17 August 2016

Choose right direction – सही दिशा चुनें

भाजपा ने गुजरात में मोदी जी के विकास माडल को बहुत ज़ोर-शोर से प्रचारित किया है तो दूसरी ओर कई जाने-माने अर्थशास्त्रियों ने गुजरात माडल की जम कर आलोचना भी की है. आम आदमी स्थूल अर्थशास्त्र की सूक्ष्मताएँ नहीं जानता. वह इतना जानता है कि उसे कितना पैसा मिला और कि उसका गुज़ारा चल रहा है या नहीं. वह नहीं जानता कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकार अपनी नागरिक ज़िम्मेदारी निभा रही है या नहीं, या कि विकास के नाम पर कार्पोरेट्स को दिए गए संसाधनों का सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं.

गुजरात में इन दिनों गाय को लेकर एक सामाजिक उथल-पुथल हुई है. सामाजिक घृणा की शिकार कुछ जातियों ने पंरपरागत मृत पशुओं का चमड़ा निकालने का अपना पेशा छोड़ने का निर्णय लिया है. उनका भविष्य क्या होगा पता नहीं. अपने उस पेशे से अलग हो कर वे नए पेशे अपनाएँगे या उन्हें नए पेशे अपनाने दिए जाएँगे, इस पर बदमज़ा करने वाली बहसें सुनने में आ रही हैं. ऐसा क्यों हो रहा है?

भारत के लोगों ने खुद को दुनिया का बहुत बढ़िया कहा जाने वाला संविधान दिया है तो क्या वे उस संविधान को ज़मीन पर घटित होते देखना चाहते हैं? इस बारे में व्यक्त संशय पुराने हैं. कोई भी सत्ताधारी अपनी आर्थिक नीतियों को पूरे देश पर लागू करने की हालत में होता है. लेकिन आर्थिक नीतियाँ एकांत पर लागू नहीं होतीं. उनका असर सारे समाज पर पड़ता है. सारे का मतलब सारे. यानि अर्थव्यवस्था का पूरा योग-क्षेम, भला-बुरा अंततः समाज ने वहन करना होता है. यदि समाज उसे ढो नहीं पाता तो व्यवस्थाएँ टूटनी शुरू हो जाती हैं जैसा दुनिया का इतिहास बताता है. गुजरात में परंपरागत पेशों को छोड़ रही जातियों में एक बेचैनी बढ़ रही है जिसे देश के अन्य राज्यों में भी बारीकी से देखा जा रहा है. यह कभी बिस्फोटक हो सकता है.

देश में आज़माए गए विकास के माडल आखिर कहाँ चूक रहे हैं? भटकी हुई राजनीति उसका सही विश्लेषण क्यों नहीं कर पा रही? यह मोटा सिद्धांत है कि टिकाऊ विकास के लिए टिकाऊ समाज ज़रूरी होता है. समाज को टिकाऊ बनाना क्या राजनीति का पहला सामाजिक लक्ष्य नहीं होना चाहिए? आरएसएस से प्रेरित भाजपा सरकारें देश की सामाजिक बनावट को मज़बूत बनाती क्यों नहीं दिख रही हैं? ये बहुत गंभीर सवाल हैं. इस दिशा में असफलता का अर्थ होगा कि ये सवाल कल बवाल बन सकते हैं.

02 August 2016

A Hunter and a prey - एक शिकारी और एक शिकार

''जब तक हिरण अपना इतिहास खुद नहीं लिखेंगे तब तक हिरणों के इतिहास में शिकारियों की शौर्य गाथाएं गाई जाती रहेंगी'' : चिनुआ अचीबी (Chinua Achebe)

भारत के स्कूलों में पढ़ाया जाने वाला इतिहास चिनुआ अचीबी के बताए कटु सत्य का प्रमाण है. देवों का महिमागान, अतीत के किन्हीं हुए-अनहुए वैदिक राजाओं की प्रशंसा, उनकी आकर्षक और रोचक बातों से साहित्य भरा हुआ है और इतना कि अधिकतर वह गप शैली से हवा-हवाई हो गया है. उन कथाओं में हारते हुए, मरते हुए या नरक जाते हुए वही लोग हैं जो आज इतिहास की कक्षाओं में बैठे महसूस करते हैं कि पढ़ाए जा रहे इतिहास में उनके और उनके पुरखों के बारे में तो कुछ लिखा ही नहीं गया. 

शिक्षित होने के बाद अब भारत का वंचित समाज इस ओर ध्यान दे रहा है कि इतिहास कही जाने वाली उन पौराणिक कहानियों में प्रजा के विभिन्न समूहों का वर्णन तो है ही नहीं. कारीगरों, वास्तुशिल्पियों, हस्तशिल्पियों, किसान-कमेरों, समाज की महत्वपूर्ण घटक स्त्री आदि की वास्तविक हालत का विस्तृत बयान उनमें नहीं है. राजा की कहानी में इतना ज़रूर जोड़ा जाता है कि 'उसके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी'. लोगों को गुलाम बनाने के उस काल में गुलामों के साथ जो हिंसा और अत्याचार हुआ उसके बारे में इतिहास चुप रहता है. लेकिन धार्मिक ग्रंथ उसे 'सुर-असुर संग्राम' के रंगों में रंग कर सही और न्यायसंगत बताते चलते हैं, अभी तक बता रहे हैं. धार्मिक पुस्तकों के रूप में तब का संविधान लिखने, धर्म का प्रचार करने और इतिहास लिखने वाला शिकारी समूह एक ही था अतः पुरोहितों का गुणगान करना वह नहीं भूलता. तथापि, वह उस हिरण की बात नहीं करता जो गुलामों के रूप में उनके क्रूर हाथों में आ गया था. आरएसएस और उसकी राजनीतिक पार्टी भाजपा आज भी उस इतिहास-बोध का वहन कर रही है, प्लास्टिक सर्जरी से इंसानी बच्चे के सिर पर हाथी का सिर लगा रही है.

यह ऐसा इतिहास-बोध है जो महिलाओं और मेहनतकशों की स्थिति सुधारने की बात कर ही नहीं सकता. वह राजाओं जैसी ऐशपरस्ती और सामंतवाद जैसी हिंसक प्रवृत्तियों का साथ निभाता है. उसे पूरा विश्वास है कि यदि वह लोगों के हाथों में पढ़ने के लिए धार्मिक पुस्तकें और धार्मिक पोस्टर थमा दे तो उसका धंधा चलता रहेगा. उसे मुख्यतः पुरुषवादियों की ज़रूरत होती है स्त्रीवादियों की नहीं.

आप जब अपने जीवन स्तर को सुधारने की बात करेंगे तो उस इतिहास-बोध को धारण करने वाली वह राजनीति आपको सीमा सुरक्षा के लिए खड़े आपके जैसे भाइयों और उनकी राष्ट्रभक्ति देखने को कहेगी और आपको चुनौती देगी कि - "असली राष्ट्रभक्त कौन है, वो फौजी, या आप?" सामाजिक समस्याओं से उसका कोई ख़ास सरोकार नहीं. आपको डराने के लिए उसे बस इतना कहना है कि मुसलमान और ईसाई ख़तरनाक हैं. इससे उसे यह प्रचार करने में आसानी हो जाती है कि छुआछूत के लिए हिंदुत्व ज़िम्मेदार नहीं क्योंकि छुआछूत मुगलों के आने के बाद भारत में आई. सोशल मीडिया पर ऐसा प्रचार काफी हुआ है. लेकिन वे इस बात का जवाब नहीं देते कि 'मनुस्मृति' हज़रत मोहम्मद ने या ईसा ने लिखी थी क्या?

मतलब यह कि धर्म अपना एजेंडा कई प्रकार से आप पर थोपता है. आपको अपना कोई राजनीतिक एजेंडा बनाने ही नहीं देता. आप उलझे रहते हैं कि आपकी समस्या धर्म है या आपके परिवार का रोज़गार. आपकी समस्या ISIS है या लग़ातार घटती आपकी ख़रीदने की ताक़त, आपकी समस्या गो-माता है या महँगी होती शिक्षा या फिर आपकी समस्या पूजा-पाठ है या महँगी होती चिकित्सा. ़ाहिर तथ्य है कि आपकी नियति राजनीति निर्धारित करती है. कब तक हिरण बने रहोगे. जागो! डॉ. अंबेडकर का बताया इतिहास जानो. ख़ूब पढ़ो और ख़ुद भी लिखो. जागो और इतिहास के शिकारी बनो.


15 July 2016

Meghs and Kabir - मेघ और कबीर

ग़रीब का दिमाग़ स्वाभाविक रूप से ऐसा बन जाता है कि उसमें 'ईश्वर-परमेश्वर' नाम की खरपतवार स्वाभाविक रूप से फैल आती है. उसे रोज़गार देने वाला ऐसा ही चाहता है. इसकी वजह यह है कि उसे जो भी आशा की किरण नजर आती है वह इसी विचार में होती है कि कोई तो उसका ईश्वर, मालिक, स्वामी, रोज़गारदाता वगैरा है जो कभी--कभी उसकी सुनेगा और उसे सहारा दे कर बेहतर जीवन देगा. उसी विचार को बल देते हुए वह जीवन काटता है. कुछ मिला तो ठीक, नहीं तो न सही जबकि उसे यह समझने की ज़रूरत होती है कि उसके हालात को सरकारी नीतियाँ बदलती हैं और उस बदलाव का रास्ता राजनीति से हो कर ग़ुज़रता है.

कठिन जीवन में आँखें बंद करके मिलने वाला आध्यात्मिक आनंद उसे सुकून देता है. वंचित व्यक्ति ईश्वर, परमेश्वर, आध्यात्मिकता, आत्मा-परमात्मा के विचारों में खुशी हासिल करता है बिना जाने कि उनका वजूद है भी या नहीं. यही वजह है कि गरीब तबकों के लोग अधिक आस्थावान हो जाते हैं. संतुष्ट रहना उसकी मजबूरी है- “रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चोपड़ी मत ललचावे जी.” लेकिन यदि कोई बेहतर जीवन की कामना को लालच की केटेगरी में डाले तो उसे धूर्त ही समझना चाहिए. अब आगे चलते हैं.

मेघ भगत सदियों से अपने पुरखों, वड-वडेरों की मान्यता/पूजा के अतिरिक्त भगती के कायल रहे हैं जिसका सीधा संबंध उनकी गरीबी से रहा. आर्य समाजियों ने शुद्धिकरण करके उन्हें भगत बना लिया. चलो जी, हम 'मेघ' से 'भगत' हो गए.

भक्तिमार्ग की एक विशेषता यह है कि वह गरीबी दूर करने का तरीका नहीं बताता. उसका काम है यह बताना कि गरीबी में कैसे रहा जाए. जहाँ तक माँगने की आदत का सवाल है कबीर ने साफ़ कहा है- "मागन गए सो मर गए मत कोई मागो भीख, माँगन से मरना भला यह सत्गुर की सीख.


अद्भुत कबीर

चौदहवीं शताब्दी के कबीर, रविदास जैसे संतों ने वंचित समुदायों को भक्तिभाव में उतना नहीं डुबोया जितना उन्हें सामाजिक चेतना की ओर मोड़ा. यह उनका क्रांतिकारी कार्य था. मेघों और अन्य वंचित जाति समूहों द्वारा संतों का भक्तिमार्ग अपनाना और ख़ुद को उनका अनुयायी बताना उसी सामाजिक चेतना का विकसित लक्षण है. बहुत से मेघ अब ख़ुद को कबीरपंथी लिखना पसंद करते हैं. यहाँ समझने की बात है कि पंद्रहवीं शताब्दी के कबीर को मेघों ने 19वीं शताब्दी में अपनायासुना है 15 अगस्त, 1947 (जो पंजाब के मेघ भगतों के आधुनिक इतिहास की कट-ऑफ़ डेट है) के बाद पठानकोट और जम्मू के क्षेत्र में मेघों द्वारा कबीर का प्रकाश उत्सव मनाने का प्रचलन बढ़ा और कबीर मंदिरों के निर्माण में तेज़ी आई.

इन दिनों पंजाब और जम्मू में अनेक कबीर मंदिर और उनकी कमेटियाँ बनीं हुई हैं जिनमें परस्पर प्रतियोगिता है. राजनीतिक धड़ेबंदियों उन पर हावी हैं और क्यों न हों आख़िर उन्हें कोई बना-बनाया वोट बैंक अपने आक़ा को दिखाना होता है. 'धन् कबीर' और 'जय कबीर' का घोष इस वोट बैंक की धार्मिक-राजनीतिक निशानी बन सकती है. इसी क्रम में सोशल मीडिया पर कबीर की ऐसी वाणी परोसी जाने लगी है जो भक्तिधारा का प्रतिनिधित्व करती है. सामाजिक चेतना जगाने वाली कबीर की वाणी वहाँ शायद ही दिखाई दे. सियासतदानों की पूरी कोशिश मेघों को अपना भक्त और वोट बैंक बता कर पेश करने की है. मेघ भगत चाहे राधास्वामीमत में हों, किसी डेरे-गुरु को मानने लगे हों या सनातनी या आर्यसमाजी हो गए हों, धर्म ग्रंथों का अखंडपाठ या जागरण करवाते हों, हैं वो भक्त ही. उनकी अपनी धार्मिक और राजनीतिक ताक़त दूर तक नहीं दिखती.

कुछ कबीर मंदिरों में ज़रूरतमंद बच्चों के लिए कंप्यूटर या अन्य प्रकार के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था हुई. कबीर मंदिरों का यह सबसे सुंदर इस्तेमाल है जिसका सीधा लाभ समाज को पहुँचता है. उधर प्रश्नचिह्नों से घिरे 'ईश्वर-परमेश्वर' या देवी-देवताओं ने वंचित समाजों को कोई फ़ायदा नहीं पहुँचाया, उनकी सामाजिक स्थिति को तो बिल्कुल नहीं बदला.

तीन सौ वर्ष पहले दुनिया के कई देशों ने विज्ञान को महत्व देना शुरू किया. वे आज विकसित राष्ट्र हैं. इसे देखते हुए भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (temperament) विकसित करने को महत्व दिया गया. कबीर ख़ुद भी बुद्ध और उनके जैसे शिक्षित लोगों की तरह तर्कशील और विवेकशील थे. ऐसे में उनके मंदिरों या उनसे होने वाली कमाई का शिक्षा के प्रयोजन से इस्तेमाल करना समाज के लिए क्या अधिक लाभकारी नहीं होगा?

मेघ समाज ने कबीर की भक्ति-वाणी के अपने कई प्रचारक पैदा कर लिए हैं लेकिन अन्य समाजों के लोग भी मेघों में आ कर यही काम करने लगे हैं. जब धर्म एक व्यापार के तौर पर स्थापित है तो उसके नियम सीखने चाहिएँ. व्यापारिक घुसपैठ, तोड़-फोड़ आदि के ख़तरे भाँपने होंगे.

जानने की बात है कि ईसाइयत और इस्लाम के अनुयायियों के बाद अब ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस हैं. वे दुनिया की आबादी का लगभग एक तिहाई हैं और उनकी संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. सवाल बनता है कि हम भगत या कबीरपंथी कहलाने वाले भोले-भाले भक्त लोग भक्ति को ज़रूरत से अधिक वक़्त दे कर वैज्ञानिक दुनिया में पिछड़ तो नहीं रहे हैं? हमारा भक्तपना तरक्की के रास्ते में देरी का कारण तो नहीं बन रहा है?

(आपके पास बहुत थोड़े आर्थिक और मानव संसाधन हैं. ऐसे में उनका उपयोग आप कैसे करना चाहेंगे, सोचिएगा.)

धार्मिक जगह क्यों? शिक्षा क्यों नहीं!