15 August 2017

Bahujan Media - बहुजन मीडिया


पिछले दो दशकों के दौरान लगातार सुनने में आता रहा कि दलित साहित्य की एक अलग श्रेणी बन रही है. फिर दलित साहित्य अकादमी की बात चली. दलित साहित्य के साथ-साथ ओबीसी साहित्य की बात होने लगी. कबीर बहुत ही सुविधापूर्वक खिसक कर ओबीसी साहित्य में चले गए. इसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रमुख भूमिका रही. आख़िर कबीर की वाणी में प्रयुक्त बिंब और प्रतीक मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं.  
अब बात करते हैं दलित मीडिया की. सामान्य तौर पर देखा जा रहा मीडिया चाहे वो इलैक्ट्रॉनिक हो या प्रिंटेड उसमें बहुजन की बात अक्सर नहीं होती. यहां एक बहुत बड़ा गैप था जिसे भरने के लिए कई उत्साही लोग और समूह सामने आए. ऐसे चैनलों में से सबसे पहले ‘नेशनल दस्तक (National Dastak)’ का नाम आता है जिन्होंने YouTube पर अपना मीडिया खड़ा करने का सफल और सशक्त प्रयास किया है. मेरी जानकारी के अनुसार दूसरे नंबर पर आवाज़ इंडिया है जिसके फॉलोअर एक लाख पचपन हज़ार हैं. उनके साथ ही ‘दलित दस्तक’ ने भी YouTube पर अपनी हाजिरी दर्ज कराई. श्वेता यादव ने ‘टेढ़ी उंगली’ नाम से कई राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने का कार्य शुरू किया है. मेघ समुदाय से श्री सतीश ‘विद्रोही’ ने जम्मू से अपना एक यूट्यूब चैनल Young India चलाया है. फिलहाल यह न्यूज़ चैनल नहीं है लेकिन कभी स्थानीय समाचारों और समस्याओं पर खुल कर बोलता है.
चैनल चलाने के लिए Facebook ने भी 'फेसबुक लाइव' नाम से एक मंच दिया है जिस से कोई भी किसी घटना को सीधे अपने फेसबुक दोस्तों तक लाइव पहुँचा सकता है.
जितना मैंने देखा है फेसबुक के लाइव स्ट्रीम का प्रयोग प्रचार के लिए अधिक हुआ है. नोटबंदी के बाद से MOJO (mobile journalism) का प्रयोग देखा है. ज़रूर कई कैमरामैन बेरोज़गार हुए होंगे. लब्बोलुआब यह कि प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में ‘बहुजन मीडिया’ या ‘बहुजन एंकरों’ और पैनलों में 'बहुजन' की हाजिरी चाहे बहुत कम हो लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहुजन मीडिया की मंथर गति ध्यान खींचती है. ऐसा देखने में आया है ‘नेशनल दस्तक’, ‘आवाज़ इंडिया’, ‘पल-पल न्यूज़ (P2N)’ और ‘दलित दस्तक’ ने अपनी पत्रकारिता में परिपक्वता दिखाई है. मेरी नज़र से नेशनल दस्तक काफी ताक़तवर हो कर उभरा है जिसके आज 4 लाख 19 हज़ार से अधिक सब्स्क्राइबर हैं.

बहुजन मीडिया अस्तित्व में आया है यह बड़ी बात है. चलते-चलते और एक बात. सभी चैनलों का लगाव किसी न किसी सियासी पार्टी से होता है. उनके चैनल का रंग भी पार्टी के पसंदीदा रंग से प्रेरित हो सकता है. रंगों के मामले में EO&E (भूल-चूक लेनी-देनी). 🙂

11 August 2017

एक और पड़ाव

मुश्किल तो है पर ऐसी मुश्किल भी नहीं जिसका अनुमान न लग सके या उसे जीया ना जा सके. शरीर एक तरफा (वन वे) टिकट लेकर आया हुआ है उसी दिशा में उसे बढ़ना है. लौटने का रास्ता बना नहीं.
मैंने इंटरनेट पर काफी यात्रा की है. थका हुआ भी महसूस करता हूं लेकिन जो मिशन लेकर चला था उस पर कुछ कार्य किया है, कुछ और कार्य करने का विचार अभी बाकी है. यह एक यायावरी है. सामने रास्ता है तो चलने को दिल करता है. कुछ और आगे दिखता है तो उस ओर बढ़ जाता हूँ. लगता है यह लक्षण ठीक ही है. आने वाले दिनों में आँख का ऑपरेशन है. कुछ दिन चिट्ठाकारिता (ब्लॉगिंग) से दूर रहना होगा. डॉक्टर ऐसी सलाह देते हैं. पहले एक ऑपरेशन करवाया था तो आँख की सीमाओं का पता चला था लेकिन चलने का जुनून खींचता रहा.
आशा है सीमाओं का वो भरम भी मिटता रहेगा. ब्लॉगिंग की यात्रा में मेरे पुराने सहयात्रियों अमृता तन्मय, दिगंबर नासवा और महेंद्र वर्मा जी के लिए शुभकामनाएँ. मुझे ब्लॉगिंग सिखाने वाले श्री राजकुमार ‘प्रोफेसर’ का आभार व्यक्त करता हूँ. ब्लॉगिंग की राह अभी बाकी है. जल्दी ही मिलेंगे.

06 August 2017

Social Media a must - सोशल मीडिया एक ज़रूरी चीज़



अधिक जानकारी देने वाला अंग्रेज़ी में लिखा एक आलेख आप ऊपर फोटो पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं..

25 July 2017

Excessive thinking - अति सोच


किसी भी उड़ने वाले और छोटे दिखने वाले पक्षी को चिड़िया कह दिया जाता है. दूसरे प्रकार की अभिव्यक्ति में ‘ब्राह्मणी चिड़िया’ जैसा शब्द है. कभी-कभी मैं भी ‘मेघनी चिड़िया’ कह देता हूं. यह प्रेम और मासूमियत की देन है. चिड़िया एक छोटी-सी चोंच भी हो सकती है और एक ‘पिद्दी’ का शोरबा भी.
एक अन्य संदर्भ में चिड़िया 'विचार' है. तनाव (टेंशन) को लेकर एक मैनेजमेंट गुरु ने इस तरह समझाया था, “इंसान का दिमाग़ एक घोंसले की तरह है जिस के आसपास विचारों की चिड़ियाएँ उड़ती रहती हैं. आपस में झगड़ती हैं अपनी जगह बनाने के लिए. क्योंकि दिमाग़ का घोंसला आपका है इसलिए आपकी मर्ज़ी है कि किस चिड़िया को आप वहाँ बैठने देते हो. चिड़िया अधिक हो गई तो आप के घोंसले में घमासान मचेगा. टेंशन हो जाएगी. इसलिए उसी चिड़िया को वहां बैठने दो जिसे आप वहाँ बैठने देना चाहते हो.”
बहुत सुकून मिला था ऐसे गुर (गुरु) की प्राप्ति पर. लेकिन रिटायर हो कर हम फँस गए गुरु जी. मोबाइल टावर लगने के बाद शहर की सारी चिड़िया लुप्त हो गई. दूसरी ओर टावर के ज़रिए फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप्प के तहत जैसे चिड़ियों के अनगिनत ब्रीडिंग सेंटर खुल गए. अब दिमाग में चीं-चीं, चैं-चैं, कैं-कैं चलता ही रहता है. ख़बरिया चैनल, फिल्मी चैनल और विज्ञापन ग्ड़ैं-ग्ड़ैं करते रहते हैं. अब गुरु जी का कहना है कि केवल ब्लॉगिंग पर ध्यान दो. ठीक है, जैसी मैनेजमेंट गुरु की आज्ञा !

तो वाट्सएप्प उड़, ट्विटर उड़, फेसबुक उड़. यूट्यूब उड़ ! 🕺