14 September 2019

King Meghvahana - राजा मेघवाहन

आगे बढ़ने से पहले कृपया नोट कर लें कि मैं इतिहासकार नहीं हूं. मैं अपनी जाति का इतिहास ढूंढता रहा हूं. इस सिलसिले में जो मिला, अच्छा-बुरा, सही-गलत वो सब यहां इकट्ठा हुआ. इसलिए यदि मैं किसी इतिहास संबंधी अवधारणा को गलत मान बैठा हूं या उसे गलत साबित करने की कोशिश की है तो उसका कारण मेरे पढ़े हुए इतिहास के उलट किसी इतिहास का मौजूद होना है.  अब आगे चलें.

जम्मू-कश्मीर के निवासी मेघ और अन्य बहुत से मेघ अपने इतिहास को ‘राजतरंगिणी’ के राजा मेघवाहन में देखते हैं. पता नहीं उनमें से कितने लोगों ने राजतरंगिणी का मूल पाठ (संस्कृत में) पढ़ा. संस्कृत में लिखी राजतरंगिणी मैंने नहीं पढ़ी लेकिन अंग्रेज़ी और हिंदी में अनूदित अंश (तृतीय तरंग के) पढ़े जो मेघवाहन से संबंधित हैं और मैं मानता हूं कि उसमें राजा मेघवाहन का जितना उल्लेख किया गया है वह राजा और उसकी शासन प्रणाली के वर्णन के  लिहाज़ से अपर्याप्त है. राजतरंगिणी के लेखक पं.कल्हण आज के अर्थ में इतिहासकार नहीं थे. लेकिन बहुत से ऐतिहासिक संदर्भों को उन्होंने अपने नज़रिए से रिकार्ड किया. 12वीं शताब्दी में इतिहास लेखन की कोई परंपरा नहीं थी उस काल में कल्हण का कार्य महत्वपूर्ण रहा होगा. आज के इतिहास लेखन से जैसी अपेक्षा हो सकती है वैसी कल्हण से नहीं होनी चाहिए. राजतरंगिणी की लेखन शैली पौराणिक कथा शैली से प्रभावित है.

श्री जोगेश चंदर दत्त ने ‘राजतरंगिणी’ का जो अंग्रेज़ी अनुवाद किया है उसी की पीडीएफ फाइल मेरी नज़र में पहले आई. उसमें बहुत स्पष्ट लिखा था कि राजा मेघवाहन जिस कालखंड में थे उसमें बौधमत का बहुत प्रभाव था. राजा के अलावा उसकी रानियों ने भी बौद्ध मठों का निर्माण करवाया था. उस नेरेशन से तब के जम्मू-कश्मीर में बौद्धमत की व्यापकता का उल्लेख मिलता है. जीवों के प्रति करुणा का भाव फैलाने में मेघवाहन की भूमिका को राजतरंगिणी में सराहा गया है. 

हफ्ता-भर पहले ‘मेघ-चेतना’ के लगभग दस साल तक संपादक रहे श्री एन.सी. भगत ने ‘मेघ-चेतना’ के किसी पुराने अंक में से 4 पृष्ठों की फोटो कॉपी मुझे दी. उसमें प्रकाशित एक आलेख मेघवाहन के बारे में था. उस आलेख के शुरू में ही छपा था “मूल पाठों का सारांश, पंडित कल्हण लिखित कश्मीर के राजाओं का इतिहास, राजतरंगिणी की तृतीय तरंग के आरंभ में ही साक्षात जिनेंद्र भगवान के तुल्य प्रभु मेघवाहन का प्रसंग शुरू होता है.यह रुचिकर था. इसे “आचार्य जैन मुनि श्री विमल मुनि जी महाराज श्री दर्शन मुनि जी महाराज” के सौजन्य से छापा गया था. उक्त आलेख दोनों मुनिजनों ने मिल कर लिखा या पहले वाले मुनि जी महाराज ने लिखा यह स्पष्ट नहीं है. श्री दर्शन मुनि जी महाराज का नाम (संभवतः दर्शन भगत था) लेकिन यह मानने का मेरे पास पर्याप्त कारण है कि जैन दायरे में उनका नाम सुदर्शन मुनि रहा होगा जिनसे मैं कालेज के दिनों में जैन धर्मशाला, सैक्टर-18, चंडीगढ़ में श्री सत्यव्रत शास्त्री जी के साथ मिलने गया था. उक्त आलेख के स्कैन इस ब्लॉग के अंत में दिए गए हैं. श्री सुदर्शन मुनि ऊधमपुर, जम्मू के रहने वाले थे.

मेघ-चेतना’ पत्रिका में छपा उक्त आलेख किसी पौराणिक कथा से कम नहीं. आलेख के शीर्षक में लिखा है - “साक्षात् जिनेंद्र भगवान के तुल्य प्रभु मेघवाहन”. आगे पहले पैराग्राफ में ही लिखा गया है कि “प्राणी मात्र पर दया करने वाले बोधिसत्वों की महिमा को भी उस उत्तम विचार संपन्न राजा ने अपने गंभीर तथा उदात्त चरित्र से परास्त कर दिया.” ऐसा कह कर मेघवाहन को जैनमत का गौरव कहा गया है ऐसा प्रतीत होता है. जोगेश चंदर दत्त के अंग्रेजी अनुवाद में लिखा गया है कि महामेघवाहन बौधमत के अनुयाई थे और उनकी रानियों ने बौद्ध विहार बनवाए थे. यानि दोनों संदर्भों के नेरेशन में तनिक भिन्नता है. 

मेघवाहन को प्रभु जिनेंद्र तुल्य मानना एक सद्भावनापूर्ण सोच है पर ज़रा संभल कर. ओडिशा (जिसे पहले उड़ीसा, Odissa कहा जाता था) में एक महामेघवाहन राजवंश रहा है जिसकी परंपरा में खारवेल जैसे सम्राट जैनमत के अनुयायी थे. अभी तक मेरी नज़र में ऐसा कुछ भी नहीं आया जो कश्मीर के मेघवाहन और ओडिशा के महामेघवाहन बीच कोई तर्कपूर्ण संबंध बिठाता हो. अलबत्ता एक आलेख (यथा 13-09-2019 को देखा गया) ऐसा है जो दोनों को एक साथ रखता है. वहां मेघवाहन और महामेघवाहन को लेकर स्पष्टता की ज़रूरत है.  

अब सवाल रह जाता है कि क्या राजा मेघवाहन ‘मेघ’ नस्ल के थे. राजतरंगिणी में इस बारे में स्पष्ट तो कुछ लिखा नहीं है लेकिन यह ज़रूर लिखा है, “We are ashamed to relate the history of this good king to vulgar men, but those who write according to the Rishis do not care for the taste of their hearers.” इसे अब कोई दिल पर ले ले या नकार दे यह आज उसकी मर्ज़ी पर है.

धार्मिक, इतिहासिक, सामाजिक विषयों पर लिखे ग्रंथों को जब पढ़ना हो तो उनके लेखकों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि को जानना-समझना बहुत ज़रूरी है. उसके बिना आप उनकी रचनाओं के गूढ़ कथ्य को सही सदर्भों में नहीं जान सकते. कल्हण कश्मीरी ब्राह्मण/पंडित थे और रामायण तथा महाभारत के जानकार थे. विकिपीडिया पर कल्हण के बारे में काफी कुछ कहा गया साथ ही यह जानना ज़रूरी है कि इतिहास के बारे में विकिपीडिया बहुत विश्वसनीय स्रोत नहीं है, तथापि कल्हण को इस लिंक से थोड़ा जान लीजिए. यह लिंक 13-09-2019 को देखा गया है.

कल्हण अपनी ‘राजतरंगिणी’ को पौराणिक शैली से मुक्त नहीं रख पाए. इसका एक उदारण मेघवाहन के संदर्भ में उनकी निम्नलिखित टिप्पणी से मिल जाता है, “From that time none violated the king's order against the destruction of animals, neither in water, nor in the skies, nor in forests did animals kill one another.” “...nor in forests did animals kill one another” जैसी बात कहना एक बहुत ही काल्पनिक स्थिति की बात है जिसमें अतिश्योक्ति है और अतिरंजना भी वरना प्रकृति में एक जीव भोजन है दूसरे जीव का.

जहाँ तक करुणा (tenderness) और अहिंसा (non-violence) की बात है करुणा बौधमार्ग की महत्वपूर्ण जीवन शैली है और अहिंसा जैनमार्ग की. बौधमत राज्य की रक्षा और आत्मरक्षा के लिए हिंसा के प्रयोग की अनुमति देता है.

अंत में मेघों का इतिहास जानने के इच्छुक मेघजनों को कह सकता हूँ कि 'राजतरंगिणी' के राजा मेघवाहन की कहानी में मेघों के इतिहास का कोई सिरा नज़र नहीं आता. यदि किसी को नज़र आ जाए तो उसे लिखना चाहिए.

ये लिंक भी देखे जा सकते हैं

Rajtarangini (PDF) (Page 36-37)

नरेंदर सहगल की पुस्तक व्यथित जम्मू-कश्मीर के पृष्ठ 25 पर प्रतिभाशाली मेघवाहन का उल्लेख हुआ है.






09 September 2019

Aryan Invasion? - आर्यों का आक्रमण?

डीएनए रिपोर्टों ने अभी तक पढ़ाए जा रहे इतिहास में कई जगह निशान लगा कर बताया है कि हुज़ूर यहाँ-यहाँ कुछ गड़बड़ है. 2018 में राखीगढ़ी में 4500 साल पुराने (हड़प्पा सभ्यता के समय के) नरकंकाल मिले. डीएनए रिपोर्ट आने से पहले ही तब मीडिया मालिक (पत्रकारों के अवतार में) अपने-अपने सिद्धांतों के साथ टूट पड़े. “ये हमीं है, यह हमारा है, वो सभ्यता हमारी थी, हमने उसे नष्ट नहीं किया था, हम सिंधुघाटी के ही हैं, हमीं ने उसे विकसित किया था, आर्य आक्रमण का सिद्धांत गलत है, अंग्रेज़ों ने हमारे इतिहास को गलत लिखा”. (यानि अंग्रेज़ों के जाने के 70 साल बाद आज तक पढ़ाए जा रहे इतिहास में यदि कुछ गलती है तो उसके ज़िम्मेदार अंग्रेज़ हैं, वग़ैरा).

अब सितंबर 2019 में उन कंकालों की डीएनए और अवशेषों  के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं तो मीडिया फिर उस पर झपट पड़ा कि इसमें यह मेरा है, तुम्हारा क्या है, हम तो पहले से ही कह रहे थे, तुम्हारा तो सिद्धांत ही गलत था, कोई आक्रमण नहीं हुआ बल्कि बाहरी लोग थोड़े-थोड़े करके आए थे, कुछ उधर से इधर आए और कुछ इधर से उधर गए (ऐसी कई बातें और उनसे जुड़े सवाल अपेक्षित थे इसलिए डीएनए रिपोर्ट अपनी सीमाएँ बता गई है और कई स्पष्टीकरण दे गई है) लेकिन सवाल मुख्यतः उस इतिहास पर उठाया जा रहा है जो बच्चों को बताता रहा है कि भारत के लोग असभ्य थे और उन्हें सभ्य बनाने के लिए आर्य लोग बाहर से यहाँ आए थे. डीएनए रिपोर्ट यह भी बता रही है कि दक्षिण एशिया की किसानी यहाँ के स्थानीय लोगों ने ही शुरू की थी. उसका कोई संबंध ईरान या पश्चिम से नहीं है. यानि भारत प्रायद्वीप की सभ्यता यहाँ के स्थानीय बाशिंदों ने ही विकसित की थी.
फिर वो आर्यवर्त क्या चीज़ है? ऊपर उठा हाथ पूछ रहा है कि आर्य का तात्पर्य रेस (नस्ल) से है या श्रेष्ठ से है, यदि श्रेष्ठ से है तो श्रेष्ठता का सिद्धांत कहाँ से आया, किसने पढ़ाया? आज के भारत में जातीय श्रेष्ठता का औचित्य क्या है? उससे अधिक प्रखर सवाल यह हो सकता है कि जातीय श्रेष्ठता पर आधारित व्यवस्था क्यों है.

इसी संदर्भ में कुछ विद्वान यह बात दोहरा रहे हैं कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने लिखा है कि आर्य बाहर से नहीं आए बल्कि वो यहीं के हैं. इस उद्धरण को भी मीडिया मालिक भुनाते फिर रहे हैं. प्रकारांतर से वे उस धारणा को झुठलाना चाहते हैं जो बहुत प्रचारित हो चुकी है कि ‘ब्राह्मण विदेशी’ है. इसी संदर्भ को दूसरे विद्वान कहते हैं कि अंग्रेज़ों के आने से पहले ही भारत के कुछ लोगों ने ख़ुद को बाकियों से श्रेष्ठ कहना शुरू किया था. इसे वे डॉ. आंबेडकर की राष्ट्रनिर्माण संबंधी अवधारणा से जोड़ कर देखते हैं और मानते हैं कि भारत में रहने वाले सभी लोग भारत के ही हैं. सभी को मिल कर एक राष्ट्र का निर्माण करना है और उसमें जातीय श्रेष्ठता वाली सोच को बाधा बन कर नहीं आना चाहिए.

फिलहाल संदर्भित रिपोर्ट यह स्थापित कर रही है कि पहले जो पढ़ाया जाता था कि प्राचीन विकसित सभ्यता का विकास बाहर से आए लोगों ने किया वो ग़लत है. वास्तव में वो विकास मूलनिवासियों ने किया था.

अब मेघों के लिए दो शब्द. 'मूलनिवासी' नाम के तहत जो मेघ पहले असहज महसूस कर रहे थे वे अब सहज हो कर बैठ सकते हैं. 

16 August 2019

भाषाशास्त्र में समाजशास्त्र की मिलावट है - Philology is adulterated with Sociology

कहते हैं कि माँ बोली (मातृभाषा) सबसे मीठी और प्यारी भाषा होती है. जब भाषाविज्ञान की कक्षाओं में पढ़ाया गया कि संस्कृत उत्तर भारत की सब भाषाओं की जननी है और बाकी सब भाषाएं भ्रष्ट (अपभ्रंश) भाषाएँ हैं तो अजीब-सा लगा था बल्कि तकलीफ हुई थी. पंजाबी को जिस वर्ग में रखा गया उस वर्ग का नाम ही ‘पैशाची’ रखा गया. कारण समझ में नहीं आता था कि देश भर की इतनी भाषाओं का अपमान करने की ऐसी क्या जरूरत पड़ गई. क्या ‘संस्कृत से इतर’ भाषाएँ या ‘भारत में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाएँ’ कह कर नहीं पढ़ाया जा सकता था? वैदिक संस्कृत का भी विकास हुआ है. कालिदास आदि की उस विकसित संस्कृत को ‘अपभ्रंश संस्कृत’ कहने की युक्ति और उक्ति नहीं सूझी और न ही हिंदी साहित्य को ‘अपभ्रंश साहित्य’ कहा गया.

पिछले कुछ वर्षों के दौरान भाषा विज्ञान में नई खोजों के सदके जानकारी में आया कि संस्कृत भारत की सब भाषाओं की तो क्या किसी एक अन्य भाषा की भी जननी नहीं है. प्राकृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा प्रमाणित हो चुकी है जिसकी बोलियों में पाली, मागधी आदि आती हैं. इस निष्कर्ष पर पहुँचाने वाले ऐतिहासिक और पुरातत्त्वशास्त्रीय (आर्कियॉलोजिकल) संदर्भ और प्रमाण उपलब्ध हैं.

भारत की अन्य भाषाओं के लिए पूर्ववर्ती भाषा विज्ञानियों ने हीनार्थक शब्दों का प्रयोग क्यों किया? कहीं उन शब्दों में सामाजिक संरचना में व्याप्त उच्चता-हीनता की भावना का कोई कोड (कूट) तो नहीं था या यह किन्हीं भाषाओं में शूद्रता स्थापित करने की युक्ति तो नहीं थी?

पिछले दिनों डॉ.राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र’ पढ़ी. भाषा का समाजशास्त्र इस बात का जवाब दे रहा है कि मागधी प्राकृत के साथ संस्कृत के आचार्यों ने दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया है. वास्तव में भाषाई स्थापनाओं (उदाहरण के लिए ‘अपभ्रंश भाषा’ जैसी स्थापना) के कुछ विकृत रूप इतने अधिक प्रचारित कर दिए गए हैं कि उनमें कुछ भी नया जोड़ना या उसमें सुधार की बात उठाना हो तो बहुत से तार्किक सबूतों की ज़रूरत होती है. इसकी भी जांच करनी होगी कि संस्कृत के नाटकों में निम्न श्रेणी के पात्र और महिला पात्र प्राकृत में और उच्च श्रेणी के पात्र संस्कृत में ही क्यों बात करते हैं. पात्रों के बीच भाषा की यह दूरी क्या संकेत करती है इसकी ईमानदार व्याख्या होनी चाहिए.

भाषा में निहित समाजशास्त्र को समाजशास्त्र के नज़रिए से ही परखना पड़ेगा कि वो ‘तत्सम’ और ‘तद्भव’ वाला मकड़जाल क्या है. कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘तद्भव’ शब्द ही वास्तव में ‘तत्सम’ हैं और उन्हें संस्कृत में अनूदित करके उनके संस्कृत रूप को ‘तत्सम’ बता दिया गया हो?

भारत में मुंडा भाषाओं का अपना एक परिवार है जिसमें लैंगिक नस्लवाद नहीं है यानि उनमें प्रत्येक शब्द का लिंग निर्धारण नहीं किया जाता. लेकिन संस्कृत और उसके संपर्क में आई भाषाओं में यह घुसा है. “ईंट या कंप्यूटर ऐसी चीजें नहीं है जिनकी पूँछ उठाकर उनका लिंग निर्धारण किया जाए कि यह शब्द पुलिंग है या स्त्रीलिंग.” 

डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह का यह स्पष्ट मत है कि ‘धातुओं का निर्णय शब्दों को मथने के बाद किया गया है. यानी शब्द उसकी धातु की खोज से पहले विद्यमान थे. इसलिए शब्दों की बनावट की व्याख्या करने वाला ‘धातु’ नामक तत्त्व प्राकृतिक नहीं, कृत्रिम है.’

समाजशास्त्रीय संदर्भों में संस्कृति और अतीत का गौरव उन लोगों के लिए आकर्षण का विषय हो सकता है जिनको व्यवस्था ने बहुत सुख सुविधाएं दे रखी थीं और दी हुई हैं. वंचित लोग किसी सांस्कृतिक गौरव को नहीं ढोते. वे तिरस्कार को ढोते रहे हैं.

जहाँ तक शब्द भंडार का सवाल है पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार और रंगकर्मी बलवंत गार्गी ने एक बार कॉफी पीते हुए मुझे कहा था कि ‘किसी गाँव में तरखाण (बढ़ई) के पास जाओ. वो बताएगा कि कौन-सी लकड़ी की किस गंध को क्या कहते हैं’. इससे ही अहसास हो जाता है कि बढ़ई के पास जो शब्द भंडार है वो संस्कृत और नागर संस्कृति वाली साहित्यिक भाषाओं में नज़र नहीं आता. दरअसल वो भाषाएँ श्रमसंस्कृति के शब्द भंडार के मुकाबले बहुत दरिद्र हैं. ज़रा दिमाग़ पर ज़ोर डालिए और बताइए कि बढ़ई या तरखाण (कारपेंटर) को संस्कृत में क्या कहते होंगे?

संस्कृत की धारा से अलग विकसित भारत की मुख्य भाषाओं के लिए ‘अपभ्रंषता’ की हीन दृष्टि क्यों? मूल पंजाबी भाषा का पता पूछना हो तो वह साहित्यक पंजाबी में या पंजाबी व्याकरण की किताबों में नहीं मिलेगा. उसे बहुत ध्यानपूर्वक पंजाब के रोज़मर्रा के ग्रामीण जीवन में प्रयुक्त शब्दों और ध्वनियों में से चुन-चुन कर इकट्ठा करना पड़ेगा. इस विषय में कार्य करते हुए आप जल्दी ही जान जाएँगे कि पंजाबी संस्कृत और पर्शियन से प्रभावित तो हुई है (उनके कई शब्द यहाँ बस गए हैं) लेकिन पंजाबी का मूल स्वरूप प्राकृत और पाली भाषा वाला है. तुहाड्डा (तुम्हारा), थोड्डा (तुम्हारा) शब्द इसके उदाहरण हैं. पंजाबी में दुद्द (जिसे ‘दुद’ की तरह भी उच्चारित किया जाता है) बोलना पारंपरिक रूप से आसान है. दुग्ध नकली शब्द है लेकिन पढ़ाया यह गया कि दुग्ध से बिगड़ कर दुद्द हो गया है. संस्कृत के ‘दुग्ध निर्मित’ शब्द और ‘दुद्दों बण्या’ (दूध से बना) या ‘दुद्द तों बण्या’ (दूध से बना) शब्दों का विकास एक ही पटरी पर नहीं है. ‘दुग्ध निर्मित’ की पटरी अलग है. पंजाब की बोलियों के मूल में बैठे प्राकृत और पाली के शब्द ही ‘तत्सम’ हैं, इसमें संदेह कैसा?

(इस आलेख का प्रेरणा स्रोत डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र है.’ डॉ. सिंह का हृदय से आभार.)

यह लिंक भी देखें :-


10 August 2019

Megh, Meghs and Many Meghs - मेघ, मेघ और मेघम्मेघ

मेघ रेस के बारे में जानकारी जैसे-जैसे बढ़ी उसे इस ब्लॉग पर एकत्रित किया जाता रहा, जैसे कि जम्मू से लेकर कर्नाटक तक मेघ रेस के लोग बसे हुए हैं. मेघवारों के इतिहास से पता चला कि मेघ रेस के लोग बिहार में भी रह रहे हैं. कर्नल कन्निंघम से पता चला कि मेघ नॉर्थ-ईस्ट में भी हैं. जानकारी इकट्ठा करके ब्लॉग लिखता हूं क्योंकि जिज्ञासु शायद उन्हें पढ़ने आ जाते हैं.

दूसरी ओर यह भी दिखता है कि सोशल मीडिया पर लोग इस चीज को लेकर बहस करते हैं कि क्या वाकई ‘मेघ’ एक रेस है? क्या अन्य प्रदेशों में बसे हुए मेघ, मेघवाल और मेघवार लोग एक ही रेस के हैं? बहस करने वालों को इस बात की भी तकलीफ़ होती है कि जो लोग राजस्थान से पंजाब में आकर बसे हैं और जिन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र मिलता है क्या वे भी मेघ हैं या कोई और हैं? कई बार सोशल मीडिया पर उनकी बहस बेस्वादी हो जाती है. वे मामले को कोर्ट तक ले जाने की बातें करने लगते हैं. उनकी मर्ज़ी. इस बहस के पीछे विषय की जानकारी का अभाव हो सकता है. उस अभाव की पृष्ठभूमि में गरीबी (poverty), भौगोलिक दूरी (distance), अनपढ़ता (illiteracy) और गतिहीनता (immobility) दिख सकती है.

पिछले दिनों रतन लाल गोत्रा जी से बातचीत हो रही थी तो उन्होंने लगभग 20 साल पुरानी एक बात सुनाई. उनका छोटा भाई अपने बिज़नेस के सिलसिले में कश्मीर में अनंतनाग जाया करता था जहाँ से वो क्रिकेट बैट बनाने में इस्तेमाल होने वाली विल्लो लकड़ी मँगवाता था. लकड़ी बेचने वालों का एक बड़ा बुज़ुर्ग वहाँ बैठा रहता था. उसने बताया था कि ‘हमारे बुज़ुर्ग जुलाहे थे और हमारे गोत्र आपके (मेघों के) गोत्रों जैसे हैं. हम यहाँ कसबी कहलाते हैं. मुसलमान बनने के बाद हमें यहाँ की मुस्लिम परंपरा के अनुसार कसबी कहा जाने लगा. आप हमारे अपने ही बंदे हो’. उस बुज़ुर्ग का अपना गोत ‘गोत्रा’ था. जम्मू के श्री दौलतराम (कुमार ए. भारती के पिता जी जो भारत विभाजन के बाद दिल्ली में रिसेटलमेंट अधिकारी के तौर पर कार्य कर चुके थे) ने रतन लाल गोत्रा जी को बताया था कि ज़िला मीरपुर (जो अब पाकिस्तान में है और मुज़फ्फ़राबाद के पास है) के इलाके के कसबी हमारे ही लोग हैं. (कसबी फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ हैः- कारीगर artisan, शिल्पी  artificer, व्यापारी trader). कहने का भाव यह कि धर्म परिवर्तन के कारण नामऔर सरनेम बदल सकते हैं लेकिन पुरखों की परंपरा एक ही रही हो सकती है. हाँ, नाम बदल जाने से पहचान कुछ कठिन हो जाएगी. शब्दों का खेल बहुत टेढ़ा है. नाम या उसकी भाव पर आधारित ध्वनि बदलने से, शब्दों के अनुवाद या अनुसृजन से, क्षेत्र बदलने से, बस्ती, खेत, मैदान, पहाड़, नदी, जंगल, व्यवसाय आदि बदलने से पहचान बदल सकती है. मनुस्मृति ने व्यवसाय बदलने की गुंजाइश पर पाबंदी लगा दी थी इसलिए व्यवसाय आधारित जाति की वही पहचान चलती रही जब तक कि जातियों के खंड करके (उनके भीतर विभाजन करके) उनके खंडों को अलग-अलग नाम नहीं दे दिए गए. इसलिए अपने मूल की पहचान को समझते हुए चलना एक ज़रूरत हो सकती है. 


इस बारे में मैंने जो पहले लिखा है उसे दोहरा रहा हूं कि राजस्थान की ओर से आए हुए जो मेघ रेस के लोग अबोहर-फाजिल्का के इलाके में बसे हुए हैं वो हजारों की तादाद में हैं. उनका जाति संबंधी फैसला राजनीतिक निर्णय के तहत पहले से हो चुका है और उन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र कई दशाब्दियों से दिया जा रहा है. मेरा विचार है कि यह बात बहुत स्पष्ट है और विधि सम्मत भी.