24 September 2012

Mother Goddess is here - देवी माँ आई हैं


कई वर्ष हो गए चंडीगढ़ जैसे आधुनिक शहर में कहीं किसी महिला में देवी माँ के आने की ख़बर नहीं सुनी थी. मेरे सर्कल में पिछले दिनों देवी माँ के पधारने की ख़बर आ गई.

तब मेरी आयु 12-13 वर्ष की थी जब टोहाना में हमारे पड़ोस की एक नव विवाहिता में उसकी पहली स्वर्गीय सास आ गई. काफी तूफान मचा. सास-ससुर परेशान, पति-देवर परेशान. ओझा बुलाए गए. मुर्गी की बलि दी गई जो मरने से पहले गोल-गोल घूमी. दो सप्ताह तक पास-पड़ोस में दहशत फैली रही. डर के कारण से मेरी माँ और मुझे सोते में छाती पर दबाव महसूस हुआ. अगले दिन माँ ने ओझा से कह कर तहलीज पर कील ठुकवाए.

बच्चा होने के नाते मेरा उस घर में आना-जाना अचानक भी हो जाता था. मुझे कुछ ऐसी बातें पता थीं जो बड़े नहीं जानते थे. मैंने एक दिन माँ से कहा कि उस महिला में आई उसकी पहली सास कहेगी कि मेरी बहु को कुछ दिन के लिए उसके गाँव भेज दो. माँ ने पूछा, "तुम्हें कैसे पता?" मैंने उत्तर जानबूझ कर नहीं दिया लेकिन ऐसा मुँह बनाया जैसे मैं अज्ञात बातें जानता हूँ. इसे 'बच्चे' की समझदारी कहा जा सकता है. मेरी भविष्यवाणी सच साबित हुई. बहु को उसके गाँव भेज दिया गया. सब ठीक हो गया. आठ-दस महीने के बाद वह लौटी. यह जीवन के एक अंधेरे पक्ष का ऐसा प्राकट्य था जिसे उस महिला के ससुराल वालों ने यह सोच कर स्वीकार कर लिया कि- 'जाने दो'. पूरे मामले में धर्म इस बात में दिखा कि आगे चल कर उस महिला की मानसिक मजूबरी समझ कर उसे क्षमा कर दिया गया.

मृतात्माएँ यूँ ही प्रकट नहीं होतीं. कोई आत्मा दुखी होती है या उसकी इच्छा पूरी नहीं हो रही होती तो मृतात्माएँ, भूत आदि प्रकट होने लगते हैं. पति के नपुंसक होने पर पत्नी का भूत-प्रेतों या ऊपरी चीज़ों के डर से साधुओं के पास या मंदिरों में जाना या युवा विधवाओं के साथ ऐसा होना इसी मानसिक प्रक्रिया का हिस्सा है. 

इसके और कारण भी हो सकते हैं. मेरे एक मित्र की पत्नी एक अन्य महिला के चंगुल में है जिसमें देवी माँ आती है और उस महिला ने अपने घर में ही एक मंदिर भी बना रखा है. उसके पति ने इसे किसी कारण से छोड़ दिया था और अब उस महिला पर तीन पुत्रियों का उत्तरदायित्व है. मित्र की पत्नी उसके मंदिर में नियमित रूप से जाती है और खूब चढ़ावा चढ़ाती है.

मित्र के यहाँ कीर्तन रखा गया तो मुझे भी निमंत्रण मिला. मैं लगभग जानता था कि क्या होने जा रहा है. कुछ देर देवी माँ की आरतियाँ गाने के बाद एक भजन-सा गाया गया जिसका भाव था- आज मेरी माँ ने यहाँ प्रकट होना है. देखा दोनों महिलाओं ने अपने बाल ऐसे बाँध रखे थे कि आसानी से खुल जाएँ. फिर उनका सिर घुमाने और झूमने जैसा नृत्य शुरू हो गया. मोहल्ले की कुछ महिलाएँ उठ कर चली गईं. एक यह कह कर चली गई कि 'इन पढ़े लिखों से हम अनपढ़ अच्छे हैं'. अधिक नहीं लिखना चाहता. संक्षेप में इतना ही कि अपने घर में मंदिर चलाने वाली देवी ने मित्र की पत्नी को बताया- तुम्हारे घर में ही कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने तुम्हारे परिवार को कुछ किया हुआ है. पारिवारिक समूह का ढाँचा ऐसा था कि यदि elimination का method अपनाएँ तो केवल उस परिवार की ओर संदेह की उँगली उठती थी जिसका संपत्ति में बराबर का कानूनी अधिकार था. कुल मिला कर नया कुछ नहीं था. प्रयोजन था संपत्ति में शरीक़ों के विरुद्ध घृणा का वातवरण बनाना और संपत्ति के मामले में सास-ससुर के निर्णयों को प्रभावित करना.

अधिकतर मामलों में ये 'देवी माँ' के व्यवसायी ऐसे 'कीर्तन' आयोजनों का प्रयोजन पहले से जानते हैं. ये कभी भूल कर भी उस व्यक्ति का नाम नहीं लेते जिसके विरुद्ध घृणा और भय का वातावरण बनाया जाना होता है. अस्पष्ट अर्थ देने वाले गोल-मोल शब्दों का प्रयोग किया जाता है और शेष कार्य अनुमान, कानाफूसी, निंदा, चुग़ली के माध्यम से होने दिया जाता है. क्योंकि नाम ले देने पर ऐसे तथाकथित धार्मिक कीर्तन में ही बवाल हो सकता है और "देवी माँ" को फटकार लगा पूछा जा सकता है कि तुम्हारे नाम लेने का मक़सद क्या है और तुम्हारे खिलाफ़ कार्रवाई क्यों न की जाए. 

इस व्यवसाय वालों को गुंडों और पुलिस का साथ लेना पड़ता है. पुलिस वाला भी इनसे विभिन्न परिवारों की आंतरिक जानकारियाँ ले सकता है अगर उसकी ख़ाक़ी काफ़ी गंदी हो. इस व्यवसाय वाले अपने 'ग्राहकों' से उनके संपर्कों की भी जानकारी एकत्रित कर लेते हैं और उनका भरपूर शोषण करते हैं. किसी का दिया हुआ विज़िटिंग कार्ड तक इनके बहुत काम आता है. इस व्यवसाय का मूल मंत्र है- भय और आशंका का वातावरण बना कर धन कमाना.

इस बिज़नेस में आपकी रुचि है क्या? ;)

MEGHnet

 

11 September 2012

Hindi Day, 14h September - हिंदी दिवस - 14 सितंबर


भाषा की दृष्टि से केंद्र सरकार का स्टाफ दो वर्गों में बँटा है. अंग्रेज़ी कबीला जो खुद को अंग्रेज़ ही मानता है और हिंदी कबीला जो खुद को मूलतः हिंदी का मिशनरी मान कर चलता है. आम धारणा है कि हिंदी में यदि कुछ किया जाना है तो हिंदी कबीला करेगा. अँग्रेज़ी कबीला मुसीबत में ही हिंदी को हाथ लगाएगा.

कंप्यूटर जब आए तो उनके साथ आधुनिकता और ग्लैमर आया. अंग्रेज़ी कबीला तुरत कंप्यूटर पर अकड़ कर बैठ गया और अंग्रेज़ी टाइपिंग का काम अपने हाथ में ले लिया. बाद में कंप्यूटर पर हिंदी आ गई. अंग्रेज़ी कबीला की-बोर्ड में हिंदी का अस्तित्व देख कर बिदका. इसके अनुसार कंप्यूटर में हिंदी ऐसा शॉर्ट सर्किट है जिस पर उँगली नहीं पड़नी चाहिए.

अन्य स्टाफ़ हिंदी में काम नहीं करता तो न करे. दंड का कोई प्रावधान नहीं है. राजभाषा का करबद्ध काडर दफ़्तर के किसी गंदे से कोने में बैनर ले कर खड़ा रहता है- 'हिंदी में काम करना आसान है.' लेकिन अन्य कोनों से इसकी प्रतिध्वनि यों आती है- हिंदी तुम्हारी सेवा का नाम है.

हर साल 14 सितंबर को 'हिंदी दिवस' मनाया जाता है. इस कबीले के लिए यह एक प्रकार की '26 जनवरी' है जिस दिन इसकी फूलों सजी झाँकी निकाली जाती है. मंच पर बैठे अंग्रेज़ी बॉस के गले में हार डाले जाते हैं. बैनर-वैनर, भाषण-वाषण, गाना-वाना, फोटो-वोटो, खाना-पीना होता है. समारोह समाप्त. 

सीढ़ियों पर, दफ़्तर भर में चढ़ता-भागता यह कबीला शाम पाँच बजे लंबी साँस ले कर अपने बॉस लोगों और साथियों को कोस लेता है- 'आज सरकारी खर्चे पर तुमने ख़ूब काजू-बादाम खा लिए, कमबख्तो!! हिंदी में काम तुम धेले का नहीं करते.'