07 June 2019

Your Cultural Capital - आपकी सांस्कृतिक पूँजी


जून का पहला हफ्ता है. सुबह के पौने पाँच बजे हैं. पक्षियों की 'गुड मॉर्निंग' और 'हैलो-हाय' शुरू हो चुकी है और मैं व्हाट्सएप खोल कर बैठ गया हूँ. एक ग्रुप है जिसमें रात की 'गुड नाइट' से पहले मेघ-जन एक दूसरे को तल्ख़ी और ज़िम्मेदारी के साथ से पूछ रहे थे कि- "तुम बताओ, तुमने बिरादरी के लिए क्या किया." इस सवाल पर लंबी बातचीत आख़िर 'गुड नाइट' पर ही ख़त्म होनी थी, हो गई. रात को जो सवाल सो गया था उसका प्रभात भी होना था, हुआ. समाचार-पत्र जैसा सुप्रभात. दशकों पहले समाचार-पत्रों में एक विज्ञापन आया करता था जिसमें खूबसूरत-सा एक राजनीतिक नारा होता था- "यह मत सोचो कि देश ने तुमको क्या दिया, यह सोचो कि तुमने देश को क्या दिया है." नारे का महकता गुलाब सीधा दिल पर आ गिरता था और दिल से आवाज़ आती थी, "सच्ची यार, आदमी को सोचना तो येई चइये कि उसने देश को क्या दिया." बच्चों का और युवाओं का बहुत कुछ देने को दिल कर आता है लेकिन क्या दें इसकी समझ नहीं होती. बात एक वलवला बन कर दिल में रह जाती है. मोटा-मोटी हम जो कार्य करते हैं वो हम देश को देते हैं और हमें जो मिलता है वो देश से मिलता है. सिंपल. सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पूँजी के क्षेत्र में यदि कोई बिरादरी गरीबी रेखा से कुछ ऊपर हो तो एक-दूसरे से कोई तीखे तेवर से नहीं पूछेगा कि 'तुमने बिरादरी के लिए क्या किया.' गरीबी रेखा से नीचे है तभी यह सवाल बनता है. तो...चलो जी वहाँ....वो...देख लेते हैं एक नेता ने कम्युनिटी सेंटर बनवा दिया, श्मशान घाट में बेंच बनवा दिए और शानदार वाशरूम भी, नेता ने एक सामाजिक संगठन खड़ा कर दिया, कबीर मंदिर बनवा दिए, सालाना शोभायात्राएँ निकाल दीं, वगैरा. लेकिन चुनाव में बिरादरी ने उसे जिताया नहीं, हराया भी नहीं बल्कि हरवा दिया. यह सांस्कृतिक और राजनीतिक पूँजी के अभाव की वजह से होता है. इसे वोटिंग वाले लोकतंत्र में किसी बिरादरी के वोटों के बिखराव यानि सियासी ग़रीबी के रूप में पहचाना जाता है. व्हाट्सएप ग्रुप में हो या वो सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गली-नुक्कड़ वाली चिल्लर बहस में हो, उसमें जब कोई पूछता है कि 'तुमने बिरादरी के लिए क्या किया' तो इसे झगड़ा नहीं बल्कि सूचनाओं के आदान-प्रदान की प्रक्रिया का हिस्सा मानना चाहिए. यह एक-दूसरे को और ख़ुद को जानकारियाँ दे कर मज़बूत करने की कोशिश होती है. ढीले ढँग से इसे 'केंकड़ाना टाँग खिंचाई' कह देते हैं लेकिन यह शुरुआती संघर्ष है जो अलग-अलग तौर-तरीक़े से होता है और दिखता ज़रूर है. यहाँ तक कि चलते-चलते ताने कसने वाले एक तरह से आपको अपने भीतर से मिलती ताकत का स्रोत बनने लगते हैं. यदि आपने अपनी बिरादरी के लिए सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पूँजी के रूप में कुछ भी संचय करने की दिशा में कार्य किया है तो पक्की बात है कि आपने देश के लिए कुछ किया है और देश को कुछ दिया है. चलिए 'पूँजी' के अर्थ जान लेते हैं. (आगे जो लिखने जा रहा हूँ उसके बारे में दिल में एक डर-सा है. काश इसे सरल शब्दों में लिख सकता. परिभाषाओं के साथ अधिक छेड़-छाड़ नहीं हो सकती क्योंकि ये महीन धागे के अनुशासन में बुनी होती है.)

छात्र जीवन से ही परिभाषाओं के बोझिल शब्दों से डरता हूँ. लेकिन अब शब्दों की जमा पूँजी ने डर कम कर दिया है. लेकिन शब्दों की व्हेट लिफ़्टिंग आज भी करनी पड़ती है.😉

1. तो, सभ्याचारक पूँजी (cultural capital) की परिभाषा को समझते हुए चलना ज़रूरी है जिसे कुछ ऐसे समझाया गया है:- सभ्याचारक पूंजी में एक व्यक्ति की सामाजिक संपत्ति (तालीम, अक़्ल, बोल-वाणी और पोशाक का स्टाइल आदि) शामिल होते हैं जो एक स्तरीकृत (stratified) समाज में सामाजिक गतिशीलता (social mobility) को बढ़ावा देती है. (यानि आप उनकी मदद से समाज में अपना काम-काज आसानी से कर सकते हैं). (यह) सभ्याचारक पूँजी रिवाज़ों की एक अर्थव्यवस्था (विनिमय प्रणाली) के भीतर एक सामाजिक रिश्ते के रूप में कार्य करती है, और इसमें बिना फ़र्क के सभी चीज़ें और प्रतीकात्मक सामान (symbolic goods) शामिल होते हैं, जिसे समाज विरल और प्राप्त करने लायक समझता है. विनिमय (एक्सचेंज) की एक प्रणाली के भीतर एक सामाजिक रिश्ते के रूप में, सभ्याचारक पूंजी में एकत्रित सभ्याचारक ज्ञान शामिल होता है जो सामाजिक हैसियत (social status) और ताकत देता है. (यहाँ पूँजी को ज्ञान, गुण, अभिव्यक्ति, प्रभावोत्पादकता, प्रस्तुतीकरण आदि के रूप में भी देखें).

2. सियासी पूंजी राजनीतिक सिद्धांत में इस्तेमाल एक रूपक (metaphor) है जो रिश्तों, विश्वास, सद्भावना, और राजनेताओं या पार्टियों और अन्य हितधारकों (stakeholders), जैसे घटकों के बीच प्रभाव के ज़रिए बनी ताक़त और संसाधनों के संचय की अवधारणा के लिए उपयोग किया जाता है. राजनीतिक पूंजी को एक प्रकार की मुद्रा के रूप में समझा जा सकता है, जिसका इस्तेमाल मतदाताओं को जुटाने, नीति सुधार, या अन्य राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है. हालाँकि, पूंजी का शाब्दिक रूप नहीं है, लेकिन सियासी पूंजी को अक्सर एक तरह के ऋण, या एक संसाधन (resource) के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसे बैंक किया जा सकता है (संभाल कर रखा जा सकता है, उस पर भरोसा किया जा सकता है), खर्च या गलत तरीके से खर्च किया जा सकता है, निवेशित (invest) किया जा सकता है, खोया जा सकता है और बचा कर भी रखा जा सकता है.

कुछ विचारक प्रतिष्ठित (reputational) पूँजी और प्रतिनिधि (representative) राजनीतिक पूंजी में अंतर करते हैं. प्रतिष्ठित पूंजी एक राजनेता की विश्वसनीयता और दृढ़ता को संदर्भित करती है. इस तरह की पूँजी को निरंतर नीति पोज़िशनिंग करके और वैचारिक नज़रिए को बनाए रख कर संचित किया जा सकता है.

10 May 2019

Unity of Meghs - मेघों की एकता - 2

तो भाई साहब, 'मेघों में एकता क्यों नहीं होती' वाला सवाल सदियों पुराना है लेकिन इस सवाल की अहमियत आजकल चुनावों के दौरान कुछ ज़्यादा है. अब टिकट न मिलने के कारण कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं में निराशा और हताशा है और वे इस मुद्दे को यह कह कर समाज पर डाल रहे हैं कि 'समाज में एकता नहीं होती'.
मेघ समाज में एकता न होने का कारण ढूंढने निकलो तो बताते हैं कि एकता कैसे हो जब मेघ समाज के नाम ही चार हों. मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा (हाल ही में ‘आर्यसमाजी’ नाम भी बताया गया है लेकिन इसमें अपेक्षानुसार गंभीरता नहीं थी). मतलब यह कि चार नामों में बँट चुके समाज में एकता कैसी? रूप-रंग की बात यदि छोड़ दी गई है तो यह नाम का सवाल भी कम महत्व का नहीं है.

राजनीतिक नज़रिए से धर्म बांट देने वाला तत्त्व है. उधर राजनीति और धर्म के बाज़ार में एकता नहीं बेची जाती, एकता का नारा ज़रूर बेचा जाता है, यह दुनियावी सच्चाई है. आदर्श राजनीतिक दलों से बँधे लोग आमतौर पर दूसरों से एका करते नहीं दिखते चाहे राजनीतिक दलों के टॉप के नेता शाम को एक टेबल पर बैठकर व्हिस्की लेते हों और मुर्गे-शुर्गे खाते हों. उनमें एक ख़ास तरह की एकता होती है. एडवर्ड गिब्बन ने कहा है, "आम लोग धर्म को सच मानते हैं, समझदार उसे झूठ मानते हैं और शासक उसे उपयोगी मानते हैं." 

एकता के सिद्धांत
एकता के कुछ सिद्धांत ढूंढे गए हैं. पहला सिद्धांत यह है कि उन समूहों में एकता होती है जो दिखने में समरूप (similar) हों यानी शारीरिक रूप से उनमें कुछ समानताएं ज़रूर हों. साथ ही इनमें आर्थिक समरूपता (similarity), भावनात्मक समरूपता, पहचान की समरूपता, सांस्कृतिक (सभ्याचारक) समरूपता होती है जिसमें आप उनके विचारों, पसंद, नापसंद, नायकों, कहानियों, परंपराओं, पहनावे, खान-पान, इतिहास, संगीत, सिद्धांतों, कार्य करने के तरीकों, विश्वासों आदि को जोड़ सकते हैं. जोड़ लिया? तो अब आप उनकी शिक्षा के स्तर के हिसाब से उनकी समरूपता को परख लें. इस सूची को अधिक न फैलाया जाए. इतने मानकों पर ध्यान देना पर्याप्त है.

इन मानकों के आधार पर व्यक्तियों में जितनी अधिक समानता होगी उनमें एकता की गुंजाइश उतनी ही अधिक होगी. वे बेहतर तरीके से एक दूसरे को 'अपने आदमी' के तौर पर पहचानेंगे और मानेंगे. उनका आपसी बंधन जितना प्रगाढ़ होगा वे एक दूसरे के उतना ही करीब होंगे. जितनी अधिक निकटता उतनी अधिक सामाजिक एकता. एकता जितनी अधिक होगी उनका परस्पर संघर्ष उतना ही कम होगा और वे संयुक्त रूप से बेहतर काम कर सकेंगे. समाज में अन्य के भले के लिए उनके दिल में फ़िक़्र की मात्रा ज़्यादा होगी. ऐसे सभी लोग समस्त समाज के लिए फ़िक़्रमंद होंते हैं. ऐसे लोग अपेक्षाकृत रूप से अधिक खुश होते हैं ऐसा देखा गया है.

तो कहा जा सकता है कि जहाँ कहीं सामाजिक ईकाई (व्यक्ति) के दिल में ख़ुशी है वहाँ सामाजिक एकता का तत्त्व ज़रूर ही अधिक पाया जाता है.

अन्य लिंक:-

Unity of Meghs - मेघों की एकता-1

Unity of Meghs and Khaps - मेघों की खापें और एकता

Why there is no unity in Megh community-1

Why Megh community does not unite-2 - मेघ समुदाय में एकता क्यों नहीं होती-2



01 May 2019

History and common man - आम आदमी और इतिहास

हालाँकि इतिहास में आत्मगौरव ढूँढना कुल मिला व्यक्ति और उसकी जाति के लिए एक अच्छी बात हो सकती है लेकिन तटस्थ सत्य से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए. ह्वेन सांग तटस्थ सत्य कहता है ऐसा सभी इतिहासकार मानते आए हैं. ऐसे ही कन्निंघम ने धरती खोद कर भारत के प्राचीन इतिहास के कई पक्षों को सप्रमाण उजागर किया. उसकी तटस्थता पर कोई उँगली नहीं उठाई जा सकती. हाँ जो उंगलियाँ यूँ ही उठ जाती हैं उन्हें अपनी तटस्थता साबित करनी होगी.
आखिरकार पाठ्यक्रमों में पढ़ाना पड़ेगा कि बौधमत वो प्राचीनतम जीवन शैली (या धर्म) है जिसका प्रभाव पूरे विश्व में देखा गया है. जहाँ तक जातिवाद और जातियों का सवाल है इस बीच भारत में कई जातियाँ बनी-मिटीं और आज भी बन-मिट रही हैं. इतिहास में आत्मगौरव ढूँढना उनका अधिकार है. एक तरफ़ा और चयनित इतिहास फ़िज़ूल है और उसमें लोगों की रुचि कम ही रहेगी. समष्टिपरक सत्य का कोई विकल्प इतिहास लेखन में भी नहीं है.


25 April 2019

From Hind to Hindu - हिंद से हिंदू तक

कहते है कि ह्यूनसांग ने ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग किया था और कि ‘हिंदू’ शब्द का पहला प्रयोग राधाकांतदेव बहादुर रचित 'शब्दकल्पद्रुम' नामक शब्दकोश में हुआ था जो संस्कृत का काफी पुराना शब्दकोश है हालाँकि इसका प्रकाशन 19वीं शताब्दी में हुआ था. संभव है संस्कृत के अस्तित्व में आने से पहले भारत में उपलब्ध शब्द 'हिंद' (जैसे- हिंदकुश) को संस्कृत में अनुवाद करके 'हिंदू' बना दिया गया हो या किसी उच्चारण प्रवृत्ति के चलते वो ‘हिंदू’ बन गया हो. हिंदकुश शब्द अशोक के समय से पहले का है. यह भाषाविज्ञानियों की स्थापना है.

अपनी स्थापना के साथ ही ‘हिंदू महासभा’ ने ‘हिंदू’ शब्द को विस्तारपूर्वक नए अर्थ के साथ शस्त्र और शास्त्र की तरह उठाया. 1915 से पहले भी लोग ‘हिंदू’ शब्द को जानते थे लेकिन एक क्षेत्र विशेष के लोगों के अर्थ में. कबीर ने भी लिखा - ".....हिंदुअन की हिंदुआई देखी तुरकन की तुरकाई." ये दोनों शब्द क्षेत्र का संकेत देते हैं।

इसमें एक दूसरा फैक्टर भी है. द्रवड़ियन भाषाओं में आखिरी वर्ण के साथ अंत में उ की मात्रा का उच्चारण होता है जिसकी वजह से वे 'बुद्ध' को 'बुद्धु' उच्चारित करते हैं. तीसरे, जिसे निकृष्ट पुरुष की तरह संबोधित करना हो उसके नाम के पीछे ‘उ’ या ‘ऊ’ की मात्रा उच्चारित करने की बुरी ही सही लेकिन एक परंपरा है, उदाहरण के लिए रामू, परसु, मंगलु या मंगलू आदि. यह किसी व्यक्ति को क्षुद्र या पतित करार देने की युक्ति है.

‘हिंदू’ शब्द को काला, चोर, ठग आदि के अर्थ में भी जाना जाता रहा है. इस नज़रिए से देखें तो ‘हिंदू महासभा’ और उसके संगठनों ने ‘हिंदू’ शब्द को व्यापक अर्थ दे कर उसे ग्राह्य बनाने का प्रयास किया और उसे धर्म की सीमा तक खींच ले गए. इस तरह उन्होंने मनुवादी व्यवस्था की व्यापक सीमाओं को स्थापित करने का प्रबंधन किया और अब तक कर रहे हैं. लेकिन उनकी  व्यवस्था से आया जातिवाद उनके गले की फांस बनता जा रहा है. उनके ‘हिंदू’ शब्द को जातिवाद से अलग करना कठिन कार्य है.

‘हिंदू’ शब्द के बारे में यदि ऊपर बताई सरल बात पकड़ में न आए तो यह आलेख आप देख सकते हैं.