18 November 2019

Caste name passing through history - इतिहास से गुज़रता जाति नाम


इंसानी स्वभाव है कि वो जब चीज़ों का अध्ययन करता है तो सहूलियत के लिए उसे हिस्सों में बांट लेता है. जातियों के विभाजन के मुख्य आधार कई हैं जैसे नाम, रूप, रंग, व्यसाय और उससे जुड़ी वस्तुएँ, ध्वनियाँ, भौगोलिक स्थिति, आसपास उपलब्ध चीज़ें, जीव, पेड़, नदी, पहाड़, सामाजिक-राजनीतिक-धार्मिक आंदोलन, या नाम देने वाले का मनोभाव. अपने कबीले और अन्य मानव समूहों की पहचान के लिए अमूमन इन्हीं आधारों पर उनके अलग-अलग नाम रख लिए जाते हैं.

आर.एल. गोत्रा जी ने मेघों के विभिन्न नामों या उनके अन्य प्रचलित नामों की सूची अपने आलेख Meghs of India में दी थी जिसमें ये नाम शामिल किए गए थे:- मद्र, मेघ, मेद, मेदे, भगत, जुलाहा, कबीरपंथी, कसबी, मेध, मेधो, मेगल, मेगला, मींह्ग, मेन, मेंग, मेंह्गवाल, मेथा, मेघोवाल, पंगवाल, पाओली, भाकरी आदि. ये नाम मेघों के साथ किसी न किसी रूप में जुड़े हैं. इतने अलग नामों की पृष्ठभूमि में भौगोलिक, धार्मिक, भाषा-बोली आदि कारण स्पष्ट देखे जा सकते हैं.

डॉ. नवल वियोगी, ताराराम जी और आर.एल गोत्रा जी के दिए संदर्भों के साथ पिछले आलेख मेघ और नाग वंश में चर्चा की गई थी कि प्राचीन काल से ही नाग वंश के अतर्गत आने वाली जातियों और उनके नाम-उपनाम आदि में भेद होता रहा है. एक सूत्र मेघऔरअहि (नाग) मेघशब्द में है. दूसरा सूत्र है महार, मदर (मद्र अथवा मेघों का अन्य नाम), महरा, सलोतरी (साल्व गोत्री जिनका संबंध मद्रों से था) और तक्षक या टाक जनजातियों से जन्मी महार, मराठा, कुर्मी आदि जातियों के साथ-साथ मेघ (कोली). तीसरा सूत्र है महाभारत में उल्लिखित कुनिंद या कुणिंद.

एक अन्य सूत्र गौतम बुद्ध के वंशवृक्ष के हवाले से मिलता है जिसका उल्लेख डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने किया है. वे बताते हैं कि गौतम बुद्ध का जन्म शाक्य वंश में हुआ. शाक्य यानि सागबेरिया या सागबरिया. बुद्ध का ससुराल कोलिय वंश में था यानि कोल, कोली, कील, कोरी, कुरी,कीर, कोइरी, किरार, कुर्मी. बुद्ध की पत्नी गोपा यानि गोप, गोआर, ग्वाल, गड़ेरी.

अब इतने सूत्र मिलने के बाद नागवंश को देखें तो सारा भारत नागमय दिखता है. एक और बात कि इतिहास में पीछे जाएँ तो जातियों की संख्या कम होती जाती है. यानि समय-समय पर जातियों में से जातियाँ पैदा हुईं और उनकी गिनती बढ़ी. अंततः हर जाति अपनी अलग पहचान के साथ ख़ुद को देखने की आदी हो गई और ख़ुद से अलग हुई जाति (अपने टुकड़े) को दूर होते देखती रही, यहाँ तक कि कालांतर में उनकी परस्पर पहचान धुँधली हो गई, बहुत धुँधली.

जातियों और गोत्रों के पुराने नामों का अध्ययन करें तो तार आपस में जुड़ते नज़र आते हैं. इस पोस्ट का प्रयोजन यह कहना है कि भारत में नागवंश कण-कण में व्याप्त है. वो लगभग सारे भारत में बसी शिव (द्रविड़ संस्कृति के सिवन, Sivan) की उस छवि जैसा है जो पौराणिक हो चुकी है और जिसके गले में नाग स्वयं आभूषण रूप में सुशोभित हैं.

13 November 2019

Megh and Naag Vansh - मेघ और नागवंश

मेघों को मेघऋषि से जोड़ने वाली बात मेघ समाजों की लोकस्मृति में रही है.  श्री आर.एल. गोत्रा ने अपने आलेख Meghs of India में ऋग्वैदिक कथाओं का अध्ययन करके वृत्र या प्रथम मेघ को एक ही पात्र पाया है. लेकिन वैदिक कथा के आधार पर उस पात्र के जीवन-काल का निर्णय नहीं किया जा सकता. इसलिए ऐतिहासिक कालक्रम की दृष्टि से वो पात्र सवालों से सर्वथा मुक्त नहीं है. कथा में वृत्र, मेघऋषि या प्रथम मेघ को अहिमेघ (नागमेघ) भी कहा गया है. संभव है ऐसा शत्रुता भाव के कारण कहा गया हो या उसके वंश (नाग वंश) के संदर्भ में उसे अहि (नाग) कहा गया हो.

Dr. Naval Viyogi, D.Litt.
आजकल डॉ. नवल वियोगीD. Litt in History and Culture from the Round Table University, Erazona, U.S.A. की पुस्तक “प्राचीन भारत के शासक नाग, उनकी उत्पत्ति और इतिहास” पढ़ रहा हूँ. वे Director, Indian National Historical Reserch Council (National Award Winner in Research Work, 1986) रह चुके हैं. उक्त पुस्तक के पृष्ठ 141 पर कुछ कड़ियों को डॉ. नवल ने जोड़ा है जो मेरे जैसे पाठक के लिए चौंकाने वाला रहा. उन्होंने बताया है कि नागवंशियों से अनेक जातियाँ निकली हैं जिन्हें आदिवासी होने के कारण चौथे वर्ण में रखा गया. इन जातियों में डॉ. नवल ने अन्य जातियों के साथ-साथ मेघ जाति को भी रखा है. टाक क्षत्रिय शासकों के गोत्रों का उल्लेख करते हुए वे उनके मालव और मद्र गोत्रों का उल्लेख करते हैं. उनका मानना है कि टाक वंश में इन गोत्रों का नाम होना इस बात का प्रमाण है कि ये शाखाएँ ऐतिहासिक सत्य हैं. इनका प्रसार आसाम की नाग जातियों तक है. इसके अलावा इनके गोत्रों की सूची में महार, मदर (मद्र अथवा मेघों का अन्य नाम), महरा, सलोतरी (साल्व गोत्री जिनका संबंध मद्रों से था) वगैरा को उन्होंने उस सूची में रखा है.

अब मद्र, मेघ, मेद, मेदे, ये कैसे जुड़े हैं उसकी व्याख्या इस आलेख में मिल जाती है जो ताराराम जी ने लिखा है. ताराराम जी 'मेघवंश - इतिहास और संस्कृति' पुस्तक के लेखक हैं. इस जानकारी के आधार पर इतना तो कहा जा सकता है कि मेघ वंश और नाग वंश संभवतः एक ही वंश के दो नाम रहे होंगे जैसा कि मेघ और अहिमेघ नामों से प्रकट होता है, या फिर वे दोनों वंश अतीत में निकट संबंधी रहे हैं. डॉ. नवल ने अपनी उक्त पुस्तक में जो जानकारी दी है वो पठनीय है. सुझाव यह है कि रुचि रखने वाले इसे खरीद कर अवश्य पढ़ें.

डॉ. नवल वियोगी नागवंश का इतिहास खोजते हुए महाभारत की कथाओं की उपेक्षा नहीं करते चाहे उनमें पेश की गई तस्वीर धुँधली ही क्यों न हो. उनका मत है कि नाग वंशी अनार्य लोग थे जिनकी उत्पत्ति कश्यप ऋषि से हुई होगी. ये नाग लोग मूल रूप में नाग पूजक थे और नाग कहलाए. नाग पूजा कहाँ से चल कर कहाँ तक पहुँची उसका उल्लेख 
पर्याप्त संदर्भों के साथ इसमें कर दिया गया है. नाग वंशी भारत में कहाँ-कहाँ बसे हैं उसका वर्णन भी इस पुस्तक में है.

पुस्तक की भूमिका में डॉ. नवल लिखते हैं कि तक्षक या टाक जनजातियों से अनेक जातियों का जन्म हुआ है जिनमें कई अन्य जातियों के अतिरिक्त महार, मराठा, कुर्मी आदि जातियों के साथ-साथ मेघ (कोली) भी हैॆं. बुद्ध के जीवन काल (567 से 487 ई.पू) में मद्र लोग बुनकर थे. इसी काल के दौरान टका (तक्षक यानि नागवंशी) लोगों का टका, मेघ या मद्र नाम से विभाजन हो चुका था. कन्निंघम के हवाले से बताया गया है कि जम्मू में दक्षिण के पहाड़ी इलाके में बसी ये जातियाँ पूर्व काल में शासक जातियाँ रही होंगी. उनका ऐसा कथन इस तथ्य को समाहित करते हुए है कि ये जातियाँ श्रम संस्कृति की वाहक थीं.

यौधेयों के साथ संबंध को लेकर डॉ. नवल ने यह जानकारी दी है कि कुषानों को भारत की सीमाओं से जब बाहर निकाला गया तब यौधेयों को कुनिंदाओं ने बहुमूल्य सहयोग दिया. इन कुनिंदाओं का सतलुज और ब्यास के बीच के ऊपरी क्षेत्र पर अधिकार था. बनावट और सजावट के नज़रिए से उनके सिक्के उसी काल के यौधेयों के सिक्कों जैसे ही थे जो दर्शाता है कि यौधेयों के साथ उनके रिश्ते गहरे थे. ये कुनिंदा बुनकर थे जिनके बारे में कहा गया है कि उनका जन्म मद्रों से हुआ था और वे उसी क्षेत्र के थे जिस पर मद्रों का शासन रह चुका था.

अपनी इस पुस्तक में डॉ. नवल यह मान कर चले हैं कि भाषा की दृष्टि से संस्कृत पहले आई थी और पाली बाद में. यानि संस्कृत के शब्द बिगड़ कर पाली बनी. भाषाविज्ञान की जो बातें डॉ. नवल के समय में पढ़ाई जा रही थीं उसके अनुसार उनका वैसा सोचना-मानना ठीक कहा जाएगा. लेकिन इस बीच जो नया शोध हुआ उसके अनुसार प्राकृत और पाली के कई शब्दों को संस्कृत के अनुकूल बना (adapt) कर उनका स्वरूप बदला गया और नतीजतन उनके मतलब बदल गए. उन्होंने जिस कालखंड के मेघों के संदर्भ में चाणक्य का उल्लेख किया है वो भी अब सवालों के घेरे में है. आधुनिक इतिहासकारों ने चाणक्य नामक पात्र की ऐतिहासिकता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं. काश ये जानकारियाँ डॉ. नवल के जीवन काल उन्हें उपलब्ध हो गई होतीं. ख़ैर!     

पुस्तक पढ़ते समय इस बात को ध्यान में रख कर पढ़ना चाहिए कि इसमें मेघों या मद्रों का उल्लेख विभिन्न नाग वंशी जातियों की उत्पत्ति और इतिहास के संदर्भ में हुआ है. इसमें अपना इतिहास ढूँढने के लिए अपने अध्ययन के औज़ारों को पास रखना होगा.

(15-11-2019 नोटयद्यपि नवल जी की उक्त पुस्तक में 'कुनिंदा', 'कुनिंदाओं' जैसे शब्द का प्रयोग हुआ है तथापि मुझे इस शब्द की वर्तनी (स्पैलिंग) को लेकर कुछ संशय था. महाभारत में कुछ ऐसा ही शब्द कभी पढ़ा था. ढूँढने पर पता चला कि वो शब्द 'कुनिंदा' न हो कर 'कुनिंद' है जिसे महाभारत में 'कुणिंद' लिखा गया है. इसका कारण अंग्रेज़ी में इसकी वर्तनी Kuninda हो सकती है.)

मेघ सभ्यता







प्राचीन भारत के शासक नाग, उनकी उत्पत्ति और इतिहास

लेखक - डॉ. नवल वियोगी
प्रकाशक - सम्यक प्रकाशन, 32/3, पश्चिम पुरी, 
नई दिल्ली-110063
मूल्य : Rs.300/-

मोबाइल - 9818390161, 9810249452




03 November 2019

My Religious Journey - मेरी धार्मिक यात्रा




बालपन का मन-मस्तिष्क कैमरे की डिस्क जैसा होता है जिस पर ज़िंदगी के अक्स छपते जाते हैं.

अमृतसर का नवांकोट, सामने मैदान और किला और आगे शीतला मंदिर. माता-पिता कभी शीतला मंदिर और कभी स्वर्ण मंदिर ले जाते थे. ये स्थान मेरे लिए घूमने की जगह थे जहाँ रौनक रहती थी. मेरी कुंडली शीतला मंदिर के किसी ज्योतिषी ने 34 रुपए में बनाई थी. बहुत अच्छी-अच्छी बातें लिखी थीं. एक बार माँ के साथ स्वर्ण मंदिर से लौटते हुए देखा बाज़ार में दो जुलूस आमने-सामने आ गए. एक जुलूस (सिखों का) नारा लगा रहा था- ‘पंजाबी सूबा’ और दूसरा (हिंदुओं का) नारे का जवाब दे रहा था- ‘महापंजाब’. दोनों तरफ़ के आगू उछल-उछल कर नारे लगा रहे थे. मां ने मुझे बाजू में भर कर सड़क के किनारे खींच लिया और एक मकान के थड़े पर हम खड़े हो गए. लोगों ने दरवाज़े बंद कर लिए हुए थे. हमारे पीछे भी दरवाज़ा था जो बंद था. कुछ ही देर में दरवाज़ा खुला और सीढ़ियों से उतरी एक अमृतधारी सिख महिला ने कहा- बहन जी अंदर आ जाओ. ये लोग पता नहीं क्या करेंगे. ऊपर की मंज़िल पर उसने हमें अपने ड्राइंग रूम में बिठाया था. जब शोर थमा तो हम बाहर निकल कर घर आए. अगले दिन पिता जी अखबार पढ़ कर बता रहे थे- ‘जुलूस के दौरान सोडावाटर की बोतलें भी फेंकी गईं जिससे कई लोग घायल हो गए’. यह धार्मिक-राजनीतिक घृणा से मेरी पहली मुलाकात थी. उस अमृतधारी सिख महिला की छवि और उसकी सहज प्रेममयी आवाज़ याद है. धार्मिक-राजनीतिक घृणा के शोर में धर्म उस महिला के रूप में वहाँ मौजूद था.

रामपुरा फूल में मेरा दाख़िला सरकारी स्कूल में हुआ. वहाँ सुबह असैंबली में प्रार्थना कराई जाती थी- ‘दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना, दया करना हमारी आत्मा को शुद्धता देना’. बहुत सुरीला गीत था लेकिन न मुझे आत्मा का पता था न परमात्मा का न प्रभु का. ख़ैर! रोहतक के माडल टाऊन में जहाँ हम रहते थे उसके पीछे ही राम मंदिर था. वहाँ मोहल्ले के अन्य बच्चों के साथ जाता, प्रसाद लेता और जब भी कोई कथावाचन होता तो सुनने चला जाता था. एक साल यह चलता रहा. समझ में कुछ आता था ऐसा तो मैं नहीं कह सकता लेकिन निश्चल हो कर कहानी सुनने का कुछ अनुशासन आ गया. निश्चल हो कर (कुछ न करते हुए) थोड़ी देर बैठना बेहतर जीवन के लिए दिए जाने वाले प्रशिक्षण का एक अंग है.

लड़कपन से किशोरावस्था में प्रवेश करने का समय टोहाना में आया. यह वो समय था जब चीन ने आक्रमण किया था. ऑल इंडिया रेडियो और नवभारत टाइम्स (सुबह होते ही जिसकी मैं प्रतीक्षा करता था) के द्वारा हम बच्चे देशप्रेम को जान रहे थे. पिता जी ने बताया था कि देश की रक्षा पहला धर्म होता है. देशप्रेम सबसे बड़ा धर्म होता है.

बचपन का यह बहुत नाज़ुक समय रहता है. अक़्ल की नसें फूटती हैं. स्मरणशक्ति ज़बरदस्त होती है. बच्चा प्राकृतिक रूप से जिज्ञासु होता है. उसके आने वाले जीवन की दिशा इसी आयु में स्पष्ट होने लगती है.

टोहाना का वह सरकारी स्कूल इस मायने में बहुत महत्वपूर्ण था कि वहाँ के हेड मास्टर श्री नागपाल स्कूल में कई प्रकार के धार्मिक कार्यक्रम कराते रहते थे. टोहाना में जैनियों की अच्छी संख्या थी. जैन साध्वियाँ वहाँ आती थीं. उनकी मीठी वाणी और शुद्ध हिंदी बहुत आकर्षित करती थी - ‘मैं विद्यार्थिनी होने के नाते यहाँ आई हूँ’. योग सिखाने वाले आते थे. कई तरह के साधु आते थे. उनमें से कइयों के मुकाबले मैं योगासन अधिक सहज तरीके से कर लेता था. एक बार काली और लंबी दाढ़ी वाला एक भगवा वेषधारी साधु आया जिसकी हमारे अंग्रेज़ी के तेज़ तर्रार मास्टर श्री चेतराम जी से अंग्रेज़ी में बहस (झड़प कहना भी ठीक होगा) हो गई. चेतराम जी बहुत फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलते थे इसलिए हम हिंदी स्कूल के बच्चे उनकी अंग्रेज़ी समझ नहीं पाए. लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज से यह समझ आ रहा था कि वे उस साधु पर बहुत आक्रामक थे और साधु के पास कोई जवाब न होने से उसके चेहरे का रंग फीका पड़ता जा रहा था. हमें लगा कि साधु में दम नहीं है. उसी दिन शाम को एक मंदिर में हरमिलापी जी महाराज का सत्संग था जहाँ मैं उत्सुकतावश अकेले ही चला गया. मैं काफी आगे जा कर बैठा. हरमिलापी जी के सत्संग के दौरान अचानक कुछ हलचल हुई, लोगों के मुँह से वाओ जैसी आवाज़ निकली और हरमिलापी जी ने प्रसन्न हो कर किसी के लिए आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया. जिधर उनका हाथ उठा था मैंने उधर पीछे मुड़ कर देखा तो महिलाओं और पुरुषों के बीच बने रास्ते में एक साधु हाथ जोड़ कर खड़ा था. वो वही साधु था जो दिन में मास्टर चेतराम जी के वचनों से हत्प्रभ हो चुका था. मेरा मन पशोपेश में पड़ गया. जो साधु हमारे टीचर का सामना नहीं कर सका था वो यहाँ सम्मानित हो रहा था. यहाँ शिक्षा के महत्व को मैं रेखांकित कर रहा हूँ. कहने का सार यह कि हरमिलापी जी महाराज और उस साधु की उपस्थिति को भव्य बनाता वातावरण वहाँ था और मेरे मन में मास्टर चेतराम जी भी उपस्थित थे.

टोहाना के उस स्कूल में पढ़ते समय एक वायलिन जैसा वाद्य यंत्र बजाने वाला कलाकार दो बार आया था. वो राष्ट्रगान को ठीक 52 सेकेंड में बजाता था. आखिर में उसका एक प्रिय भजन होता था जिसके बोल थे- ‘जब तेरी डोली निकाली जाएगी, बिन मुहूरत के उठा ली जाएगी’. उसके गाने का स्टाइल मन में वैराग्य भरता था. इन्हीं दिनों पिता जी अपने समय के महान योगी स्वामी व्यास देव उर्फ़ स्वामी योगेश्वरानंद सरस्वती 1008 जिन्हें बाद में भावसमाधि के अभ्यास के कारण परमहंस भी कहा गया था, उनकी तीन बृह्दाकार पुस्तकें लाए- ‘बहिरंग-योग’, ‘आत्म-विज्ञान’ और ‘ब्रह्म-विज्ञान’. ‘बहिरंग-योग’ में यम, नियम, आसनप्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि को जिस भाषा में उन्होंने समझाया था वह कठिन नहीं थी. ‘आत्म-विज्ञान’ और ‘ब्रह्म-विज्ञान’ समझने की कोशिश की लेकिन उनकी भाषा और उसका अर्थ मेरी पहुँच से बाहर था. लेकिन ‘बहिरंग-योग’ के प्रभावाधीन मैं योग और आंतरिक अभ्यास की ओर प्रवृत्त हुआ. तब मैं सातवीं कक्षा में था. किशोरावस्था आ चुकी थी. इस आयु में सेक्स सहित मन के विभिन्न निकायों (विचारों कह लीजिए) का विकास हो रहा होता है. समाधि में साधन के समय जिस प्रकार के हमारे विचार-वृत्तियाँ होती हैं उन्हें बल मिल जाता है. इससे मुझे आगे चल कर कुछ हानि उठानी पड़ी और फ़ायदा भी हुआ. कालेज के दिनों में एक अवसर पर चंडीगढ़ में स्वामी योगेश्वरानंद जी के शिविर में उनसे मिलने का अवसर मिला. इस शिविर का आयोजन उस समय चंडीगढ़ के एसपी रहे श्री भनोट ने किया था. योगेश्वरानंद जी ने प्राणायाम और आंतरिक साधनों के बारे में कुछ अनुदेश दिए. अगले दिन लाला लाजपतराय भवन, सैक्टर 15 में उनका व्याख्यान सुना. योगियों की दृढ़ इच्छा शक्ति के उन्होंने उदाहरण दिए. बाकी अब याद नहीं. उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था. अच्छा स्वास्थ्य धर्म का महत्वपूर्ण अंग है.

फिर से टोहाना लौटता हूँ जहाँ से एक अन्य रास्ता निकला जब पिता जी स्वामी योगेश्वरानंद जी की पुस्तकें तो लाए ही थे साथ ही उन दिनों किन्हीं साधुओं के बताने पर वे उच्च आध्यात्मिक शिक्षा के लिए होशियारपुर के बाबा फकीर चंद के संपर्क में आए या कहना चाहिए कि चले गए और उनके हो रहे. फकीर चंद जी की फोटो हमारे घर में विराजमान हो गई. 1966 में पिता जी ने मुझे चंडीगढ़ में मेरे बड़े भाई के पास छोड़ा जहाँ मेरा दाखिला डीएवी कालेज में हुआ. वहाँ धार्मिक शिक्षा के अंतर्गत सत्यार्थप्रकाश नामक पुस्तक पढ़ाई जाती थी. सत्यार्थप्रकाश में आर्यसमाज के नियम दिए गए थे. अन्य कई संस्थाएँ जो किसी धर्म का प्रचार करती हैं उनके साहित्य में संस्था या धर्म के नियम लिखे रहते हैं. नियम से तात्पर्य एक विशेष अनुशासन से होता है जो उस संस्था के संपर्क में आने वाले के लिए प्रस्तावित होता है. वो चाहे तो संस्था के साथ निबाहने के लिए उन्हें माने. मेरे सामने कई अन्य संस्थाओं के नियम आए. उनमें से कई नियम ऐसे भी होते हैं जो आपको कुछ सिखाने की बजाय आपके व्यवहार को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं. कुछ नियम आपको मानसिक गुलाम, यहाँ तक कि जोकर बना देने की क्षमता रखते हैं. कहते हैं कि धर्म में पैदा होना अच्छी बात है लेकिन धर्म में ही मर जाना बुरी बात. इसका अर्थ साधारणतः यह है कि वो धर्म अच्छा जो बंदे को ज़िंदगी जीने और तरक्की का रास्ता दिखाने के बाद बंदे को उसकी आज़ादी वापस कर दे ताकि वो परिवर्तनशील दुनिया के साथ चलता रह सके.

भाई साहब ने डेरा ब्यास के बाबा चरण सिंह जी से नामदान लिया हुआ था और उनके कायल थे. मैंने बाबा जी के दो-एक सत्संग सुने हुए हैं. भाई साहब समाधि भी लगाते थे. भिवानी से रिटायर होने के बाद पिता जी चंडीगढ़ में अपने घर न आ कर सीधे होशियारपुर में बाबा फकीर के आश्रम में चले गए जहाँ उन्होंने अपना एक कमरा और रसोई बनवा ली थी. बड़े भाई साहब ही मुझे पहले पहल होशियारपुर के उस आश्रम में ले गए थे और मैंने फकीर चंद जी को देखा और उनके कुछ सत्संग सुने जो आसान और बोलचाल की भाषा में थे. फकीर चंद जी उत्साह देने वाली बातें करते थे. रियारमेंट के बाद पिता जी का सादगी भरा जीवन वहाँ आश्रम में देखा. उसके बाद तो हर साल मैं गर्मियों की छुट्टियों में दो-दो महीने के लिए उस आश्रम (मानवता-मंदिर) में जाता रहा और फकीर चंद जी के काफी सत्संग बहुत चाव और लगन से सुने. फकीर चंद जी ने अपने सत्संगियों को हिदायत दी थी कि उनकी अनुपस्थिति में वे भगत मुंशी राम के साथ बैठ कर साधन-अभ्यास किया करें. ज़ाहिर है कि पिता जी आंतरिक अभ्यास के बहुत अनुभवी थे. फकीर चंद जी ने मुझे सुमिरन और ध्यान करने के निर्देश दिए. बाद में आगे चल कर पिता जी ने बहुत ऊँची समाधि की ओर जाने के लिए कहा.

चंडीगढ़ में कालेज के दिनों में अपने जीजा जी (श्री सत्यव्रत शास्त्री) के संपर्क में भी कई साल रहा जो आर्यसमाजी थे और पुरोहिताई का कार्य भी करते थे. सैक्टर-22 की आर्यसमाज में स्वामी अग्निवेश के आठ-दस दिनों के एक शिविर में मैंने हिस्सा लिया. तब स्वामी अग्निवेश आर्यसमाज के लिए बहुत काम कर रहे थे. आज मैं स्वामी अग्निवेश को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जानता हूँ और उनका सम्मान करता हूँ. वे कई नामी-गिरामी भगवाधारी लोगों के मुकाबले बेहतर कार्य कर रहे हैं. बंधुआ मज़दूरों की मुक्ति के क्षेत्र में उनका कार्य उन्हें कई भगवा धारियों से अलग और ऊँची जगह देता है. समाज-सेवा धर्म का अभिन्न अंग है.

चंडीगढ़ में रहते हुए कुछ साल मैं आर्यसमाज और बाबा फकीर चंद के बीच झूलता रहा. चूँकि पिता जी का झुकाव फकीर चंद की ओर था इसलिए मैं भी वैचारिक रूप से उधर झुकता चला गया. यहाँ फकीर चंद जी के बारे में वो विशेष बात बता देना चाहता हूँ जो उनकी अपनी ज़बान से सुन रखी है. फकीर चंद जी जाति के ब्राह्मण थे. एक दृष्य के द्वारा उनकी भेंट अपने गुरु से हुई जो जाति के कायस्थ थे और राधास्वामी संत्संग आगरा के सत्संगी रह चुके थे. फकीर चंद जी के होशियारपुर सेंटर (मानवतामंदिर) को ब्राह्मणों का केंद्र माना जाता था. यहाँ अभिवादन के तौर पर ‘राधास्वामी’ कहने की परंपरा थी. फकीर चंद जी के सत्संग इस मायने में महत्वपूर्ण थे कि उनके व्याख्यानों में एक बात बार-बार बहुत साफ़ कही जाती थी कि “जब मुझे मालूम हुआ कि मेरा रूप लोगों में प्रकट हो जाता है और वो मैं नहीं होता, इस बात ने मेरे जीवन का तख़्ता बदल दिया”. मैं अक्सर सोचा करता था कि मुहावरा तो तख़्ता पलट दिया होता है तो फकीर चंद जी तख़्ता बदल दिया क्यों कहते हैं. बाद में समझ आया कि तख़्ते से उनका तात्पर्य ‘बैनर’ से था. हज़ारों बार मेरे कानों ने वो बात सुनी और वो चित्त में बैठती चली गई. इसका अंतिम परिणाम यह निकला कि जब भी कहीं पढ़ता-सुनता कि किसी के यहाँ कोई रूप, मूर्ति या चीज़ प्रकट हुई है तो मैं समझ जाता था कि या तो कहीं मन का खेल (प्रोजेक्शन) हुआ है या फिर किसी इंसान ने ही कोई नया जाल बिछाया है.

मुंबई में नौकरी के दौरान मेरे एक मित्र अब्दुल हमीद ख़ान मुझे ब्रह्मकुमारियों के केंद्र में ले गए जहाँ मैंने कुछ दिन का एक पाठ्यक्रम (कोर्स)-सा किया. वहाँ मन (विचारों) के प्रबंधन के तौर-तरीके सिखाए गए. जिन्हें मैं उपयोगी मानता हूँ. विचार-प्रबंधन के वो तरीके दरअसल मैं कुछ मैनेजमेंट प्रशिक्षण कार्यक्रमों के दौरान जान चुका था. एक मैनेजमेंट गुरु ने कहा था कि आपकी जो भी इच्छा हो या जो भी आप करना या बनना चाहते हों उसका एक 3डी चित्र अपने मन में बना कर रखें. इसे फकीर चंद जी ऐसे समझाते थे, "जो भी तुम को माँगना हो उसकी फोटो बना कर अपनी खोपड़ी में रखो". बात एक ही थी. बहरहाल मैंने बीके (ब्रह्मकुमार) का कोर्स तो अटैंड कर ही लिया था.

ऊपर की बातों से ज़ाहिर है कि मेरे धार्मिक मन को अधिकतर बाबा फकीर पर ठहरने का मौका मिला. यह चांस की बात रही. वरना मन पर धार्मिक संस्कार तो कई प्रकार के थे. मेरा उद्देश्य यहाँ अपनी धार्मिक यात्रा को समझना है. फकीर को मैं आज भी याद करता हूँ. वे इतने खुले थे कि उनकी खूबियों और कमियों को भी गिना जा सकता है. डेविड सी. लेन के डिस्कशन ग्रुप में बहुत विस्तार से उनका उल्लेख आ चुका है. सिर्फ इतना जानना काफी है कि फकीर का बार-बार यह कहना कि ‘मैं किसी के अंतर नहीं जाता’ मेरे दिमाग़ में घर कर गया और उसने मेरे धार्मिक जीवन को रोशन और समतल कर दिया. कोई और मेरे मन के मैदान में चोरी से घुस नहीं सका. नो चांस.

फकीर चंद जी के निधन के बाद मुंशीराम जी चंडीगढ़ में अपने घर आ गए. उनके दैनिक कार्यक्रम नियमित रूप से चलते थे. लगभग आठ साल उनकी सेवा करने का अवसर मुझे मिला फिर नौकरी के सिलसिले में मुझे चंडीगढ़ से बाहर जाना पड़ा. इस दौरान उनसे बहुत कुछ जानने-सीखने को मिला. एक विशेष उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ. श्री मुंशीराम जी आंतरिक अभ्यास और समाधियों के बहुत अनुभवी थे. कई लोग उनसे मार्गदर्शन लेने आते थे. एक बार मैंने उनसे पूछ लिया कि सबसे बढ़िया समाधि कैसी होती है तो उन्होंने कहा कि जब हम ऑफिस में काम करते हुए किसी समस्या को सुलझाने में लगे होते हैं और मन उसमें पूरी तरह लगा होता है तो जिस हालत में उस समस्या का समाधान मिल जाता है वही सबसे बढ़िया समाधि होती है. यह बात मैंने गाँठ बाँध ली और कभी ऊँची समाधियों के चक्कर में नहीं पड़ा. मन लगा कर कोई कार्य करने से बेहतर और कौन-सी समाधि हो सकती है.
    
अब 69 साल का होने वाला हूँ. धर्म की बातें सुन-सुन कर पक चुका हूँ. लेकिन चौकन्ना रहता हूँ. पिछले दिनों मैं एक मित्र से मिलने जालंधर गया तो वहाँ डॉ. आंबेडकर भवन में लगी बुद्ध की मूर्ति के सामने उनके साथ ग्रुप फोटो खिंचवाई और उसे सोशल मीडिया पर शेयर किया. एक रिश्तेदार ने वो फोटो देखी और पूछा कि बौध हो गए हो क्या? उसकी आवाज़ में एक व्यंग था जिसे मैं जड़ तक समझता हूँ. उसी प्रसंग में कई बातें याद हो आईं. हमारे पूर्वजों को मंदिरों में घुसने की मनाही थी. पुरोहित वर्ग हमारी जातियों से दूर ही रहता था. सोचता हूँ तब हमारे पूर्वजों को धार्मिक शिक्षा कहाँ से मिलती थी? उनका सादगी और प्रेम भरा निश्छल व्यवहार किससे प्रेरित था? यम और नियमों की गढ़त से निखरा उनका सामाजिक व्यवहार किसका ऋणी था? मेरे माता-पिता, संबंधी-मित्र मुझे कई धार्मिक स्थानों पर ले कर गए लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैंने वहाँ से कुछ महत्व का सीखा. अधिकतर धार्मिक स्थान एक प्रोपेगंडा के सहारे चलते हैं. उनके साथ कुछ चमत्कारों की कहानियाँ जोड़ दी गई होती हैं. कुल मिला कर एक प्रकार का व्यवसाय उन स्थानों पर चलता है. अपने जीवन के लिए महत्व का जो सीखा वो या तो माँ ने बचपन में अपने प्यार-दुलार से सिखाया या आगे चल कर स्वामी योगेश्वरानंद के साहित्य और कुछ बाबा फकीर की संगत से सीखा. फकीर ने तो हिदायत कर दी थी कि तुम जवान हो, खूब पढ़ो और बढ़ो. उस समय की मेरी आयु और ज़रूरतों को भगती की आवश्यकता नहीं थी. मैंने जीवन में बहुत पढ़ा, बहुत सीखा. उससे लाभ मिला.

आगे के जीवन में और अधिक अध्ययन करने के बाद यह जाना कि जीवन की गढ़त करने वाले यम-नियम तो धम्मपद में उल्लिखित हैं और उनका व्यवहारिक ज्ञान बचपन में मेरी साक्षर-भर माँ मुझे पहले ही दे चुकी थी. माँ धम्मपद के बारे में कुछ भी जानती थी ऐसा मुझे नहीं लगता. ‘बहिरंग-योग’ (अष्टांगयोग) से माँ के दिए ज्ञान की पुष्टि मात्र हुई थी. माँ को वो सब किसने सिखाया? यह सहज सवाल है. मुझे नहीं लगता कि माँ का अपना कोई सर्कल अपने समाज से बाहर किसी अन्य धार्मिक समूह में था. मोहल्लों की कीर्तन मंडलियों की मैं बात नहीं करता जो मोहल्ला पोलिटिक्स का निर्माण करती हैं. मेरा मानना है कि माँ को वो सब उस सामाजिक-धार्मिक परंपरा से प्राप्त हुआ था जिसकी जड़ें देश की उस सभ्यता में हैं जिसे आजकल बौध-सभ्यता कहा जाता है. इंसानों और पशु-पक्षियों के प्रति करुणा और सेवा का पाठ माँ ने पढ़ाया. उधर फकीर चंद जी की संगत से मैंने जाना कि मन में किसी का रूप प्रकट होना धार्मिक लूट का मुख्य आधार है. जब इतना हो गया तो फिर मूर्ति पूजा या उससे संबंधित अन्य प्रकार के धार्मिक क्रियाकलापों से मेरा संबंध टूटना तय ही था. धार्मिक लूट से बचा रहा. यह बड़ी बात रही. यानि प्रत्यक्ष में मेरा नास्तिक-जैसा हो जाना कुदरती था. मेरी बनावट कुछ ऐसी ही हो चुकी थी. फकीर चंद जी के गुरु शिवब्रतलाल जी उन्हें कहते थे कि पिछले जन्म में मैं बुद्ध था और तुम भिक्षु आनंद थे. उनकी इस बात को मैं धम्म प्रवाह की कथा के रूप में सुनता हूँ. डेविड सी. लेन ने फकीर चंद जी की रेखांकित शिक्षाओं में एक तिब्बतन भिक्षु को देख लिया था.

इस यात्रा का परिणाम यह रहा कि किसी तरह की धार्मिक भटकन बाकी नहीं रही. धार्मिक यात्रा मुझे फिर से माँ तक ले आती है जिसने बचपन में मुझे बाहर से थपेड़ कर भीतर से मज़बूत किया. वो कभी किसी आडंबर में नहीं पड़ी. इस प्रक्रिया में मैं अकेला नहीं था और माँ भी अकेली नहीं थी. उसके साथ उसके जैसी लाखों अनपढ़ या साक्षर-भर मेघ माताएँ और मेघ बच्चे थे और करोड़ों हो चुके हैं जिन्होंने अपनी सभ्यता को बिना किसी कर्म-कांड के प्रेमपूर्वक संजोए रखा है. मुझे कुछ अलग बनने की ज़रूरत महसूस नहीं होती. मैं एक तरह का धर्मरहित धार्मिक बंदा बन चुका हूँ जो पुनर्जन्म के विचार तक से मुक्त है.

आज इतना भर जानता हूँ कि माँ का बनाया हुआ रास्ता स्वयं मुझे उठाए फिरता है.

30 October 2019

The King Priest of Mohanjodaro - मोहनजोदड़ो का राजपुरोहित


इसी साल 24 मार्च 2019 को और पिछले साल 17 नवंबर 2018 को आदरणीय डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने एक ही विषय पर दो पोस्टें डाली थीं. विषय था मोहनजोदड़ो के तथाकथित राजपुरोहित (King priest) की वह विश्व प्रसिद्ध मूर्ति जो कराची के म्यूज़ियम में रखी है वह किसकी मूर्ति हो सकती है या है. मोहनजोदड़ो में इस मूर्ति के अतिरिक्त मिली अन्य मूर्तियों का आपस में मिलान और बुद्ध की मूर्ति से मिलान करने के बाद उनका मानना है कि यह मूर्ति बुद्ध की मूर्ति के स्टाइल की है. इस बारे में अंतिम निष्कर्ष क्या होगा पता नहीं लेकिन मूर्ति के माथे पर बना कुकुध और बैठने की मुद्रा भी बुद्ध की ओर संकेत करती है.

इस संदर्भ में मुझे एक मेघ ऋषि मंदिर में स्थापित फोटो का ध्यान हो आया जो मोहनजोदड़ो की उक्त मूर्ति का रूपांतरण (adaptation) प्रतीत होता था. उसकी अन्य छवियाँ भी तैयार की गई थीं. ऐसा भी होता है कि हम कभी किसी छवि को प्रतीक बना कर एक अर्थ विशेष में उसका प्रयोग करते हैं लेकिन बाद में होने वाला शोध उसे अलग अर्थ दे सकता है हालाँकि आस्था का तत्त्व उसमें स्थाई रह सकता है. इस निगाह से देखें तो प्रतीकात्मकता (symbolism) में अर्थ विस्तार की संभावनाएँ बरकरार रहती हैं. ऋषियों-मुनियों की प्रतीकात्मक छवियों (images) में भी परिवर्तन होता रहता है. कहीं कुछ जोड़-दिया जाता है और कहीं कुछ घटा दिया जाता है ताकि वो समय के अनुसार नया अर्थ दे सके.

फेसबुक पर कभी एक सज्जन ने पूछा था कि तुलसी दास के चित्र में कलम, दवात और पुस्तक भी रखी रहती है तो कबीर के चित्र में बीजक नामक ग्रंथ और कलम-दवात क्यों नहीं रखी जा सकती? रखी जा सकती है. कौन रोकता है? कबीर का चित्र उनके ज्ञान के अनुरूप होना ही चाहिए.