19 November 2017

Divorce? - तलाक?

एक समय था जब हमारे समाज में तलाक़ जैसे मामले नाममात्र के ही थे. वैसे भी वे अदालतों में नहीं जाते थे. पत्नी से संतान नहीं हुई, पति संतान नहीं दे सका, या जीवन साथी किसी भयंकर बीमारी का शिकार हो गया - ऐसे कारणों से शादीशुदा महिलाएँ और पुरुष एक दूसरे से अलग होते रहे हैं. बुज़ुर्ग कहते रहे हैं कि अगर मियां-बीवी में नहीं ही बनती है तो बेहतर है अलग हो जाओ. समाज बहुत समझदार होता है.

लेकिन पिछले चार-पाँच दशकों से तलाक़ के मामले बढ़े हैं. हिंदू मैरिज एक्ट ने मानसिकता को काफ़ी बदला है. तलाक़ के चल रहे एक मामले में मैंने परेशान पति से पूछा कि क्या उसकी पत्नी हिंदू मैरिज एक्ट का हवाला देती है? उसने हामी भरी. मेरे मुँह से निकल गया कि ‘देन विश यू ऑल द बेस्ट’. उनमें तलाक़ हो गया. यदि किसी के हाथ में हिंदू मैरिज एक्ट की कापी दिख जाए तो उसे ख़तरे की निशानी समझें 😜.

अब बच्चे बहुत पढ़-लिख गए हैं इसलिए किसी उपदेश की ज़रूरत नहीं. लेकिन कुछ संकेत कर देना ठीक होगा. अधिकतर मन-मुटाव छोटी-छोटी बातों पर होते हैं जैसे किसी बात पर वाद-विवाद करना और अपने विचार एक-दूसरे पर थोपने की कोशिश करना, अपने ‘कहने का मतलब’ समझाना वगैरा. ये गुस्से की वजह बन सकते हैं. लेकिन ज़रूरी नहीं कि वहाँ आपसी प्रेम की कमी ही हो. जयशंकर प्रसाद ने लिखा है-
जिसके हृदय सदा समीप है
वही दूर जाता है,
और क्रोध होता उस पर ही
जिससे कुछ नाता है.

झगड़े बढ़ भी सकते हैं. पत्नी मायके चली जाती है और बच्चे टुकुर-टुकुर पप्पा की ओर देखते हैं. प्यार की पप्पी, लाड़-दुलार की झप्पी काम नहीं करती. नाटककार भुवनेश्वर ने कहा है कि यदि शादी के एक वर्ष के अंदर पति-पत्नी का झगड़ा नहीं होता तो उन्हें मनोचिकित्सक (psychiatrist) से सलाह करनी चाहिए. उनके ऐसे असामान्य (abnormal) व्यवहार का इलाज ज़रूरी है. आपसी झगड़े और रार आमतौर पर नार्मल होती है. बस, उसे खींचना नहीं चाहिए.


यदि आप दोनों मियाँ-बीवी आपस में बहसबाज़ी करते हैं, झगड़ते हैं तो बधाई ले लीजिए. मनोचिकित्सकों ने आपकी पीठ थपथपाई है. वे कहते हैं कि जो प्यार दिल (💓) और तितलियों (🦋) से शुरू होता है वो वाद-विवाद (😈) तक स्वभाविक ही पहुँच जाता है. दरअसल यह आपसी संप्रेषण (communication) विकसित होने की प्रक्रिया (process) है. इसमें कुछ चुनौतियाँ हैं. प्रेम, एक-दूसरे का सम्मान ज़रूरी शर्त है. वो बरकरार रहना चाहिए. मनोचिकित्सकों का कहना है कि जो जोड़े तर्क-वितर्क, बहस करते हैं वास्तव में वे एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं. एक आलेख का लिंक नीचे दिया है इसे पढ़ लीजिए और आपसी समझ बढ़ाइए.


15 November 2017

It is enough - इतना काफ़ी है

इंसान का धरती पर चलना धरती के इतिहास में बहुत पुरानी घटना नहीं है. भाषा का विकास, धर्म का उदय, उधार लेने का प्रचलन, पूंजी निर्माण और पूँजीवादी व्यवस्था को तो एकदम आधुनिक ही कहा जाएगा. इंसानों ने कृषि की या कृषि ने इंसानों को पालतू बना लिया यह विषय सुनने में कठिन ज़रूर लगता है लेकिन किसानों की आत्महत्याओं ने इसे सरल बना दिया है. कृषि और अनाज संग्रहण में इंसान की बहुत-सी समस्याओं की जड़ें मौजूद हैं. पूँजीवाद भी अपनी शुरुआत वहीं से मानता है.
आजकल हम फैक्ट्रियों में बना हुआ भोजन खाने लगे हैं. ऑर्गेनिक खेती के उत्पादों की ओर लपकना नया शौक है चाहे महँगा है. कृषि और फैक्टरी से आ रही खाने-पीने की चीज़ों में कैमिकल्ज़ का इस्तेमाल बढ़ाया गया है जो चरिंदों, परिंदों के साथ-साथ इंसानी शरीर की कैमिस्ट्री पर भारी पड़ रहा है. चीनी और फैट्स ने शारीरिक मोटापा दिया. दूसरी ओर सूचना उद्योग (यानि पुस्तकों, अख़बारों, पत्रिकाओं, पोर्न, टीवी, इंटरनेट) ने हमें अच्छा-ख़ासा दिमाग़ी मोटापा बख़्शा है. जी हाँ, वही जंक फूड, आप जानते ही हैं.
सुना है चिकित्सा-विज्ञान मनुष्य के लिए अमरत्व के तारे तोड़ कर ला रहा है. लेकिन हर देश में युद्धों की तैयारियाँ हो रही हैं इस पर हैरानगी बिलकुल नहीं होती. कृषि और औद्योगिक क्रांति के साइड इफैक्ट्स अब इंसानियत के साथ धोखाधड़ी के तौर पर देखे जा रहे हैं.
प्रकृतिवाद अपनी शिकायत भरी नज़र से पूँजीवाद को तरेरता है. पूँजीवाद यह कह कर पल्ला झाड़ लेता है कि जनसंख्या बढ़ने से धरती पर जो जीवन का बोझ बढ़ता है उसे धरती झेल पाए उसका इकलौता उपाय पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है. मार्क्सवाद उसके आसपास मंडराता रहता है, "मैं अभी यही हूँ." पूँजीवाद हँस कर जवाब देता है, "भाई, खड़ा रह, मुझे क्या."
अब सरकारें सोचती है कि वे क्या करें सिवाय इसके कि अगर लोग जनसंख्या पर ख़ुद नियंत्रण नहीं रखते तो क्यों न उन्हें वहाँ छोड़ दिया जाए जहाँ शिक्षा और चिकित्सा खर्चीली हो, सस्ते मज़दूर हमेशा उपलब्ध रहें, बाज़ार के आशा-निराशा के खेल में वे जीवन भर भक्ति और दर्शन पेलते रहें. कुछ पैसा मिलता रहे, जाता रहे, उधारी-चुकौती चलती रहे. इतना बहुत होता है आम आदमी के लिए. रह गया जनसंख्या नियंत्रण का काम, बंदा न करे तो उसे औद्योगिक और कृषि क्रांतियों के साइड इफ़ैक्ट्स पर छोड़ दिया जाए. प्राकृतिक आपदाएँ कुछ मदद कर देंगी. हथियार और बिगड़ता पर्यावरण भी आबादी कम करने में योगदान देगा. कुपोषण के अलावा इंसान का शारीरिक और दिमाग़ी मोटोपा भी सहायक होगा. तो फिर समस्या किस बात की है? सारा इंतज़ाम तो हुआ पड़ा है. बस ख़ुश रहा करो.



07 November 2017

Myth of Sudama - सुदामा का मिथ

कृष्ण और सुदामा का प्रसंग जो भक्ति साहित्य ने दिया है वो भावुकता भरा है इसीलिए अविश्वसनीय है. एक शक्तिशाली राजा अपने पुराने सहपाठी (क्लासफैलो) की आवभगत करने के लिए भावविह्वल हो कर रोता हुआ,भागता हुआ बाहर आए और उसे अपने सिंहासन पर बिठाकर उसके पांव धोए ऐसा संबंध सहपाठियों में तो नहीं देखा जाता. कथा में कुछ लोचा है. कुछ लोचा कवि सूरदास के पदों में भी है जहाँ वे कृष्ण और सुदामा के मिलन प्रसंग का वर्णन ऐसे करते हैं :-
अब हम जानी तुमहिं वो मूरख
कहाँ रहे तुम कहाँ बसत हो
सुधरे हो या निरे भगत हो।
घरबार संगहिं तुमहिं रहत हो
करम से का तुम अभहिं बचत हो
(अर्थ - अब मैं पहचान गया हूं कि तुम वही मूर्ख हो. बताओ, अब तक तुम कहाँ रहे और अभी कहाँ रहते हो. तुम्हारे अंदर कुछ सुधार हुआ है या अब भी तुम केवल भक्त ही हो. तुम घर-परिवार के संग ही रहते हो या नहीं. और परिश्रम से क्या तुम अभी पहले की ही तरह बचते हो?)
बात समझ में आती है. सुदामा ब्राह्मण था इसलिए कई बातें संकेत रूप में समझ आ जाती हैं. लेकिन शक्तिशाली यदुवंशी राजा कृष्ण उसके पाँव आखिर क्यों धोएगा? नए संदर्भों में यादव यह सवाल पूछने लगे हैं. इसे भी टटोलने की जरूरत है कि सूरदास ने सुदामा को ‘निरे भगत’ क्यों कह दिया. अगर भक्त सूरदास का यह हाल है तो बाक़ी भक्तों का क्या होगा. कबीर को तो मैं 'भक्त' नहीं मानता बल्कि 'मुक्त' मानता हूँ. उनका समय 'मुक्तिकाल' था.
सूरदास का पद Mahendra Yadav जी ने उद्धृत किया है और यह उन्हीं की पोस्ट का पश्चप्रभाव है.

02 November 2017

Advocate Hans Raj Bhagat - Some records - एडवोकेट भगत हंसराज - कुछ रिकार्ड


श्री आर एल गोत्रा जी ने ही सबसे पहले एडवोकेट हंसराज भगत जी के बारे में जो बताया था वो मैंने यहाँ दर्ज कर दिया था. जो छुटपुट बातें अन्य से प्राप्त हुई उसे भी साथ ही दर्ज कर दिया. पहला रिकार्ड लुधियाना के श्री सुरजीत सिंह भगत से मिला. उन्होंने तब की पंजाब विधानसभा के सदस्यों की एक फोटो उपलब्ध कराई थी. उन्होंने यह भी बताया कि उनको मिली जानकारी के अनुसार भगत हंसराज जी का बेटा इंडियन एयरलाइंस में था. आज (01-11-2017) को जोधपुर से ताराराम जी ने एक पुस्तक के कुछ पृष्ठों की फोटो प्रतियां भेजी हैं जिनमें तब की पंजाब विधान सभा का कुछ रिकार्ड उपलब्ध है. उससे पता चलता है कि एडवोकेट भगत हंसराज उस विधान सभा के मंत्रीमंडल में पार्लियामेंट्री प्राईवेट सेक्रेटरी रहे थे. नई जानकारी के संदर्भ में आज फिर गोत्रा जी से बात हुई. उन्होंने बताया कि भगत हंसराज भगत का उल्लेख अमेरिका के महान विद्वान मार्क योर्गन्समायर (Mark Juergensmeyer) की पुस्तक ‘रिलीजियस रिबेल्स ऑफ पंजाब’ में भी आया है. उन्होंने यह भी कहा कि जालंधर के कुछ आर्यसमाजी मेघ कहते हैं कि भगत हंसराज ने मेघों को आर्यनगर की ज़मीन का वाजिब हक़ दिलाने के लिए जो मुक़द्दमा किया था उस पर अदालती निर्णय न हो कर बाहर ही समझौता हो गया था. इसकी पुष्टि की जानी बाकी है. कुछ और विवरण ताराराम जी से प्रतीक्षित है.








गज़ट के नीचे बाईं ओर भगत जी के नोटरी के तौर पर नियुक्त होने की बात का उल्लेख है.
This is screenshot from the book 'Religious Rebels of Punjab' written by Mark Juergensmeyer