15 February 2017

The size of a Voter - वोटर का आकार

फोटो bhaskar.com के साभार
हर चुनाव अपने पीछे कुछ सामाजिक मुद्दे, रंजिशें और नफ़रतें छोड़ जाता है. लोग कहने लगे हैं कि अब पार्टियों से ऊपर उठकर सोचना शुरू करो. वे महसूस करते हैं राजनीतिक पार्टियाँ समाज के सामान्य ताने-बाने को तबाह करती हैं. इसे ठीक होना ही चाहिए लेकेिन यह होगा कैसे? राजनीतिक पार्टियों ने अपना महिमाजाल इतना फैलाया हुआ है कि छोटी पार्टियाँ या छोटे समूह अपना एजेंडा नहीं बना ही नहीं पाते. उसे लागू करना तो दूर की बात है. कोई नया विचार या विचारधारा लेकर आए तो बड़ी पार्टियाँ तुरत उसे अपने चुनावी घोषणापत्र में थोड़े से अतिरिक्त शब्दों के साथ शामिल करके उसे हाइजैक कर लेती हैं. दरअसल वे हाइजैक नहीं करती बल्कि थोड़ा-बहुत शोर मचा कर उसे डिफ्यूज़ कर देने की ताकत रखती हैं. यह कार्य मीडिया के माध्यम से आसानी से हो जाता है जो बड़ी पार्टियों के नियंत्रण में होता है.

वैसे तो हरेक आदमी अपने, अपने परिवार या समाज के लिए जो भी सामान्यतः कर रहा होता है वह अनेक प्रकार से देश हित में होता है. लेकिन वो दिखता नहीं. जिसके पास पैसा और सत्ता है वो देश के लिए काम करता हुआ दिखता है और वो अपना विज्ञापन करता हुआ चलता है. नया चलन है कि वो अपने राजनीतिक विरोधी पर देशद्रोही का इल्ज़ाम लगाने से ग़ुरेज़ नहीं करता. अब लोग कहने लगे हैं कि "पार्टियों से ऊपर उठ कर" कार्य करो. पार्टियाँ अपनी वैचारिक लाइन से ऊपर उठ कर काम करेंगी ऐसा नहीं लगता.

तो फिर मतदाता क्या करे. लोकतंत्र में मतदाता इस कार्य की सूक्ष्मतम इकाई है. बहुत ही छोटी. उसकी उम्मीदें और प्रयास भी छोटे होते हैं. इसलिए उसे बड़ा सुझाव कोई दे भी तो क्या दे. वोटर की नियति है कि वह ‘मत दान’ कर के अपना ‘मत त्याग’ देता है. उसकी पहली होशियारी इतनी-सी हो सकती है कि भई ‘अपने मत को दान में न दे कर मत का सही उपयोग किया जाए’. अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछने की आदत डाली जाए. वादे के मुताबिक काम नहीं करता तो उसे पकड़ा जाए. आम वोटर जाति के सवाल पर तो फिलहाल कुछ नहीं कर सकता लेकिन धर्म के नाम पर हो रही राजनीति को वो दुत्कार सकता है.

आम वोटर की देशभक्ति असंदिग्ध है.

10 February 2017

Unity of Meghs - मेघों की एकता



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जब-जब सामाजिक-राजनीतिक निर्णयों की बात आती है तो यह सवाल मन पर लटक जाता है कि मेघों में एकता क्यों नहीं होती? ऐसी सोच रखने वाला मैं पहला व्यक्ति नहीं हूँ न ही मेघ समाज अकेला ऐसा समाज है.  पहली बात यह कि लंबी अनपढ़ता के कारण बहुत से समुदाय अपने अतीत और वर्तमान का सही विश्लेषण नहीं कर पाते. कुछ कमियां और कमज़ोरियां ऐतिहासिक होती हैं. दूसरे, धर्म की सही समझ न होने से वे समुदाय नहीं समझ पाते कि इंसानों को बांटने वाले तत्वों में धर्म सबसे बदनाम चीज़ है जो इंसान के मन और जीवन में बहुत तोड़-फोड़ मचाता है. कुछ राहत भी देता है इससे इंकार नहीं लेकिन उसके व्यावसायिक और राजनीतिक स्वरूप को समझा जाए.


पंजाब के मेघ भगत लोगों ने तथाकथित मुख्यधारा में शामिल होने की कोशिश में आर्यसमाज से लगन लगा ली. यह कुदरती था क्योंकि उन्हें शिक्षित करने में आर्यसमाज का बहुत रोल था. उन दिनों आर्यसमाज का मतलब था - कांग्रेस. इसलिए धर्म और राजनीति का एक घालमेल मेघों को मिल तो गया लेकिन आगे चल कर राजनीतिक-धार्मिक ताने-बाने और ताने-पेरे को समझने में उनको मुश्किलें आईँ.


1977 में जनता पार्टी के उदय के समय कुछ मेघजन कांग्रेस से छिटकते हुए नज़र आए. जिन्होंने ‘हलधर’ को चुना वे अन्य कांग्रेसी-आर्यसमाजी मेघों की नज़र में बिरादरी के ग़द्दार ठहराए गए. जब पूरा देश जनता पार्टी की लहर में बह रहा था तब मेघों ने कांग्रेस को जिताया. इस दौरान कई मेघ समझ गए कि आर्यसमाज ने उन्हें अपने एजेंडा से निकाल दिया हुआ था. लेकिन वे हवन से संतुष्ट और राजनीतिक नुक़सान से बेख़बर थे. आर्यसमाज-कांग्रेस की जुगलबंदी से वे ऐसा कोई समर्थन नहीं पा सके जो उन्हें विधानसभा में प्रतिनिधित्व दिला पाता.


मेघ इस ग़लतफ़हमी में रहे कि आरक्षण कांग्रेस ने दिया है. उधर आर्यसमाजियों की स्वाभाविक कोशिश थी कि मेघ डॉ. अंबेडकर की विचारधारा से दूरी बनाए रखें. आज बहुत से मेघ अंबेडकर को मानने लगे हैं लेकिन पुरानी पीढ़ी के कुछ बचे-खुचे बूढ़े आर्यसमाजी आज भी उन्हें अंबेडकरी विचारधारा से दूर रहने की सलाह देते हैं. वे नहीं जानते कि मेघों से अलग दिखने वाले अन्य समुदाय जिन्हें मेघ ख़ुद से कमतर मानते थे वे अंबेडकरी विचारधारा को अपना कर सामाजिक जागृति में पहलकदमी कर पाए और राजनीतिक तौर पर मेघों से आगे निकल गए.


1980-90 के मध्य में मेघों ने अंबेडकर को अपनाना शुरू किया था इसके संकेत मिलते हैं. लेकिन आर्यसमाजियों के विरोध के कारण वे दबाव में आ गए और 14 अप्रैल को ‘मेघ-दिवस’ के तौर पर मनाने की उनकी कोशिश को निराशा मिली. आज अंबेडकरवाद देश में एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर स्थापित हो चुका है.


मेघों में कबीर के प्रति झुकाव का कोई तारीख़वार इतिहास तो नहीं मिलता लेकिन कहा जाता है कि 1947 तक 2 प्रतिशत मेघजन कबीर को मानते थे और आज 98 प्रतिशत कबीर को मानते हैं. (मेघों ने इतने कबीर मंदिर बना लिए हैं कि अब उन्हें कबीर मंदिरों का बीमा कराना चाहिए🙂). ‘कबीरपंथी मेघ’ होना एक ऐसी पहचान है जिसमें वोट बैंक बनने की भरपूर क्षमता है. एक बार रवीश कुमार ने ऐसा ही संकेत दिया था. तो मान लिया जाए कि मेघों में एक प्रकार की धार्मिक एकता विकसित हो गई है. लेकिन केवल धर्म से काम नहीं चल सकता. सदियों की ग़रीबी से लड़ने के लिए सत्ता में बढ़ती हुई भागीदारी ज़रूरी है.

इस समय चुनाव का समय है. पंजाब में वोटिंग हो चुकी है. मेघों की राय ईवीएम में बंद है. जालंधर (वेस्ट) की सीट के लिए आप पार्टी, भाजपा और शिवसेना ने मेघों को टिकट दिया. 3 उम्मीदवार मैदान में हैं. (पूरे पंजाब में शिवसेना ने 5 मेघों को टिकट दिया है). कांग्रेसी मेघों में बहुत बेचैनी रही. अब वोट बँट जाने का भय भी सताता है. फिर भी मुमकिन है इस बार के चुनाव के नतीजे इस बात को साफ़ कर दें कि मेघों में एकता की बुद्धि विकसित हुई है.

31 January 2017

Megh Manavta Dharm and Constitutional Religion - मेघ मानवता धर्म और संवैधानिक धर्म

संविधान को लागू हुए 67 वर्ष हो चुके हैं लेकिन हर पढ़ा-लिखा नागरिक महसूस करता है कि भारतीय समाज संविधान की भावना के अनुरूप विकसित नहीं हो पाया है. जात-पात (जिसमें रंगभेद शामिल है), लिंग भेद, धर्म भेद, अवैज्ञानिक नज़रिया आदि अनेक समस्याएँ हैं जिनसे समाज पार नहीं पा रहा है. कुछ विचारधाराएँ समाज में हैं जो संविधान को ऐसे रूप में बदल लेना चाहती हैं जो साफ़ तौर पर वर्तमान संविधान के विरुद्ध दिखाई देता है.

उक्त पुस्तक ‘संविधान धर्म’ के सिद्धांत का प्रतिपादन करती प्रतीत होती है. धर्म के नाम पर लोग बहुत भावुक हो उठते हैं. जो भी उनकी धार्मिक वृत्ति या पसंद है उससे अलग कोई धर्म उनके समक्ष रखा जाए तो वे आशंकित हो उठते हैं कि कहीं उन पर कोई नया धर्म तो नहीं थोपा जा रहा या किसी नए विचार से उनका धर्म प्रदूषित तो नहीं हो जाएगा, वगैरा-वगैरा. ये ख़तरे हम तब भी महसूस करते हैं जबकि हम भारत के नागरिकों ने ख़ुद को एक बहुत बढ़िया और मज़बूत संविधान दिया हुआ है.

कुछ वर्ष पहले मेरे एक पुराने मित्र श्री जी. एल. भगत, आयकर आयुक्त (सेवानिवृत्त) ने ‘Scheduled Castes As A Separate Religion’ के नाम से एक आलेख Part-1 और Part-2 मुझे भेजा था जिसे मैंने पढ़ा तो था लेकिन उसकी अवधारणा (concept) तब मेरी समझ में नहीं आई थी. तीन दिन पहले वे खुद चंडीगढ़ आए. उन्होंने बामसेफ के कुछ पदाधिकारियों से उक्त आलेख में बताए गए ‘मेघ मानवता धर्म’ की अवधारणा पर बातचीत की. मैं भी उस बातचीत का हिस्सा बना.

पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अपनी प्रस्तुत अवधारणा पर बहुत कार्य किया है और एक ‘कॉन्स्टिट्यूशनल सोशियो-कल्चर एंड इट्स कोड ऑफ ह्यूमन कंडक्ट (Constitutional Socio-Cultural and Its Code of Conduct’ नाम से एक पुस्तक अंग्रेज़ी में तैयार की है जिसमें ‘मेघ मानवता सोशियो कल्चरल सोसाइटी’ नामक संस्था के गठन का उल्लेख है जिसका एक संविधान बनाया है. उन्होंने बताया कि इस सोसाइटी की विचारधारा का विस्तार केरल, तमिलनाडु, गुजरात आदि राज्यों में भी किया है. सोसाइटी का रजिस्टर्ड कार्यालय मुंबई में है. इस सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी (Socio-Cultural Society) का मुख्य उद्देश्य भारत में ऐसे समाज का निर्माण करना है जो भारत के संविधान के अनुसार जन-जन में ऐसा मानवीय व्यवहार विकसित करें जो संविधान सम्मत हो और साथ ही उसकी रक्षा करने के क़ाबिल हो. ज़ाहिर है कि इस सोसाइटी का वैचारिक परिप्रेक्ष्य (Ideological Perspective) बहुत बड़ा है. इस संबंध में दो विरोधाभासी मत देखने को मिलते हैं. कोई कहता है कि जो संविधान को मानता है उसे किसी अलग धर्म की कोई जरूरत नहीं. दूसरा कह देता है कि संविधान कोई धर्म नहीं है. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के विचार भी इस बारे में अंतर्विरोधों (internal contradictions) से भरे हो सकते हैं आखिर वे भी सामाजिक प्राणी हैं. परस्पर विरोधी दिखने वाले इन विचारों से एक बात स्पष्ट है कि संविधान में धर्म जैसी कोई चीज है तो ज़रूर और अगर नहीं है तो भी उसके अपने संवैधानिक मूल्य (Constitutional Values) तो हैं ही जो किसी धर्म से कम नहीं हैं बशर्ते कि संविधान की भावना को धारण कर लिया जाए. क्या हमारे वर्तमान समाज में उसकी काबलियत है?

उक्त पुस्तक में ‘मेघ मानवता’ शब्द के अर्थ की पृष्ठभूमि को भी स्पष्ट किया गया है. बताया गया है कि ‘मेघ मानवता’ शब्द भारत में प्रचलित जजमानी प्रथा से पहले की सभ्यता से संदर्भित है. ‘मेघ मानवता’ बुद्ध से पहले अस्तित्व में थी. आज उसी धर्म को सत्यमत, बुद्धिज्म का नाम दिया गया है. मैगी (Magis) और शाक्य बुद्ध से पहले भी अस्तित्व में थे और बुद्ध उस धर्म के नायक हुए. पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि महावीर मेघ समुदाय से थे और नवल वियोगी ने उल्लेख किया है कि महावीर जैन की एक बहन मेघ परिवार में ब्याही गई थी.

लेखक ने बताया है कि यह सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी बुद्ध, कबीर, नानक, रविदास, घासीदास, फुले, अंबेडकर और अन्य संतों, सूफी संतों और सामाजिक क्रांतिकारियों, वीर नारायण सिंह और अन्य दबाए गए कबीलों के योद्धाओं की विचारधारा को मानती है.

पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि हिंदू धर्म विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं का जुड़ाव है इसी लिए उसे ‘जीवन-शैली (Way of Life)’ कहना पड़ता है. लेकिन यह ‘जीवन शैली’ शब्द चंद जाति समूहों के लिए सुविधाजनक है तो कुछ के लिए नहीं है. लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व (आरक्षण) के अधिकार पर पुस्तक काफी स्पष्ट होकर अपनी बात कहती है. इस सोसाइटी का स्वरूप धार्मिक कैसे है और ‘संवैधानिक धर्म’ शब्द इस्तेमाल क्यों किया गया है उसे स्पष्ट करने के लिए ‘थियोसोफिकल सोसायटी ऑफ वर्ल्ड’ में दी गई शर्तों की बात पुस्तक में की गई है. दावा किया गया है कि उन शर्तों की नींव पर ही ‘मेघ मानवता सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी’ का गठन हुआ है।

इसी संदर्भ में विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक सिद्धांतों की तर्ज़ पर सोसाइटी के 52 संकल्पों (Resolutions) का उल्लेख है जो इस सोसाइटी को वैचारिक आधार देते हैं। अंत में हम सबका ख़ुद से यह पूछना तो बनता है कि एक सोसाइटी, जिसका आकार चाहे फिलहाल सीमित-सा हो, वह संविधान में उदित होते एक धर्म का अस्तित्व क्यों नहीं देख सकती जो पूरे भारतीय समाज के लिए कल्याणकारी हो?


26 January 2017

Meghs as per anthropology - मानवशास्त्र के अनुसार मेघ

इंसान जब अपने मूल को ढूँढने निकलता है तो उसे सृष्टि के प्रारंभिक प्राणियों जैसे अमीबा, Comb Jelly, मछली और फिर बंदर में अपना अतीत जल्दी से न दिखता है न हज़म होता है. फिर वो पूछता है कि भाई हम किस मानव स्वरूप पुरुष की संतान हैं जिसे हम अपना पहला पुरुष कह सकें. यही 'पहला' सबसे बड़ी मुसीबत है उनके लिए जो सवाल पूछते हैं. फिर भी वैज्ञानिकों ने और अन्य जानकार लोगों ने मानवशास्त्र-विज्ञान (anthropology), भाषा-विज्ञान (philology) आदि के आधार पर बहुत सी जानकारी दी है. 'पहला' तो नहीं मिलता लेकिन उसकी संतानों के कदमों के निशान पाए जाते हैं कि वे कहाँ से चले होंगे और कहाँ-कहाँ गए और इस समय कहाँ-कहाँ हैं. तो हे मेघजन! आपके लिए कुछ संदर्भ हाज़िर हैं इससे आपको कुछ तसल्ली मिलेगी.

मेघवंश के इतिहासकार ताराराम जी ने हाल ही में श्री मारवाड़ मेघवाल सेवा संस्थान, शाखा - देसूरी के घानेराव में दिनांक 03 जनवरी 2017 को एक उद्बोधन दिया था जिसकी एक प्रति उन्होंने अग्रिम रूप से मुझे भेजने की कृपा की थी. उस भाषण का एक अंश आपके मतलब का हो सकता है यदि आप अपनी मानवशास्त्र सम्मत (एंथ्रोपोलोजिकल) पहचान में रुचि रखते हैं.

"किसी समय मारवाड़ और महाराष्ट्र एक ही हुआ करता था और यह ध्यान देने वाली बात है कि इस क्षेत्र का नाम ‘मारवाड़’ और इससे इतर प्रदेश का नाम 'महाराष्ट्र' इन जगहों पर निवास करने वाले एक ही तरह के ‘म्हार’ वा ‘मेग’ लोगों के कारण पड़ा था. कोल-द्रविड़ मूल के ‘मेग’ शब्द के अर्थ जूना, पुरानाप्राचीनफैलना या पसारना, बादलमुख्य या प्रमुख आदि कई होते है. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ‘महार’ और ‘मेग’ शब्द की व्युत्पत्ति धातु भी एक ही है. म्हारवाड से मारवाड़ और महार-रटठ से महाराष्ट्र शब्द बना. वाड का अर्थ जगहघेरा या वाड़ से है और रटठ का अर्थ राष्ट्र से है. स्पष्ट यह है कि यह भूमि मेघों और महारों की भूमि रही हैऐसा इसके प्राचीन इतिहास से ज्ञात होता है. इनसे जुडा हुआ मालवा और मालानी भी ‘मल्ल’ लोगों का निवास होने के कारण मालवा और मालानी कहलाया. ये सब तथ्य आज जिस संगठन के बैनर-तले यह कार्यक्रम हो रहा हैउसके लिहाज से महत्त्वपूर्ण हैक्योंकि मारवाड़ की ‘मेघ’ जाति की उत्पत्ति’ और महाराष्ट्र की ‘म्हार’ नामधारी जाति की उत्त्पति एक ही प्रजाति से हुई है. मल्लमेगम्हार आदि भारत के प्राचीन और मूल वाशिंदे है. इसमें अब कोई संशय नहीं रह गया है और वे कोल-द्रविड़ मूल के है. सिन्धु-घाटी की प्राचीन सभ्यता के सृजनहारों में कई इतिहासकारों ने ‘मेगों’ का उल्लेख किया है और हमारा जो यह प्रदेश हैवह किसी समय सिंध का ही एक हिस्सा था. इसलिए यहाँ निवास करने वाले आज के ‘मेग’ और प्राचीन काल के ‘मेग’ एक ही परंपरा और एक ही प्रजाति के हैइसमें भी कोई संदेह नहीं रह जाता है. सिन्धु और उसकी सहायक नदियों के आस-पास बसने वाले मेगों का उल्लेख महाभारत आदि ग्रंथों में मद्र और मल्ल के रूप में और कहीं-कहीं बाह्लिक के रूप में हुआ है. विश्व-इतिहास में इन्हें ‘मेडिटेरेनियन’ के रूप में भी रखा है और आस्ट्रिक प्रजाति के साथ वर्णन किया गया है. आज तक की उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट हुआ है कि ये प्रजातिगत रूप से कोल-द्रविड़ मूल के मंगोलियन प्रजाति से निकली हुई जातियां हैजो भारत में वैदिक आर्यों के आक्रमण से पहले यहाँ बस चुकी थीं. वैदिक आर्यों के और यहाँ की मेघ आदि जातियों के बीच 500 वर्ष तक लम्बा संघर्ष चला. समय बीतते-बीतते वैदिक-आर्य सरस्वती नदी के आस-पास बस गए और उस भू-भाग पर कब्ज़ा कर लियाजिसे उन्होनें आर्यावर्त कहा. मेघ लोग सतलजजिसका पुराना नाम ‘मेगाद्रु’ था उसके आस-पास व चेनाब या चंद्रभागा और सिन्धु की अन्य सहायक नदियों के आस-पास बस गए. आर्यों के बाद तूरानी, अरबमंगोलशकहुण और सिदियन आदि लोगों और प्रजातियों के आक्रमण भी हुए. आर्य लोग सरस्वती से विन्ध्य पर्वत तक विस्तृत हुएजिसे उन्होंने ब्रह्मवृत्त नाम दिया. उसके आगे वे नहीं जा सके और गंगा नदी व गांगेय-तटों को अपनी आवास भूमि बनाया. मेग आदि कोल-द्रविड़ मूल की जातियां हिमालय के तलहटी-मैदानों की ओर विस्तृत होती गयी और सिन्धु से लेकर मेघना व ब्रह्मपुत्र नदी तक निवासित हुईं.

अजमेरपालीनागौरजोधपुर और बाड़मेर होते हुए कच्छ में जाकर अरब सागर में मिलने वाली लूनी नदी सिन्धु नदी की सहायक नदी थी. मेग लोग प्राचीन काल में इन क्षेत्रों में भी आकर बस गए."

ताराराम जी की इन कुछ पंक्तियों की पृष्ठभूमि में कई संदर्भ होंगे. दो नीचे दे रहा हूँ ताकि समझने में आसानी रहे. इन पर क्लिक करके आप पढ़ सकते हैं.



02 January 2017

Happy new year via Faiz - नया साल मुबारक वाया फ़ैज़


*ऐ नये साल*

ऐ नये साल बता, तुझ में नयापन क्या है?
हर तरफ ख़ल्क ने क्यों शोर मचा रखा है?
रौशनी दिन की वही, तारों भरी रात वही,
आज हमको नज़र आती है हर बात वही।
आसमां बदला है अफसोस, ना बदली है जमीं,
एक हिन्दसे का बदलना कोई जिद्दत तो नहीं।
अगले बरसों की तरह होंगे करीने तेरे,
किसे मालूम नहीं बारह महीने तेरे।
जनवरी, फरवरी और मार्च में पड़ेगी सर्दी,
और अप्रैल, मई, जून में होवेगी गर्मी।
तेरे मान-दहार में कुछ खोएगा कुछ पाएगा,
अपनी मय्यत बसर करके चला जाएगा।
तू नया है तो दिखा सुबह नयी, शाम नई,
वरना इन आंखों ने देखे हैं नए साल कई।
बे-सबब देते हैं क्यों लोग मुबारक बादें,
गालिबन भूल गए वक़्त की कड़वी यादें।
तेरी आमद से घटी उम्र जहां में सभी की,
'फैज' नयी लिखी है यह नज़्म निराले ढब की।

(ख़ल्क – दुनिया, हिन्दसे – अंक, जिद्दत – नयी बात, आधुनिकता (novelty), करीने – ढ़ंग,
मान-दहार – समय (time period), ग़ालिबन – शायद, आमद – आने से)

23 December 2016

Research v/s bickering - शोध बनाम कलह

राजनीति को लेकर सभी समुदायों में झिकझिक होती है. मेरे मेघ भगत समुदाय में भी होती है. पिछले दिनों एक सज्जन ने सोशल मीडिया पर मेघ समुदाय को किसी पार्टी का टिकट न मिलने की वजह डॉ. ध्यान सिंह के शोधग्रंथ को बताया. हँसी भी आई और हैरानगी भी हुई. बस एक विवाद पैदा किया जा रहा था. 

असल में उक्त शोधग्रंथ (थीसिस) मेघ भगत समुदाय के पिछले 200 वर्ष के इतिहास और मेघ जाति (जो कबीरपंथी के नाम से भी जानी जाती है) के उद्भव (मूल) की खोजबीन करता है

राजनीतिक दलों की नीति है कि वे टिकटों का आबंटन जाति के आधार पर करते हैं. उसकी वजह से किसी जाति या समुदाय को टिकट नहीं मिलता है तो उसका समाधान राजनीतिक स्तर पर होना चाहिए. यदि किसी राज्य में मेघवंश से निकली कई जातियाँ बसी हैं और राजनीतिक पार्टी सभी को एक ही जाति मान कर एक ही टिकट देती है तो दोष किसी शोधग्रंथ का कैसे हो सकता है, ख़ास कर तब जब उस शोधग्रंथ में उन अलग-अलग जातियों को कहीं भी 'एक जाति' न बताया गया हो.

इस सच्चाई को खास तौर पर देखना ज़रूरी है कि उक्त शोधग्रंथ पर डॉक्टरेट की डिग्री सन् 2008 में दी गई थी. अब देखना यह चाहिए कि 2008 से पहले जालंधर के आसपास बसी मेघ भगत जाति के प्रति राजनीतिक दलों का रवैया क्या था? देखना यह भी चाहिए कि मेघ भगत जाति का क्या अपना कोई कद्दावर नेता है जो समुदाय की जातिगत स्थिति और उनकी विभिन्न लोकल समस्याओं को ऊपर तक असरदार तरीके से पहुँचा सके, समुदाय की राजनीतिक और सामाजिक लड़ाई लड़ सके? यदि पूरा समुदाय एक मज़बूत राजनीतिक वोट बैंक है तो कमज़ोरी कहाँ है? मेघ भगत समुदाय की असल समस्या है कि उसके पास बढ़िया क्वालिटी के सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और राजनेताओं की कमी है. आज के समय में यह कमी मामूली नहीं है.  


06 December 2016

Sir Chhoturam and Dr. Ambedker - सर छोटूराम और डॉ. अंबेडकर

फेसबुक पर जो चिंतक मेरी मित्र सूची में हैं उनमें से श्री राकेश सांगवान को मैं बहुत महत्व देता हूँ. आज डॉ. अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर उन्होंने यूनियनिस्ट मिशन के नज़रिए से सर छोटूराम और डॉ. अंबेडकर का एक मूल्यांकन किया है जो उनके 'यूनियनिस्ट मिशन' के नज़रिए को प्रतिपादित करता है और हिंदुत्व को छूता है. (एक बात मैं अपनी ओर से साफ करता चलता हूँ कि मैं हिंदुत्व को संघ का राजनीतिक एजेंडा समझता हूँ.) यह राकेश सांगवान का दूसरा आलेख है जिसे मैंने मेघनेट में शामिल किया है. राकेश सांगवान जी का पहला आलेख यहाँ है.    


"बाबा साहब ने 1935 में यह कह कर कि ‘हमें हिन्दू नहीं रहना चाहिए। मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ यह मेरे बस की बात नहीं थी लेकिन मैं हिन्दू रहते हुए नहीं मरूंगा, यह मेरे बस की बात है।’ धर्मान्तरण की घोषणा कर दी।

संघ जोकि हिंदुत्व का हिमायती है, हिंदुत्व ही जिनके लिए देश निर्माण है, आज वो संगठन भी बीसवीं सदी के उनके हिंदू धर्म के सबसे बड़े बाग़ी की जयंती मनाने को मजबूर है। मतलब साफ़ है उनके हिंदुत्व के अजेंडा पर अंबेडरवाद भारी है।

कई साथी सवाल करते है कि तुम सर छोटूराम के संघर्ष को बड़ा मानते हो या डॉक्टर अम्बेडकर के संघर्ष को? मैं डॉक्टर अम्बेडकर के संघर्ष को सर छोटूराम के संघर्ष से कहीं बड़ा मानता हूँ। यह सही है कि सर छोटूराम ने मजलूम किसान-कमेरी कौमों के लिए संघर्ष किया, उन्हें आर्थिक आज़ादी दिलाई, उनका मानना था कि सामाजिक भेदभाव का सबसे बड़ा कारण ग़रीबी है। पर सर छोटूराम की लड़ाई मुख्यतः जिस किसान क़ौम के लिए थी उसके लिए सामाजिक ग़ुलामी ज़्यादा बड़ी समस्या नहीं थी क्योंकि उनके पास जोतने के लिए ख़ुद की ज़मीन थी जिस कारण वो अपने साथ हो रहे सामाजिक भेदभाव की ज़्यादा परवाह नहीं करते थे, पर दुश्मन जिस प्रकार से किसान पर आर्थिक मार मार रहा था जिस प्रकार धीरे-धीरे आर्थिक तौर पर ग़ुलाम बना रहा था उसे समझने में सर छोटूराम को देर नहीं लगी कि ये आर्थिक ग़ुलामी धीरे-धीरे किसान को सामाजिक ग़ुलाम बनाने की क़वायद है। सर छोटूराम की लड़ाई सिर्फ़ एक फ़्रंट पर थी पर डॉक्टर अम्बेडकर की लड़ाई तो तीन फ़्रंट पर थी। डॉक्टर अम्बेडकर जिस वर्ग की लड़ाई लड़ रहे थे उसका शोषण तो सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक हर स्तर पर हो रहा था। सर छोटूराम जिनकी लड़ाई लड़ रहे थे उनके हाथ में कम से कम लठ तो था पर डॉक्टर अम्बेडकर जिनकी लड़ाई लड़ रहे थे वो तो मुर्दे समान थे जिनके मुँह में कोई ज़ुबान नहीं थी। डॉक्टर अम्बेडकर ने मुर्दों में जान फूँकी, उन्हें आवाज़ दी और ये उस आवाज़ की ही गूँज है कि आज हिंदुत्ववादी संगठन भी डॉक्टर अम्बेडकर को याद करने को मजबूर है। पर डॉक्टर अम्बेडकर की लड़ाई अभी अधूरी है क्योंकि दुश्मन का बिछाया जाल बहुत गहरा है। अभी उस जाल को कटने में वक़्त लगेगा और यह जाल सिर्फ़ शिक्षा से ही कटेगा इसलिए डॉक्टर अम्बेडकर कहते थे कि शिक्षा शेरनी के दूध समान है, जो इसे पिएगा वही दहाड़ेगा।

आज डॉक्टर साहब के महापरिनिर्वाण दिवस पर यूनियनिस्ट मिशन सजदा करता है उनके संघर्ष को सैल्यूट करता है।

-यूनियनिस्ट राकेश सांगवान
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