16 August 2019

भाषाशास्त्र में समाजशास्त्र की मिलावट है - Philology is adulterated with Sociology

कहते हैं कि माँ बोली (मातृभाषा) सबसे मीठी और प्यारी भाषा होती है. जब भाषाविज्ञान की कक्षाओं में पढ़ाया गया कि संस्कृत उत्तर भारत की सब भाषाओं की जननी है और बाकी सब भाषाएं भ्रष्ट (अपभ्रंश) भाषाएँ हैं तो अजीब-सा लगा था. पंजाबी को जिस वर्ग में रखा गया उस वर्ग का नाम ही ‘पैशाची’ रखा गया. कारण समझ में नहीं आता था कि देश भर की इतनी भाषाओं का अपमान करने की ऐसी क्या जरूरत पड़ गई. क्या ‘संस्कृत से इतर’ भाषाएँ या ‘भारत में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाएँ’ कह कर नहीं पढ़ाया जा सकता था? वैदिक संस्कृत का भी विकास हुआ है. कालिदास आदि की उस विकसित संस्कृत को ‘अपभ्रंश संस्कृत’ कहने की युक्ति और उक्ति नहीं सूझी और न ही हिंदी साहित्य को ‘अपभ्रंश साहित्य’ कहा गया.

पिछले कुछ वर्षों के दौरान भाषा विज्ञान में नई खोजों के सदके जानकारी में आया कि संस्कृत भारत की सब भाषाओं की तो क्या किसी एक अन्य भाषा की भी जननी नहीं है. प्राकृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा प्रमाणित हो चुकी है जिसकी बोलियों में पाली, मागधी आदि आती हैं. इस निष्कर्ष पर पहुँचाने वाले ऐतिहासिक और पुरातत्त्वशास्त्रीय (आर्कियॉलोजिकल) संदर्भ और प्रमाण उपलब्ध हैं.

भारत की अन्य भाषाओं के लिए पूर्ववर्ती भाषा विज्ञानियों ने हीनार्थक शब्दों का प्रयोग क्यों किया? कहीं उन शब्दों में सामाजिक संरचना में व्याप्त उच्चता-हीनता की भावना का कोई कोड (कूट) तो नहीं था या यह किन्हीं भाषाओं में शूद्रता स्थापित करने की युक्ति तो नहीं थी?

पिछले दिनों डॉ.राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र’ पढ़ी. भाषा का समाजशास्त्र इस बात का जवाब दे रहा है कि मागधी प्राकृत के साथ संस्कृत के आचार्यों ने दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया है. वास्तव में भाषाई स्थापनाओं (उदाहरण के लिए ‘अपभ्रंश भाषा’ जैसी स्थापना) के कुछ विकृत रूप इतने अधिक प्रचारित कर दिए गए हैं कि उनमें कुछ भी नया जोड़ना या उसमें सुधार की बात उठाना हो तो बहुत से तार्किक सबूतों की ज़रूरत होती है. इसकी भी जांच करनी होगी कि संस्कृत के नाटकों में निम्न श्रेणी के पात्र और महिला पात्र प्राकृत में और उच्च श्रेणी के पात्र संस्कृत में ही क्यों बात करते हैं. पात्रों के बीच भाषा की यह दूरी क्या संकेत करती है इसकी ईमानदार व्याख्या होनी चाहिए.

भाषा में निहित समाजशास्त्र को समाजशास्त्र के नज़रिए से ही परखना पड़ेगा कि वो ‘तत्सम’ और ‘तद्भव’ वाला मकड़जाल क्या है. कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘तद्भव’ शब्द ही वास्तव में ‘तत्सम’ हैं और उन्हें संस्कृत में अनूदित करके उनके संस्कृत रूप को ‘तत्सम’ बता दिया गया हो?

भारत में मुंडा भाषाओं का अपना एक परिवार है जिसमें लैंगिक नस्लवाद नहीं है यानि उनमें प्रत्येक शब्द का लिंग निर्धारण नहीं किया जाता. लेकिन संस्कृत और उसके संपर्क में आई भाषाओं में यह घुसा है. “ईंट या कंप्यूटर ऐसी चीजें नहीं है जिनकी पूँछ उठाकर उनका लिंग निर्धारण किया जाए कि यह शब्द पुलिंग है या स्त्रीलिंग.” 

डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह का यह स्पष्ट मत है कि ‘धातुओं का निर्णय शब्दों को मथने के बाद किया गया है. यानी शब्द उसकी धातु की खोज से पहले विद्यमान थे. इसलिए शब्दों की बनावट की व्याख्या करने वाला ‘धातु’ नामक तत्त्व प्राकृतिक नहीं, कृत्रिम है.’

समाजशास्त्रीय संदर्भों में संस्कृति और अतीत का गौरव उन लोगों के लिए आकर्षण का विषय हो सकता है जिनको व्यवस्था ने बहुत सुख सुविधाएं दे रखी थीं और दी हुई हैं. वंचित लोग किसी सांस्कृतिक गौरव को नहीं ढोते. वे तिरस्कार को ढोते रहे हैं.

जहाँ तक शब्द भंडार का सवाल है पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार और रंगकर्मी बलवंत गार्गी ने एक बार कॉफी पीते हुए मुझे कहा था कि ‘किसी गाँव में तरखाण (बढ़ई) के पास जाओ. वो बताएगा कि कौन-सी लकड़ी की किस गंध को क्या कहते हैं’. इससे ही अहसास हो जाता है कि बढ़ई के पास जो शब्द भंडार है वो संस्कृत और नागर संस्कृति वाली साहित्यिक भाषाओं में नज़र नहीं आता. दरअसल वो भाषाएँ श्रमसंस्कृति के शब्द भंडार के मुकाबले बहुत दरिद्र हैं. ज़़रा दिमाग़ पर ज़ोर डालिए और बताइए कि बढ़ई या तरखाण (कारपेंटर) को संस्कृत में क्या कहते होंगे?

संस्कृत की धारा से अलग विकसित भारत की मुख्य भाषाओं के लिए ‘अपभ्रंषता’ की हीन दृष्टि क्यों? मूल पंजाबी भाषा का पता पूछना हो तो वह साहित्यक पंजाबी में या पंजाबी व्याकरण की किताबों में नहीं मिलेगा. उसे बहुत ध्यानपूर्वक पंजाब के रोज़मर्रा के ग्रामीण जीवन में प्रयुक्त शब्दों और ध्वनियों में से चुन-चुन कर इकट्ठा करना पड़ेगा. इस विषय में कार्य करते हुए आप जल्दी ही जान जाएँगे कि पंजाबी संस्कृत और पर्शियन से प्रभावित तो हुई है (उनके कई शब्द यहाँ बस गए हैं) लेकिन पंजाबी का मूल स्वरूप प्राकृत और पाली भाषा वाला है. तुहाड्डा (तुम्हारा), थोड्डा (तुम्हारा) शब्द इसके उदाहरण हैं. पंजाबी में दुद्द (जिसे ‘दुद’ की तरह भी उच्चारित किया जाता है) बोलना पारंपरिक रूप से आसान है. दुग्ध नकली शब्द है लेकिन पढ़ाया यह गया कि दुग्ध से बिगड़ कर दुद्द हो गया है. संस्कृत के ‘दुग्ध निर्मित’ शब्द और ‘दुद्दों बण्या’ (दूध से बना) या ‘दुद्द तों बण्या’ (दूध से बना) शब्दों का विकास एक ही पटरी पर नहीं है. ‘दुग्ध निर्मित’ की पटरी अलग है. पंजाब की बोलियों के मूल में बैठे प्राकृत और पाली के शब्द ही ‘तत्सम’ हैं, इसमें संदेह कैसा?

(इस आलेख का प्रेरणा स्रोत डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र है.’ डॉ. सिंह का हृदय से आभार.)

यह लिंक भी देखें :-


10 August 2019

Megh, Meghs and Many Meghs - मेघ, मेघ और मेघम्मेघ

मेघ रेस के बारे में जानकारी जैसे-जैसे बढ़ी उसे इस ब्लॉग पर एकत्रित किया जाता रहा, जैसे कि जम्मू से लेकर कर्नाटक तक मेघ रेस के लोग बसे हुए हैं. मेघवारों के इतिहास से पता चला कि मेघ रेस के लोग बिहार में भी रह रहे हैं. कर्नल कन्निंघम से पता चला कि मेघ नॉर्थ-ईस्ट में भी हैं. जानकारी इकट्ठा करके ब्लॉग लिखता हूं क्योंकि जिज्ञासु शायद उन्हें पढ़ने आ जाते हैं.

दूसरी ओर यह भी दिखता है कि सोशल मीडिया पर लोग इस चीज को लेकर बहस करते हैं कि क्या वाकई ‘मेघ’ एक रेस है? क्या अन्य प्रदेशों में बसे हुए मेघ, मेघवाल और मेघवार लोग एक ही रेस के हैं? बसह करने वालों को इस बात की भी तकलीफ़ होती है कि जो लोग राजस्थान से पंजाब में आकर बसे हैं और जिन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र मिलता है क्या वे भी मेघ हैं या कोई और हैं? कई बार सोशल मीडिया पर उनकी बहस बेस्वादी हो जाती है. वे मामले को कोर्ट तक ले जाने की बातें करने लगते हैं. उनकी मर्ज़ी. इस बहस के पीछे विषय की जानकारी का अभाव हो सकता है. उस अभाव की पृष्ठभूमि में गरीबी (poverty), भौगोलिक दूरी (distance), अनपढ़ता (illiteracy) और गतिहीनता (immobility) दिख सकती है.

पिछले दिनों रतन लाल गोत्रा जी से बातचीत हो रही थी तो उन्होंने लगभग 20 साल पुरानी एक बात सुनाई. उनका छोटा भाई अपने बिज़नेस के सिलसिले में अनंतनाग जाया करता था जहाँ से वो क्रिकेट बैट बनाने में इस्तेमाल होने वाली विल्लो लकड़ी मँगवाता था. लकड़ी बेचने वालों का एक बड़ा बुज़ुर्ग वहाँ बैठा रहता था. उसने बताया था कि ‘हमारे बुज़ुर्ग जुलाहे थे और हमारे गोत्र आपके (मेघों के) गोत्रों जैसे हैं. हम यहाँ कसबी कहलाते हैं. मुसलमान बनने के बाद हमें यहाँ की मुस्लिम परंपरा के अनुसार कसबी कहा जाने लगा. आप हमारे अपने ही बंदे हो’. उस बुज़ुर्ग का अपना गोत ‘गोत्रा’ था. जम्मू के श्री दौलतराम (कुमार ए. भारती के पिता जी) जो भारत विभाजन के बाद दिल्ली में रिसेटलमेंट अधिकारी के तौर पर कार्य कर चुके थे, ने रतन लाल गोत्रा जी को बताया था कि ज़िला मीरपुर (मुज़फ्फ़राबाद के पास) के इलाके के कसबी हमारे ही लोग हैं. (कसबी फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ हैः- कारीगर artisan, शिल्पी  artificer, व्यापारी trader). कहने का भाव यह कि धर्म परिवर्तन के कारण नाम बदल सकते हैं लेकिन पुरखों की परंपरा एक ही रह सकती है. हाँ, नाम बदल जाने से पहचान कुछ कठिन हो जाएगी. शब्दों का खेल बहुत टेढ़ा है. नाम या उसकी भाव आधारित ध्वनि बदलने से, शब्दों के अनुवाद या अनुसृजन से, क्षेत्र बदलने से, बस्ती, खेत, मैदान, पहाड़, नदी, जंगल, व्यवसाय आदि बदलने से पहचान बदल सकती है. मनुस्मृति ने व्यवसाय बदलने की गुंजाइश पर पाबंदी लगा दी थी इसलिए व्यवसाय आधारित जाति की वही पहचान चलती रही जब तक कि जातियों के भीतर विभाजन करके उनके खंडों को अलग-अलग नाम नहीं दे दिए गए. इसलिए अपने मूल की पहचान को समझते हुए चलना एक ज़रूरत हो सकती है. 


इस बारे में मैंने जो पहले लिखा है उसे दोहरा रहा हूं कि राजस्थान की ओर से आए हुए जो मेघ रेस के लोग अबोहर-फाजिल्का के इलाके में बसे हुए हैं वो हजारों की तादाद में हैं. उनका जाति संबंधी फैसला राजनीतिक निर्णय के तहत पहले से हो चुका है और उन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र कई दशाब्दियों से दिया जा रहा है. मेरा विचार है कि यह बात बहुत स्पष्ट है और विधि सम्मत भी.

02 August 2019

Megh Organisations, Siwan (Kaithal) - मेघ संगठन, सीवन (कैथल)

पिछले दिनों सुनने में आया था कि भगत महासभा नामक संगठन ने पेहोवा, हरियाणा में समुदाय का सम्मेलन किया था. संगठन के तौर पर भगत महासभा का हरियाणा में यह पहला सम्मेलन था. उसी कार्यक्रम में फैसला किया गया कि अगला कार्यक्रम मेघ जन की बड़ी आबादी वाले शहर सीवन में 28-7-2019 को किया जाएगा.

समझ नहीं आता कि इसे इत्तेफाक कहा जाए या पहचानने की चूक कि 28 जुलाई 2019 को सीवन के जिस सम्मेलन में हम पहुंचे वह भगत महासभा का था जिसमें इस सभा के ऑल इंडिया प्रेसिडेंट राजकुमार प्रोफेसर खुद मुख्य अतिथि थे. बैनर पर उस दिन की तारीख के साथ "आर्य (मेघ) सभा सीवन और मेघ महासम्मेलन" लिखा था. भगत महासभा की इकाई यहां सक्रिय थी जिसने यह कार्यक्रम आयोजित किया था. जो मेहरबान मुझे चंडीगढ़ से सीवन ले गए थे उनके साथ मैं सबसे अगली पंक्ति के कोने में बैठ गया. वहाँ से बिना रुकावट बने फोटो लिए जा सकते थे. थोड़ी देर के बाद भगत महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार अपनी टीम आई जिसमें जम्मू, पंजाब, हरियाणा से कई और 1-2 राजस्थान से आए हुए सज्जन थे. उनके गले में हार थे और उन्होंने अगली कतार में बैठे हम सभी से प्रेम पूर्वक हाथ मिलाया. फिर उसके बाद हमें डिस्टर्ब किए बिना उनकी टीम के लिए सबसे आगे कुर्सियों की कतार लगाई गई. एक गणमान्य सज्जन ने मुझे भी आगे की कतार में आने के लिए कहा. मैंने मना किया. ('वहां गले में हार पड़ने का खतरा है,'' यह बात मैंने धीरे से अपने प्रिय मित्र ओमप्रकाश गडगाला जी के कान में कही थी. तब तक हमारे लिए "जाते थे जापान पहुँच गए चीन" जैसी स्थिति थी. 

कार्यक्रम शुरू होने पर अतिथियों का परिचय दिया गया तब स्पष्ट हो गया कि कार्यक्रम का आयोजन भगत महासभा की पेहोवा-सीवन की स्थानीय इकाई ने किया था. चंडीगढ़ से चल कर सीवन के ओम पैलेस में जा बैठने तक मुझे जिस आयोजक संस्था के आयोजन स्थल के पते के बारे में जो पता था उसका पता भी यही था (वेरी सॉरी कह रहा हूँ). यहां ऑल इंडिया मेघ सभा की सीवन शाखा के कार्यकर्ता मौजूद थे. सब को एक साथ देख कर मुझे अच्छा ही लगा.

एक बात शुरू में कहता चलूं कि हॉल पूरा भरा हुआ था (लगभग तीन-चार सौ की केपेसिटी रही होगी). महिला सहभागियों का काफी संख्या में आना उत्साहवर्धक था. महिलाओं की सहभागिता और ज़्यादा होनी चाहिए. मंच पर केवल डायस और माइक था और मंच संचालक की कुर्सी थी. वक्ता लोग श्रोताओं के साथ या आगे की कतार में बैठे थे. नाश्ते और भोजन का भी अच्छा प्रबंध था.

भगत महासभा जम्मू में सक्रिय सामाजिक संगठन है. पंजाब में इसकी गतिविधियां समय-समय पर देखी गई हैं. वक्ताओं ने इस अवसर पर जो कहा उसका सार नीचे दिया गया है :-

मेघ समाज के लोग एक गत्यात्मक (डायनेमिक) संगठन की जरूरत महसूस करते हैं जो सारे मेघ समाज को (इस संदर्भ में जम्मू, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़) में वैचारिक और संगठनात्मक नेतृत्व दे सके. मेघ समाज विभिन्न स्थानों पर विभिन्न नामों में बंटा हुआ है. जैसे मेघ, भगत, आर्य मेघ, आर्य भगत, कबीरपंथी, जुलाहा आदि. धर्म के नजरिए से मेघ आर्यसमाजी, कबीरपंथी, सिख, राधास्वामी, निरंकारी, सनातनी, डेरे, गद्दियां आदि में बँटे हुए दिखते हैं. वक्ताओं ने अपने समुदाय में शिक्षा के प्रसार के लिए और अधिक जोर देने के साथ-साथ धार्मिक नजरिए से बंटे दिख रहे समाज को सामाजिक संगठनों के माध्यम से इस प्रकार जोड़े रखने की जरूरत पर बल दिया कि समाज अपनी राजनीतिक आवश्यकताओं के लिए हर हाल में इकट्ठा रहे. धार्मिक और राजनीतिक विचारधाराएं जो समाज की एकता को खंडित करती हैं उसके बारे में समुदाय को शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाए ताकि अपेक्षित सियासी लाभ मिल सके. इस संदर्भ में एक वक्ता ने 'मेघ-धर्म' का भी उल्लेख किया जिसकी अवधारणा (कन्सेप्ट) की व्याख्या ज़रूरी है (इस बारे में सोशल मीडिया पर काफी बहस हो चुकी है.)

जो मेघ छात्र शहरों में पढ़ने जाते हैं उनके रहने की व्यवस्था के लिए धर्मशालाएं बनाने की बात उठी. लुधियाना में उपलब्ध ऐसी धर्मशाला का उदाहरण दिया गया. सीवन में किए जा रहे ऐसे प्रयास की जानकारी दी गई जिसका मामला काफी आगे तक पहुँचा हुआ है.

कुछ वक्ताओं ने बताया कि समाज के लोग अक्सर पूछते हैं कि मेघ कौन होते हैं. कई वक्ताओं ने अपने-अपने तरीके से इसका उत्तर दिया. एक वक्ता ने कहा कि 3000 साल पहले हमारे मकान पक्के होते थे, आज बहुत से मकान कच्चे हैं. ऐसा क्यों और कैसे हुआ इसकी संक्षेप में जानकारी दी गई.

पूर्व एमएलए श्री बूटा सिंह ने कहा कि लगभग सभी सामाजिक संगठनों के संविधान में लिखा रहता है कि यह संगठन गैर-राजनीतिक है जबकि सच्चाई यह है कि बिना राजनीतिक (सरकारी) सहायता के समाज का विकास बेहतर तरीके से नहीं हो पाता. राजनीतिक पार्टियों के नाम पर समाज बंट जाता है. दरअसल जरूरत इस बात की होती है कि किसी राजनीतिक पार्टी से टिकट प्राप्त उम्मीदवार को सामाजिक संगठनों के समर्थन की जरूरत होती है और सामाजिक संगठनों की इसमें समुचित सहभागिता होनी चाहिए. (उनका इशारा इस ओर था कि सामाजिक संगठन बिना अपने संविधान का उल्लंघन किए भी वातावरण बनाने और वोट मोबिलाइज़ करने का कार्य कर सकते हैं और प्रेशर ग्रुप (दबाव समूह) बन सकते हैं.)

जम्मू से आए एक प्रतिनिधि ने कहा कि संगठनों को अपने कार्य और कार्य प्रणाली में इतना मजबूत होना चाहिए कि राजनीतिक नेतृत्व को उनकी जरूरत महसूस हो. एक सुझाव यह था कि मेघ समाज के जम्मू, पंजाब और हरियाणा में बने सामाजिक संगठनों की एक कन्फेडरेशन बनाई जाए तो लाभ होगा.

भगत महासभा के अध्यक्ष श्री राजकुमार और ऑल इंडिया मेघ सभा के अध्यक्ष डॉ. सुरिंदर पाल, ऑल इंडिया मेघ सभा की सीवन शाखा के अध्यक्ष राजिंदर सिंह तहसीलदार ने अपने-अपने संगठनों के बारे में जानकारी दी और मेघ समाज के लिए निरंतर कार्य करते रहने का संकल्प दोहराया.

प्रमुख प्रतिनिधियों की सूची इस प्रकार है :-
(सर्वश्री) बोध राज भगत (राष्ट्रीय उपाधयक्ष, भगत महासभा  जम्मू कश्मीर) पवन भगत (चेयरमैन), मोहिंदर भगत (प्रदेश अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर), तरसेम भगत (सहअध्यक्ष), सीता राम भगत, जय भगत, नरेश भगत, सुशील भगत, भगत महासभा पंजाब के प्रदेश अधयक्ष, राजेश भगत (राजू), प्रो रंजीत भगत, रमेश परम्मानन्द, मोहन लाल हैप्पी, सत पाल भगत, विनय भगत, कुलदीप भगत, दर्शन डोगरा, संतोख भगत, डॉ ध्यान सिंह भगत और भक्ष्य नंद भारती (राजस्थान). अंत में अलग-अलग राज्यों से आए मेघ समाज के प्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया और स्मृतिचिह्न भेंट किए गए. (इस अवसर पर कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की गई थी तथापि यह नामों की ऊपर दी गई सूची जम्मू से प्रकाशित न्यूज़ पोर्टल  www.earlyindianews.com से ली गई है जिसका लिंक यहाँ है.)












31 July 2019

A matter for consideration - मुद्दा तवज्जो के लिए

ख्यालों के जंगली घोड़ों को बाँधना नहीं चाहता. मुद्दा बार-बार किसी बहाने से सामने आ जाता है इस लिए यह नोट तैयार करके कुछ लोगों को विचारार्थ दिया है. बाकी समय बताएगा.

जब हमारे मेघ समाज के सबसे पहले शिक्षित हुए दो-एक लोगों मे से एक एडवोकेट हंसराज भगत और अन्य प्रबुद्ध जनों ने मेघ समुदाय को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने के लिए महत्वपूर्ण प्रयत्न किए थे तब की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां आज की परिस्थितियों से इस मायने में अलग थीं कि उस समय ‘अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)’ की सूचियाँ बनाने की कोई बात नहीं हो रही थी. अपने समाज के लिए कुछ राजनीतिक और आर्थिक सुविधाएँ  जुटाने के लिए हंसराज भगत के प्रयासों के बाद सर छोटूराम की सरकार का लिया गया फैसला उचित ही था कि आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन और सामाजिक व्यवस्था द्वारा सीमाओं में बाँधे गए मेघों को अनुसूचित जातियों की सूची में रखा गया. भूलना नहीं चाहिए कि मेघों के अत्यंत खराब आर्थिक और सामाजिक हालात का मुख्य कारण जम्मू में फैली प्लेग की महामारी और अकाल की स्थितियाँ भी रहीं. अंग्रेज़ों के शासन के दौरान औद्योगीकरण ने मेघों को भी बड़े पैमाने पर बेरोज़गार कर दिया. मेघ कृषक, कृषि श्रमिक और बुनकर रहे हैं.

मेघ कब से बुनकरी का कार्य कर रहे हैं इसकी ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती. लेकिन इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि यह समाज कभी क्षत्रिय रहा है. ये प्रमाण पौराणिक कहानियों और इतिहास दोनों में मिल जाते हैं.

आज की स्थिति यह है कि मेघ कबीरपंथी भी हैं जो एक सामाजिक आंदोलन का प्रभाव है. हथकरघा (खड्डियों) का व्यवसाय बर्बाद हो जाने के बाद वे कई अन्य व्यवसायों में भी गए. मेघ कबीर की वाणी से जुड़े रहे हैं क्योंकि अपने व्यवसाय की झलक उन्हें कबीर की वाणी में मिलती थी. कई मेघ पंजाब के सेंसस रिकॉर्ड में कबीरपंथी के तौर पर दर्ज हैं.

यह सवाल मेघ (भगत, कबीरपंथी) समुदाय के लोगों के ज़ेहन में उठता रहा है कि क्या वे ओबीसी के लिए क्वालीफाई करते हैं विशेषकर कबीरपंथी नाम के तहत? कई शिक्षित मेघजनों यह मानते हैं कि यदि अनुसूचित जातियों की सूचियाँ बनाते समय ओबीसी के वर्गीकरण का विकल्प उपलब्ध रहा होता तो एडवोकेट हंसराज भगत पंजाब की मेघ जाति को उसी में शामिल करने की सिफ़ारिश करते. लेकिन उन्होंने मेघों के अत्यधिक आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के कारण उस समय अनुसूचित जातियों में उन्हें रखे जाने का विकल्प चुना जिसमें कुछ आर्थिक सुविधाएँ संभावित थीं.

उसके बाद के समय में मेघों को सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का लाभ मिला है और उनमें एक मध्यम वर्ग उभरा है. यह वर्ग अनुसूचित जाति का कहलाने से बहुत सकुचाता है लेकिन नौकरी या कोई अन्य लाभ पाने के लिए वो जाति प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करता है. वो यह चाहता है कि किसी तरह ‘अनुसूचित जाति’ नाम की पहचान से पीछा छूटे. इस समान्यतः शिक्षित वर्ग में सामाजिक और राजनीतिक जागृति आई है. उनके परिवारों से अन्य जातियों में शादियाँ होती हैं. इस वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी है. लेकिन जो इनके स्तर तक नहीं पहुँचे और जिनकी संख्या काफी अधिक है, उनका क्या? 

जो मेघ गाँवों में रह रहे हैं उनकी संख्या बड़ी है. उन्हें जाति का डंक अधिक झेलना पड़ता है. वे पर्याप्त रूप से जागरूक, शिक्षित और संगठित नहीं हैं. उनका प्रतिनिधित्व करने वाला कोई मज़बूत बुद्धिजीवी वर्ग नहीं मिलता. लेकिन कई शहरों में मेघों के छोटे-छोटे सामाजिक संगठन हैं जिन्हें उनकी बात करनी चाहिए. सोचा जाना चाहिए कि क्या वो अति पिछड़े हुए मेघ समाज के लोग आरक्षण का लाभ उठाने की हालत में हैं? ज़मीनी सच्चाई यह है कि एक तरफ उनका शिक्षा का स्तर बहुत कम है और दूसरी तरफ़ सरकारी नौकरियाँ लगभग ख़त्म हो चुकी हैं. जो बचा-खुचा आरक्षण है उसके प्रावधानों को अदालतों के फैसलों ने इतना कमज़ोर कर दिया है कि वे कारगर नहीं रहे. प्राइवेट सैक्टर में आरक्षण की बात अभी दूर की कौड़ी है.

तुलना करें तो पंजाब में अनुसूचित जातियों के लिए जो आरक्षण के प्रावधान हैं उनके तहत कुछ विशेष जातियों में एक विशेष अनुपात में वो आरक्षण बाँट दिया गया है. ओबीसी को प्रोमोशन में आरक्षण नहीं मिलता. दूसरी तरफ पिछले कई दशकों से कई हथकंडे अपना कर अनुसूचित जातियों के लिए प्रोमोशन के रास्ते बंद ही किए गए हैं. प्रोमोशन में आरक्षण से संबंधित उच्चतम न्यायालय के आदेशों को लागू न होने देने के पीछे प्रशासनिक कारण हो सकते हैं.

भारत के कई राज्यों के बुनकर और कृषि श्रमिक समुदाय ओबीसी में शामिल हैं. (उनकी सूचियाँ एकत्रित की जा सकती हैं). यह एक आधार है जिस पर मेघ समुदाय को ओबीसी में शामिल करने के लिए आवेदन किया जा सकता है. इससे पैदा होने वाले हालात में आरक्षण को लेकर कितना नफा-नुकसान होगा उसका सही आकलन तो नहीं किया सकता लेकिन सामाजिक स्टेटस में होने वाले परिवर्तन को आसानी से समझा जा सकता है. जाति व्यवस्था में जिस स्थिान को मेघ अपना समझते रहे हैं और जो उन्हें नहीं मिल पाया उसकी उपेक्षा कैसे की जा सकती है? मेघ जाति क्या है यह बात देश के भीतरी भागों (गाँवों) के लोग नहीं जानते लेकिन यदि उन्हें बताया जाए कि मेघ अनुसूचित जाति में आते हैं तो मेघों को उन जातियों के साथ जोड़ कर देखा जाता है जिनका हिस्सा वो हैं नहीं. गाँवों की यह स्थिति उनके मन में हीनता की भावना पैदा करती है. यदि मेघ जाति ओबीसी में शामिल हो जाती है तो कई दुराग्रहपूर्ण स्थितियों से निजात मिल सकेगी.

एक बात और भी. हम अपनी मौजूदा हालत में अक़सर संतुष्ट हो चुके होते हैं. उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन की आहट से हम आशंकित हो उठते हैं. लेकिन जहाँ हम हैं वहाँ तो हैं ही, बस, उससे थोड़ा बेहतर हो जाए तो वो ज़रूर बेहतर ही होगा उसके लिए कोशिश होनी चाहिए.

कबीर के संदर्भ

पढ़ी-लिखी जमात में कबीर एक समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए जिनका मुख्य कार्य हिंदू धर्म में फैले जातिवाद का विरोध था. जातिवाद को चुनौती देने वाले कई संतजन जान पर खेल गए. 

लगभग सभी ओबीसी जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) या शब्दों का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें जुलाहे, कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली आदि. इसी आधार पर कबीर का महिमा मंडल 'दलित साहित्य' की सीमाएँ तोड़ कर 'ओबीसी साहित्य' तक पहुँचा है. यानी कबीर को अब ओबीसी का प्रतिनिधि साहित्यकार कहा जाता है.

मेघ सदियों से कपड़ा बुनने का कार्य करते आ रहे हैं. वे कबीर की वाणी से इस आधार पर भी प्रभावित रहे हैं कि कबीर ने जो अध्यात्म की शिक्षा दी वो कपड़ा बनाने के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (शब्दों) के साथ भी थी.



विशेष नोट
मेघ समाज के लोग चाहे किसी भी नाम से अपनी पहचान रखते हों (जैसे मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा, आर्य, पंजाबी जाट आदि) लेकिन वे अनुसूचित जाति के तौर पर अपनी जातीय पहचान से हर तरह से असंतुष्ट हैं. वे ओबीसी के तौर पर अपनी पहचान को बेहतर पाएँगे ऐसा कई मेघजनों का मानना है. यह नोट कई लोगों से विचार-विमर्श के बाद बनाया गया है जो समझते हैं कि मेघ समाज को ओबीसी में शामिल करने के लिए कोशिश अवश्य की जानी चाहिए. यह नोट केवल मेघ समाज के भीतर विचार-विमर्श के लिए तैयार किया गया है. - भारत भूषण, चंडीगढ़)