22 September 2018

Megh Chetna - मेघ चेतना अप्रैल-जून 2018


ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका मेघ-चेतना का माह अप्रैल-जून 2018 का अंक ऑनलाइन प्रकाशित कर दिया गया है. यह निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है.

22 August 2018

कोली, कोरी, कोल- भारतीय मूलनिवासी कबीले

Repeated Post
English version 
(यह आलेख kolisamaj.org (http://www.kolisamaj.org/myhistory/historyofkolis.html) पर दिए एक आलेख के हवाले से है. उस डोमेन के मालिक ने अपन डोमेन नेम बिक्री पर लगा दिया है. इसलिए उक्त लिंक पर वह आलेख अब नहीं दिख रहा है. इंटरनेट पर लिंक गुम होते रहते हैं.)

पठानकोट से मेरे एक अनजाने मित्र (जो इस बीच पुराने मित्र हो चुके हैं) प्रीतम भगत ने मोबाइल पर बताया कि बुद्ध की माता कोली (कोरी) समुदाय से थीं. मेरी दिलचस्पी बढ़ी. इस बात की खोज करते हुए नेट पर एक ऐसे आलेख तक पहुँचा जो कोली समुदाय के बारे में था. इस आलेख की शुरुआत एक जाने-पहचाने वाक्य से हु थ कि - हम कौन हैं? मेरे पुरखे कौन थे? वे कहाँ से आए थेवे कैसे रहते थे?’ मैं यहाँ उक्त आलेख के कुछ अंश ही दे रहा हूँ. पूरा आलेख कोली समुदाय के इतिहास का बढ़िय़ा लेखा-जोखा देता है.

यह देखने वाली बात है कि कोली समुदाय भी अपना इतिहास सिंधुघाटी सभ्यता के उसी ज़माने में ढूँढता है जहाँ आज के लगभग सभी वंचित समुदाय पहुँचते हैं. इससे इतिहास समझी जाने वाली उस पौराणिक कथा का गुब्बारा फट जाता है कि तथाकथित असुरों, राक्षसों (सिंधुघाटी सभ्यता के मूलनिवासियों) और सुरों (जो यूरेशिया से वाया रान यहाँ आए थे) के बीच कोई सौहार्दपूर्ण समझौता हुआ था. यह वास्तव में एक लंबे युद्ध और संघर्ष के बाद की भीषण त्रासदी थी जो भारत में ग़ुलामी प्रथा की सच्चाई कहती है.

ऐसी पौराणिक कहानियाँ हैं जो संकेत करती हैं कि सुरों ने असुरों को गुलाम बना लिया था. ये वही गुलाम लोग हैं जो विभिन्न जातियाँ में बाँट दिए गए थे और वे जातिप्रथा (श्रमिकों/कमेरों का वर्गीरण) समाप्त करने के लिए आज तक संघर्षशील हैं. जातिप्रथा का अर्थ ही यही है कि किसी की जाति जानों और उसे उठने से रोकने के लिए पूरा ज़ोर लगा दो. इन्हें अन्य पिछड़े वर्गअनुसूचित जातियाँ और अनुसूचित जनजातियाँ कहा जाता है. इन्हें मानवाधिकारों के बारे में जानकारी कम ही है. यह तथ्य है कि भारत के मूलनिवासी गुलाम बना लिए गए थे और सदियों से वे अमानवीय स्थितियों में रहने के लिए मजबूर किए गए हैं. इनकी अधिकतर आबादी गाँवों में रहती है. अगडी जातियाँ शेष विश्व क भारत की ऐसी तस्वीर दिखाती हैं मानो भारत से गुलामी मिट गई है. समता आ गई है. छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है आदि. लेकिन यह सच्चाई से बहुत है. दुनिया तथ्यों को जानती-समझती है.

इस बीच एक ब्लॉगर डोरोथी ने अपने एक कमेंट के द्वारा बताया था कि पूर्वी भारत की कोल जनजाति भी अपना उद्गम सिंधुघाटी सभ्यता को मानती है. इस बारे में मुझे एक लिंक मिला- दि इंडियन नसाइक्लोपीडिया जिसे इस आलेख में 'Other Links’ के अंत में दिया गया है. इसमें पर्याप्त व्याख्या है. 

कोलीकोरी और कोल भारत के मूलनिवासी हैं. आर्यों (ब्राह्मणों) से पहले वे इस भूमि पर बस चुके थे. जब मूलनिासी युद्ध में हार गए तब आगे चल कर उन्हें अलग-अलग नाम और व्यवसाय दिए गए. उन्हें अलग-अलग जाति कहा गया. उनसे शिक्षा का अधिकार छीन लिया गयाआज देश में लोकतंत्र होने के बावजूद ये अभी इतने अशिक्षित और इतने दबाव में रहे हैं कि अपनी सामाजिक और राजनीतिक एकता और सत्ता में भागीदारी के बारे में बड़ी सोच तक नहीं पहुँच पाए हैं.

ख़ैर! मेघवालबुनकरमेघभगतजुलाहाअंसारी, पंजाब के कबीरपंथी आदि समुदायों की भाँति कोली और कोरी भी पारंपरिक रूप से जुलाहे हैं. सरकारी नीतियों और औद्योगीकरण के कारण इनका ह पारंपरिक व्यवसाय तबाह हो चुका है और वे आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए हैं. ्रामीण क्षेत्रों में इनकी एक बड़ी आबादी गरीबी और कुपोषण की शिकार है. इन्हें बहुत कम वेतन पर रोज़गार दिया जाता है. बेगार (Forced labor) के तौर पर कार्य करना इनके लिए कोई नई बात नहीं है(कोल शब्द अफ़्रीकी मूल का माना जाता है. ऐसा प्रतीत होता है कि कोली शब्द कोल से ही बना है). ख़ैरआप इस आलेख के अंश पढ़ना जारी रखें और इन विश्वसनीय तथा प्यारे कोली/कोरी लोगों के बारे में जाने.

(विशेष नोट - इस आलेख में कुछ मिथकीय पात्रों के नाम है जैसे - वाल्मीकि, राम आदि जिनका अस्तित्व ऐतिहासिक दृष्टि से विवादित है. कुछ अन्य बातें भी हैं जिन्हें इतिहास की नई खोजों और पुरातत्व की कसौटी पर कसने की आवश्यकता है. इसके बावजूद यह आलेख पठनीय है.)


अशोक महान कोरी कबीले से थे
कोली (Story Of India’s Historic People - The Kolis)
एक समय आता है जब हममें से प्रत्येक व्यक्ति पूछता है, ‘मैं कौन हूँ? मेरे पुरखे कौन थे? वे कहाँ से आए थे? वे कैसे रहते थे? उनकी बड़े कार्य क्या थे और उनके सुख-दुख क्या थे?’ ये और अन्य कई मूलभूत सवाल हैं जिनके बारे में हमें उत्तर पाना होता है ताकि हम अपने मूल को पहचान सकें.
भारत के मूलनिवासी कबीलों के बारे में अध्ययन करते हुए हमारे विद्वानों ने अति प्राचीन रिकार्ड और दस्तावेज़ – वेदपुराणविभिन्न भाषाओं के महाकाव्यकई पुरातात्विक रिकार्ड और नोट्स और कई अन्य प्रकाशन देखे हैं.
इतिहास और एंथ्रपॉलॉजी के विद्यार्थियों ने प्रागैतिहासिक (Pre-historic) और भारत के स्थापित इतिहास में भारत के इस प्राचीन कबीले का चमकता अतीत पाया है और लगातार चल रही खोज में और भी बहुत कुछ मिल रहा है.

यह आलेख गुजराती में लिखे मुख्यतः तीन प्रकाशनों पर आधारित है. भारत का एक प्राचीन कबीला – कोली कबीले का इतिहास – इस पुस्तक का संपादन श्री बचूभाई पीतांबर कंबेद ने किया था और भावनगर के श्री तालपोड़ा कोली समुदाय ने प्रकाशित किया था (पहला संस्करण 1961 और दूसरा संस्करण 1981)1979 में बॉम्बे समाचार में प्रकाशित श्री रामजी भाई संतोला का एक आलेख और डॉ. अर्जुन पटेल द्वारा 1989 में लिखा एक विस्तृत आलेख जो उन्होंने 1989 में हुए अंतर्राष्ट्रीय कोली सम्मेलन में प्रस्तुत करने के लिए तैयार किया था.

भगवान वाल्मीकि और उनकी रामायण

प्राचीनतम राजा मन्धाताएक सर्वोपरि और सार्वभौमिक राजा था जिसका प्रताप भारत में सर्वत्र था और जिसके शौर्य और यज्ञों की कथाएँ मोहंजो दाड़ो (मोहन जोदड़ो) के शिलालेखों पर अंकित हैंवे इसी कबीले के थे. प्राचीनतम और पूज्य ऋषि वाल्मीकि जिन्होंने रामायण लिखी वे इसी कबीले से थे. महाराष्ट्र राज्य में आज भी रामायण को कोली वाल्मीकि रामायण कहा जाता है. रामायण की शिक्षाएँ भारतीय संस्कृति का आधार हैं. 

ईश बुद्ध
ईश बुद्ध की पत्नी कोली कबीले से थी. महान राजा चंद्रगुप्त मौर्य और उसके कुल के राजा कोली कबीले के थे. संत कबीरजो पेशे से जुलाहे थेके कई भजनों में लिखा है- कहत कबीर कोरी”, उन्होंने स्वयं को कोरी कहा है. सौराष्ट्र के भक्तराज भदूरदास और भक्तराज वलरामजूनागढ़ के गिरनारी संत वेलनाथजीभक्तराज जोबनपगीसंत श्री कोया भगतसंत धुधालीनाथमदन भगतसंत कंजीस्वामी जो 17वीं और 18वीं शताब्दी के थेये सभी कोली कबीले के थे. उनके जीवन और ख्याति के बारे में 'मुंबई समाचार', 'नूतन गुजरात', 'परमार्थआदि में छपे आलेखों से जानकारी मिलती है.
महाराष्ट्र राज्य में शिवाजी के प्रधान सेनापति और कई अन्य सेनापति इसी कबीले के थे. ‘A History of the Marathas’ (मराठा इतिहास) मुख्यतः मवालियों और कोलियों से भरी शिवाजी की सेना का शौर्य गर्वपूर्वक कहता है. शिवाजी का सेनापति तानाजी राव मूलसरे जिसे शिवाजी हमेशा मेरा शेर कहा करते थेएक कोली था. जब तानाजी कोडना गढ़ को जीतने के लिए लड़ी लड़ाई में शहीद हुआ तो शिवाजी ने उसकी स्मृति में उस किले का नाम बदल कर सिंहाढ़ रख दिया.  
सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्रम में बहुत सी कोली महिला योद्धाओं ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के प्राण बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनमें एक उसकी बहुत करीबी साथी थी जिसका नाम झलकारी बाई था. इस प्रकार कोली समाज ने देश और दुनिया को महान बेटे और बेटियाँ दी हैं जिनकी शिक्षाओं का सार्वभौमिक महत्व और प्रासंगिकता आज आधुनिक जीवन में भी है.

हमारे प्राचीन राजा मन्धाता की कथा
ओंकारनाथेश्वर में मन्धाता मंदिर

कहा जाता है कि श्री राम का जन्म मन्धाता के बाद 25वीं पीढ़ी में हुआ था. एक अन्य राजा ईक्ष्वाकु सूर्यवंश के कोली राजाओं में हुए हैं अतः मन्धाता और श्रीराम ईक्ष्वाकु के सूर्यवंश से हैं. बाद में यह वंश नौ उप समूहों में बँट गयाऔर सभी अपना मूल क्षत्रिय जाति में बताते थे. इनके नाम हैंमल्लाजनकविदेहीकोलिएमोर्यालिच्छवीजनत्रीवाज्जी और शाक्य.
पुरातात्विक जानकारी को यदि साथ मिला कर देखें तो पता चलता है कि मन्धाता ईक्ष्वाकु के सूर्यवंश से थे और उसके उत्तराधिकारियों को सूर्यवंशी कोली राजा के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि वे बहादुरलब्ध प्रतिष्ठ और न्यायप्रिय शासक थे. बौध साहित्य में असंख्य संदर्भ हैं जिससे इसकी प्रामाणिकता में कोई संदेह नहीं रह जाता. मन्धाता के उत्तराधिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और हमारे प्राचीन वेदमहाकाव्य और अन्य अवशेष उनकी युद्धकला और राज्य प्रशासन में उनके महत्वपूर्ण योगदान का उल्लेख करते हैं. हमारी प्राचीन संस्कृत पुस्तकों में उन्हें कुल्याकुलिएकोली सर्पकोलिककौल आदि कहा गया है.

प्रारंभिक इतिहास  बुद्ध के बाद
वर्ष 566 ई.पू. के दौरानजब हिंदू धर्म निर्दयी हो चुका था और पूर्णतः पतित हो चुका थातब राजकुमार गौतम जिसे बाद में विश्व ने बुद्ध (the enlightened one) के रूप में जाना, का जन्म उत्तर-पश्चिमी भारत में हिमायलन घाटी में रोहिणी नदी के किनारे हुआ. ईश बुद्ध की माता महामाया एक कोली राजकुमारी थीं.
ईश बुद्ध की शिक्षा को ऊँची जाति के हिंदुओं के निहित स्वार्थ के लिए ख़तरे के तौर पर देखा गया. शीघ्र ही बुद्ध की शिक्षाओं को भारत से पूरी तरह बाहर कर दिया गया.
ऐसा प्रतीत होता है कि कोली साम्राज्यों का बुद्ध से संबंध और प्रेम होने के कारण उन्हें सबसे अधिक अत्याचार सहना पड़ा. यद्पि अधिकतर लोगों ने बौध शिक्षा को नहीं अपनाया था लेकिन अन्य ने उन्हें दूर किया और शासकों ने भी उनकी उपेक्षा की.

ईश बुद्ध के 2000 वर्ष बाद
इस संघर्ष ने कोली साम्राज्यों को बहुत हानि पहुँचाई होगी. ऐसा प्रतीत होता है कि बहुत ही क्लिष्ट हिंदू समाज में पदच्युति के बाद कभी बहुत शक्तिशाली रहा यह कबीलाजो बहुत परिश्रमीकुशलनिष्ठावान्आत्मनिर्भर साथ ही आसानी से भड़क कर युद्ध पर उतारू होने वाला थाअपनी केंद्रीय स्थिति खो बैठा. एक समाज जिसने अपनी देवी मुंबा देवी के नाम से मुंबई की स्थापना और निर्माण किया उसे आज राजनीतिक और शिक्षा की प्रभावी स्थिति में आना कठिन हो गया है. अब तो कई शताब्दियों से अन्य कबीलों ने इसे नीची नज़र से देखा और इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव इस समस्त क्षत्रिय समुदाय को तबाह करने वाला था.

वर्तमान

महाराष्ट्र के कोली मछुआरे

आज के भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक कोली पाए जाते हैं और क्षेत्रीय भाषा के प्रभाव के कारण उनके नाम तनिक परिवर्तित हो गए हैं. कुछ मुख्य समूह इस प्रकार हैंकोली क्षत्रियकोली राजाकोली राजपूतकोली सूर्यवंशीनागरकोलीगोंडाकोलीकोली महादेवकोली पटोल, कोली ठाकोरबवरायाथारकर्ड़ापथानवाडियामइन कोलीकोयेरीमन्धाता पटेल आदि.
भारत के मूलनिवासी कबीले के तौर पर खुले कृषि भू-भागों और समुद्र तटीय क्षेत्रों में रहने को पसंद करने वाला यह क्लैन्ज़मन है. आज के कोली कई कबीलाई अंतर्विवाहों से हैं. अनुमान लगाया गया है कि जनगणना में 1040 से भी अधिक उप-समूह हैं जिन्हें एक मुश्त रूप से कोली कहा जाता है. हिंदू होने के अतिरिक्त इन अधिकांश समूहों में सामान्य कुछ नहीं हैऔर कि ऊँची जाति के हिंदुओं यह स्वीकार करते हैं कि कोली स्पर्श से वे भ्रष्ट नहीं होते और शुद्ध वंश के कोली मुखियाओं की क्षत्रिय राजपूतों से अलग पहचान करना कठिन है जिनके साथ उनके नियमित अंतर्विवाह होते हैं.  

गुजरात के कोली
लेखक द्वय अंथोवन और डॉ. विल्सन मानते हैं कि गुजरात में मूलरूप से बसने वाले कोली और आदिवासी भील थे. रायबहादुर हाथीभाई देसाई पुष्टि करते हैं कि यह 600 वर्ष पूर्व शासक वनराज के समय में था. गुजराती जनसंख्या में बिल्कुल अलग जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले या तो वैदिक हैं या द्रविडियन हैं. इनमें नागर ब्रह्मणभाटियाभडेलाकोली, राबरीमीणाभंगीडुबलानैकडाऔर मच्छी खारवा कबीले हैं. मूलतः पर्शिया से आए पारसी बहुत बाद में आए. शेष आबादी मूलनिवासी भीलों की है.

गुजरात के भील
डाँडी मार्च
जब बापू (एम.के. गाँधी) 9 जनवरी 1920 को दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो उनके साथ वहाँ जो लोग थे वे भी लौट आए. बापू को हमारे लोगों के चरित्र के बारे में व्यक्तिगत जानकारी थी. इसलिए जब 1930 के डाँडी मार्च के स्थान का निर्णय करने का समय आया तो डाँडी को चुना जाना अचानक नहीं हुआ क्योंकि उस समय कई विकल्प थे और अन्य स्वार्थी पक्षों का दबाव भी था. बापू किसी परियोजना को सफलतापूर्वक पूरा करने में हमारे लोगों के साहस और गहरी समझ से संतुष्ट थे. और यह प्रमाणित भी हो गया.

निष्कर्ष
अपनी वर्तमान स्थिति के लिए हम उच्च जातिओं पूरी तरह दोष नहीं दे सकते. इतिहास में यह होता आया है कि कभी शक्तिशाली रहे लोग पतन को प्रात हुए और पूरी तरह अदृश्य हो गए या अकिंचन बना दिए गए. इस संसार में जहाँ योग्ययतम की जीत का नियम है वहाँ लोगों को महान प्रयास करने होते हैं और कुर्बानियाँ देनी होती हैं ताकि वे बुद्धिमान नेतृत्व में एक हों और फिर से इतिहास लिखना शुरू करें.
हमारे पास हज़ारों स्नातक और व्यवसायी हैंउच्च योग्यता वाले डॉक्टरडेंटिस्टवकील और कुशल टेक्नोक्रैट हैं जो भारत और अन्य देशों में रह रहे हैं. वे सभी अपनी कुशलता का प्रयोग पैसा बनाने और भौतिक पदार्थों और अन्य छोटे सुखों के लिए कर रहे प्रतीत होते हैं. भौतिक सुविधाएँ आवश्यक हैं परंतु हमारी प्राथमिकता अपने धर्मसंस्कृति और परंपरा को बचाने की भी अवश्य होनी चाहिए.
हमारी वर्तमान पीढ़ी के संपन्न लोग स्वयं को अपने समाज के मशालची के तौर पर देखें और ऐसे सभी प्रयास करें कि आपसी संवाद स्थापित होएकता हो और अपने अतीत के गौरव को पुनः प्राप्त करने की ज़बरदस्त शक्ति बना जाए. अब यह हमारे लिए चुनौती है.  

पूरे आलेख (अँग्रेज़ी) के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें http://www.kolisamaj.org/myhistory/historyofkolis.html

(नोट - जहाँ तक इतिहास का संबंध है मेरा विचार है कि हम उसे पौराणिक कथाओं के साथ जोड़ने लगते हैं जबकि हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि वैज्ञानिक खोज पर आधारित इतिहास पर ही भरोसा करें.)

मेघवंश एक सिंहावलोकन : लेखक आर. पी. सिंह (पीडीएफ पाठ)



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16 August 2018

The Trails of Part Payment - टूटी रकम के निशान

श्री राजकुमार भगत
वे कभी भी हमें पाँच हज़ार रुपए इकट्ठा नहीं देते थे. उस समय उस पाँच हज़ार की बहुत कीमत होती थी. वे कभी हमें पाँच हज़ार रुपए इकट्ठे नहीं देते थे तो हम चलते कैसे? यह पहली बात. दूसरी बात यह है कि हमारी बिरादरी में हमें गाइड करने वाला या जागरूक करने वाला कोई भी नहीं था. यदि किसी आदमी के सामने कोई लक्ष्य हो तो उसे प्राप्त करे. हमारे सामने तो कोई लक्ष्य ही नहीं था. अंधेरा ही अँधेरा था. कोई बताने वाला नहीं था कि बेटा तुम यह करो, तुम इधर चलो. सबसे पहले 1-2 लोगों को इस कार्य (सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट बनाने) का तजुर्बा था मैंने भी 1970 में दसवीं पास की थी. तब हमारे पास ना तो पढ़ने के लिए पैसा था और ना ही कोई कामकाज शुरू करने के लिए. दिन में कुछ काम करके जैसे-तैसे ईवनिंग कालेज में और प्राइवेट पढ़ता रहा और बीए किया. दूसरी दिक्कत थी कि हमारे यहाँ टांग खींचने वाले लोग भी थे. फिर हम सर्जिकल में ही आए. जहां तक मुझे याद है उस समय हमारी मेघ बिरादरी में तकरीबन 35 से 40 कारखाने थे. वहां पर सर्जिकल का सामान बनता था. उन लोगों में से कुछ का काफी नाम था उनमें से एक नाम श्री रामचंद साणा (A machine used for sharpenig and polishing ) वाला था. मेरे पिता श्री चूनीलाल साणा वाला, मेलाराम साणा वाला कर्मचंद साणा वाला, रतनलाल साणा वाला, बाबा साणा वाला जैसे बहुत बढ़िया लोग थे जिन्होंने साणा का कार्य किया. ये सभी अनपढ़ थे. मेरे पिताजी भी अनपढ़ थे. जितनी उनको समझ थी उसके अनुसार उन्होंने हमें पढ़ाया-लिखाया और हम यहाँ तक पहुँच सके. आगे चलकर हमारे कामकाज की लाइन इस तरह ख़त्म हुई कि हमारा अपना कोई कामकाज नहीं था लेकिन जिन लोगों का हम जॉब वर्क करते थे वे कभी भी हमें इकट्ठी पेमेंट नहीं करते थे जो कभी 5000 रुपए भी होती थी. वे उस रकम को तोड़ कर देते थे ताकि कहीं हम बड़ी रक़म मिलने पर बेहतर कामकाज शुरू न कर लें जिससे हमारी माली हालत ऊपर न उठ जाए. आज हालत यह है कि जिस जगह पर बस्तियों में सर्जिकल का काम किया जाता था वहां जो मजदूर काम करते थे उनका काम खत्म हो चुका है. जो 2-4 बड़ी फैक्ट्रियां थीं वो भी खत्म हो चुकी हैं. क्योंकि मालिक कभी भी हमें पूरी पेमेंट इसलिए नहीं करते थे कि कहीं हमारे पास इकट्ठी रक़म ना आ जाएं और हम कहीं अपना काम धंधा शुरू ना कर लें. पहली बात तो यह. दूसरी बात है कि जैसे ही हफ़्ता ख़त्म होने पर लेबर उनसे अपनी महीने की पगार ₹400 रुपए मांगते थे तो वो 300 देते थे. दूसरे जब उन्हें पगार देते थे तो वो कहते थे कि आ जाओ, वहां से जा कर के शराब पकड़ लाओ और वह 10-15 रुपए की शराब वहां से खरीद लेते थे. मालिक लोग भी पीते थे और मजदूरों को भी पिलाते थे. अगले दिन मजदूरों को पता ही नहीं होता था कि उन्होंने कमाया क्या और खाया क्या. कहने का मतलब यह है कि मालिकों ने उन मजदूरों की आँखें कभी खुलने ही नहीं दीं. यह हाल था. सर्जिकल और स्पोर्ट्स के काम में दूसरी बिरादरियों के यहाँ काम करने वाले हमारे 90 फीसदी लोगों को ऐसे-ऐसे नशों की लत लगा दी गई थी कि वे पैसा अपने घर दे ही नहीं सकते थे जिससे उनका परिवार पलता. घर मर्द और औरत दोनों से चलता है. औरत को आप पैसे नहीं देंगे तो घर कैसे चलेगा. अब भगतों के पास स्पोर्ट्स का काम ही नहीं है. सर्जिकल के काम को आप एक परसेंट गिन सकते हैं. बाकी उनकी हालत आप समझ सकते हैं. यह भी एक कारण था कि जालंधर में सर्जिकल की इतनी मार्कीट थी जो पाकिस्तान के स्यालकोट जैसी थी लेकिन अब हमारे उन कारखानों का नामोनिशान ख़त्म हो गया है. अब दो-चार पार्टियाँ हैं जो पाकिस्तान से इम्पोर्ट कर रही हैं. वही माल बेच रही हैं. यों समझ लीजिए के डेढ़ घर भगतों का है मतलब एक कुछ अधिक मँगवाता है और दूसरा कुछ कम. बाकी नॉन-भगत हैं, वो भी 5-7 ही हैं. वो भी कुछ खास नहीं हैं. पहले यहां कोई 90 पार्टियाँ थीं जो सप्लायर थीं. सप्लायर भी दसेक रह गए हैं. लाइन ही ख़त्म हो गई. स्पोर्टस के सामान का भी कुछ ऐसा ही हाल रहा. वहाँ भी भगत ही मज़दूर थे जो महाजनों के यहाँ काम करते थे. उन्होंने भी इनको कभी सीधे होने ही नहीं दिया. हमारी बाँह पकड़ने वाला कोई नहीं था. मुझे उस काम से बाहर हुए 25-26 साल हो चुके हैं. 1986 के आसपास मैंने वो लाइन छोड़ दी थी. क्योंकि उससे रोटी भी नहीं चलती थी. हर हफ्ते 5-6 (हज़ार) का माल दिल्ली में बेचने निकलते थे. उससे पूरी नहीं पड़ती थी. फिर मैंने वो लाइन छोड़ दी. लगभग 15 साल कमीशन एजेंट का काम किसी पार्टी के पास किया. वो पार्टी भगत नहीं थे. लेकिन उनके साथ अच्छे संबंध थे. पड़ोसी थे. प्रेम प्यार था. उन्हीं से उधार लेकर स्कूटर लाइन में चला गया. जहाँ मैंने 27-28 साल काम किया. तब तक मेरी उम्र भी 50 की हो गई थी. फिर सोचा कि कब तक गाड़ियों में धक्के खाएँगे. फिर कुछ प्रेरणा सी हुई और हालात ऐसे बनते चले गए कि अब मैं 1994 से लोकल जालंधर में ही कार्य कर रहा हूँ. लेकिन स्कूटरों के उस काम के तजुर्बे से ही सीख कर मैंने स्कूटर पार्ट्स का काम छोड़ दिया और पेंटिंग के काम की ओर चला गया. आजकल यही काम कर रहा हूँ और दाल-रोटी सोहणी चल रही है. यदि आप पूछें कि वो (पुरानी)लेबर अब क्या करती है? सर्जिकल और स्पोर्ट्स का काम खत्म हुए अब 35 साल के लगभग हो चुके हैं. एक जेनरेशन का गैप पड़ गया है. अब तक उनमें से कई मर चुके हैं. एकाध आदमी मैंने देखा है रेहड़ी लगाता है. जालंधर भार्गो कैंप में जो इन कामों में लगे चार-पाँच बड़े लोग थे उनमें से भी एक आध ही बचा है. बाकी खत्म हो गए. हमारे जो सियासतदाँ थे उन्होंने भी लोगों को रास्ता दिखाने के लिए कोई कोशिशें नहीं कीं. न उन्होंने कोई सेमिनार वगैरा कराए. जागरूकता लाने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया. नौजवानों में जागरूकता तो आज भी नहीं है. एक दौर आया था जब भार्गों कैंप के 10वीं पास हमारे बच्चे बैंकों में भर्ती हुए. काफी एलआईसी जैसी कंपनियों में भर्ती हुए. तब आवाज़ें लगा-लगा कर उन्हें बुलाया गया था. वो एक आँधी आई थी. अब वो अब खत्म हो चुकी है. तब भर्ती हुए लोगों में से अधिकतर रिटायर हो चुके हैं. अब हरेक आदमी तो अपने बच्चों को अमेरिका नहीं भेज सकता. जहाँ तक लोगों को गाइडेंस देने के लिए सेमिनार कराने का सवाल है भार्गों कैंप में एक लड़का आया था, राजकुमार. उसे पता नहीं प्रोफेसर कहते हैं. उसने अपनी आर्गेनाइज़ेशन भगत महासभा के ज़रिए दो-चार सेमिनार कराए और काम करने की कोशिश की थी. लेकिन ऐसे कामों के लिए बहुत पैसा चाहिए होता है. अगली जेनरेशन के लिए अलग तरह के मौके होंगे. उन्हें उत्साहित करने की ज़रूरत है. लेकिन बड़े पैमाने पर उसकी तैयारी करने के लिए दस साल का समय लग सकता है. जो लीडरी करना चाहता हो वो अपनी बिरादरी को आगे नहीं ले जा सकता. जो समाज के लिए कुछ करना चाहता है उसे पहले समाज सेवक होना होगा. ऐसे समाज सेवकों की बड़ी तादाद में ज़रूरत है जो हमारे लिए काम कर सकें. हमारे बच्चे अभी इस हालत में भी नहीं हैं कि वे जानकारियों के उन सोर्सिस तक पहुँच सकें जहाँ से उन्हें सही गाइडेंस मिल सकती है. यदि हम उन्हें 25 फीसदी बता दें तो बाकी 75 फीसदी वे ढूँढ लेेगे. लेकिन अभी तक हमने उन्हें 5 फीसदी भी नहीं बताया. जो परिवार पढ़ लिख गए हैं उन्होंने अपनी आने वाली पीढ़ियों का कुछ उद्धार कर लिया है. घर का अच्छा माहौल भी इसमें बहुत पार्ट प्ले करता है. लेबर क्लास के पास तो बच्चों के लिए टाइम ही नहीं बचता. वे अच्छा पढ़ाई का माहौल भी नहीं दे पाते. एक और बात को ठीक से समझ लेना ज़रूरी है कि हम किसी से कम नहीं हैं. मेरे व्यवसाय के कारण मेरी डीलिंग करोड़ोंपति लोगों से होती है. मध्यप्रदेश में, महाराष्ट्र में. वे सभी हमेशा भगत जी कह कर बुलाते हैं. वे भगत के साथ हमेशा जी लगा कर बोलते हैं. हमें अपने समाज का सम्मान करना सीखना चाहिए. उसकी प्रशंसा करना सीखना चाहिए. हमारे समाज के लोगों ने घर से बाहर निकल कर बहुत काम किया है और बड़े ओहदों पर जा कर बहुत नाम कमाया है. वे इंजीनियर और एमडी हुए हैं.
राजकुमार भगत, विर्क एनक्लेव, जालंधर

06 August 2018

Waiting for Mega Transformation - मेघ-परिवर्तन की प्रतीक्षा में

वैसे तो हर समाज जैसे-जैसे फैलता है वैसे-वैसे वो कई आधारों पर बँटता भी जाता है जैसे कि नाम, रूप, रंग, एरिया, धर्म-डेरे, राजनीतिक पार्टी वगैरा के आधार पर.

मेघ समाज भी इस फैलाव और बिखराव की प्रक्रिया से गुजरा है. मेघ, भगत और कबीरपंथी तीन नाम दिमाग़ को झल्लाने के लिए काफी हैं. एक समय था जब मेघों की इस बदलाव की प्रक्रिया के सारे स्विच आर्यसमाज के हाथों में थे जिसने इनकी मौजूदा बनावट में अहम रोल निभाया. फिर भी, यह देख कर हैरानी होती है कि मेघों की बहुत बड़ी, कहते हैं कि, लगभग 70% आबादी राधास्वामी मत में दाखिल हो गई. आर्यसमाज से अलग होकर उन्हें क्या मिला इस पर जितनी चाहे माथापच्ची की जा सकती है लेकिन इसे तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक विभिन्न धार्मिक पंथों के जात-पात विरोधी स्टैंड की भाषा को अच्छे से पढ़ नहीं लिया जाता. इस मामले में राधास्वामी मत का बैनर बहुत बड़ा था.

आर्यसमाज ने अपने धार्मिक-सामाजिक रूप-रंग के सहारे राजनीति में पैठ बनाई लेकिन सामाजिक आंदोलन के क्षेत्र में वह पिछड़ता रहा. यह बात मेघ समाज के संदर्भ में कही जा रही है. दूसरी ओर कबीरपंथ नामक सामाजिक आंदोलन इस समाज में पहुंचा और काफी तेजी से फैला. राधास्वामी मतावलंबियों की भी इसमें भूमिका रही क्योंकि यह मत संतमत की शाखा माना जाता है और भगत नामकरण की वजह से मेघों को उसमें संतमत की पहचान स्थापित नज़र आई. वैचारिक रूप से कबीर की छवि को अपनाने में न उन्हें दिक्कत हुई और न ही अधिक मशक्कत करनी पड़ी. वैसे भी शुरुआत से ही कबीर एक फैलता हुआ फिनॉमिना (असाधारण घटना) है. यही कारण है कि जालंधर के भार्गो कैंप में स्थित कबीर मुख्य मंदिर पर विभिन्न सियासी दलों की नज़र जमी रहती है. 

मेघों की सियासी समझ पहले के मुकाबले बढ़ी है लेकिन अभी उसे परिपक्व नहीं कहा जा सकता है. उन्होंने अपना एक आज़ाद उम्मीदवार जिताने के लिए सफल कोशिश नहीं की. इसके कई आयाम है. पहली बात यह कि यदि सियासी पार्टियों वाली राजनीति करनी है तो बहुत-सा धन और अन्य संसाधन चाहिएँ. मेघों के पास जो है वो नाकाफी है. लेकिन जिन लोगों के पास कुछ संसाधन है उन्हें सियासी दल अपनी दावत में शामिल कर लेते हैं विशेषकर तब जब वे सियासी समझ ना रखते हों लेकिन दावत में कंट्रीब्यूटरी कर सकते हों. उसे पार्टी फंड कहते हैं.

हमारे समाज के बहुत से पढे-लिखे लोग राजनीति और समाज सेवा में लगे हैं लेकिन उनके पास संसाधनों की कमी है. बेहतर होता कि समाज के धन्नासेठ उनकी ग्रूमिंग का प्रबंध करते. कभी लगता है कि ऐसा कुछ कार्य शुरू तो हुआ है. मेघों की सियासत की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उनके पास संख्या बल नहीं है कम से राजनीतिक पार्टियाँ ऐसा ही मानती हैं. पंजाब में वे कुछ लाख हैं. इस स्थिति को देखते हुए यह जागृति बहुत पहले आ जानी चाहिए थी कि उनके नेता अन्य समुदायों के साथ कारगर राजनीतिक संबंध बनाते. सामाजिक संबंधों की शुरुआत हो चुकी है.

इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जब तक हम दो-चार राजनीतिक विचार इकट्ठे करते हैं तब तक पॉलिटिकल पार्टियां बहुत-सी नई जानकारियाँ और आँकड़े बटोर चुकी होती हैं. फिर भी अपने माज़ी (अतीत) से सीखिए. अतीत अपना इतिहास दोहराता है और तब तक दोहराता रहता है जब तक आप उससे सीख लेकर अपना वर्तमान और भविष्य बेहतर ना बना लें. लेकिन सीखने की गति भी तेज़ होनी चाहिए.