06 November 2018

Meghs and their ancestry - मेघ और उनकी वंश परंपरा

(आदरणीय प्रो. के.एल. सोत्रा जी को संबोधित एक पोस्ट)

आदरणीय गुरु जी,
   जहां तक मेघ ऋषि का सवाल है मैंने अपने दादाजी से और पिताजी से सुना हुआ है कि हम किसी मेघ ऋषि की संतानें हैं. अब इस बारे में अधिक कहने से पहले इस चीज़ को देखना ज़रूरी है कि जातियों के इतिहास में मेघ ऋषि के बारे में क्या कहा गया है. हमारे समुदाय के लिए मेघ ऋषि का नाम नया नहीं है. राजस्थान के मेघवाल मेघ ऋषि को अपना वंशकर्ता मानते हैं. गुजरात में भी मेघ ऋषि को मेघ रिख कहा जाता है और वह उनके लिए एक पूजनीय व्यक्तित्व है और संभवत वंशकर्ता भी है. मेघ ऋषि को अपना आराध्य मानने वाले ओडिशा में भी हैं. मेघवारों का मेघ रिख बिहार की ओर से आता है और गुजरात में अपना राज्य स्थापित करता है. कौशांबी से ऐसे सिक्के मिले हैं जिन पर मेघ और मघ सरनेमधारी राजाओं के नाम अंकित हैं. मेरी मां के कुछ रिश्तेदार हैदराबाद सिंध (अब पाकिस्तान के सिंध प्रांत में) रहते थे. अन्य मेघ भी वहाँ रहते होंगे ऐसा अनुमान है. हिंदू परंपरा के मेघों के बारे में जोशुआ प्रोजेक्ट काफी कुछ कहता है. सिख परंपरा के मेघों के बारे में भी जोशुआ प्रोजेक्ट जो तस्वीर देता है वो रुचिकर है. हलाँकि इस प्रोजेक्ट के तहत दर्शाए गए आंकड़े बहुत पुराने प्रतीत होते हैं.
   मेघ भगतों में मेघ ऋषि की पूजा की कोई परंपरा मैंने नहीं देखी और न सुनी. जहां तक मेरी जानकारी है राजस्थान में भी मेघ ऋषि की पूजा परंपरा पुरानी नहीं है. पिछले एक-दो दशकों में ही इसे जयपुर में श्री गोपाल डेनवाल और श्री आर.पी. सिंह के नेतृत्व में शुरू होते देखा गया और पंजाब के अबोहर में भी इसकी शुरुआत देखी गई जिसमें श्री हरबंस मेघ की भूमिका प्रमुख दिखी. पूजा की वह परंपरा कितनी विस्तृत है मैं नहीं जानता. मैं आपके और सुभाष जी के साथ सहमत हूं कि मेघ और मेघवाल नाम से दोनों अलग-अलग जातियां हैं, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए लेकिन साथ ही इस तथ्य को भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत में किसी वंश के तहत कई जातियाँ बनाने की परंपरा है. उनमें से कई जातियों का वंशकर्ता पुरुष एक ही होता है इस प्रकार से मेघ जातियों का मूल एक ही है. उदाहरण के तौर पर प्राचीन काल में हमारे यहां नागवंशी राजाओं का साम्राज्य रहा है लेकिन आज हम पाते हैं कि नागवंश से निकली हुई कई जातियां भारत भर में फैली हुई हैं. भौगोलिक दूरियों के कारण वे आपसी पहचान खो चुकी हैं. लेकिन वे हैं और उनके वंशकर्ता भी साझे हैं. प्रसिद्ध इतिहासकार नवल वियोगी ने उन पर शोधकार्य किया है और विस्तार से उल्लेख किया है. मेरा मानना है कि हमें नागवंश और मेघवंश के तहत आने वाली जातियों के बारे में और अधिक अध्ययन करना चाहिए और अपनी जानकारी बढ़ानी चाहिए.  केवल विवाद खड़ा करने से कुछ नहीं होता. इन विषयों पर, विशेषकर व्हाट्सएप जैसी जगह पर हम जो समय और ऊर्जा बर्बाद करते हैं वह ठीक नहीं है. 
   एक मेघ दूसरे राज्य में जाकर यदि मेघवाल जाति के नाम का अपना जाति प्रमाण-पत्र बनवा लेता है तो उसे संदेह की दृष्टि से देखा जा सकता है. लेकिन यदि किसी राज्य में बहुत समय पहले से और समय-समय पर आकर 50-60 हजार मेघ बस जाते हैं लेकिन उस राज्य विशेष की अनुसूचित जातियों की सूची में मेघ जाति नहीं हैं तब भी उनका वह बड़ा समूह अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर जाति के लिहाज से एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है. उस हालत में उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर राजनीति तय करती है कि उन्हें कौन-सी श्रेणी में रखा जाए और उन्हें जाति के नज़रिए से कहाँ रखा जाए. ज़ाहिर है इस बारे में कुछ प्रक्रियाएँ भी होंगी. पंजाब में बसे मेघवालों की कितनी संख्या है और उन्हें राजनीतिक निर्णयों ने कहाँ रखा है, ऐसी जानकारियाँ नागरिक की पहुँच से बाहर नहीं हैं.
   मेघवंश की जातियों में गोत्रों की असमानता  होना कोई समस्या नहीं है. किसी वंशकर्ता का गोत्र कुछ देर चलता है फिर तीन-चार पीढ़ियों के बाद कई कारणों से गोत्रों के नाम बदल जाते हैं. एक गोत्र का गाँव बस जाए तो आगे चल कर गाँव के नाम पर ही एक अलग गोत्र चल पड़ता है. रोज़गार दाता के नाम से भी गोत्र चले हैं. गोत्रों के बारे में कुछ अधिक जानकारी आपको इस लिंक से मिल जाएगी  गोत्र प्रथा.
   जहाँ तक 'मेघ-धर्म' की बात है इसकी एक शुरुआत हमारे ही समुदाय के श्री गिरधारी लाल डोगरा (सेवानिवृत्त आयकर आयुक्त) ने 'मेघ मानवता धर्म' नाम से शुरू की थी. उनकी अवधारणा (कन्सेप्ट) बहुत बड़ी है और उसकी शुरुआत उन्होंने तत्संबंधी अंतर्राष्ट्रीय निर्धारक नियमों और शर्तों के हिसाब से की थी. उसके प्रचार के लिए उन्होंने अपनी एक संस्था का विस्तार भी किया है. उनसे भी पहले कई अन्य जातियों के बुद्धिजीवियों ने अपनी जाति को ही धर्म बताया. 'जाट धर्म' की बात जाट करते रहे हैं. मैं समझता हूँ कि इसके पीछे यह मानसिकता रही हो सकती है कि भारतीय समाज में व्यवसाय को भी धर्म कहा जाता रहा है. इस नज़रिए से या उसके प्रभावाधीन किसी ने 'मेघ धर्म' या 'जाट धर्म' कह दिया तो कोई हैरानगी की बात नहीं है. मेघों की अपनी कबीलाई और सभ्याचारक परंपराएँ तथा जीवन शैली है उन्हें भी धर्म कहने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है. वो उनका अपना लाइफ़ स्टाइल (जीवन शैली) है और सुप्रीम कोर्ट ने 'हिंदू' को धर्म न कह कर जीवन शैली बता दिया है. इस पर विमर्ष आगे भी चलता रहेगा.
   रही बात हरबंस मेघ जी की तो सीधी सी बात है कि वे कोई फ़िनॉमिना नहीं है बल्कि मेघ फ़िनॉमिना का हिस्सा हैं. ऐतिहासिक दृष्टि से वे हमारे अपने ही वंश के हैं. हम एक ही वंशकर्ता के वंशधर हैं. वे हमारे अपने लोग हैं.
  

19 October 2018

Megh Dynasty - A Historical Dynasty - मेघ वंश - एक ऐतिहासिक राजवंश

सदियों से गरीबी की मार झेल रही जातियां अपना अतीत ढूंढने के लिए मजबूर हैं ताकि वे अपने आपको समझ सकें. इस बारे में एक बहुत ही अद्भुत फिनॉमिना है कि वे लोक-कथाओं के ज़रिए आपस में राजा-रानी और राजकुमार-राजकुमारी की कहानियां सुनाते हैं. सुनते हुए वे खुद की और अपने माता पिता की पहचान राजा-रानी या उनकी संतानों के रूप में करते हैं. यह प्रवृत्ति सारी इंसानी ज़ात में देखी जाती है. यदि किसी को मालूम हो जाए कि उसके पुरखे कभी, किसी समय, किसी इलाक़े के शासक थे तो उसे कैसा महसूस होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है. उसे थोड़ी बहुत हैरानगी और खुशी भी होगी कि उसकी जमात में बहुत क्षमताएं रही हैं. लेकिन वो जानना चाहेगा कि किस कारण से उनकी क्षमताएँ संकुचित हो गईं. हालांकि पहले भी मैंने इस ब्लॉग पर कुछ पोस्ट लिखी हैं जो बताती हैं कि मेघवंशी जातियों के पुरखे कभी शासक रहे हैं. उन पोस्टों पर यद्यपि किसी ने कमेंट नहीं किया लेकिन टेलीफोन पर कई प्रतिक्रियाएं मिलीं. उनमें से एक मज़ेदार प्रतिक्रिया यह भी थी कि कुछ बच्चे उन पोस्टों को पढ़कर बिगड़ गए और फिजूलखर्ची पर उतर आए (यानि मेरी पोस्ट को दोषी करार दिया जा रहा था :)). मैं नहीं समझता यदि बच्चों का पालन-पोषण सही तरीके से हुआ है तो वे ऐसी किसी पोस्ट को पढ़कर बिगड़ ही जाएंगे. यह सब कुछ यदि मेरे ब्लॉग पर ना भी रहता तो भी, कहीं ना कहीं, किसी न किसी जिज्ञासु बच्चे के हाथ में आ जाता. बच्चों का रास्ता उनका परिवेश तय करता है. मेघ वंश के राजाओं के बारे में हाल ही में जो विस्तृत सामग्री मिली है वो जोधपुर के श्री ताराराम (जिन्होंने मेघवंश - इतिहास और संस्कृति नाम की पुस्तक लिखी है) के ज़रिए मिली है. उन्होंने इतिहास की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. साधना मेघवाल के शोध-पत्र की फोटो प्रतियां भेजी हैं जिन्हें आप नीचे दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं. यह शोध-पत्र 'राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस' (जो राजस्थान के इतिहासकारों का एक मंच है) के एक अधिवेशन में प्रस्तुत किया गया था. ध्यान रहे कि इस शोध-पत्र में दिए गए संदर्भ नामी-गिरामी इतिहासकारों की पुस्तकों से लिए गए हैं. लिंक नीचे हैं. डॉ. साधना मेघवाल को बहुत बहुत धन्यवाद.

12 October 2018

Social Work v/s Politics - सामाज सेवा बनाम सियासत

राजनीति दुनिया के चार बड़े धंधों में से एक है. राजनीतिज्ञ (politician) किसी विचारधारा पर चलता है लेकिन समझौते भी करता चलता है, वह विचारधारा से हट भी जाता है ताकि सत्ता में बना रहे. उसके वादे कोई गारंटी नहीं देते. उसके अस्तित्व की सार्थकता सत्ता में या सत्ता के पास रहने में है. वह मुद्दों की छीना-झपटी करता है और मुद्दों का उत्पादन करता है. वह कसम तो संविधान की खाता है लेकिन कार्य पार्टी के एजेंडा पर करता है, जैसे - युद्ध, दंगे, गाय, हिंदुत्व, धर्म आदि. उसका कार्यकर्ता (political worker, activist) उसके एनेक्सचर-सा होता है, स्थान दोयम दर्जे का और कुल मिला कर इस्तेमाल करके फेंक देने वाली चीज़. राजनीतिज्ञ की पहचान उसकी राजनीतिक समझ है और राजनीतिक कार्यकर्ता अपनी सामाजिक सक्रियता और सामाजिक कार्य से सम्मान पाता है. अपने नेता की गलती का परिणाम जनता के साथ-साथ कार्यकर्ता को भी भुगतना पड़ता है. जब कोई कार्यकर्ता ख़ुद राजनीतिज्ञ बन जाता है तो समाज को सीधे तौर पर नुकसान होता है. राजनीतिज्ञ और उसके कार्यकर्ताओं के मुकाबले सामाजिक कार्यकर्ता अधिक सम्मान का हक़दार है.


03 October 2018

Dr. Ambedker and Sir Chhotu Ram - डॉ आंबेडकर और सर छोटूराम


किसी भी व्यक्ति को उसकी दो-एक बातों के संदर्भ में नहीं बल्कि उसके संपूर्ण कथन या वांग्मय से जानना चाहिए. युवावस्था में उसने चाहे जो भी अच्छा कहा हो उसकी उन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए जो वह अपने क्षेत्र में परिपक्व होने के बाद कहता है. सर छोटूराम ने अपने जीवन में एक सामाजिक क्रांति ला दी थी जिससे वंचित समाज को लाभ हुआ. उनका जीवन लंबा रहा होता तो कम से कम उत्तर भारत में उनके कार्य का प्रभाव बहुत व्यापक रूप से पड़ा होता. प्रभाव तो आज भी है. ध्यान से देखें तो डॉ. आंबेडकर के कई कार्यों में सर छोटूराम की विचारधारा को भी शामिल देखा जा सकता है. इस विषय पर और अधिक अध्ययन की ज़रूरत है.