28 September 2016

Meghs – The Indigenous People – मेघ – मूलनिवासी लोग

चलिए, फैसला हो गया.

इंसान की बड़ी पुरानी और पक्की आदत है कि वह अपना मूल ढूँढना चाहता है. पहले तो उसे सब कुछ 'भगवान का' बता कर चुप करा दिया जाता था. लेकिन अब वह जान चुका है कि जहाँ-जहाँ उसके सवाल भगवान को समर्पित हो रहे थे वहाँ बहुत बड़ा लोचा है. इस लिहाज़ से कबीर का जवाब भी क्या बुरा था कि भई- 'कुदरत के सब बंदे'. लेकिन नहीं, बंदा नहीं मानता. मेघ-जन भी इस सवाल के पीछे हाथ धो कर पड़े हैं कि- 'असल बात बताओ'. सवाल अड़ा हुआ है और जवाब हकलाते हैं.

मेघों के मूल को लेकर बहुत सिद्धांत हैं. उनसे इतना संकेत तो मिलता है कि वे भारत की अन्य जातियों की तरह कई प्रकार के रक्त मिश्रण के दौर से गुज़रे हैं लेकिन वैज्ञानिक खोज विशेषकर डीएनए रिपोर्ट से साफ़ जवाब मिले हैं और संदेह दूर हुए हैं.

जब से संयुक्तराष्ट्र ने International Day of the World's Indigenous Peoples 9 August घोषित किया है तब से भारत के कई समुदायों में यह जानने की जिज्ञासा बढ़ी है कि क्या वे भारत के मूलनिवासी हैं? डीएनए रिपोर्ट ने सभी सवालों के जवाब दे दिए हैं. संक्षेप में मेघ-जन भारत के मूलनिवासी हैं, वही 'मूलनिवासी' जिसे बामसेफ़ ने अपने तौर पर खूब प्रचारित किया है. उम्मीद है इससे व्यवस्था परिवर्तन में मदद मिलेगी और समाज अपनी समस्याओं का शांतिपूर् समाधान निकाल लेगा.
https://www.youtube.com/watch?v=GWfTYiaP3PU&index=1&list=PLrKlvsV9IOwUdwDpkTXy4P8cryJXNYcrj&spfreload=5




05 September 2016

History via Vedas and Puranas – इतिहास वाया वेद और पुराण

आज अधिक नहीं लिखना चाहता. जो पढ़ा है कि उसे सीधा आपसे शेयर करना चाहता हूँ. जो मेघवंशी अपना इतिहास जानने के लिए वेदों-पुराणों में जाते हैं उनकी जानकारी के लिए चंद्रभूषण सिंह यादव के लिखे एक आलेख का लिंक नीचे दे रहा हूँ. बहुत उपयोगी है. इसे पढ़ कर विचार कीजिए कि इतिहास को ढूँढने या लिखने की कौन सी पद्धति अधिक उपयोगी रहेगी.



MEGHnet

01 September 2016

A story from a folksinger - लोक गायक से एक कहानी

जो यहाँ कहा है वह सार है. विस्तार से नीचे दिए वीडियो में कहा है.

बचपन में एक हम मज़ेदार कामेडी गाना सुना करते थे - सिकंदर ने पोरस से की थी लड़ाई, जो की थी लड़ाई, तो मैं क्या करूँ! कौरव ने पांडव से की हाथापाई, जो की हाथापाई तो मैं क्या करूँ! उसमें एक उखड़े हुए स्टूडेंट की तकलीफ़ थी. उस समय की स्कूली पढ़ाई और व्यावहारिक जीवन के बीच की दूरी या गैप उसमें हँसी पैदा करता था.

भारत में जो इतिहास पढ़ाया जाता है उसमें बहुत से गैप हैं. गैप को खोद-खोद कर गुम इतिहास को निकालना हमने अंग्रेज़ों से सीखा. वरना पंडित से सुनी कथा ही हमारे लिए इतिहास था. शिक्षा और विज्ञान के साथ बुद्धि बढ़ी तो विद्वानों ने कहानियों पर सवालिया निशान लगाना सीखा. उदाहरण के तौर पर अब भाषा-विज्ञानी बताते हैं कि संस्कृत में लिखी रचनाएँ दो हज़ार साल से अधिक पुरानी नहीं है. सम्राट अशोक के समय लिखे गए शिला लेखों में संस्कृत का एक भी शब्द नहीं है. इतिहास की नई खोज चाणक्य के ऐतिहासिक पात्र होने पर ही गंभीर सवाल उठाती है.

जब श्री आर.एल. गोत्रा जी ने बताया कि एक लोक गायक राँझाराम मेघों की कथा को सिकंदर से जोड़ता था तो यह मेरे लिए एक नई बात थी. गोत्रा जी ने इसका उल्लेख एक सोशल साइट पर किया तो एक अन्य सज्जन ने उनका समर्थन किया. गोत्रा जी से एक अन्य संकेत भी मिला कि श्री राँझाराम की रिश्तेदारी श्री सुदेश कुमार, आईएएस से है जो मध्यप्रदेश काडर से सेवानिवृत्त हैं. 29-08-2016 को सुदेश भगत जी से बात हुई तो उन्होंने पुष्टि की कि श्री राँझाराम उनके पिता श्री तिलकराज पंजगोत्रा के फूफा थे और वे लोक गायक थे. फिर कहता चलता हूँ मेघ समुदाय में लोक गीतों का लगभग अभाव है.

23-08-2016 को मैंने एक अन्य मित्र कर्नल तिलकराज भगत जी से फोन पर बात की तो उन्होंने बताया कि उनका बचपन स्यालकोट के पास अपने गाँव मयाणापुरा में बीता है जहाँ राँझाराम के कार्यक्रम वे देख चुके हैं. राँझाराम की कथाएँ इतिहास भले न हों लेकिन उनमें ऐतिहासिक संकेत तो हो ही सकते हैं. वैसे भी लोक गायक घटनाओं को अपने शब्दों में ढालते आए हैं. कर्नल तिलकराज ने संकेत किया है कि मेघों के कुछ गोत्रों के नाम ग्रीक शब्दों से निकले प्रतीत होते हैं. यह अध्ययन का विषय है. ज़ाहिर है राँझे जैसे अन्य कई लोक गायकों के हाथों में उन दिनों कलम-दवात या पोथियाँ तो थी नहीं लिहाज़ा पंडितों से सुनी-सुनाई बातें वे अपने गीतों में कहते रहे.

गोत्रा जी ने यह प्रश्न एक से अधिक बार पूछा है कि ब्राह्मण समुदाय में सिकंदर नाम रखने की एक परंपरा दिखती है, तो कहीं सिकंदर ही आर्यों का देवता आर्यवंशी इंद्र तो नहीं था? पता नहीं, मैं नहीं जानता. लेकिन पंडित जयशंकर प्रसाद का नाटक 'चंद्रगुप्त' पढ़ा है जिसमें एलेक्ज़ांडर यानि सिकंदर का नाम अलक्षेंद्र (अलक्ष+इंद्र) रखा गया है.

सिकंदर लंबा रास्ता तय करके मेदियन और पर्शियन साम्राज्य के इलाके से होता हुआ झेलम और चिनाब क्षेत्र तक आया. उस क्षेत्र में मेघों के होने का स्पष्ट उल्लेख सर एलेग्ज़ैंडर कन्निंघम ने किया है जिनकी रिपोर्टें 1871 में छपी थीं यानि सिकंदर के आने के लगभग 2200 वर्ष बाद. कन्निंघम ने जब रिपोर्ट लिखी तब मेघ उन इलाकों में काफी संख्या में बसे थे.

वक्त के साथ चलता इतिहास बदलता रहा है. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सिकंदर ने पोरस को हराया और इतिहासकारों का मानना है कि पोरस ने सिकंदर को हराया. एक और बात भी देखने में आती है कि इतिहासकार जिस व्यक्ति का इतिहास दफ़्न करना होता था वे उसका नाम ही बदल देते थे और अपनी पसंद के व्यक्ति को हीरो बना देते थे.

सिकंदर अपने सेनापति सेल्यूकस को यहाँ छोड़ गया जिसने अपनी बेटी चंद्रगुप्त को ब्याह दी थी. ग्रीकों की बहुत सी निशानियाँ यहाँ रह गईं होंगी. वैसे भी जिस रास्ते से सिकंदर आया उस रास्ते में बहुत गोरे और बहुत साँवले लोग भी रहते थे. यह जुगलबंदी रक्तमिश्रण की कहानी कहती है.

फिलहाल राँझाराम की कथा इतना संकेत करती है कि सिकंदर की फौज के साथ हमारा कुछ न कुछ संबंध तो रहा है. इतिहास लेखन की अनुमान पद्धति में यह मान्य सिद्धांत है. दूसरी ओर यह एक प्रमाण है कि मेघों के प्राचीन इतिहास का एक अंश लोक-स्मृति (Public memory) में सुरक्षित है. मेघवंश के इतिहासकार वैज्ञानिक शोध के साथ अपना अतीत खंगालते रहेंगे जो मेदियन साम्राज्य से लेकर ग्रीस तक के इलाके के इतिहास और वहाँ की Demography के अध्ययन से हो सकता है. डीएनए का अध्ययन क्या कहता है यह भी देखने की बात है.

प्राचीन (pre-historic) इतिहास किसी एक जगह समाप्त नहीं हो जाता. किसी समय पराजित हुए भारतीय समुदायों ने अब पुरातत्व, लोक-स्मृति, तर्क, प्रमाण पर आधारित लोकतांत्रिक इतिहास बोध के साथ अपना इतिहास खुद लिखना शुरू किया है. जाट और सैनी समुदायों सहित कई अन्य समुदाय पोरस को 'अपना बंदा' कहते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि भारत के कई समुदाय अब अपन-अपना इतिहास खुद लिख रहे हैं. आगे चल कर उन सब के समन्वय की ज़रूरत होगी.

आप भी ज़रूर कुछ कहना चाहते होंगे? ज़रूर कहिए. बल्कि बेहतर है कि लिख डालिए. शुभकामनाएँ.

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17 August 2016

Model of Development – विकास का मॉडल

भाजपा ने मोदी जी के विकास माडल को भारत भर में बहुत ज़ोर-शोर से प्रचारित किया है जो गुजरात में उन्होंने ज़माया तो दूसरी ओर कई जाने-माने अर्थशास्त्रियों ने गुजरात माडल की जम कर आलोचना भी की है. आम आदमी सरकारी बजट और उसके आबंटन की ारीकियाँ नहीं जानता! वो इतना जानता है कि उसे कितना पैसा मिला और कि उसका गुज़ारा चल रहा है या नहीं. वो यह भी नहीं जानता कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकार अपनी नागरिक ज़िम्मेदारी निभा रही है क्या, या कि विकास के नाम पर कार्पोरेट्स को दिए गए संसाधनों का सही इस्तेमाल हो रहा है, या कि कार्पोरेट्स के पास रखे देश के पैसे का इस्तेमाल सही प्रयोजनों के लिए हो रहा है या नहीं.

हाल ही में गाय को लेकर गुजरात में एक सामाजिक उलट-फेर होता दिखा है. सदियों से सामाजिक घृणा की शिकार कुछ जातियों ने मृत पशुओं का चमड़ा निकालने का अपना पंरपरागत पेशा छोड़ने का निर्णय लिया. उनका भविष्य क्या होगा नहीं मालूम. वे सभी अपने परंपरागत पेशे से अलग हो कर नए पेशे अपनाएँगे या उन्हें नए पेशे अपनाने दिए जाएँगे, यह सोचने की बात है और इस पर बदमज़ा करने वाली बहसें सुनाई दे रही हैं

दुनिया का बहुत बढ़िया कहा जाने वाला संविधान भारत के लोगों ने खुद को दिया है तो क्या वे अपने उस संविधान को ज़मीन पर घटित होते देखना चाहते हैं? इस सवाल के जवाब की बात करें तो इस बारे में व्यक्त संशय पुराने हैं. इस विषय में विमर्श 'हाँ भी' और 'नहीं भी' के बीच झूलता दिखता है. एक बात स्पष्ट होनी ही चाहिए कि विकास के माडल संविधान की भावना के अनुरूप होने चाहिएँ. अर्थनीति भी ऐसी होनी चाहिए जो संविधान की भावना के अनुरूप सारे भारतीय समाज के लिए लक्षि हो. 

कोई भी सत्ताधारी अपनी आर्थिक नीतियों को पूरे देश पर लागू करने की हालत में आ जाता है. लेकिन आर्थिक नीतियाँ एकांत पर लागू नहीं होतीं. उनका असर सारे समाज पर पड़ता है. सारे का मतलब सारा समाज. यानि अर्थव्यवस्था का पूरा योग-क्षेम, भला-बुरा अंततः समाज ने वहन करना होता है. यदि समाज उसे ढो नहीं पाता तो फिर व्यवस्थाएँ टूटनी शुरू हो जाती हैं जिसका इतिहास दुनिया जानती है. वो इतिहास आज भी घटित होता है. गुजरात में परंपरागत पेशों को प्रभावित कर रही राजनीतिक विचारधारा ने समाज के कमज़ोर वर्गों में बेचैनी बढ़ा है जिसे अन्य राज्यों में भी बारीकी से देखा जा रहा है

अब सीधा सवाल यह है कि यदि अब तक सत्ता में बैठे लोगों की नीयत ठीक थी तो देश में आज़माए गए विकास के माडल आखिर कहाँ कमी छोड़ते जा रहे हैं? क्या राजनीति इतना भटक गई है कि समाज की बेचैनी का सही विश्लेषण नहीं कर पा रही? ऐसा है तो यह चिंता का विषय क्यों नहीं बन रहा? नहीं ही बन रहा तो क्या यह चिंता बढ़ाने वाली बात नहीं है?

इस बात को समझना कितना कठिन हो सकता है कि टिकाऊ विकास के लिए टिकाऊ समाज एक ज़रूरी शर्त है. सभी अर्थशास्त्री इस सिद्धांत को जानते हैं. इस बारे में लोगों का दायित्व तो है ही साथ ही समाज को टिकाऊ बनाना क्या राजनीति का पहला सामाजिक लक्ष्य नहीं होना चाहिए? सभी के मन पर यह प्रश्न टँगा हुआ है कि आरएसएस से प्रेरित भाजपा सरकारें या अन्य दलों की सरकारें देश की सामाजिक बनावट को टिकाऊ बनाती क्यों नहीं दिख रही हैं? ये बहुत गंभीर सवाल है. इस दिशा में असफलता का परिणाम यही होगा ये सवाल कल बड़े बवाल बनेंगे.

तो फिर, या तो इस दिशा में कुछ कीजिए नहीं तो आगे चल कर भुगतिए. यह चेतावनी नहीं दी जा रही बल्कि यह एक प्रक्रिया है जो घटित होती है.

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02 August 2016

Deers of Chinua Achebe - चिनुआ अजीबी के हिरण


चिनुआ अजीबी ने कहा है - ''जब तक हिरण अपना इतिहास खुद नहीं लिखेंगे तब तक हिरणों के इतिहास में शिकारियों की शौर्य गाथाएं गाई जाती रहेंगी''. : चिनुआ अजीबी (Chinua Achebe)

भारत में अभी तक पढ़ाया जा रहा इतिहास चिनुआ अजीबी के बताए कटु सत्य का प्रमाण है. कुछ नामों का महिमागान, अतीत के किन्हीं हुए-अनहुए राजाओं की प्रशंसा, उनकी आकर्षक और रोचक बातों से इतिहास के साथ-साथ साहित्य भी इतना भरा हुआ है कि वह गल्प अधिक लगता है. ई जगह संदर्भित अतिप्राचीन कथाओं में हारते हुए, मरते हुए या नरक जाते हुए वही लोग हैं जिनके वंशज आज इतिहास की कक्षाओं में बैठे महसूस करते हैं कि पढ़ाए जा रहे इतिहास में उनके और उनके पुरखों के बारे में तो कुछ लिखा ही नहीं गया.

शिक्षित होने के बाद अब भारत में दूर-दूर तक बिखरा वंचित समाज इस ओर ध्यान दे रहा है कि इतिहास कही जाने वाली उन पौराणिक कहानियों और इतिहास में प्रजा के विभिन्न समूहों का वर्णन तो है ही नहीं. कारीगरों, वास्तुशिल्पियों, हस्तशिल्पियों, किसान-कमेरों, समाज की महत्वपूर्ण घटक स्त्री आदि की वास्तविक हालत का विस्तृत बयान उनमें है ही नहीं. राजा की कहानी में इतना ज़रूर जोड़ा जाता है कि 'उसके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी'.

सबसे पहले इस बात को जानते हुए चलते हैं कि मुअनजोदाड़ो की खुदाई में तलवारें, भाले या युद्ध में काम आने वाले हथियार नहीं मिले हैं. ज़ाहिर है वहाँ के वासी शांति से रहने वाले थे. बाहर से आए सशस्त्र आक्रमणकारियों के मुकाबले उनकी हालत निःशस्त्र विरोधियों जैसी थी. विजय के बाद उन आक्रमणकारियों ने लोगों को गुलाम बनाना शुरू किया. उस समय गुलामों के साथ जो हिंसा और अत्याचार हुआ उसके बारे में इतिहास चुप रहा है धार्मिक ग्रंथ उसे 'सुर-असुर संग्राम' के रंगों में रंग कर सही और न्यायसंगत बताते चले आ रहे हैं. धार्मिक पुस्तकों के रूप में तब का संविधान लिखने, धर्म का प्रचार करने और इतिहास लिखने वाले आक्रमणकारी जिन्हें चुनुआ अजीबी ने शिकारी कहा है उनके पुरोहित उन शिकारियों का ही गुणगान करते हैं. तथापि, वह पुरोहित वर्ग हिरण की बात नहीं करता जो गुलामों के रूप में उनके क्रूर हाथों में आ गया था. भारत की कुछ राजनीतिक पार्टियाँ आज भी उसी इतिहास-बोध का वहन कर रही हैं और प्लास्टिक सर्जरी से इंसानी बच्चे के सिर पर हाथी का सिर लगा रही है.

यह ऐसा इतिहास-बोध है जो महिलाओं और मेहनतकशों की स्थिति सुधारने की बात नहीं करता. वह राजाओं जैसी ऐशपरस्ती और सामंतवाद जैसी हिंसक प्रवृत्तियों का साथ निभाता है. उसे पूरा विश्वास है कि यदि वह लोगों के हाथों में पढ़ने के लिए धार्मिक पुस्तकें और धार्मिक पोस्टर थमाता रहता है तो उसका धंधा चलता रहेगा. उसे ज़रूरत है पुरुषवाद की.

आप जब अपने जीवन स्तर को सुधारने की बात करेंगे तो उस इतिहास-बोध को ढोने वाली वो राजनीति आपको सीमा सुरक्षा के लिए खड़े आपके जैसे भाइयों की राष्ट्रभक्ति का आदर्श दिखा कर आपको चुनौती देगी कि - "असली राष्ट्रभक्त कौन है, वो फौजी, या आप?" आप चाहें तो सभी सिविल कार्य छोड़ कर फौज में भर्ती हो जाइए अगर जगह मिल जाए तो. यदि आप ऐसे सवालों पर अपना आर्थिक-सामाजिक एजेंडा भूल जाते हैं तो यह आपकी कमज़ोरी मानी जाएगी. आपकी सामाजिक समस्या से उस राजनीति का कोई सरोकार नहीं. आपको डराने के लिए उन्हें बस इतना कहना है कि मुसलमान और ईसाई ख़तरनाक हैं. इससे उन्हें यह प्रचार करने में आसानी हो जाती है कि छुआछूत के लिए हिंदुत्व ज़िम्मेदार नहीं क्योंकि छुआछूत मुगलों के आने के बाद भारत में आई. सोशल मीडिया पर ऐसा प्रचार काफी हुआ है. लेकिन वे इस बात का जवाब नहीं देते कि 'मनुस्मृति' हज़रत मोहम्मद ने लिखी थी या हज़रत ईसा ने?

लब्बोलुआब यह कि धर्म अपना एजेंडा कई प्रकार से आप पर थोपता है. आपको शिकारयोग्य हिरण बनाए रखना चाहता है. आपको अपना कोई राजनीतिक एजेंडा बनाने ही नहीं देता. आप उलझ कर रह जाते हैं. जब धर्म आपको सबसे बड़ी समस्या लगने लगे तो आप अपने परिवार के रोज़गार और स्वास्थ्य-चिकित्सा को भूलेंगे ही और वोट डालते समय आपको सही राह दिखाने वाला कोई नहीं होगा. यह आपकी समस्या है कि आप जानें कि आपकी समस्या ISIS है या लग़ातार घटती आपकी ख़रीदने की ताक़त, आपकी समस्या गौ-माता है या महँगी होती शिक्षा या फिर आपकी समस्या पूजा-पाठ है या महँगी होती चिकित्सा. जब आप उनके निर्धारित एजेंडा को अपना मानने लगते हैं तब आप अपने एजेंडा को भूल जाते हैं. हज़ार बातें छोड़ दीजिए, इस ज़ाहिर तथ्य को समझ लीजिए कि आपकी आर्थिक नियति राजनीति और सत्ता में बैठे लोग निर्धारित करते हैं. डॉ. अंबेडकर का बताया इतिहास जानिए. ख़ूब पढ़िए और ख़ुद भी लिखिए. बस इतना जानना काफी होगा कि हिरणों का कोई एजेंडा नहीं होता. जो अपना एजेंडा बना लेता है वो हिरण नहीं रह जाता.

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15 July 2016

Meghs and Kabir - मेघ और कबीर

ग़रीब का दिमाग़ स्वाभाविक रूप से ऐसा बन जाता है कि उसमें 'ईश्वर-परमेश्वर' नाम की खरपतवार स्वाभाविक रूप से फैल आती है. उसे रोज़गार देने वाला ऐसा ही चाहता है. इसकी वजह यह है कि उसे जो भी आशा की किरण नजर आती है वह इसी विचार में होती है कि कोई तो उसका ईश्वर, मालिक, स्वामी, रोज़गारदाता वगैरा है जो कभी--कभी उसकी सुनेगा और उसे सहारा दे कर बेहतर जीवन देगा. उसी विचार को बल देते हुए वह जीवन काटता है. कुछ मिला तो ठीक, नहीं तो न सही जबकि उसे यह समझने की ज़रूरत होती है कि उसके हालात को सरकारी नीतियाँ बदलती हैं और उस बदलाव का रास्ता राजनीति से हो कर ग़ुज़रता है.

कठिन जीवन में आँखें बंद करके मिलने वाला आध्यात्मिक आनंद उसे सुकून देता है. वंचित व्यक्ति ईश्वर, परमेश्वर, आध्यात्मिकता, आत्मा-परमात्मा के विचारों में खुशी हासिल करता है बिना जाने कि उनका वजूद है भी या नहीं. यही वजह है कि गरीब तबकों के लोग अधिक आस्थावान हो जाते हैं. संतुष्ट रहना उसकी मजबूरी है- “रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चोपड़ी मत ललचावे जी.” लेकिन यदि कोई बेहतर जीवन की कामना को लालच की केटेगरी में डाले तो उसे धूर्त ही समझना चाहिए. अब आगे चलते हैं.

मेघ भगत सदियों से अपने पुरखों, वड-वडेरों की मान्यता/पूजा के अतिरिक्त भगती के कायल रहे हैं जिसका सीधा संबंध उनकी गरीबी से रहा. आर्य समाजियों ने शुद्धिकरण करके उन्हें भगत बना लिया. चलो जी, हम 'मेघ' से 'भगत' हो गए.

भक्तिमार्ग की एक विशेषता यह है कि वह गरीबी दूर करने का तरीका नहीं बताता. उसका काम है यह बताना कि गरीबी में कैसे रहा जाए. जहाँ तक माँगने की आदत का सवाल है कबीर ने साफ़ कहा है- "मागन गए सो मर गए मत कोई मागो भीख, माँगन से मरना भला यह सत्गुर की सीख.


अद्भुत कबीर

चौदहवीं शताब्दी के कबीर, रविदास जैसे संतों ने वंचित समुदायों को भक्तिभाव में उतना नहीं डुबोया जितना उन्हें सामाजिक चेतना की ओर मोड़ा. यह उनका क्रांतिकारी कार्य था. मेघों और अन्य वंचित जाति समूहों द्वारा संतों का भक्तिमार्ग अपनाना और ख़ुद को उनका अनुयायी बताना उसी सामाजिक चेतना का विकसित लक्षण है. बहुत से मेघ अब ख़ुद को कबीरपंथी लिखना पसंद करते हैं. यहाँ समझने की बात है कि पंद्रहवीं शताब्दी के कबीर को मेघों ने 19वीं शताब्दी में अपनायासुना है 15 अगस्त, 1947 (जो पंजाब के मेघ भगतों के आधुनिक इतिहास की कट-ऑफ़ डेट है) के बाद पठानकोट और जम्मू के क्षेत्र में मेघों द्वारा कबीर का प्रकाश उत्सव मनाने का प्रचलन बढ़ा और कबीर मंदिरों के निर्माण में तेज़ी आई.

इन दिनों पंजाब और जम्मू में अनेक कबीर मंदिर और उनकी कमेटियाँ बनीं हुई हैं जिनमें परस्पर प्रतियोगिता है. राजनीतिक धड़ेबंदियों उन पर हावी हैं और क्यों न हों आख़िर उन्हें कोई बना-बनाया वोट बैंक अपने आक़ा को दिखाना होता है. 'धन् कबीर' और 'जय कबीर' का घोष इस वोट बैंक की धार्मिक-राजनीतिक निशानी बन सकती है. इसी क्रम में सोशल मीडिया पर कबीर की ऐसी वाणी परोसी जाने लगी है जो भक्तिधारा का प्रतिनिधित्व करती है. सामाजिक चेतना जगाने वाली कबीर की वाणी वहाँ शायद ही दिखाई दे. सियासतदानों की पूरी कोशिश मेघों को अपना भक्त और वोट बैंक बता कर पेश करने की है. मेघ भगत चाहे राधास्वामीमत में हों, किसी डेरे-गुरु को मानने लगे हों या सनातनी या आर्यसमाजी हो गए हों, धर्म ग्रंथों का अखंडपाठ या जागरण करवाते हों, हैं वो भक्त ही. उनकी अपनी धार्मिक और राजनीतिक ताक़त दूर तक नहीं दिखती.

कुछ कबीर मंदिरों में ज़रूरतमंद बच्चों के लिए कंप्यूटर या अन्य प्रकार के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था हुई. कबीर मंदिरों का यह सबसे सुंदर इस्तेमाल है जिसका सीधा लाभ समाज को पहुँचता है. उधर प्रश्नचिह्नों से घिरे 'ईश्वर-परमेश्वर' या देवी-देवताओं ने वंचित समाजों को कोई फ़ायदा नहीं पहुँचाया, उनकी सामाजिक स्थिति को तो बिल्कुल नहीं बदला.

तीन सौ वर्ष पहले दुनिया के कई देशों ने विज्ञान को महत्व देना शुरू किया. वे आज विकसित राष्ट्र हैं. इसे देखते हुए भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (temperament) विकसित करने को महत्व दिया गया. कबीर ख़ुद भी बुद्ध और उनके जैसे शिक्षित लोगों की तरह तर्कशील और विवेकशील थे. ऐसे में उनके मंदिरों या उनसे होने वाली कमाई का शिक्षा के प्रयोजन से इस्तेमाल करना समाज के लिए क्या अधिक लाभकारी नहीं होगा?

मेघ समाज ने कबीर की भक्ति-वाणी के अपने कई प्रचारक पैदा कर लिए हैं लेकिन अन्य समाजों के लोग भी मेघों में आ कर यही काम करने लगे हैं. जब धर्म एक व्यापार के तौर पर स्थापित है तो उसके नियम सीखने चाहिएँ. व्यापारिक घुसपैठ, तोड़-फोड़ आदि के ख़तरे भाँपने होंगे.

जानने की बात है कि ईसाइयत और इस्लाम के अनुयायियों के बाद अब ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस हैं. वे दुनिया की आबादी का लगभग एक तिहाई हैं और उनकी संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. सवाल बनता है कि हम भगत या कबीरपंथी कहलाने वाले भोले-भाले भक्त लोग भक्ति को ज़रूरत से अधिक वक़्त दे कर वैज्ञानिक दुनिया में पिछड़ तो नहीं रहे हैं? हमारा भक्तपना तरक्की के रास्ते में देरी का कारण तो नहीं बन रहा है?

(आपके पास बहुत थोड़े आर्थिक और मानव संसाधन हैं. ऐसे में उनका उपयोग आप कैसे करना चाहेंगे, सोचिएगा.)

धार्मिक जगह क्यों? शिक्षा क्यों नहीं!