23 April 2017

Your vote determines your fate - आपका वोट आपके नसीब को तय करता है

2014 का चुनाव भारत की राजनीति के इतिहास में एक दुर्घटना के तौर पर भी जाना जाएगा जिसमें विपक्ष अपंग हो गया. उसके बाद की स्थितियां ऐसी हैं कि हिंदू-मुसलमान, गौमाता, लव-जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे जोर पकड़ते नजर आए जिसे आम नागरिक गौर से देख रहा है. जाहिर है हिंसक ब्यानबाज़ी इसलिए की जाती है ताकि आम पब्लिक की नसें सर्द पड़ जाएँ. जिस जातपात के अंधेरे ने देश की बहुसंख्य आबादी को आज़ादी की रोशनी से दूर रखा है उसे हटाने की बात कोई नहीं करता. इन हालात में भी कुछ अनुभवी आवाजें और ख़्याल बुलंद होते रहते हैं.

105 लाख करोड़ रुपया कितना होता है मैं नहीं जानता. राजनीति के प्रखर दार्शनिक और राजनीतिज्ञ शरद यादव ने कहा है कि हर वोट की कीमत 105 लाख करोड़ रुपए होती है. हर वोट सरकार को इतना पैसा खर्च करने के लिए शक्ति देता है.

देश में अनपढ़ता और गरीबी इतनी है कि चुनाव में लोग सौ रुपए, पाँच सौ रुपए में या दारू की बोतल के बदले अपना वोट बेच देते हैं और फिर उन्हें शिकायत भी होती है कि उनके जीवन में कोई सुधार नहीं हुआ. होता कैसे? वे अपना वोट ऐसे व्यक्ति को नहीं देते जो उनके सामाजिक हालात सुधारने और देश के आर्थिक स्रोतों में उनके हिस्से को सुनिश्चित करने के लिए काम करे. प्रत्यक्षतः इसमें बड़ी बाधा जातपात है और नेता जातपात के चलते रहने में अपनी भलाई देखते हैं. इस लिए वोट दान में या उपहार में न दें. इसे व्यवस्था परिवर्तन के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करें.

इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि भारत में गरीबी का इंडेक्स जाति के इंडेक्स जैसा है. नीचे की जातियां गरीब हैं और ऊपर की जातियां अमीर. तिस पर भ्रष्टाचार गरीबों को अधिक गरीब बनाता है. 'गरीबी हटाओ' का नारा लगा कर इंदिरा गांधी ने चुनाव जीता. हाल ही में गरीबों का नाम लेकर केंद्र में नई सरकार बनी. लेकिन गरीबों को अपने जीवन स्तर में कोई सुधार होता नजर नहीं आता. ज़ाहिरा तौर पर इसका बड़ा कारण जातपात है. जातिवाद सुनिश्चित करता है कि सस्ते मज़दूरों की सप्लाई न रुके और निशाने पर श्रमिक यानि निम्न जातियाँ होती है. महँगी शिक्षा और महँगी चिकित्सा ग़रीबी को और भी बढ़ा देती है.

(“याद रखना कि जातिव्यवस्था के कूड़े पर....कचरे पर हर तरह का कीड़ा पलता है -करप्शन का....भ्रष्टाचार का....अन्याय का....सब तरह का. जात है तो न्याय नहीं मिल सकता. इंसाफ धरती पर सब जगह आ जाएगा लेकिन हिंदुस्तान में नहीं आ सकता. - शरद यादव”)

17 April 2017

Nag, Nagvanshi and Ichhadhari - नाग. नागवंशी और इच्छाधारी

तो ‘इच्छाधारी नाग’ की कथा बाकी रह गई थी.

उस कथा की जड़ ज़रूर पौराणिक कथाओं में रही होगी जो भारत के वंचित समाजों को मूर्ख बनाने के लिए लिखी गई थीं. ऐसा बहुत से विद्वानों का मानना है. यदि ये प्रतीकात्मक कथाएँ किसी भी तरह से नागवंशियों को लक्ष्य करके लिखी गई हैं तो उसके कुछ स्पष्ट अर्थ भी ज़रूर होंगे.

एक तेलुगु फिल्म का डॉयलाग था कि ‘पुलि’ के मुकाबले ‘गिलि’ अधिक खतरनाक होता है. मतलब ‘शेर-वेर’ में से ‘वेर’ अनदेखा है और खतरनाक है. यानि ‘नाग’ को हम जानते हैं लेकिन ‘इच्छाधारी नाग’ एक अनजाना शत्रु है. उसका भय काल्पनिक है इसी लिए बड़ा है. लेकिन वो आइने (भ्रम) में से दिख जाएगा (आपको नहीं, फिल्म बनाने वाले को). तो उस नकली भय से बचाव ज़रूरी है जो मंत्र-ताबीज़, टोने-टोटके, सँपेरे-बीन, यज्ञ-हवन से लेकर पुलिस-फौज आदि से संभव हो सकता है, ऐसा फिल्मकार दिखाते हैं. वैसे फिल्म में एक आस्तिक-से आदमी की मौजूदगी और उसकी सहायता तो न्यूनतम शर्त है ही. कुल मिला कर इन फिल्मों का सार यह होता है कि नाग को या नाग-जैसी किसी चीज़ को कहीं भी मार डालना अत्मरक्षा-जैसा होगा. यह नागों जैसे भोले-भाले जीवों के लिए खतरे की घंटी रही है जो वैसे भी इंसानों से डरे-छिपे फिरते हैं.

नागो और नागवंशियो, अमां जाओ यार! तुम इन कथाओं से पीछा नहीं छुड़ा सकते. हाँ, एनिमल प्रोटेक्शन के नाम पर कुछ कार्य हुआ है जो केवल एनिमल्ज़ के लिए है. नागिन का श्राप लोगों पर पड़ता दिखाया जाता है लेकिन प्रैक्टिकल लाइफ में नागों का श्राप फिल्मकारों पर नहीं पड़ता.

पुराने ज़माने में नागवंशियों को पत्थरों पर उकेरा जाता था लेकिन अब फोटो शॉप का श्राप पड़ा है. कह लो, क्या कहते हो?


12 April 2017

Naag, Nagas and Nagmani - नाग, नागवंशी और नागमणि

नागों, संपेरों और बीन पर आधारित दर्जनों फिल्में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ने दी हैं. उनमें से एक टी-सीरीज की बनाई हुई फिल्म ‘नागमणि’ देखने का सुखद अवसर मिला. यह अच्छे ग्रेड की फिल्मों में नहीं है. Anyhow.....

अब मनोरंजन इंडस्ट्री की क्रिएटिविटि देखिए. ‘नागमणि’ में 'नाग जाति' का स्पष्ट उल्लेख है. स्क्रीन पर एक उजड़ा हुआ मंदिर है (वैसे आज भी नाग जातियों के अधिकांश मंदिर उजड़े हुए ही हैं) और नाग पंचमी के दिन वहाँ नाग जाति के लोग आकर शिव की पूजा करते हैं. इस बात पर कई संदर्भ याद हो आए जैसे इतिहासकार नवल वियोगी की लिखी पुस्तक ‘Nagas - The Ancient Rulers of India’, आर.एल गोत्रा का आलेख - The Meghs of India जिसमें ऋग्वेद में उल्लिखित एक पात्र ‘वृत्र’ को ‘अहिमेघ’ यानि ‘नाग मेघ’ बताया गया है. फिलहाल आप संपेरों और उनकी बीन पर नज़र जमाए रखें.

इस फिल्म में एक मज़ेदार डायलॉग है - ‘नागराज जब बीन सुनते हैं तो वो नाचे बगैर नहीं रह सकते’. Very interesting. नाग जाति के हवाले से संपेरा कौन है इसे समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए लेकिन बीन को अलग से समझना ज़रूरी है. ‘बीन’ मेंटल कंडिशनिंग भी हो सकती है और मनोरंजन की लत भी (है वो भी मेंटल कंडिशनिंग). तो या तो नाग जातियों की मेंटल कंडिशनिंग कर दी गई या उन्हें मनोरंजन के मायाजाल में फाँस लिया गया. बाकी कहानी अंडरस्टुड है.

जहाँ तक 'मणि' का सवाल है वो नागों के सिर (दिमाग़) में थी और आज तक है. 'मणि' मतलब 'दिमाग़'. जिसके पीछे सँपेरा हाथ धो कर पड़ा होता है. वो या तो नाग को वश में कर के मणि चुरा लेगा या ख़ुद नष्ट हो जाएगा, यह स्क्रिप्ट राइटर पर डिपेण्ड करता है. वैसी स्क्रिप्ट तो आप भी लिख सकते हैं, नहीं? तो हे नागराज! जब आपके पास ज़बरदस्त 'मणि' है तो आप नई स्क्रिप्ट क्यों नहीं लिखते जिसमें आपकी 'मणि' सुरक्षित हो और उसकी चमक सब से बढ़ कर हो.

हाँ, अगर ज़्यादा जानकारी चाहिए तो इस लिंक पर चले जाइए. कुछ और लिंक भी हैं, देख लीजिए.


दक्षिण भारतीय फिल्म ‘नागमणि’


'इच्छाधारी नाग' की बात अलग से करूँगा. उसका मामला ज़रा टेढ़ा है. 😂


07 April 2017

Creativity and Entertainment - रचनात्मकता और मनोरंजन

मनोरंजन की दुनिया भी बहुत निराली है. बचपन से रामायण-महाभारत की कथाएं सुनते आए हैं. तर्क की दृष्टि से उनमें लिखी बातें असंभव और अंतर्विरोधों से भरी लगती हैं. सोशल मीडिया पर छोटी उम्र के बच्चे उनके बारे में तार्किक बातें करने लगे हैं और ऐसा वे चुटकुलों के माध्यम से कर रहे हैं. इसे आप बच्चों की क्रिएटिव डिवाइस कह सकते हैं.

बचपन में जो फिल्में देखी थीं वो तस्वीर की तरह ज़हन में बसी हैं. वे आज भी सच्चाई सरीखी महसूस होती हैं. जानता हूं कि फिल्में एक तरह का नाटक या स्टेज शो होता है जिसे कैमरे में क़ैद कर लिया जाता है और फिर उन्हें एडिट कर के ऐसे सजाया जाता है कि अलग-अलग फ्रेम इकट्ठे होकर एक चलती कहानी का रूप ले लेते हैं. कहानी और विज़ुअल्ज़ को इतना उदात्त (बड़ा) बनाया जाता है कि दर्शक का भावनात्मक संसार प्रेरित हो कर उसके साथ-साथ आंदोलित होने लगता है. ऐसे अनुभव दिमाग पर छप कर उसका हिस्सा बन जाते हैं और दिमाग़ की मौत तक उसमें रहते हैं. इन्हें हम संस्कार भी कह देते हैं.

जब फिल्में नहीं बनती थीं तब ऐसी कहानियां शब्दों, नाटकों, गीतों के माध्यम से यात्रा करती थीं. कथावाचक (किस्सागो) कह कर या गा कर लोगों को कथाएँ सुनाता था. उसका इम्प्रेशन (संस्कार) पाठक-श्रोता के मन पर बैठता जाता था ठीक वैसा जैसा फिल्म देखने पर होता है. मनोरंजन का बाज़ार आकर्षक होता है जिसकी ओर हम मर्ज़ी से खिंचते हैं. कुछ श्रेय कलाकार को भी जाता है. मँजा हुआ लेखक या कलाकार किसी की मृत्यु के अवसर को जश्न में बदल सकता है. रावण दहन इसका एक उदाहरण है.

एक सिलेबस की किताब में पढ़ा था कि श्रम करने के बाद मजदूरों को मनोरंजन की तलब होती है. वे गाना-बजाना करके अपनी थकान उतारते हैं. क्योंकि दुनिया में मेहनतकशों की संख्या सबसे अधिक है तो मनोरंजन का सबसे बड़ा बाजार वहीं है. बाज़ार के खिलाड़ी इस बात को जानते हैं. इस दृष्टि से जातक कथाएँ, रामायण, महाभारत, पुराण और अन्य विस्तारित साहित्य जैसे गीत-गोविंद या पंचतंत्र आदि, ऐसी रचनाएं हैं जो किसान-कमेरों, कारीगरों, शिल्पियों को लुभाती चली आ रही हैं. सदियों से अशिक्षित समाजों ने उन ग्रंथों, कथाओं को तर्क की दृष्टि से नहीं देखा. वे मनोरंजित और धन्य होते रहे. शिक्षित युवा अब तर्क के नजरिए से भी उस कथा-साहित्य को देखने लगे हैं.

आज रचनात्मकता के इतने साधन उपलब्ध हैं कि चाहे कोई भी मनोरंजन की एक दुनिया बना ले, चाबी दे कर उसे चलने के लिए ज़मीन पर छोड़ दे, वो चलती जाएगी. आप भी बनाइए और देखिए, वो सदियों तक चल सकती है.


"अच्छा लिखने के लिए अच्छा पढ़ना ज़रूरी है."

30 March 2017

Expanding Kabir - फैलता कबीर

कबीर के बारे में जितना भी लिखा गया वह या तो भक्ति साहित्य की समीक्षा के नाम पर लिखा गया था या फिर जातिवाद के आधार पर. कुल मिला कर कबीर के साहित्य पर आचार्यत्व थोपा गया था जबकि ज़रूरत थी उस विश्लेषण की जो बता सके कि कबीर की वाणी में ऐसा क्या-क्या है जो कबीर का लिखा हो ही नहीं सकता.


उल्लेखनीय है कि उस समय के लगभग सभी संत निम्न जातियों से थे. कबीर को संत कहा गया तो कहीं उसे विद्रोही भी बताया गया. ऐसा अधिकतर सवर्ण लेखकों ने किया. दूसरी ओर वे समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए और उनका मुख्य कार्य व्यर्थ और अमानवीय धार्मिक कर्मकांडों के अलावा हिंदू धर्म में मान्य जातिवाद का विरोध था. उनका वो नज़रिया निम्न जातियों में व्यापक स्तर पर फैला. उन्हें भक्त कहा जाना उनके असली कार्य को पीछे धकेलने की एक कोशिश थी जो धीरे-धीरे नाकाम होती रही. लोग समझने लगे कि जिसे साहित्य में भक्तिकाल कहा जाता है वह वास्तव में मुक्तिकाल था जिसमें जातिवाद के विरोध में संघर्षरत कई संत जान पर खेल गए. 'आवाज़ इंडिया' और अन्य जगह तर्कवादी कबीर की तुलना बुद्ध से होने के बाद से कुछ लोग उन्हें 'अदृश्य बुद्धिस्ट' कहने लगे हैं. उनके ऐसा करने के पीछे 'अदृश्य' कारण हो सकते हैं.


हालाँकि सभी अनुसूचित जातियों के अपने धार्मिक आइकॉन के रूप में उनके अपने महापुरुष हैं लेकिन लगभग सभी अनुसूचित जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों और उनके व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली, जुलाहे, आदि हैं.


अब मेघों (कबीरपंथी, मेघ और मेघ भगत) की बात करते चलते हैं जिन्होंने चौदवीं शताब्दी के कबीर को 20 वीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर अंगीकार किया. इसका कारण मेरी समझ के अनुसार यह है कि ये व्यवसाय से बुनकर थे. इस दृष्टि से कबीर और उनकी वाणी के प्रति इनका आकर्षण स्वाभाविक था. कबीर की वाणी में इन्होंने अपनी मेघपीड़ा और मेघसुख दोनों महसूस किए. पंजाब में इनकी पहचान 'कबीरपंथी' और 'मेघ' नामों से होती है. शादियां और अन्य संस्कार मुख्यतः आर्यसमाजी और थोड़े-बहुत कबीरपंथी परंपराओं के अनुसार होते हैं.


इन दिनों कबीर की पहचान ओबीसी के प्रतिनिधि साहित्यकार के रूप में होने लगी है और ओबीसी साहित्य में वे जगह पाते हुए दिख रहे हैं. पिछले दिनों संसद में नए ओबीसी आयोग के गठन की बात चली थी जिसका दायित्व होगा कि वह ओबीसी में शामिल करने योग्य कुछ नई जातियों के प्रस्तावों पर निर्णय करेगा जिसमें केंद्र सरकार की सीधी भूमिका होगी…...और इस पर मेरी कल्पना के घोड़े जंगली हो उठते हैं. दिल पूछने लगता है कि क्या मेघ ओबीसी के लिए क्वालीफाई नहीं करते? 🤔
“मध्यकालीन संत कवि कबीर की हिन्दी साहित्य ने काफी दिनों तक उपेक्षा की थी. साहित्य से ज्यादा समाज में स्वीकृत और जीवित रहे कबीर को बाद में साहित्यिक आलोचकों ने उनकी जाति के सन्दर्भ में भ्रामक दावे के साथ साहित्य में जगह दी, यह दावा था उनके ब्राह्मण विधवा का बेटा होने का.  बाद के दिनों में दलित आलोचकों ने उन्हें दलित बताया.” : कमलेश वर्मा

23 March 2017

Advertise Your Megh - अपने मेघ का विज्ञापन करें

यदि आप काम तो बहुत उम्दा कर रहे हैं और कोई आपको और आपके काम को नहीं जानता तो इसका कारण विज्ञापन की कमी हो सकता है. आप बंदे तो बहुत अच्छे हैं लेकिन दूसरों के बीच आपका वैसा इंप्रेशन नहीं बन पा रहा तो पक्की बात है कि आपने अपना विज्ञापन नहीं किया. यदि आप सोचते हैं कि आपके भीतर बहुत बढ़िया विचारों, भावनाओं, जज़्बातों, उम्मीदों का ख़ज़ाना भरा हुआ है और दूसरे लोग उसे ख़ुद-ब-ख़ुद जान जाएँगे तो आप ग़लती पर हैं. आपको बोलने और अपना विज्ञापन करने की ज़रूरत है.


विज्ञापन की ख़ासियत है कि रिपीट होते रहने पर वो अपना एक ख़ास अर्थ देने लगता है. फिर उस अर्थ के रूप में दूसरों के मन का हिस्सा बन जाता है. थोड़े में कहें तो आप अपने विज्ञापन के ज़रिए दूसरे के दिल-दिमाग़ में जगह बनाते हैं और आगे चल कर आपको उसका फ़ायदा होने लगता है. यह बेहतरीन हो जाता है जब विज्ञापन सही सूचना और अच्छा इंप्रेशन दें. विज्ञापन रोचक, भयानक, आकर्षक और मनोरंजक होते हैं यह आपने देखा होगा.


मेघ समाज अपने ख़ुद के विज्ञापन के प्रति कमोबेश उदासीन रहा है और अब उसे बहुत सचेत रहने की ज़रूरत है. यह समाज ग़रीबी के बावजूद इंसानियत और मानवीय गुणों से भरपूर रहा. विपरीत हालात में जीने की इच्छाशक्ति और जीवट में इस समाज के लोगों का जवाब नहीं. वे शिक्षित हुए तो अपनी ज्ञान-बुद्धि और सूझ-बूझ से कामयाबी की ऊँचाइयों तक पहुँचे. सेना में गए तो अपनी प्रोफेशनल क्षमता की निशानियां छोड़ आए. व्यापार में उन्होंने सफलता हासिल की.


तो मेघ सर, आप अपनी ख़ासीयतों का अच्छे से विज्ञापन क्यों नहीं करते? शुरू कीजिए. इस दुनिया में आइए. अब तो आपके पास सोशल मीडिया है. आपके बनाए हुए कबीर मंदिर हैं जो आपका विज्ञापन हैं. ये आपको पहचान देते हैं.


एक विज्ञापन है जिसमें पहले परिवारों की खुशहाली, शिक्षा के प्रसार, स्वास्थ्य सेवाओं, खेल-खिलाड़ी, संस्कृति विकास आदि की बात है. आखिर में एक छोटी-सी लाइन है- “इस्पात भी हम बनाते हैं”. यह टाटा स्टील का है. अपने कार्य के बारे में दूसरों को बताना और सलीके से की गई ख़ुद की तारीफ़ अपना और अपने समाज का बढ़िया विज्ञापन होता है.

मेघ सर, सुबह हो गई है. अख़बार देखिए. दुनिया विज्ञापनमय है. उसमें अपनी हाज़िरी दर्ज कीजिए.




19 March 2017

Casteism - Expectations of worker castes - जातिवाद - कमेरी जातियों की उम्मीदें

यह जानकर खुशी होती है कि हमारे मेघ समुदाय के लोग अन्य जातियों के साथ बेहतर आपसी व्यवहार स्थापित कर रहे हैं. यह भी देखा गया है कि उनमें रोटी-बेटी का संबंध बना है चाहे अभी वो व्यापक स्तर पर नहीं है. (ऑफ कोर्स मैं इंटरकास्ट मैरिजिज़ की बात कर रहा हूँ). निश्चित रूप से भारतीय समाज में एक परिवर्तन देखने को मिला है जो स्वागत योग्य है.


अब सीधे आरएसएस की विचारधारा पर आते हैं. आरएसएस का दीर्घाकालिक लक्ष्य सत्ता रहा जिसका रास्ता हिंदुत्व से हो कर गुज़रता है. हिंदुत्व का आधार एक संदेहास्पद अवधारणा पर आधारित है. जब स्वामी दयानंद द्वारा प्रयुक्त ‘आर्य’ शब्द अधिक नहीं चल सका तो उसके बाद हेडगेवार, सावरकर जैसे चिंतकों ने हिंदुत्व का नाम और एजेंडा प्रस्तावित किया जिस पर आरएसएस चल निकला. हिंदुत्व का अर्थ क्या होगा जब हम उसे ‘हिंदू धर्म’ शब्द के साथ जोड़कर देखेंगे. संभव है कि आरएसएस के एजेंडा में ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू धर्म’ में अंतर हो लेकिन आम आदमी के लिए हिंदुत्व और हिंदू धर्म एक ही बात है. हिंदू धर्म की कई विशेषताएं हैं जिसमें समाज का जातिगत ढांचा एक प्रमुख लक्षण है जिसे जातपात कहा जाता है. इसमें कमेरी और श्रमिक जातियां सबसे नीचे आती हैं और अन्य जातियां सवर्ण कहलाती हैं. नोट करें कि सवर्ण जातियां खुद को जातिगत ढांचे के अंतर्गत नहीं मानतीं.


अब रहा हिंदू धर्म. इसका आधार ऐसे ग्रंथ माने जाते हैं जो मुख्यतः वैदिक ब्राह्मणों ने लिखे हैं. इन ग्रंथों ने जातिवाद और अस्पृश्यता जैसी  बुराइयों  का आधार तैयार किया, उसे निरंतरता दी. ये आज भी उस नफ़रत पैदा करने वाली मानव व्यवस्था को मान्यता देते हैं. हिंदुत्व के ध्वजाधरों ने कभी भी इन ग्रंथों के बारे में खुल कर नहीं बोला कि ऐसे ग्रंथ जो जातिगत घृणा फैलाते हैं वो उन्हें मान्य नहीं हैं या वे उन ग्रंथों का खंडन करते हैं, कम से कम जातिवाद के संदर्भ में.


हिंदूधर्म की कोई स्पष्ट परिभाषा अभी तय नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट ने उसे जीवनशैली कहकर कहीं रख दिया हुआ है. लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता. हिंदुत्ववादी संगठन मनुस्मृति आदि धर्म ग्रंथों की भावना को कभी मरने नहीं देते. वे उसे धार्मिक सत्संगों, सम्मेलनों तक में घसीट कर ले आते हैं और लोगों के मन पर जातिवाद की जो तस्वीरें बनी हुई हैं उन्हें धुंधला नहीं होने देते.


संघी विचारधारा से प्रभावित कुछ मेघ कहते दिखे हैं कि हम अन्य जातियों की जातपात संबंधी समस्या को अपना ढोल समझ कर बजाते हैं तो यह हमारी ग़लती है. यह बात हज़म नहीं होती क्योंकि यह समस्या सभी कमेरी और श्रमिक जातियों की है. इन दिनों उन जातियों में जो एकता का भाव पैदा हुआ है उससे संघ जैसे संगठनों में बेचैनी हुई है लेकिन अधिक नहीं क्योंकि वे अभी तक सत्ता में हैं. सवर्ण व्यवस्था ने इस देश की बहुसंख्यक आबादी को मनुस्मृति के संविधान के तहत सदियों तक अशिक्षित रखा इसलिए वे किसी न किसी प्रकार से सत्ता में आने का जुगाड़ कर लेती हैं. पहले यह कार्य कांग्रेस के माध्यम से हुआ अब भाजपा ने उसकी जगह ले ली है.

सिर्फ़ यह कहने से काम नहीं चलेगा कि जातपात मर चुकी है. कमेरी और श्रमिक जातियाँ संघ जैसे संगठनों से यह उम्मीद क्यों न करें कि वे जातिवाद को स्थापित करने वाले उन धार्मिक ग्रंथों के अर्थ तय करें और उनमें भरे जातिवाद को अपने स्तर से अमान्य कहने की स्वस्थ परंपरा डालें. शायद इससे देश में व्याप्त जातिवादी नज़रिया बदल जाए. धर्मग्रंथों के अलावा शब्दकोशों, मुहावरा कोशों आदि को अलग से देखा जा सकता है. राजनीतिक पार्टियाँ भी जातिवाद को अपनी तरह से ज़िंदा रखती हैं. वे भी 'टिकाऊ विकास के लिए टिकाऊ समाज ज़रूरी' वाले सिद्धांत पर कार्य करती नहीं दिखतीं.