. इन शासकों के बारे में इतना तो पता चलता है कि वे बौध थे हालाँकि उनके नामों में एक नाम मुस्लिम नाम भी होता था जो उनकी किसी के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक हो सकता है. यदि इसे डायनेस्टी मान कर गूगल करें तो चीन की मिंग (Ming) डायनेस्टी सामने पड़ती है लेकिन जल्दी ही वो एक अलग राजवंश होने का पता देने लगती है. अब यहमिंगशब्द औरड्रैगनयानिनाग शब्द भी ध्यान खींच रहा है. दक्षिणी चीन में ‘Snake Cults’ (जिसका अर्थनागपंथजैसा हो सकता है) का संदर्भ मिलता है. संभव है इसी का संबंध अविभाजित असम के मेघालय और नागा लोगों से रहा हो जो म्यांमार में भी रहते हैं. Nagaland (नागालैंड राज्य) नागा नजातियाँ वहाँ हैं.

मेंगशब्द को लेकर लगता है मैं किसी फॉरबिडन एरिया (वर्जित क्षेत्र) में गया हूँ और मेरी कल्पना के जंगली घोड़े चीन की दीवार अनजाने में फाँद गए हैं.

अब किसी को तो इतिहास की एक पुस्तक लिखनी चाहिए जिसका टाइटल ही हो - ‘History of Naga’s (Made Simpler)’.


12 January 2020

Links with Greek history - ग्रीक इतिहास से रिश्ता


पुरातत्वविद एलेग्ज़ेडर कंन्निघम आदि पुरातत्व वेत्ताओं का ऐसा मत है कि प्राचीन काल के मेगरी, मेगल्लाए ही वर्तमान समय के मेग या मेघ हैं. नृविज्ञान (anthropology) और अन्य इतिहासिक कड़ियों से मेघवाल भी मेगरी और मेगल्लाए से आ जुड़ते हैं. इन सभी शब्दों के मूल में मेग और मेगल्लाए की परंपरा है. इनकी सिंध से लेकर मेगरा तक कई बस्तियां थीं और प्राचीन काल में इस क्षेत्र के विभिन्न भूभागों पर उनका राज्य था. यूनान (ग्रीस) के एगॉस्तना (Aigosthena) में मेगारी लोगों का एक प्रसिद्ध बंदरगाह भी था. वहाँ से 19 किलोमीटर दूर मेगारी नगर था जहाँ से मेगों के सिक्के मिले हैं. इसी नगर को कभी मेगरा भी कहा गया. उस नगर को आजकल पोर्टो जरमेनो कहा जाता है. एगॉस्तेना, मेगरी नगर के अलावा पगे (Pagae) नगर में भी मेग श्रृंखला के सिक्के प्राप्त हुए हैं. ये तीनों शहर मेगों के थे. ये सिक्के ईसा से तीसरी-चौथी शताब्दी पूर्व के हैं. ऊपर दी गई जानकारी ताराराम जी ने एक पोस्ट के माध्यम से दी है. उनके द्वारा संदर्भित पुस्तक और उसमें दी गई सिक्कों संबंधी जानकारी के चित्र यहाँ नीचे दिए गए हैं.

श्री आर.एल. गोत्रा और ताराराम जी समय-समय पर बताते रहे हैं कि मेघों का प्राचीन इतिहास जानना हो तो दक्षिण-पश्चिम एशिया के इतिहास को व्यापक रूप से पढ़ना होगा. अब चूँकि ताराराम जी इस पर कार्य कर रहे हैं इसलिए मुझे अधिक नहीं कहना है सिवाय इसके कि मुझे रांझाराम का ध्यान हो आया और अपने बड़े भाई का भी जिन्होंने कभी कहा था कि सिकंदर हमें ढूँढता हुआ ही इधर आया था.



03 January 2020

An investigation into History - इतिहास की पड़ताल


डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘इतिहास का मुआयना’ पढ़ना एक आश्चर्य में डालने वाला और मन-मस्तिष्क को खोल देने वाला सुखद अनुभव रहा. अपने मेघ समुदाय का इतिहास खोजते हुए रास्ते में पसरे अंधेरे में कई ठोकरें खाई हैं. कहीं रोशनी दिखती थी लेकिन गुम हो जाती थी. आखिर यही सच साबित हुआ कि इतिहास और भाषा का रास्ता सच जैसा सीधा नहीं है. साहित्य और इतिहास में से बहुत-सा सच गायब है. जब तक सच अपना इतिहास ख़ुद नहीं लिखता तब तक वह नज़र नहीं आ सकता.

अब ‘इतिहास का मुआयना’ की ओर आते हैं. इस पुस्तक ने पढ़ाए जा रहे इतिहास पर प्रमाण और तर्क सहित सवाल उठाए गए हैं. यह विशेषकर भाषा के नज़रिए से जाँचा गया इतिहास है. होना यह चाहिए कि बच्चों को वो इतिहास पढ़ाया जाए जो पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर लिखा गया हो. इतिहास लेखन की ऐसी परंपरा अंग्रेजों के आने से पहले हमारे यहां नहीं थी. अंग्रेजों का पुरातत्व प्रेम ही  सम्राट अशोक का इतिहास, सिंधु घाटी सभ्यता और बौद्ध सभ्यता का इतिहास खोज कर लाया. संभव है संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों में इतिहास के संकेत उपलब्ध हों लेकिन समस्या यह रही कि संस्कृत भारत में कभी जनभाषा रही नहीं. इसलिए जो संस्कृत में लिखा गया वह ना तो जन तक पहुंचा और ना ही लोगों ने उस पर संदर्भात्मक संवाद किया. केवल वैदिक और पौराणिक कथाओं के समय-समय पर बदलते नेरेटिव के स्थानीय भाषाओं में किए गए मनमाने अनुवाद से वे परिचित रहे. शिलाओं और शिलालेखों पर उपलब्ध इतिहास की शक्ल किसी के हथौड़े-छैनी ने बदल दी या प्रकृति ने समय-समय पर उसके रूप को प्रभावित किया. लिखित साहित्य के संस्करण तो बदले ही जाते रहे.

नृविज्ञान (Anthropology) ने बताया है कि भारत में सबसे पहले ‘नेग्रिटो’ (Negrito) का पता चलता है और उसके बाद ‘आस्ट्रिकों’ (Austric) का. पीपल की पूजा और तीर-कमान का इस्तेमाल नेग्रिटो की देन है तो सिंदूर, 20 पर आधारित गिनती, कपास और कपड़ा बनाना ‘आस्ट्रिकों’ का दिया उपहार है. इनके बाद द्रविड़ आते हैं जिन्होंने हिंदी की ‘ट’ वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) की ध्वनियां दी हैं. तमिल भाषा की झलक झारखंड की भाषा ‘कुडुख’ में और बलोचिस्तान स्थित भाषा ‘ब्राहुई’ में मिल जाती है. जाति, धर्म और देश इनकी समानताओं में कहीं बाधा नहीं बनते.

डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह की यह पुस्तक बौध सभ्यता पर बहुत ध्यान देती है क्योंकि इतिहास लेखकों ने इसके साथ काफी नाइंसाफी की है. कई ऐसी बातें लिख दी गई हैं जिनके प्रमाण नहीं थे, प्रमाण थे तो तोड़-मरोड़ कर पेश किए गए. यहाँ तक कि ऐतिहासिक पात्रों, उनसे संबंधित गांव, नगरों के नाम बदल दिए, दिन-महीनों की तो छोड़िए शताब्दियों तक की कहानी बदल दी, कांस्य युगीन बौध-सभ्यता को ईसा पूर्व की छठी शताब्दी के लौह युग में ला कर रख दिया गया.

इतिहास के साथ हुई छेड़-छाड़ के कई उदाहरण डॉ. सिंह ने दिए हैं. इतिहासकार डी.डी. कोसंबी के हवाले से उन्होंने बताया है कि बुद्ध का वास्तविक नाम गोतम और उनकी पत्नी का नाम कच्चाना था और मां का नाम लुंमिनि था. इनको दिए नाम क्रमशः सिद्धार्थ, यशोधरा और महामाया वास्तव में डुप्लीकेट हैं. एलेग्ज़ेंडर का ‘सिकंदर’ नाम भी डुप्लीकेट है. कोलों (वही मानव समूह जिसके साथ मेघ वंश को जुड़ा बताया गया है) की भाषाओं (संताली, मुंडारी, हो आदि) में गोतम का सीधा-सा अर्थ घी होता है जो भारत के मूल निवासी लोगों की नाम परंपरा का है, जैसे - पंजाबी में नाम है मक्खन सिंह. तेलुगु में नाम है ‘पेरुगु रामकृष्ण’ (एक बहुत प्रसिद्ध लेखक). पेरुगु का अर्थ है दही.

वैदिक सभ्यता की बात करते हुए डॉ. सिंह ने बहुत तीखा सवाल पूछा है कि- “जब सिंधु घाटी की सभ्यता वैदिक सभ्यता थी तब इंद्र जिन्हें ‘पुरंदर’ अर्थात ढहाने वाला कहा जाता है किस का किला ढहा रहे थे. अपना ही?”. “सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मौर्य काल तक नगर, भवन, सड़कें, गलियां मिलती हैं. क्या कारण है कि गुप्त काल का ऐसा कुछ भी नहीं मिलता मंदिरों के सिवाय?”, वे पूछते हैं.

हमारे देश में अष्टमियाँ और नवमियाँ मनाने की परंपरा रही है तो क्या वजह है कि जिस अशोकाष्टमी को जनमानस हजारों साल से मनाता रहा है उसे एक अशोक वृक्ष के साथ जोड़ दिया गया. तो क्या अशोक अष्टमी किसी अशोक वृक्ष की जन्मतिथि है? लेखक ने इस पर हैरानगी प्रकट की है. यदि यह वृक्ष की जन्मतिथि है तो वाकई यह हास्यास्पद है.

वेदों और वेदों की भाषा को लेकर विद्वान लेखक ने कई जानकारियां दी हैं. वे बताते हैं कि वेद किसी आदिम समाज की रचना नहीं है. इसकी भाषा का ध्वनितंत्र और शब्द जाल चरवाहों, गड़ेरियों की भाषा से कहीं अधिक जटिल है और एक व्याकरण में आबद्ध है. इसके अलावा पुस्तक के नाम पर 'वैदिक युग' जैसा नामकरण इतिहास की शब्दावली नहीं है. यह संस्कृत साहित्य के इतिहास की टर्मिनोलॉजी हो सकती है. लेखक ने बताया है कि गौतम बुद्ध ने वैदिक साहित्य का विरोध नहीं किया था बल्कि वैदिक साहित्य ही है जो बुद्ध के विरोध में रचा गया. ईसा से पहले का कोई अभिलेख नहीं मिला है जिसमें ‘वेद’ जैसे किसी शब्द का उल्लेख हो. अशोक के अभिलेखों में भी यह शब्द नहीं है. इसके अलावा इतिहास में और साहित्य में शब्दों के साथ खिलवाड़ हुआ है जिससे गलत अर्थ निकलता है. इस विषय को छूते हुए डॉ. सिंह ने पूछा है कि द्रविड़ों के देश में तो आर्य आए थे तो द्रविड़ क्यों ‘अनार्य’ या आर्येतर हुए? सलीके से तो आर्य ही अद्रविड़ या द्रविड़ेतर हुए.

लिपि विज्ञान (Graphology) के नज़रिए से पता चलता है कि शुंग काल (185 से 149 ई.पू.) से पहले हमारी वर्णमाला में ‘ऋ’ था ही नहीं, यानि ऋग्वेद की रचना उसके बाद की है. ‘ऋ’ संस्कृत की विशिष्ट ध्वनि है और लिखित है और संस्कृत शुंग काल से पहले की नहीं है. गुप्त काल के इतिहास पर डॉ. सिंह ने कई रुचिकर जानकारियां दी हैं. वे बताते हैं कि गुप्त वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त प्रथम दरअसल मौर्य वंशी राजवंश के चंद्रगुप्त की नकल है जबकि चंद्रगुप्त प्रथम का असली नाम चंडसेन था. चंडसेन के दूसरे पुत्र समुद्रगुप्त ने अपना नाम अशोक रखा. चंद्रगुप्त द्वितीय ने राजा विक्रमादित्य का नाम अपनाया. तीनों नाम एक तरह की नकल थे जिन्होंने कई भ्रम पैदा किए.

प्रसिद्ध इतिहासकार जयचंद्र विद्यालंकार के हवाले से बताया गया है कि 15वीं शताब्दी के महाराणा कुंभा से पहले ‘राजपूत’ शब्द साहित्य और इतिहास में नहीं मिलता. राजपूतों के लिए ‘क्षत्रिय’ शब्द रूढ़ (conventional) हुआ है. डॉ. सिंह ने पूछा है कि प्राचीन काल में क्षत्रिय किसे कहा जाता था? पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि सूरदास जाति के अहीर थे लेकिन उन्हें ब्राह्मण बनाने की होड़ लगी थी और कहा गया कि वे अहीर थे और उन्होंने ब्राह्मण के घर जन्म लिया. रैदास और कबीर के जन्म की कथाओं में भी इनके जन्म को किसी न किसी तरीके से ब्राह्मण से जोड़ा गया इस कार्य के लिए हिंदी के साहित्यकारों की कलम पल्टियाँ मार-मार कर और गुलाटियाँ खा-खा कर लिखती रही. डॉ. सिंह ने लिखा है कि कबीर का बौद्धिक आंदोलन 'भक्ति आंदोलन' ना होकर हाशिए के लोगों का आंदोलन रहा है. प्रसिद्ध समाजशास्त्री विवेक कुमार ने ‘भक्ति काल’ को ‘मुक्ति काल’ कहा है. कबीर और तुलसी की विचारधारा, दर्शन और भक्ति-दर्शन आपस में मेल नहीं खाते. कबीर अपने ईश्वर को कुम्हार, जुलाहा, रंगरेज, दर्जी आदि में बनाते हैं. एक अन्य जगह उन्होंने उदाहरण दिए हैं, जैसे- "साहब हैं रंगरेज चूनर मोरि रंग डारि", "साँई को सियत मास दस लागै", "गुरू कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट" आदि.

कबीर वैष्णव, शैव, शाक्तों की धज्जी उड़ाते हैं लेकिन बौधों पर हमला नहीं करते. उधर कबीर के जन्म से 44 वर्ष पहले ही रामानंद की मृत्यु हो चुकी थी. यह बात डॉक्टर मोहन सिंह की पुस्तक ‘कबीर - हिज़ बायोग्राफी’ (पृष्ठ 11 से 14) के हवाले से लिखी गई है.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह बताते हैं कि रीतिकाल का 200 वर्ष का इतिहास ब्राह्मण कवियों का है जिसमें कोई उल्लेखनीय शूद्र रचनाकार नहीं है.

आधुनिक काल के इतिहास में हुए आज़ादी के आंदोलनों के साथ हुए भेदभाव के बारे में कई टिप्पणियां इस पुस्तक में हैं, जैसे- आदिवासियों की स्वतंत्रता की लड़ाई जिसे स्वतंत्रता की लड़ाई के इतिहास में सही स्थान नहीं मिला. अंग्रेजों से लड़ने वाले आदिवासी नेता गुंडा धुर के नाम पर अंग्रेजों का बनाया गुंडा एक्ट आज भी उसी नाम से चल रहा है. स्वतंत्रता सेनानियों का नाम लेने का यह कोई सलीका नहीं. बाबू जगदेव प्रसाद जी के नारे - “सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है. धन, धरती और राजपाट में करना अब बंटवारा है”- इस पुस्तक में पढ़ने को मिला. यह सर छोटूराम के उस नारे की याद दिलाता है - “जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी”.

कई सामाजिक सुधार आंदोलनों का नाम लेकर लेखक ने पूछा है कि ब्रह्म, आर्य, वेद, प्रार्थना आदि क्या हैं? उधर ज्योतिबा फुले का आंदोलन ‘सत्यशोधक समाज’ के माध्यम से सत्य का प्रचार कर रहा था.

यह कृति इस बात की घोषणा ऊँचे स्वर में करती है कि 1857 से भी 100 वर्ष पहले से स्वतंत्रता के लिए अनेक युद्ध हो चुके थे जो आदिवासी लड़ते रहे. ये लड़ाइयां 18-18 साल से लेकर 60 साल तक लंबी चलीं और उन पर फौजी कार्रवाइयाँ भी हुईं. इस लड़ाई में आभिजात्य वर्ग नज़र नहीं आता. ऐसी कई लड़ाइयां तो खुद आभिजात्य वर्ग के व्यवहार के खिलाफ़ थीं.

अठारह पुराणों के पुरानेपन पर चुटकी लेते हुए लेखक ने पूछा है कि 11वें पुराण यानि ‘भविष्य पुराण’ में ब्रिटिश काल का वर्णन है. वेद युग के वेद व्यास ने 18 पुराण कैसे लिखे? वेदव्यास किस काल के हैं?

‘इतिहास का मुआयना’ पुस्तक के लेखक डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह साहित्यकार तो हैं ही पाली और प्राकृत भाषा के भी जानकार हैं और शिलालेखों का अनुशीलन कर चुके हैं. वे प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी हैं और कई पुस्तकें लिख चुके हैं. वे कई शब्दों की क्षितिज तक खोज करके उन्हें असली रूप में पकड़ लाते हैं. उदाहरण के लिए जूनागढ़ अभिलेख में प्रयुक्त ‘राष्ट्रिय’ शब्द का अर्थ इतिहासकारों ने राज्यपाल या किसी अधिकारी से लिया. लेखक ने बताया है कि कालिदास ने ‘राष्ट्रिय’ शब्द का प्रयोग ‘साला’ के अर्थ में किया है. इससे दो अर्थों का भान होता है कि अभिलेख में उल्लिखित ‘राष्ट्रिय’ का तात्पर्य सम्राट अशोक के साले से है और कि जिस संस्कृत का यह शब्द है वही प्रमाणित करती है कि वह अभिलेख दूसरी सदी का ना होकर छठी या सातवीं सदी के बाद का है.

संस्कृत की पुरातनता, भारत में अधिकतम गांवों के नाम संस्कृत में ना होने, भूतकाल शब्द की प्रयुक्ति, भूत, प्रेत, पिशाच शब्दों की प्रयुक्ति, गेहूं शब्द गंदुम से आया था या गोधूम से, हाथ की उंगलियों पर गिनती करने से बने शब्द पंजा, पंज (पाँच), दस (दस्ताना, दस्तकारी) वगैरा के बारे में दी गई जानकारियाँ ध्यान खींचती हैं. यह भी बताया गया है कि ‘माया’ शब्द भारतीय दर्शन का हिस्सा बन गया बिना इस विवरण के कि इसका आविष्कार मगों ने किया था.

अपना अनुभव यहाँ जोड़ रहा हूँ कि जब हमें भाषाविज्ञान पढ़ाया गया तो बताया गया कि संस्कृत से पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं का विकास हुआ है. हमें पढ़ाया गया, हम ने पढ़ लिया. तब हम छात्रों के पास पूछने लायक कोई सवाल नहीं था. लेकिन अपनी 2017 में छपी पुस्तक में डॉ. सिंह ने हमें नए औज़ारों से परिचित कराया है और अब हम भी पूछ सकते हैं कि क्या पाली में संस्कृत का कोई तत्सम शब्द है? ये तत्सम शब्द कहीं संस्कृत का महिमामंडन की किसी खामखाह की प्रक्रिया का हिस्सा तो नहीं? अब भाषा के आचार्यों को ही उत्तर देना पड़ेगा कि पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में संस्कृत के तत्सम शब्द सिरे से नदारद क्यों हैं जबकि आधुनिक आर्य भाषाओं में हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि पहले के आचार्य उल्टा बोल गए थे और अब उस उल्टेपन को निभाया जा रहा है. अब तो व्याकरण पढ़ने वाले छात्र भी पूछ बैठते हैं कि स्वरों में यह ‘ऋ’ कैसे खड़ा है. यह तो ‘र’ (व्यंजन) के साथ ‘इ’ (स्वर) जुड़ा हुआ है. यह कोई अलग ध्वनि कैसे है. वैसे भी भाषाविज्ञान बताता है कि भाषा का विकास कठिन ध्वनियों से आसान ध्वनियों की ओर होता है. आधुनिक आर्य भाषाओं ने संस्कृत की ध्वनियों को आखिर सरल बनाया ही है. संस्कृत की ध्वनियों के उच्चारण के लिए प्रशिक्षित जिह्वा की आवश्यकता रहेगी. कहा गया है कि संस्कृत भारत की लोकप्रिय भाषा है तब समाचार पत्र, टीवी सीरियल, फिल्में, लोकगीत आदि संस्कृत में क्यों नहीं हैं? इस पुस्तक की विशेषता इस बात में भी है कि डॉ. राजेंद्र ने भारतीय भाषाओं की कई गुत्थियों के सिरे पकड़ कर सवाल पूछे हैं.

पुस्तक की लेखन शैली स्पष्टतः किसी विद्यार्थी के नोट्स लेखन जैसी है जिन्हें क्रमबद्ध तरीके से संख्या दे कर लिखा गया है. सिंधुघाटी, मौर्य काल, वैदिक काल, शुंग-गुप्त काल, मध्य काल पर और भाषाओं के इतिहास पर उनकी समीक्षात्मक टिप्पणियाँ आपको मिल जाएँगी. जैसे-जैसे पाठक पुस्तक पढ़ता जाता है उसके भीतर प्रश्न उभरने लगते हैं और कई तरीके से उत्तर भी मिलते जाते हैं. पुस्तक एक निरंतर मुआयना और गहरी पड़ताल है जो इतिहास की बहुत सी असंगतियों और विसंगतियों को लाल पेन से रेखांकित करती है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी की विशेषता यह है कि वे इमानदारी से सवाल उठा रहे हैं और अपने तर्क भी दे रहे हैं जिससे पाठक को यह फायदा होता है कि उसके मन-मस्तिष्क की कई अनजानी खिड़कियां और दरवाजे खुलने लगते हैं.

'इतिहास का मुआयना' पढ़ने के बाद इतना दावा किया जा सकता है कि यदि यह पुस्तक नवल वियोगी जैसे इतिहासकार के हाथों से गुज़री होती तो उनकी क्रांतिकारी पुस्तक 'प्राचीन भारत के शासक नाग - उनकी उत्पत्ति और इतिहास' का रूप-स्वरूप कुछ और ही होता.

पुस्तक के प्रकाशक और विक्रेता का पता नीचे दिया गया है. पुस्तक संग्रहणीय है. इतिहास, भाषा, भाषा-विज्ञान और  साहित्य के जिज्ञासु छात्र ज़रूर पढ़ें और खरीद कर पढ़ें.

 




पुस्तक - इतिहास का मुआयना
लेखक - डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह
प्रकाशक - सम्यक प्रकाशन, 32/3, पश्चिम पुरी,
नई दिल्ली-110063
मूल्य : Rs.120/-
(मोबाइल - 9818390161, 9810249452)



29 December 2019

National poet Kabir - राष्ट्रकवि कबीर


कबीर एक फैलता हुआ फिनॉमिना रहा है इसमें संदेह नहीं. पूर्वी उत्तरप्रदेश से यह पूरे भारत में फैला. उत्तर पश्चिम भारत में इसे फैलाने का कार्य ख़ासकर नाथपंथियों ने किया. लेकिन कबीर केवल भारत में ही नहीं रुका. कबीर पर विदेशियों की पारखी नज़र पड़ी और वे कबीर का अनुवाद करके उसे अपने यहाँ ले गए.

मार्को डेला टोम्बा (1726 - 1803) सबसे पहले इटैलियन भाषा में इसका अनुवाद किया. फिर कबीर को इंग्लैंड और फ्रांस तक जाते देखा जा सकता है. इस कार्य की शुरुआत कैप्टन डब्ल्यू. प्राइस (1780 - 1830) और जनरल हैरियट (1780- 1839) के ज़रिए हुई. हैरियट ने 1832 में कबीर का फ्रेंच में अनुवाद किया. कबीर को वैज्ञानिक नज़रिए से पढ़ने-गुनने का काम एच. एच. विल्सन ने किया. विल्सन (1786- 1860) पूर्वी जीवन-दर्शन को समझते थे. 1828 तथा 1832 में उनका किया कार्यहिंदू सैक्ट्सशीर्षक से एशियाटिक रिसर्चिज़ में छपा.

ऊपर उल्लिखित विद्वानों की सामग्री के आधार पर गार्सां तासी ने फ़्रैंच भाषा में पहला हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा. उनकी पुस्तक "इस्त्वार लितरेत्यूर ऐंदूई ऐंदूस्तानी" (प्रथम भाग 1839, दूसरा भाग 1847) प्रकाशित हुई. इस पुस्तक में कबीर को तुलसी दास के मुकाबले डेढ़ गुणा अधिक स्थान दिया गया. जब भारत के हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वाले लोग कबीर को मुश्किल से ही स्थान दे रहे थे तब विदेश में कबीर का बेहतर मूल्यांकन हो रहा था. कबीर को पाठ्यक्रमों में शायद ही कहीं जगह मिल रही होगी. सिखों के पवित्र ग्रंथ (1604) श्री गुरुग्रंथ साहिब में कबीर है लेकिन तुसलीदास नहीं है. इस ग्रंथ का जब अन्य भाषाओं में अनुवाद (अर्नेस्ट ट्रंप, 1877 और मैक्स आर्थर मेकलिफ, 1909)  हुआ तो कबीर की ओजस्वी वाणी कई अन्य देशों में पहुँची. यह कार्य अठारवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में बढ़ता दिखता है. जर्मन प्रोफेसर अर्नेस्ट ट्रंप जब कबीर की कुछ कविताओं का अनुवाद जर्मन भाषा में कर रहे थे लगभग उसी समय दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश (1875) में कबीर के बारे में जो लिख रहे थे वह कबीर की सच्चाई से बहुत दूर था. ज़ाहिर है कि भारत में एक मानसिकता ऐसी भी थी जो कबीर पर अनुसंधान की राह में रोड़े अटका रही थी. कबीर के बारे में जो कार्य आधुनिक शिक्षा कर रही थी उसे लेकर वो मानसिकता गालियाँ बक रही थी. मध्ययुगीन साहित्य के चिंतक कवियों में से सबसे अधिक कार्य कबीर पर ही हुआ है. गुई सोरमन ने तो अपनी 2001 में प्रकाशित पुस्तकदि जीनियस ऑफ़ इंडियामें कबीर को राष्ट्रकवि कहा है. यह साहित्य और आलोचना साहित्य में एक बड़ी घटना है. ज़ाहिर है कबीर राष्ट्रनिर्माता हैं.

ऊपर दी गई सभी जानकारियाँ श्री सुभाष चंद्र कुशवाहा की पुस्तक "कबीर हैं कि मरते नहीं" (2020) में मिलती हैं जो अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज से छपी है. किताब में उन्होंने कबीर से जुड़ी अनेक गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास किया है - मिसाल के तौर पर कबीर का जन्म और मृत्यु, कबीर के माँ-बाप और धर्म, उनके गुरु की गुत्थी आदि. लेखक ने 19 सदी के विदेशी अखबारों में छपे लेख और समाचारों का सिलसिलेवार विवरण प्रस्तुत किया है. ऐसा विवरण अभी तक किसी आलोचक ने नहीं प्रस्तुत किया है.

सुभाष चंद्र कुशवाहा ने लिखा है कि 1841 से कबीर के बारे में ब्रिटिश अखबारों में लेख और समाचार छपने लगे थे. उन्होंने इस संदर्भ में ब्राडफोर्ड ऑर्ब्ज़वर (9 सितंबर 1841) को उद्धृत किया है, जिसमें . लंगलोज का लंबा लेख है और लंगलोज ने इस लेख में कबीर को भारत का महान समाज सुधारक और 15 वीं सदी का नायक कहा है. फिर तो आलोचक ने 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 20 वीं सदी के पूर्वार्द्ध के अनेक ब्रिटिश अखबारों के अनेक पन्नों को प्रस्तुत किया है. कोई दो दर्जन अखबारों का हवाला है, जिनमें कबीर से संबंधित लेख हैं, खबरें हैं.

एलेन्स इंडियन मेल (2 नवंबर, 1848), अर्मघ गार्डियन (1 जनवरी, 1853), मार्निग एडवर्टाइजर (10 मार्च, 1865), दि स्काॅटमैन (5 जुलाई, 1872), बरमिंघम डेली पोस्ट (15 अगस्त, 1879), डंडी एडवर्टाइजर (30 नवंबर, 1881), दि होमवर्ड मेल (23 जनवरी, 1882), लंदन डेली न्यूज (24 मार्च, 1883), यार्कशायर गज़ट (17 जून, 1893) और दि पाॅल माॅल गजट (18 अक्तूबर, 1894) से लेकर शेफिल्ड डेली टेलीग्राफ (3 अप्रैल, 1915), ग्लोब (24 अप्रैल, 1915), दि लीड मरक्यूरी (20 मार्च, 1930) तथा लीवरपूल इको (14 अप्रैल, 1942) तक दो दर्जन पश्चिम के अखबारों का हवाला है. पश्चिम के वे अखबार जिनमें कबीर मौजूद हैं. कहीं कबीर की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद है, कहीं उन पर लेख है, कहीं कबीर पंथ की जानकारी है, कहीं डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर की पुस्तक की समीक्षा है, कहीं रुडयार्ड किपलिंग लिखित कबीर का गीत प्रसंग है और कहीं रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा अंग्रेजी में अनूदित कबीर की कविताओं की खबरें हैं.

यह नए साल 2020 में कबीर का नए परिप्रेक्ष्य में स्वागत है.

(पुस्तक का परिचय कराने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह का हृदय से आभार)