15 June 2013

Social Conventions and Meghwals - मेघवाल और सामाजिक रूढ़ियाँ


Prithvi Pal Singh Meghwal (via Face Book)

मेरी व्यथा:- बहुत गाँवों में हमारे समाज की कुछ भयानक-असहनीय परम्पराएँ या मजबूरियाँ हैं, जैसे:-

(1) मेघवाल परिवार की शादी के कार्याक्रम के दौरान अगर गाँव में कोई ठाकुर या उसका कोई सबंधी मर जाता है तो, मेघवाल परिवार को बिना गाजा-बाजा यानि बिना किसी गीत-गायन और ढोल के चुपचाप उस शादी को सम्पन्न करना होता है, दूसरी ओर अगर इसका उल्टा उदाहरण लें तो ठाकुर कभी भी अपनी शादी का माहौल फीका नहीं करेगा (उदाहरण :- नरसाणा, मुडी, तेळवाडा, निम्बलान, पारपड, सापनी, दासपा और आस-पास के सैंकडों गाँव)

(2) अगर किसी गाँव में बारात आती है तो बारातियों को शादी से पहले, जहाँ गाँव के बाहर डेरा लगाया जाता है, वहाँ नीचे बैठना पडता है, क्योंकि ठाकुर, मेघवालों को पलँग-कुर्सी पर बैठने की आज्ञा नहीं देता, मुझे भी एक बारात में नीचे बैठना पडा था (गाँव निम्बलान-जालोर). मैं उस वक़्त कॉलेज मे पढता था. पहले मैं दूल्हे के साथ पलँग पर बैठा था, पर उस गाँव के अपने समाज के लोगों ने ही मुझे पलँग से नीचे उतार दिया, और बोले कि आप तो एक दिन के मेहमान हो और हमें तो इस गाँव में जिंदगी-भर रहना है. फिर भी मैं अड़ा रहा और फिर से पलँग पर बैठ गया और ठाकुर ने देख लिया, शिकायत आयी, और जिसकी सज़ा हमने बारात रवानगी के वक़्त पायी, वहाँ के ठाकुर के बच्चों ने हमारे, उजले कपडों पर गोबर-कीचड़ डाला. हमें बहुत परेशान किया पर किसी की हिम्मत न थी कि उन्हें रोके. (उदाहरण:- जालौर, बाड़मेर के सैंकड़ों गाँव).

(3) शादी के बाद नव-विवाहित जोड़े को गाँव के तथाकथित ठाकुर के घर धौक लगाने जाना होता है, कभी-कभी इसका शर्मनाक परिणाम भी भुगतना पड़ता है (उदाहरण :-जालौर-बाड़मेर के कठाडी, रामणिया और आस-पास के गाँव).

(4) अगर ठाकुर के घर कोई मर जाता है तो अपने समाज के लोगों को सिर पर सफेद कपड़ा बाँधना पड़ता है और ठाकुर की मौत का शोक करना पडता है. इसका भी उल्टा उदाहरण लें तो ठाकुर कभी भी ऐसा नहीं करता है. (उदाहरण:- जालौर, बाड़मेर के सैंकडों गाँव).

(5) गाँव के मेघवाल समाज के लोग अगर गाँव के बाहर गुंदरा (चौहटा) या किसी चौपाटी पर बैठने की हिम्मत कर ले तो उसे लात मार के नीचे फेंका जाता है, सो किसी की हिम्मत तक नहीं कि कोई चौपाटी/चौहटे पर बैठ सके. और अगर बस में सफर करे तो ठाकुर जात को जगह अपने-आप ही मिल जाती है क्योंकि मेघवाल बंधु को सीट छोडनी ही पडती है. 

(6) मरे हुये ठाकुर के घर मेघवाल औरतों का रोने जाना तो कई गाँवों में अभी-भी चल रहा है.
क्या वाकई यह परम्परा है या माजबूरियाँ, या हमारी आदत जो चाहते हुए भी नहीं छूट रही है?

(7) गाँव में मरे ठाकुर के घर मृत्यु-भोज में मेघवाल जाता है और सबसे दूर अलग बैठ कर अपने ही घर से साथ लाए बरतन में भोजन करता है. क्या वहाँ जाना और इस तरह अपमान के साथ खाना मजबूरी है?

(8) आज भी कई गाँवों के सभी घरों में नल सुविधा नहीं है, इसलिये मेघवाल औरतों को गाँव के कुँए पर पानी भरने जाना पड़ता है जहाँ उन औरतों को अपने मटके लिए दूसरे समाज की औरतों से दूर खड़े रहना पड़ता है. अगर मेघवाल औरत अकेली कुँए पर गयी है तो मटका उठाने में दूसरी औरतें सहायता नहीं करतीं यानि वे औरतें मेघवालों के मटकों को हाथ तक लगाना अशुभ मानती हैं. शायद इस समस्या को दूर होने में थोड़ा और समय लगेगा. 

(9) अपने किसी रिश्तेदार के मरने पर मृत्यु-भोज कर के अपने आप को समाज में ऊँचा साबित करना.

मेघवाल मृत्यु-भोज:- कई गाँवों से भारी मात्रा में मेघवाल पुरुष, महिलाएँ, बच्चे, मृत व्यक्ति के घर इकट्ठे होते जाते हैं और खाना खाते जाते हैं. अगर गंगा थाली हो तो ढेरों मिठाइयाँ बनाई जाती हैं. इस अवसर के लिये एक गरीब को अपना कई वर्षों की कमर-तोड़ मेहनत से हुई कमाई पानी की तरह बहानी पड़ती है,  कभी-कभी खेत को गिरवी रखना या बेचना पड़ता है, क्योंकि मजबूरी यह होती है कि अपने ही समाज के लोग कहते हैं कि हमारे भी बाप-दादा की मृत्यु के बाद हमने मृत्यु-भोज कराया तब तूने भी खाया था अब तेरी बारी वरना तेरे बाप-दादा मरने के बाद ऐसे ही समाज में लटकते रहेंगे और बार-बार समाज की बैठक में ऐसा मामला उठाया जाता है और उस गरीब को कोसा जाता है, पर आज-कल ऐसा सामाजिक दबाव कम तो हो गया है पर फिर भी ये मूर्ख लोग नहीं समझते. मैं मेरी मौसी की सासु के मृत्यु-भोज में नहीं गया. मेरी मौसी ने पूछा कि क्यों नहीं आया, बहुत लोग आये थे, मैंने कहा मौसी आपको मैंने पहले ही कहा था कि यह खर्चा मत करो. आपको क्या मिला? मौसी हँस कर बोली- अरे, समाज में रहना है तो करना पडता है, और तुझे पता है बहुत लोग आये थे, लगभग 12 गाँव के लोग, और भोज में 3-4 लाख खर्चा आया. लोगों ने बहुत सराहा, वाह भाई बहुत खर्च किया और मौसी-मौसा कुछ दिनों तक समाज में अपने आपको ऊँचा समझने लगे हैं. क्या ये परम्परा सही है? 

मेरी ऐसी कोई मजबूरी या आदत नहीं है पर मेरे द्वारा अकेला कुछ करना व्यर्थ है क्योंकि हमारे बंधुओं को गंदी सामाजिक परम्परा ने जकड़ रखा है, ये तभी इस समस्याओं से मुक्त होंगे जब सब मिलकर इसे दूर करेंगे और मेरी तरह अपना सुंदर जीवन जीने की कोशिश करेंगे. और अगर बुजुर्ग (जिन्होंने इन गंदी परम्पराओं को अपनी कांख मे दबा रखा है) कोशिश करेंगे तो यह परम्परा जल्दी ही भस्म हो जाएगी.

मेरी व्यथा पढने के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया, पर असली शुक्रिया तो तब होगा जब आप सब मेरा साथ दोगे.

शर्मनाक :दलित दूल्हे को घोड़े से उतारकर, पैदल घुमाया

शर्मनाक :दलित दूल्हे को घोड़े से उतारकर, पैदल घुमाया

Jul 12, 2013
टीकमगढ़ । एक दलित दूल्हे का सिर पर सेहरा बांध कर और घोड़ा पर सवार होकर अपनी बारात निकलवाने का सपना उस समय हवा हो गया, जब गांव के प्रभावशाली लोगों ने दूल्हे को न केवल घोड़े से नीचे उतरवाया बल्कि उसकी बारात भी पैदल निकलवाई। मामला टीकमगढ़ जिले के दिगौड़ा थाना के अंतर्गत आने वाले ग्राम मऊ बछौड़ा का है। इधर घटना के बाद दूल्हे की बहन और पिता ने इसकी सूचना पुलिस को दी है। पुलिस ने मामले में एक संदिग्ध व्यक्ति को पकड़ लिया है।
http://www.bhaskar.com/article/c-58-1972588-NOR.html

 

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