31 March 2014

A drop of History of Meghs - मेघ इतिहास की एक बूँद

(Frederic Drew की पुस्तक के पृष्ठ 55-57 तक का अनुवाद)

अंत में वे जातियाँ आती हैं जिन्हें हम अंग्रेज़ सामान्यतः हिंदुओं की 'निम्न जातियाँ' कहते हैं लेकिन ऐसा किसी हिंदू के मुँह से नहीं सुना जाता; उन्हें हिंदू के तौर पर कोई मान्यता नहीं दी जाती; उन्हें हिंदुओं में नीचा स्थान भी प्राप्त नहीं है. उनके नाम हैं मेघ और डूम और मेरा विचार है कि इनमें धियार नामक लोगों को भी शामिल करना चाहिए जिनका पेशा लोहा पिघलाना है और जिन्हें आमतौर पर उनके साथ ही वर्गीकृत किया जाता है.

ये कबीले आर्यों से पहले आने वाले कबीलों के वंशज हैं जो पहाड़ों पर रहने वाले थे जो हिंदुओं और आर्यों द्वारा देश पर कब्ज़ा करने के बाद दास बना लिए गए थे; आवश्यक नहीं था कि वे किसी एक व्यक्ति के ही दास हों, वे समुदाय के लिए निम्न (कमीन) और गंदगी का कार्य करते थे. उनकी स्थिति आज भी वैसी है. वे शहरों और गाँवों में सफाई का कार्य करते हैं*. (* मेरा विचार है कि धियारों का रोज़गार ऐसा कम है कि वे जातीय रूप से मेघों और डूमों से जुड़े हैं.) डूमों और मेघों की संख्या जम्मू में अधिक है और वे पूरे देश, जो निचली पहाड़ियों और उससे आगे की ऊँची पहाड़ियों, में बिखरे हैं. वे ईँट बनानें, चारकोल बर्निंग और झाड़ू-पोंछा जैसे रोज़गार से थोड़ी कमाई कर लेते हैं. इन्हें प्राधिकारियों द्वारा किसी भी समय ऐसे कार्य के लिए बुलाया जा सकता है जिसमें कोई अन्य हाथ नहीं लगाता.

केवल उनके द्वारा किए जाने वाले ऐसे श्रम की श्रेणी के कारण ही ऐसा है कि उन्हें एकदम अस्वच्छ गिना जाता है; वे जिस चीज़ को छूते हैं वह गंदी प्रदूषित हो जाती है; कोई हिंदू सपने में भी नहीं सोच सकता कि वह उनके द्वारा लाए गए ऐसे बर्तन से पानी पीएगा जिस बर्तन को एक सोंटी के किनारे पर लटका कर ही क्यों न लाया गया हो. जिस गलीचे पर अन्य बैठै हों वहाँ इन्हें कभी आने नहीं दिया जाता है. यदि संयोग से उन्हें कोई कागज़ देना हो तो हिंदू उस कागज़ को ज़मीन पर गिरा देगा और वहाँ से वह उसे ख़ुद ही उठाएगा; वह उन्हें उनके हाथ से नहीं लेगा.

मेघों और डूमों के शारीरिक गुण भी हैं जो उन्हें अन्य जातियों से अलग करते हैं. उनका रंग सामान्यतः अधिक साँवला होता है जबकि इन क्षेत्रों में उनका रंग हल्का गेहुँआ होता है, इनका रंग कभी इतना साँवला भी हो सकता है जितना दिल्ली से नीचे के भारतवासियों में है. मेरा विचार है कि आम तौर पर इनके अंग छोटे होते हैं और कद भी तनिक छोटा होता है. अन्य जातियों की अपेक्षा इनके चेहरे पर कम दाढ़ी होती है और डोगरों के मुकाबले इनका चेहरा-मोहरा काफी निम्न प्रकार का है, हालाँकि इसके अपवाद हैं जिसका कारण निस्संदेह रक्तमिश्रण है, क्योंकि दिलचस्प है कि अन्य के साधारण दैनिक जीवन से इनका अलगाव उस कभी-कभार के अंतर्संबंधों को नहीं रोकता जो अन्य जातियों को आत्मसात करता है.

डूमों के मुकाबले मेघों की स्थिति कुछ वैसी है जैसे हिंदुओं में ब्राह्मणों की, उन्हें न केवल थोड़ा ऊँचा माना जाता है बल्कि उन्हें कुछ विशेष आदर के साथ देखा जाता है.

जम्मू-कश्मीर के महाराजा (गुलाब सिंह) ने इन निम्न जातियों की स्थिति में सुधार के लिए कार्य किया और सैंकड़ों लोगों को सिपाही के तौर पर खुदाई और खनन कार्य के लिए भर्ती किया. इन्होंने कुछ नाम कमाया है, वास्तव में युद्ध के समय ऐसा व्यवहार किया है कि उन्हें सम्मान मिला है, उच्चतर जातियों के समान ही अपने साहस का परिचय दिया है और सहनशक्ति में तो उनसे आगे निकले हैं.

इस प्रकार हम देखते हैं कि डूगर के अधिसंख्य लोग हिंदू हैं जिनमें पुराने कबीलों के भी लोग हैं. वे किस धर्म से संबंधित हैं यह नहीं कहा जा सकता........

(From 'The Jummoo and Kashmir Territories, A Geographical Account' by Frederic Drew, 1875)










MEGHnet






https://archive.org/stream/jummooandkashmi00drewgoog#page/n308/mode/1up

28 March 2014

Ravish Kumar (NDTV) shows political picture of Megh/Bhagat/Ravidasia - रवीश कुमार (एनडीटीवी) ने दिखाई मेघ/भगत/रविदासियों की राजनीतिक तस्वीर

NDTV ने जालंधर के भगतों की एक बड़ी साफ राजनीतिक तस्वीर दी है जिसे रवीश कुमार ने दिखाया है. लीजिए नीचे लिंक हाजिर है. क्लिक कीजिए,  देखिए, समझिए और सोचिए.



आपकी सहूलियत के लिए रवीश की प्रारंभिक टिप्पणी को मैंने लिपिबद्ध करके नीचे दिया है:-.

"नमस्कार मैं रवीश कुमार (साथ में एनडी टीवी की सहयोगी रिपोर्टर सर्वप्रिया सांगवान), हिंदुस्तान में सबसे ज़्यादा दलित पंजाब में रहते हैं और पंजाब में गरीबी रेखा से नीचे के जो लोग हैं उनमें से भी सबसे ज़्यादा दलित हैं. लेकिन इसके बावजूद एक तबका दलितों में ऐसा है जो ठीक-ठाक से बेहद के स्केल पर आर्थिक रूप से समृद्ध हुआ है. लेकिन अगर आप उत्तर प्रदेश से तुलना करेंगी तो उसकी तुलना में पंजाब के दलितों ने राजनीति में अपना वर्चस्व कायम नहीं किया है और उसके अनेक कारण रहे होंगे कि क्यों नहीं किया है. मगर एक कमी यह रह जाती है कि हम अकसर अपनी चुनावी रिपोर्टिंग में जो रिज़र्व सीट है उसके भीतर की विविधता और अंतर्विरोध को बहुत ज़्यादा तवज्जो नहीं देते हैं क्योंकि उन सीटों पर कोई अरविंद केजरीवाल या नरेंद्र मोदी या मुलायम सिंह यादव इस स्तर के नेता नहीं होते हैं और इसका नतीजा यह होता है कि वो सिर्फ गिन लिए जाते हैं कि लोकसभा की 70 से 80 सीटें हैं और उनमें जा कर यह जीतेगी या इस पार्टी ने यह उम्मीदवार दिया है. पंजाब में दलित राजनीति की कामयाबी और उसकी नाकामी दोनों को समझना हो तो जालंधर सबसे अच्छा सेंटर है. यह उसके पूरे संकट को बताता है कि किस तरह से यहाँ का जो दलित है उसको पार्टियों ने रविदासिए समाज में, वाल्मीकि समाज में और बरार समाज में और कबीरपंथी जो अपने आप को भगत कहते हैं उन तमाम तरह के समाजों में बाँट दिया है.

दलित चेतना यहाँ पर अलग-अलग सामुदायिक-सांप्रदायिक चेतना में बँटी हुई है. दलितों का कोई एक नेतृत्व नहीं है खासकर जब यह अहसास हुआ है कि हमें हिस्सेदारी नहीं मिली, हमारा भी दो लाख वोट है दलितों के भीतर और सिर्फ रविदासियों को मिलता है टिकट, तो उसी से चुनौती मिल रही है. उसने पंजाब की दलित राजनीति को ज़्यादा इंटरेस्टिंग बना दिया है."

इसी ब्लॉग से अन्य लिंक-
मेघों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा


MEGHnet

19 March 2014

Dharmaram Meghwal- our hero - धर्माराम मेघवाल- हमारे अग्रणी


धर्माजी मेघ का जन्म एक साधारण मेघवाल परिवार में हुआ था। आपकी माताजी का नाम नैनी बाई और पिताजी का नाम मदाजी था। मदाजी के चार पुत्र और एक पुत्री थी। धर्माजी चौथी संतान थे।

मदाजी के पुरखे ऊँटों पर वर्तमान पाकिस्तान से सामान लाकर जैसलमेर और जोधपुर के इलाकों में बेचते थे। साथ ही गायें-भैसे और भेड़-बकरी पालते थे। वर्षा के दिनों में खेती-बाड़ी के कामों में संलग्न हो जाते थे। औरतें खेती-बाड़ी के कामों से फारिग होने पर कताई-बुनाई का काम करती थीं। उस समय मारवाड़ में सामंतशाही का जोर था और  व्यापक स्तर पर मेघवालों ने और विशेषकर मदाजी  के परिवार वालों ने इसके विरुद्ध आन्दोलन छेड़ रखा था।  इसलिए उनके परिवार को कई बार एक गाँव से दूसरे गाँव भटकना पड़ा। वे मारवाड़ के पिलवा, जूडिया, हापाँ और केतु आदि गाँवों में रहे। उनके कुटुंब के कई लोग सामंतशाही और अकाल के कारन मारवाड़ छोड़कर पाकिस्तान के सिंध हैदराबाद और मीरपुर खास में जा बसे थे। कुछ लोग सौराष्ट्र की मिलों में काम करने चले गए।  उस समय पाकिस्तान और भारत में लोग आते-जाते रहते थे। धर्माजी भी अपने पिताजी के साथ वहाँ कई बार आये और गए।  मदाजी की पहली पत्नी का दो पुत्र और एक पुत्री को  जन्म देने के बाद देहांत हो गया। घर बार को संभालने के लिए मदाजी ने सेतरावा निवासी मेघवाल घमाजी की पुत्री नैनी बाई से विवाह कर लिया। नैनी बाई और मदाजी के दो संतान पैदा हुई। जिसमें धर्माजी बड़े थे।

सन 1925 के अकाल में मदाजी के कुटुम्ब के कई लोग जोधपुर आ गए और और जीवन यापन करने लगे। वर्षा के दिनों में गाँवों में जाकर खेती बाड़ी करते। धर्माजी उस समय बहुत छोटे थे। जोधपुर में रहते हुए वे सरकार की सेवा में आ गए और जब दुनिया का दूसरा प्रसिद्ध जंग छिड़ा तो जोधपुर में अंग्रेजों की सेना में 1942 को भर्ती हो गए। वहाँ से वे कलकत्ता गए, और कलकत्ता से उन्हें जर्मनी और जापान के विरुद्ध बर्मा बॉर्डर पर लड़े जा रहे युद्ध मैदान में भेज दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध 1939-1945 के बीच लड़ा गया था, जिसमें वर्तमान राजस्थान के भूभाग से कई मेघ लोग सेना में थे। 01 सितम्बर 1939 से लेकर 02 सितम्बर 1945 तक ब्रिटिश भारतीय सेना बरमा बोर्डेर पर जापान और जर्मनी की हिटलर सेना के विरुद्ध युद्ध रत रही। इस युद्ध में धर्माजी वल्द मदाजी मेघ इसी ब्रिटिश इंडिया आर्मी सेना में सार्जेंट थे। जब बरमा बोर्डेर पर युद्ध तेज हुआ तो उनकी रेजिमेंट के मेजर हुआ करते थे- करिय्प्पा। जो बाद में फील्ड मार्शल जनरल बने। इस सीमा पर 36000 भारत के सैनिक शहीद हुए, 34354 सैनिक घायल हुए और तक़रीबन 67340 युद्ध बंदी बनाये गए। 

धर्माजी युद्ध क्षेत्र में बहादुरी से लड़े। युद्ध की गोलियों को बहादुरी से उन्होंने सहा। उनके एक पैर में कुछ गोलियाँ घुस गयी थीं फिर भी वे डटे रहे। बाद में उनकी जांघ में भी गोलियाँ लगीं। जब करियप्पा साहब को ये सब जानकारी हुई तो उन्होंने धर्मा जी को संभवतः डिब्रूगढ़ मिलिट्री हॉस्पिटल में भर्ती कराया वहाँ गोलियाँ निकल नहीं सकीं। अतः धर्माजी को दीमापुर ले जाया गया। जहाँ उनकी जांघ से मांस काटकर गोलियाँ निकाली गयीं। वहां लम्बे समय तक उनका इलाज चला। धर्माजी को पुरस्कृत किया गया। वे बरमा स्टार और पेसिफिक क्लास्प्स से भी नवाजे गए थे। उन्हें कामैग्न अवार्ड भी मिला। (यह मुझे उन्होंने बताया था, उनके कुछ मैडल मेरे पास हैं; जिनमें से कुछ के फोटो नीचे पोस्ट किये गए हैं).

जापान ने 22 जनवरी 1942 में बर्मा पर आक्रमण किया। भारत की फ़ौज की तादाद बहुत कम थी। एक बार तो ऐसा लगा की भारत की सेनाएँ हार जाएँगी। रसद पानी भी ख़त्म था। परन्तु धर्माजी मेघ जैसे जाबांज़ इस हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने कहा कि युद्ध में बंदी बनाये जाने से तो अच्छा है कि युद्ध करते करते मर जाएँ। सैनिकों के इस जज्बे का प्रभाव उनके कमांडरों पर पड़ा। भारत से और थलसेना बुलाई गयी। इम्फाल और कोहिमा में जम कर युद्ध हुआ। जापान पीछे हटने को तैयार नहीं था। जापान ने रंगून पर भी अधिकार कर लिया था। परन्तु धर्माजी जैसे वीर सैनिकों की बदौलत पासा पलट गया और रंगून को भारतीय सैनिकों ने जीत लिया। उधर अमेरिका ने जापान पर बमबारी कर दी। मुझे धर्माजी ने बताया था कि उनके पास युद्ध के पूरे साजो सामान भी नहीं थे। अपने आत्मविश्वास और हौसले से तथा अमेरिकी कार्रवाई की मदद से वे जीत सके थे।

इसी समय धर्माजी मेघ बर्मा और जापान के सैनिकों के संपर्क में आये थे और बौद्ध धर्म की उन्हें जानकारी हुई। जिसे वे हमें यदाकदा बताया करते थे। अमेरिकी सैनिकों के प्रति उनका बड़ा आदर भाव था क्योंकि उनके साथ अमेरिकन सैनिक भी थे जिन्होंने रसद ख़त्म होने पर उन्हें थोड़ा-बहुत डिब्बा बंद रसद दिया था।

सन 1942 में धर्माजी जर्मन-जापान के विरुद्ध 'मिड वे' युद्ध मैदान में थे। यूनाइटेड स्टेट्स द्वारा जापान पर अणुबम गिराने के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। जर्मनी पहले ही घुटने टेक चुका था। धर्माजी 1942 से लेकर 1945 तक युद्ध भूमि में रहे। दुश्मनों से लड़ते रहे। कई दिनों तक भूखे प्यासे युद्ध करते रहे। उन्होंने बताया कि प्यास बुझाने के लिए पेट्रोल की घूँट भी सैनिकों ने लिए। ब्रिटिश भारत आर्मी का रसद भी ख़त्म था। अमेरिकन सेना के रसद ने उनकी मदद की। 

युद्ध 6 वर्ष से ज्यादा चला। धर्माजी 1942 से 1945 तक युद्ध के मिड वे में डटे रहे। इतनी लम्बी अवधि तक युद्ध मैदान में धर्माजी जैसे शूरवीर ही टिक सके। बात साफ है कि बहादुरी किसी कौम विशेष की बपौती नहीं है। मेघों की बहादुरी ने समय-समय पर वो परवान चढ़ाये हैं जो बहुत कम वीरों को प्राप्त होते हैं।

संभवतः 1946-47 में धर्माजी अंग्रेजी सेना से वापस मारवाड़ में आ गये। देश आजाद हुआ तो उसके बाद पाकिस्तान से 1947-48 में कश्मीर को लेकर युद्ध हुआ। सेना की भर्ती हुई। बहादुर धर्माजी घर बैठे नहीं रह सकते थे। वे दुबारा आर्मी सर्विसेज कोर्प्स (atillery) में 17 जुलाई 1948 को भर्ती हो गए। उनके नम्बर थे- 6437956 और कश्मीर के पाकिस्तान बॉर्डर पर युद्धरत रहे। युद्ध विराम के बाद सेवा निवृत्त हो वे फिर मारवाड़ आ गये। द्वितीय विश्व युद्ध के समय उनका आइ डी नम्बर था-557879. 

अंग्रेजों की सेना में भर्ती होने से पहले धर्माजी जोधपुर रियासत में बतौर सवार थे। रियासत के समय सैनिक/सिपाही को सवार कहा जाता था। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने पर विभिन्न रियासतों या प्रेसिडेंसी से सैनिक इकट्ठे कर अंग्रेजों ने इम्पीरिअल रेजिमेंट बनायीं थी। जिसमे धर्माजी मेघ भी एक सैनिक थे। उन्हें सार्जेंट कहा जाता था। इस प्रकार से रियासत के मार्फ़त ही वे अंग्रेज सेना के अंग बने थे। 
धर्माजी मेघ ने सेतरावा गाँव में 1979में बड़े पैमाने पर आंबेडकर जयंती का आयोजन किया।a group photo. Dharmaji Megh is in-between group. Me sitting-1979






जुझारू धर्माराम जी-

सम्मान और स्वाभिमान का जीवन-
सन 1950 में धर्मरामजी आर्मी सप्लाई कोर्प्स(आर्टिलरी) की सेवा से वापस आये। उस समय राजस्थान में बेगारी व छुआछूत उन्मूलन तथा सामंतशाही के विरुद्ध मेघवालों का आन्दोलन पूरे जोर और जोश में था। मारवाड़ में मेघवालों ने सब जगह अपनी पञ्चायतों के माध्यम से  इसे सख्ती से लागू करवाया था। मेघवालों में जो बाम्भ (बेगारी) करते थे और जो गंदे धंधे करते थे, उन पर मेघवालों की पंचायतों के कठोर रवैये  के कारण राजस्थान में 1952 में पूर्ण प्रतिबन्ध लग गया। इसमें पश्चिमी राजस्थान में तिन्वरी के मेघवाल उम्मेदारामजी कटारिया की सक्रिय भूमिका थी। वे मेघवालों के 84 खेड़ों के सर्वमान्य नेता थे।  सामाजिक सुधार के इन आंदोलनों में अलग अलग पट्टियों में अलग अलग नेता उभरे थे। मेघवालों में जन जागरण को लेकर कई युवा और समाज सेवी घर घर जाकर प्रचार करने लगे। इस समाज सुधार के आन्दोलन को सफल बनाने हेतु उस समय कई लोग उस समय राजनीती में भी आये और कई साधु-सन्यासी भी बने। अजमेर के गोकुलदास जी, सेतरावा के पिपाराम जी आदि इस समय उभरे प्रमुख लोग थे। धर्माजी भी इस आन्दोलन में पूरी तरह से शरीक हो गए और घर-घर एवं ढ़ाणी-ढाणी जाकर बेगारी एवं गंदे धंधों के प्रतिकार करने की चेतना का संचार करने लगे। वे इस प्रतिकार आन्दोलन में कुछ वर्षो तक सक्रिय रूप से जुटे रहे। उधर मारवाड़ में लगातार अकाल पड़ रहे थे। इन परिस्थितियों ने धर्मारामजी को दुबारा कोई जीविका ढूंढने हेतु मजबूर किया। स्वाभिमानी धर्मारामजी कोई भी ऐसा-वैसा धंधा नहीं कर सकते थे। वे कोई उपयुक्त सम्मानजनक रोजगार ढूंढ़ने लगे। उनके भाईयों ने जोधपुर में पत्थर की खदानों को लीज पर लिया और पत्थर का व्यवसाय करने लगे। 
  
उस समय मारवाड़ में अकाल के समय टिड्डियों का भयंकर प्रकोप होता था। जब भी टिड्डियों की महामारी आती, उससे निपटने के कोई साधन नहीं होते थे। अकाल में लोग टिड्डियों को भून कर खाते भी थे। अंग्रेजों ने 1939 के आस-पास इसकी रोकथाम हेतु जोधपुर में एक टिड्डी महकमा लगभग खोल रखा था। एक तरह से यह टिड्डी नियंत्रण और टिड्डी चेतावनी का दफ्तर था। राजस्थान और गुजरात इसकी निगरानी का क्षेत्र था। धर्मारामजी इस दफ्तर में असिस्टेंट ड्राईवर के रूप में भर्ती हो गए। टिड्डी उन्मूलन और उसकी रोकथाम हेतु जोधपुर से ट्रकों में सामान भरकर राजस्थान के जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर, नागोर, पाली और गुजरात के प्रभावित क्षेत्रों में सामान सप्लाई किया जाता था। धर्मरामजी की ड्यूटी अधिकांशतः जैसलमेर के रूट पर होती थी। उनकी ट्रक का ड्राइवर उसी इलाके का एक राजपूत था। इलाके में भयंकर छुआछात थी। ड्राइवर भी भेदभाव व छुआछात करता था। इसकी शिकायत की, पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। ड्राइवर के पास में ही असिस्टेंट ड्राइवर बैठा करता था। अर्थात धर्मारामजी ड्राइवर के पास ही बैठते थे। छुआछूत के कारण ड्राइवर को यह अच्छा नहीं लगता था। दूसरा, उस समय परिवहन के साधन बहुत कम थे। लोग लम्बी दूरी का सफ़र भी पैदल ही चलकर तय करते थे। रास्ते में कोई राहगीर मिल जाता तो उसे ट्रक में बिठा लेते थे। ज्यादातर समय ड्राइवर ही गाड़ी चलाता था। कभी-कभी धर्मरामजी भी गाड़ी चलाते थे। ड्राइवर को लालच आ गया। वह कभी-कभी जब कोई राहगीर मिलता तो धर्माजी को पीछे बैठने को कहता। पहले-पहल तो धर्माजी ने ऐसा कर लिया परन्तु जब उनको मालूम पड़ा कि ड्राइवर राहगीर को ट्रक की आगे की सीट पर बैठाता है और उससे पैसे लेता है तो इसका विरोध करना शुरू कर दिया। महकमे में भी शिकायत  की गई। कोई विशेष कार्यवाही नहीं हुई।

एक बार वे जोधपुर से जैसलमेर जा रहे थे। सवारी मिलने पर ड्राइवर ने धर्माजी को पीछे बैठने का कहा। आपस में कहा-सुनी हुई। तकरार झगड़े में बदल गयी। धर्माजी ने ड्राइवर को पीट दिया। ऐसा एक दो बार हुआ। महकमे में शिकायत की गयी परन्तु कोई हल नहीं निकला तो आखिर धर्मारामजी ने वह नौकरी भी छोड़ दी।
                  
आजादी के बाद मिलिट्री की नौकरी छोड़ने के बाद धर्मारामजी जोधपुर पुलिस में भी सिपाही के रूप में नौकरी करने लगे। कुछ समय जोधपुर पदस्थापन के बाद उनकी पोस्टिंग ग्रामीण इलाके के फलोदी क़स्बे के थाने में हो गयी। वहां पर भयंकर भेदभाव और छुआछुत व्याप्त थी। मेघवालों सहित सभी निम्न कही जाने वाली जातियां इस बुराई से पीड़ित थी। बेगारी और गंदे धंधे करने या न करने का निर्णय पूर्णतयः आदमी के ऊपर निर्भर करता था। मेघवालों ने इन सब का जबरदस्त निषेध कर रखा था। वे कोई ऐसा काम नहीं करते थे फिर भी उनके साथ सार्वजनिक स्थानों, होटलों और कुओं आदि पर भेदभाव पूर्ण दुर्व्यवहार और छुआछूत बरती जाती थी। वे कुँए पर जहाँ सवर्ण पानी भरते थे, वहां पानी नहीं भर सकते थे बल्कि जहाँ जानवर आदि पानी पीते थे , वहां खैली में पानी भरते थे। उन्होंने थाने से जाकर जायजा लिया और खुद ने जहाँ से सवर्ण जातियां पानी भरती थी, वहां से पानी भरना  शुरू किया। धर्माजी ने मेघवालों आदि को समझाया कि यह बराबरी के  हक़ की बात है। बेगारी और गंदे  धन्धे छोड़ना बहुत कुछ आपके वश में था पर छुआछूत और भेदभाव मिटाना बहुत कुछ आप पर नहीं निर्भर करत्ता है।  इसलिए जो लोग भेदभाव करते हैं, उनके दिमागों को ठीक करना जरूरी है। यह बीमारी भेदभाव करने वालों के दिमाग में है। कुछ दिन तो ठीक-ठाक रहा पर ब्राह्मण आदि सवर्ण जातियों  में सुगबुगाहट शुरू हो गयी और उनमें रोष पैदा हो गया।

क़स्बे में हलचल मच गयी। कई लोग पक्ष में और कई लोग विरोध में हो गए। धर्मा रामजी ने वहाँ के मेघवालों और दलित लोंगों को उत्साहित किया। एक दिन  धर्मरामजी और उनके सहयोगी बराबरी से पानी भर रहे थे। सवर्ण लोग लामबद्ध होकर आये और धर्माजी पर हमला कर दिया।

धर्माजी मल्ल-युद्ध और लाठी चलाने में पारंगत थे। पकड़ पकड़ कर कईयों को मारा। बर्तन-भांडे फूट गए। अचानक किसी ने उनके ऊपर लाठी से वार कर दिया। हाथ से वार को रोका, तब तक उनके ललाट में लग गई। खून निकलता देख लोग तितर-बितर हो गए.

धर्माजी थाने आये और केस दर्ज किया काफी समय तक केस चला। कुछ लोग पक्ष द्रोही (hostile) हो गए । फिर भी  वे वहां पर छुआछूत उन्मूलन हेतु लोगों को प्रेरित करते रहे और खुद भी लगे रहे। ऐसी हालात में कुछ महीनों के बाद नौकरी से इस्तीफा देकर घर आ गए।
          
धर्मरामजी के पिताजी श्री मदारामजी के देहावसान के बाद सभी भाई-बहिनों की शादी होने के बाद उनकी शादी पाली देवी से हुई। अक्सर उसे पालु कहते थे। शादी के समय उनके बड़े भाई ने अपने हाथ से बहु के लिए वरी का सालू और पवरी बुनी, जिसमें चांदी के तार बुने गए थे। वे उस समय सेतरावा अपने ननिहाल में थे। नई नई शादी के बाद पालि देवी औरतों के साथ गांव के कुंए पर पानी भरने गई। वह नया पीला पोमचा (ओढना) ओढ कर  नख शिख तक गहने पहन कर गयी थी। एक ही कुंए पर सभी जाति के लोग अलग अलग पानी भरते थे।

जब राजपूत औरतों ने सजी धजी नई नवेली दुल्हन को नए कपड़ों और पीले ओढ़ने में देखा तो उनका गुस्सा सातवें आसमान चढ़ गया। वे मेघवाल औरतों को भला-बुरा कहने लगी। उनके पूछने पर  बताया  कि  यह  नैनी बाई के बेटे धर्माजी की बहु है। धर्माजी के सभी भाई बलिष्ठ और साहसी थे। धर्माजी के अक्खड़ और स्वाभिमानी स्वाभाव के चर्चे गाँव में पहले ही बहुत हो चुके थे।  धर्माजी और उनके  परिवार से कोई सीधे-सीधे पंगा भी  नहीं लेना चाहता था। फिर भी सवर्ण औरतों ने चेतावनी के लहजे में कहा-- 'अगर एक मेघवाल औरत पीला ओढ़ना और गहने पहन कर आयेगी तो हम क्या पहनेगी? मेघवालों में और हमारे में फर्क ही क्या रह जायेगा?'

सभी मेघवाल औरतें सहम गयीं। कुंए से पानी भर कर मटके अपने-अपने घर रख कर धर्माजी के घर इकट्ठी हुई और कुंए पर हुई कहासुनी का वृतांत सुनाया और बोली की बिनणी  की वजह से बेरे (कुंए) पर झगडा हो गया। अब उन्हें पानी भरने  जाने में भी डर लागता है। धर्माजी ने उन औरतों का हौसला बंधाया और कहा कि कोई  किसी को गहने और ओढ़ने से नहीं रोक सकता और कोई किसी को पानी भरने से भी नहीं रोक सकता। मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। ऐसा कहते हुए खुद घड़ा लेकर पाली देवी और कुछ औरतों को साथ लेकर कुंए पर पानी भरने गए।

मेघों की ब्रिटिश सेना में भर्ती होने से उनके जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्त्व पूर्ण तबदीली आई। धर्माजी मेघ के परिवार में यह स्पष्ट दिखती थी। फ़ौज में भर्ती होने से अनिवार्य रूप से उन्हें शिक्षा का लाभ मिलाना शुरू हुआ। धर्माजी बताते थे कि उनके ननिहाल में एक पोसला (पाठशालाथी। जो जैन मंदिर के प्रांगण में चलती थी और कुछ जैन और बनिए उसमें लिखाई पढाई सीखते थे। दूसरे लोगों को नजदीक ही नहीं फटकने दिया जाता था। परन्तु जब दूसरे विश्वयुद्ध में वे ब्रिटिश की रॉयल पोइनॆर कोर में भर्ती हुए तो उन्हें अंग्रेज़ों ने रोमन में पढाया। युद्धरत रहते हुए वे रोमन से हिंदी और अंग्रेजी की वर्ण माला सीखे तथा युद्ध समाप्ति के बाद पढ़ने-लिखने पर विशेष ध्यान दिया और जब 23 अप्रेल 1947 को फौजी सेवा से निवृत हुए तब तक वे सेना चौथी क्लास पास कर चुके थे। इस प्रकार से उन्हें शिक्षा प्राप्ति का सुअवसर आजादी से पहले मिला। जिसका फायदा उन्हें और उनके समाज को कई जगहों पर मिला। उनमें साहस और आत्मबल तथा आत्मगौरव और स्वाभिमान रस-बस गया। यह सैन्य सेवा का प्रत्यक्ष प्रभाव था।

सैन्य सेवा(Military Service) से उनके परिवार को आर्थिक सुरक्षा भी मिली। इससे उनका परिवार और सम्बन्धी पूर्णतः आत्म निर्भर हो गए। युद्धरत सैनिकों के परिवारों को ब्रिटिश सरकार प्रतिमाह नियमित रूप से मनीआर्डर द्वारा उनके घर तनख्वाह की राशि भेजा करती थी। धर्माजी की तनख्वाह के उस समय के 18 रुपये उनकी मां नैनी बाई के नाम से जोधपुर पोस्ट ऑफिस में भेजे जाते थे। राज के आदमी द्वारा इतला मिलने पर उनकी मां पोस्ट ऑफिस से यह राशि प्राप्त करती थी। उस समय चांदी के कलदार रुपये प्रचलन में थे। प्रतिमाह मिलने वाली यह रकम उनके परिवार और सम्बन्धियों के लिए आवश्यकता से बहुत अधिक होती थी। धर्माजी के ननिहाल में उनके नानानानी की अकाल मृत्यु हो जाने से उस परिवार की देखभाल का दायित्व भी धर्माजी की माँ नैनी बाई पर आ पड़ा। अतः वह अपने पीहर आ गयी और अपने पिताजी के परिवार को भी संभालने लगी। जोधपुर से करीब 125 किमी दूर सेतरावा में कोई पोस्ट ऑफिस नही होने के कारन उन्हें मनी आर्डर लेने तो जोधपुर ही जाना पड़ता था। जहाँ धर्माजी के भाई रहते थे। बाद में शेरगढ़ में पोस्ट ओफिस खुला तो फिर वहाँ जाकर तनख्वाह लाती। इससे उनका परिवार आर्थिक रूप से आत्म निर्भर और सबल हो गया। यह फ़ौज की नौकरी का दूसरा बड़ा सुपरिणाम था।

आर्थिक आत्म निर्भरता प्राप्त होने से वे मारवाड़ में बेगार प्रथा के विरुद्ध बिगुल बजाने में भी समर्थ हो सके। ब्रिटिश सेना की नौकरी ने उनके परिवार में तथा उन जैसे परिवारों में बेगारी छोड़ कर स्वतंत्र मन माफिक व्यवसाय करने के मार्ग को प्रशस्त किया। इससे मेघों को निम्न या हीन व्यवसायगत बंदिशों से अपने को स्वतंत्र करने में बड़ी मदद और सुरक्षा मिली।

ब्रिटिश सेना में रहते हुए उन्होंने कई नौजवानों को फ़ौज में भर्ती होने हेतु प्रेरित किया और कई लोगों को सेना में भर्ती करवाया। जिनमे मेघवालों के साथ ही साथ राजपूत आदि जातियों के नौजवान थे। उस समय कुछ जाति आधारित रेजिमेंट भी थी। ब्रिटिश सरकार ने मारवाड़ के मेघवालों की सैन्य भर्ती उनके अदम्य साहसवीरता और युद्ध भूमि में विषम परिस्थितियों में भी लम्बे समय तक डटे रहने के कारण बढ़ा दी थी। कुछ प्रदेशों यथा असमपंजाब आदि जगहों से ज्यादा मारवाड़ के राजपूतों और मेघवालों को पहले वरीयता दी जाने लगी। इस प्रकार जो जो मेघवाल सेना में भर्ती होने हेतु इच्छुक होता और शारीरिक मापदंड पूरा करता उसे अंग्रेज सेना की किसी न किसी भारतीय रेजिमेंट में भर्ती कर लिया जाता।

ब्रिटिश सेना का अंग होने से उनका और उनके परिवार का मान और सम्मान भी बढ़ा।

धर्माजी की बहादुरी और योगदान चिरस्मरणीय है।

मेघ लोग एक बहादुर कौम रही है। महाराजा गुलाब सिंह के समय के कश्मीर और पंजाब के मेघों का भी मैंने प्रमाण सहित उद्धरण दिया था कि किस तरह से मेघों की सैनिक बहादुरी से महाराजा युद्धों में जीते थे और उन्होंने अपनी सेना में मेघों की नफ़री बढ़ायी थी। यह 1857 और प्रथम विश्वयुद्ध की कई डिस्चपैच में उल्लेखित है। मेरा निवेदन उन सभी से है जो इस समाज से जुड़े हैं कि वे उस इतिहास को उजागर करें और उन वीर पुरुषों पर फ़ख़्र करें। यह काम बहुत ही पेचीदा और कठिन है। 'जम्मू एंड कश्मीर टेरिटरी: ज्योग्राफिकल अकाउंट' नामक पुस्तक फ्रेडेरिक ड्रियू ने 1875 में लन्दन से प्रकाशित की। 'द पंजाब, नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस एंड कश्मीर' नामक पुस्तक 1916 में सर James Douie ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित की। इन दोनों पुस्तकों में मेघ सैनिकों का जिक्र है और उनकी बहादुरी की प्रशंसा है। ये महत्वपूर्ण पुस्तकें 1857 के गदर में और प्रथम विश्वयुद्ध में मेघों की बहादुरी पर गौरवपूर्ण टिप्पणियाँ अंकित करती हैं। जो लोग मेघों के जज्बात और बहादुरी पर टीका टिपण्णी करते हैं, उन्हें इनको देखना चाहिए और अपने मतिभ्रम को दूर करना चाहिए। It is only conversation to Hinduism, which degraded Meghs, none else. Hope new generation will think about it seriously.
श्री धर्माराम जी का स्कैच

(Countributed by Sh. Tararam s/o Sh. Dharmaram Megh)

(रामसा कडेला मेघवंशी द्वारा विशेष नोट:
ताराराम जी धर्माराम जी के बेटे हैं। जहाँ धर्माराम जी ने देश व समाज की अस्मिता की रक्षा करके अपने जीवन को प्रेरणादायी बना दिया वहीं श्री ताराराम जी ने भी मेघों का इतिहास- "मेघवंश इतिहास और संस्कृति" लिख कर अपने समुदाय पर उपकार किया है। इनके परिवार को हमारा नमन और साधुवाद. जय मेघवीर धर्माराम जी और सभी मेघ वीरों की। जय मेघ)

13 March 2014

Meghvansh and its Gotra system - मेघवंश और उसकी गोत्र व्यवस्था



गोत्र व्यवस्था और मेघवंश : ताराराम
 
(यह आलेख माननीय ताराराम जी की पुस्तक 'मेघवंश- इतिहास और संस्कृति-2' का एक अंश है)

हिंदू समाज विभिन्न जातियों का एक ऐसा जाल है, जिसे समझना एवं भेदना बड़ा मुशिकल है। इन जातियों की पूर्वगामी व्यवस्था को 'वर्ण-व्यवस्था' के रूप में प्रकट किया जाता है एवं उसे धर्म प्रणीत ठहराया जाता है। सामाजिक व्यवस्था के धर्मप्रणीत आधार को सुव्यवस्थित तरीके से जितनी चतुराई से व्यावहारिक जामा हमारे देश में पहनाया गया, उतना अन्य किसी भी देश में देखने और सुनने को भी नहीं मिलता। कदाचित भारत देश को धर्म प्रधान देश कहना उचित लगता है, जब उसकी प्रत्येक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में हम धर्म का गहरा आधार पाते हैं। परंतु गहराई में जाने पर ऐसा मालूम पड़ता है कि यह प्रचार का एक साधन भी है। हम इस नाम से उन समस्त तत्त्वों का प्रचार करते हैं, जो वर्ण प्रभुत्व (वर्ण-प्रभुत्व) के पोषक हैं। वर्ण-व्यवस्था, जाति-व्यवस्था या गोत्र-व्यवस्था की उत्पत्ति का जो भी आधार रहा हो वह आज इतना महत्वपूर्ण नहीं है, परंतु सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से वर्गप्रभुत्व के दृष्टिकोण से आज भी ये धर्मप्रणीत आधारभूत है। अत: इस दृष्टि से मेघवंश के संदर्भ में इस पर विचार करना चाहिए।
हिंदू समाज में जाति अपने आप में न केवल एक सामाजिक घटक बन चुका है, अपितु राजनीतिक और सांस्कृतिक घटक भी बन चुका है। सामाजिक और सांस्कृतिक घटक रूप में प्रत्येक जाति अपने प्रभुत्व के लिए गोत्र की सहायता लेती है। जातिवादी व्यवस्था में वर्ग प्रभुत्व को स्थायी बनाए रखने में गोत्र-व्यवस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। भारतीय समाज किंवा हिंदू समाज में गोत्र का विचार विभिन्न सामाजिक रस्मों-रिवाज एवं सामाजिक सरोकारों में किया जाता है, यह रूढ़ि मेघ समाज में भी वर्तमान है। मेघ समाज में गोत्र की प्रथा अन्य समाजों में व्याप्त इस प्रथा की देखा-देखी से आयी है। जब चारों ओर गोत्र की परंपरा का बोलबाला हो गया, तो मेघों ने भी अपने को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में मिलाते हुए इस व्यवस्था को प्रश्रय देना प्रारंभ कर दिया। यह गोत्र-परंपरा मेघों की अपनी सामाजिक या सांस्कृति परंपरा नहीं है, बल्कि ब्राह्मणी परंपरा से ली गई प्रथा है।
ब्राह्मणवादी व्यवस्था में प्रत्येक जाति अपनी उत्पति किसी न किसी ऋषि या नायक (शूरवीर) से जोड़कर अपनी जाति के वर्ग प्रभुत्व की व्याख्या करती है। अपनी जाति की श्रेष्ठता को स्थापित करने में गोत्र व्यवस्था को महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा जाता है। ये सब 'गोत्र' व्यवस्था को परंपरागत रूप से मिली दृढ़ मान्यता के सूचक हैं। ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पोषक ऋषियों ने देखा कि जब तक व्यक्ति या समाज के जीवन में जात्याभिमान या वंश अभिमान की सृष्टि नहीं की जाएगी, तब तक वर्ग प्रभुत्व की कल्पना साकार रूप नहीं ले सकती है। इसीलिए उन्होंने इसे व्यावहारिक रूप देने के लिए गोत्र प्रथा का सृजन किया। प्रारंभ में इने-गिने ऋषि थे, जिन्होंने इस व्यवस्था को चलाया। परंतु बाद में यह संख्या बढ़ती गयी। कई ऋषियों के नाम वेदों, ब्राह्मणों और उपनिषदों में आते हैं, परंतु वे किसी गोत्रकर्ता अर्थात गोत्र-व्यवस्था को चलाने वाले नहीं बताए गए। वेदों में उल्लेखित बहुत से ऋषि मन्त्र दृष्टा बताए गए हैं, परंतु वे सभी भी गोत्र-कर्ता नहीं हैं। स्पष्टत: इस व्यवस्था को लेकर भी ऋषियों में मतभेद थे। भारत की विभिन्न परंपराओं में इसका कभी-भी एक-सा स्वरूप व स्वीकृति नहीं रही है।
भारत की ब्राह्मणवादी परंपरा में गोत्र-भेद की पृष्ठभूमि भेद-भाव और ऊँच-नीच की वर्णवादी व्यवस्था को स्थायी और सनातन बनाने के लिए ही रची गई है और इसे चालू रखकर प्रथा एवं परंपरा का रूप इसलिए दिया गया, क्योंकि यह वर्ण व्यवस्था या जाति-व्यवस्था को मजबूत बनाती है। वस्तुत: यह मनुष्यों को विभक्त करने की एक अन्य सोची-समझी भेदकारी व्यवस्था है, जो जन-जीवन में रूढ़ होकर परंपरा के रूप में चली आ रही है। वैदिक व्यवस्था या ब्राह्मणवादी व्यवस्था में इससे किसी व्यक्ति या समुदाय विशेष की आंशिक इतिहास की छानबीन करने में भी सहायता मिलती है। वैदिक परंपरा में यह उस समय की देन है, जब मानव-समुदाय अनेक भागों में विभक्त होने लगा था और उसे अपने पूर्वजों और संबंधियों का ज्ञान कराने के लिए संकेत की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। क्रमश: जैसे-जैसे मानव-समाज अनेक भागों में विभक्त होने लगा व वर्ण-व्यवस्था प्रभावी होने लगी, वैसे-वैसे इस गोत्र-व्यवस्था या गोत्र नाम के प्रति मनुष्यों में मोह भी बढ़ता गया। भारत की जिन परंपराओं में इसका कुछ भी स्थान नहीं था, वहां भी यह धीरे-धीरे फैल गई। इस प्रकार से विवाह-संबंध और सामाजिक रीति-रिवाजों में उसका विचार किया जाने लगा एवं किसी न किसी रूप में सभी ने इसको स्वीकृति प्रदान कर दी। वर्तमान मेघवाल समाज भी इससे बच नहीं सका। प्रारंभ में जिन आठ ऋषियों को गोत्रकर्ता माना जाता है, उन्हें गोत्र-प्रवर में इस प्रकार से उल्लेखित किया गया है-
जमदग्निभरद्वाजो विश्वामित्रात्रिगौतमा:
वशिष्ठकश्यपोSगस्त्यो मुनयो गोत्रकारिण:।।
अर्थात जमदग्नि, भरद्वाज विश्वामित्र, अत्रि, गौतम, वशिष्ठ, कश्यप और अगस्त्य ये गोत्रकर्ता मुनि हैं। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि जगदग्नि आदि इन आठ ऋषियों के समय भृगु और अंगिरा आदि भी अनेक ऋषि थे, परंतु उस समय उनके नाम के गोत्र का प्रचलन नहीं हुआ था। ये अन्य ऋषि भी मंत्रदृष्टा थे, परंतु इनके नाम से गोत्र नहीं बनें अर्थात ये गोत्रकर्ता नहीं बन पाए। ऐतिहासिक रूप से यह विचारणीय है कि ऐसा क्यों हुआ। एक ही जाति में अलग-अलग गोत्र भी सुने जाते हैं और अलग-अलग जातियों का एक ही गोत्र या समान नाम के गोत्र भी सुने जाते है। इन सबके विश्लेषण से एक बात स्पष्ट होती है कि हक़ीकत में इन ऋषियों या शूरवीरों का एक-दूसरे ऋषि या शूरवीर से कुछ भी लेना-देना नहीं है, तभी तो कई जातियां एक ही नामधारी ऋषि से अपनी उत्पत्ति बताती हैं। परंतु वास्तव में उन जातियों का आपस में कुछ भी लेना-देना नहीं होता है। साधारणतया ब्राह्मण परंपरा में गोत्र प्रथा को रक्त-परंपरा की पर्यायवाची माना गया है। अत: यह परंपरा यह स्वीकार करती है कि ब्राह्मण सदा-सर्वदा ब्राह्मण ही बना रहता है। जिसका ब्राह्मण जाति में जन्म हुआ है, ह अन्य जाति वाला कभी नहीं हो सकता है। ब्राह्मणवादी परंपरा में प्रारंभ से ही सदाचार की अपेक्षा रक्त परंपरा को अधिक महत्व दिया गया है। जब इस परंपरा में रक्त-शुद्धता का सिद्धांत अस्वीकृत होने लगा या डंबोडोल होने लगा, तो रक्त की शुद्धता के सिद्धांत को सामाजिक व्यवस्था की शुद्धता के सिद्धांत पर ला खड़ा किया गया। यही गोत्र परंपरा का गंभीर भेद है। अन्य देशों में रंगभेद या नस्लभेद तो है, परंतु गोत्र-भेद नहीं है। ब्राह्मणवादी परंपरा में जाति की इस जटिल व्यवस्था को गोत्र-प्रवर की व्यवस्था ने न केवल भेदकारी बनाया, अपितु उसे कारगर व स्थायी बनाने में भी संस्थागत आधार प्रदान किया।
भारत की गैर ब्राह्मणवादी परंपराओं में गोत्र व्यवस्था का ऐसा कोई भेदकारी स्वरूप नहीं था। वर्ण-व्यवस्था या जाति-व्यवस्था की शुद्धता के आधारभूत रूप में गैर ब्राह्मणवादी परंपराओं यथा बौद्ध-जैनों में गोत्र का ऐसा कोई विधान कभी भी स्वीकृत नहीं हुआ। वैदिक लोगों की गोत्र की व्यवस्था उन-उन ब्राह्मणों को उन-उन ऋषियों का वंशज प्रकट करती है। ब्राह्मणवादी गोत्र-व्यवस्था, जो पहले उच्चवर्ण तक ही थी, वह धीरे-धीरे सभी वर्णों व जातियों में से गोत्रों की जो व्यवस्था ब्राह्मणों तक सीमित थी, वह क्षत्रियों और वैश्यों तक जाने या अनजाने रूप में आ गई, परंतु ब्राह्मणों के अलावा अन्य वर्णों में गोत्र का कोई महत्व नहीं था।
वर्णों में गोत्र का कोई महत्व नहीं था और शूद्र एवं गैर वैदिक लोगों में तो इसका वैसे ही कोई महत्व नहीं रखा गया था यहाँ तक कि क्षत्रियों में भी इसका कोई महत्व नहीं था, मेघ समाज का गठन पूर्ण रूपेण गैर ब्राह्मणवादी परंपरा से हुआ था, अत: वे इससे अनभिज्ञ से बने रहे, धीरे-धीरे मेघ समाज अब एक जाति के रूप में पुकारा जाने लगा और अभिहीत किया जाने लगा तो वर्णवादी व्यवस्था के अन्य पोषक तत्त्वों का भी इस समाज में प्रश्रय मिलाना शुरू हुआ। इसी के परिणाम स्वरूप वे खाप को ही अपना गोत्र कह देते हैं।
मेघ समाज संपूर्ण भारत में मेघ जाति से ही पहचाना जाता है। यह अपने आप में एक परंपरागत सांस्कृतिक घटक है, जिसकी अपनी एक विशिष्ट पहचान है। मेघों का अपना वंश है। वे वंश के नाम से ही जाने जाते हैं, इसके अलावा इनका कोई गोत्र नहीं है। वंश या बंस ही उनका कुल या गोत्र है, अन्य दूसरा कोई गोत्र नहीं है। अपनी विशिष्ट सामाजिक और राजनीतिक सोच एवं सांस्कृतिक व धार्मिक परंपरा से उनके वंश का गठन हुआ है। इस वंश या बंस को कई समाज सुधारकों ने गोत्रकर्ता ऋषियों से जोड़कर देखने की चेष्टा की। उनका प्रयास हिंदू व्यवस्था में इस जाति के मान को बढ़ाने हेतु था, परंतु वास्तव में ऐसे प्रयास इस जाति की हीनता को ही स्थायी बनाने वाले सिद्ध हुए हैं। अत: मेघों को अपने कुल या बंस को ही पुन: प्रतिष्ठित करना होगा। जिसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था में सम्मिलित होने के प्रयासों में वे भूल गए हैं। सन 2001 की भारत देश की जनगणना में मेघ जाति सबसे ज्यादा राजस्थान में निवास करती है, जहाँ बहुधा वे मेघवाल नाम से जाने जाते हैं। राजस्थान की समस्त अधिसूचित अनुसूचित जातियों की जनसंख्या में इनकी जनसंख्या 21.23% है। जो चमारों की जनसंख्या से थोड़ी सी कम है। जम्मू-कश्मीर की समस्त अधिसूचित अनुसूचित जातियों की जनसंख्या में मेघों की जनसंख्या 39.00% से ज्यादा है। इस प्रकार से यहां पर मेघ लोग सघन रूप से निवास करते हैं। इन मेघों की कुछ खापें एक-सी हैं अर्थात मिलती हैं एवं कुछ खापें ऐसी है, जो नहीं मिलतीं। यहां पर उसकी विवेचना अपेक्षित नहीं है। परंतु इससे एक बात स्पष्ट है कि कुछ खापें तो भौगोलिक प्रभाव से बनी है, कुछ राजनीतिक कारणों से व अन्य कारणों से उत्पन्न हुई हैं। उनमें गोत्र प्रवर की कोई मान्यता ऐतिहासिक रूप से कभी भी नहीं रही है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए राजस्थान की मेघ जाति की कुछ खापों का उल्लेख करना समीचीन है, जिससे मेघ जाति इस गोत्र के बारे में पनप रही मिथ्या धारणा को समझ सके एवं पुन: एक सांस्कृतिक और राजनीतिक वजूद रखने वाला प्रभुत्वकारी घटक बन सके।
राजस्थान के मेघवालों में गोत्रकर्ता के नाम का कोई भी गोत्र प्रचलित नहीं है। वे अपने सामाजिक रीति-रिवाजों में अपनी खाप को ही गोत्र का नाम दे देते हैं। इस प्रकार से खाप की अभिव्यक्ति उनके ब्राह्मणवादी गोत्र की कमी को पूरा कर देती है। ये खापें भी राजस्थान में बहुधा राजपूतों की उपजातियों से मिलती हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि राजपूतों की ये उपजातियां भी उनका कोई गोत्र या प्रवर नहीं है। वस्तुत: राजपूत, जाट और मेघ आदि जातियों का परिघटन एक ही आधार पर हुआ है, परंतु परंपरा व प्रभुत्व भेद से उनमें ऊँच-नीच की दीवारें खड़ी हो गई अन्यथा ये सभी एक ही घटक दल व घटनाक्रम की उपज हैं।
मेघ समाज एक जाति के रूप में ज्ञात होने से पहले एक संगठित व अभिज्ञात राजनीतिक और सांस्कृतिक दल था जिसकी राजनीतिक सत्ता का केन्द्र वत्स जनपद था। वहां पर मेघ राजा वसिष्ठीपुत्र भीमसेन के शौर्य एवं बल से उनको एक विशेष पहचान मिली। की पीढ़ियों तक शासन करने के बाद जब ये सत्ताविहीन हुए तो विस्थापित हुआ यह समाज भारत के विभिन्न भागों में जा बसा, जहां पर ये कई जगहों पर शासक या गवर्नरों के रूप में ख्यात नाम हुए। चूंकि मेघों की परंपरा वर्ण, जाति और गोत्र आदि परंपरा से भिन्न थी, अत: उनकी पहचान वशिष्टी के नाम से ही की जाती रही अर्थात मेघ जाति बनने से पूर्व ये अपने को वशिष्टी या वशिष्ठा नाम से ही अपना परिचय देते थे जो उनके गौरव और शौर्य का इतिहास बयान करता था। अत: सारे भारत में मेघ वाशिष्ठी, वशिष्टा या वासिका नाम से संज्ञान हुए। कई भू-भागों में यह वशिष्टा नाम धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो गया और भू-भाग विशेष में निवास करने के कारण उस भू-भाग का नाम उनके साथ जुड़ गया यथा मारू-मेवाड़ा आदि, ऐतिहासिक रूप से मेघों के प्रतिबोध हेतु ऐसे कई अन्यान्य शब्दों का भी प्रयोग होने लगा। परंतु ये न तो उनके गोत्र थे और न ही उन्होंने इन्हें गोत्र के रूप में धारण किया था। उस समय तक वे गोत्र-व्यवस्था को अभिसात नहीं कर पाए थे, क्योंकि अभी तक ब्राह्मणवादी व्यवस्था में उनका विलीनीकरण नहीं हुआ था।
राजस्थान में राजपूतों के उत्कर्ष के समय और उसके बाद भी उनमें गोत्र-प्रवर की ललक कहीं पर भी दृष्टिगोचर नहीं होती है। इसके कई कारण थे, परंतु सबसे बड़ा कारण यह था कि प्रभुत्वकारी रूप में उभरे राजपूत भी गोत्र-व्यवस्था के प्रति उदासीन ही थे। यह तो राजपूतों का जब हिंदूकरण हुआ, तो उनमें हिंदू वर्ण व्यवस्था में उच्च स्थान प्राप्ति के उत्साहस्वरूप गोत्र के प्रति उनका रुझान बढ़ा। ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पुरोधे गैर ब्राह्मणवादी परंपराओं को अपने में मिलाने के लिए उनको कृत्रिम नाम और उत्पति की कथा-किंवदतियों से उनका उत्साहवर्धन कर रहे थे। इस युग में एक ही घटक दल के विभिन्न मानव समूह विभिन्न जातियों में विभक्त कर दिए गए। जिनका राजनीतिक वजूद स्थिर हो चुका था, वे राजपूत नाम से ब्राह्मणवादी व्यवस्था में उच्चवर्ण में मिला दिए गए व खेती-बाड़ी, शिल्पकारी या अन्य पेशों में संलग्न लोगों को, जो ब्राह्मणी परंपरा के नहीं थे, उन्हें निम्नस्तर पर खपाया जाने लगा। सत्ता प्राप्त लोगों का अतिउत्साह से पुरानी परंपरा में मेल कराने का कार्य उनके इतिहासकारों ने बखूबी किया बाकी आमजन को उनका आश्रित बनाकर उनकी अभिज्ञात जाति का नाम धारण करने का लोभ देकर उनको भी इस चक्रव्यूह में पीसा गया। यह जनता जनार्दन कहीं से भी न तो ब्राह्मण थी और न ही शूद्र, वैश्य या अन्य वर्णवादी व्यवस्था का अंग। परंतु जब उनके बड़े-बड़े लोगों को मिला दिया, तो उनके अन्य स्वजनों को भी इस घेरे में लेना आवश्यक था। इसी पर पूरा सामाजिक और राजनीतिक वजूद टिका था। अत: एक शासक कौम मेघ का, जिसका कोई अभिज्ञात गोत्र नहीं था, उसे इस व्यवस्था ने अपने में खपाने में सफलता प्राप्त की। उनके लिए इतना भर अभीष्ट था कि वे फलां-फलां राजपूत वर्ग या जाति से हैं, चूंकि वे अब शासक वर्ग से नहीं है, अत: उनकी स्थिति निम्न है। खेती-बाड़ी उनका मुख्य पेशा था। वर्षा के मौसम के अलावा वे कपड़े बुनने का कार्य व अन्य शिल्पकार्यों में संलग्न हो गए। कपड़े-बुनने व अन्य शिल्प व दस्तकारी ब्राह्मणवादी व्यवस्था में शूद्र की श्रेणी में ही गिने जाते थे। अत: धीरे-धीरे हिंदू व्यवस्था में वे हीन अवस्था को प्राप्त होते गए।
प्रभुत्कारी जातियों के नाम का उपयोग उनकी जाति नहीं भी, बल्कि वह उनका नख कहलाता था। नख का वास्तविक अर्थ यही है कि जो-जो जिस-जिस नख को धारण करता है, वह-वह उस-उस शासक के अधीन है। राजस्थान में मेघों में विभिन्न खापों के नाम यथा परिहार, पँवार, चौहान, सोलंकी, राठौड़, भाटी आदि प्रचलित हैं, वे भी उनके गोत्र नहीं हैं। बल्कि स्पष्टतः उनसे वही अद्यबोध होता है कि फलां-फलां सत्तासंपन्न वर्गों से ही इनका संबंध है। ये खापें मेघों के गोत्र कदापि नहीं रहे हैं व न ये गोत्र हैं। ये जो खापें हैं वे भौगोलिक और राजनीतिक कारणों से बनी हैं, इसके अलावा इसमें गोत्र, प्रवर आदि का कोई आधार भी नहीं है। इसे स्पष्ट करने के लिए हमें इन राजपूतों के गोत्रों के बारे में जानना आवश्यक है।
ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह सुविदित है कि ब्राह्मणों के गौतम, भरद्वाज, अत्रि आदि अनेक गोत्र मिलते हैं, जो उन ब्राह्मणों का उन-उन ऋषियों का वंशज होना माना जाता है। परंतु राजपूतों के गोत्र उनके वंशकर्ता के सूचक नहीं हैं, क्योंकि प्रारंभ में गोत्र व्यवस्था ब्राह्मणों तक ही सीमित थी। यह विशुद्ध रूप से वर्ण व्यवस्था को टिकाऊ बनाने की एक कारगर युक्ति थी जिसके प्रति जितने कायल ब्राह्मण थे, अन्य कोई वर्ग उतना उत्सुक नहीं था। परंतु धार्मिक व राजनीतिक क्षेत्र में ब्राह्मणों की पूरी पैठ थी, अत: इसे पुरोहित के माध्यम से क्षत्रियों तक विस्तारित किया गया। जो-जो पुरोहित जिन-जिन क्षत्रियों के याजक होते थे, उन-उन क्षत्रियों को भी उस गोत्र का माना जाने लगा। यह सिर्फ धार्मिक पूजा-पाठ-यज्ञ-याज्ञ आदि तक सीमित था। भगवान बुद्ध एवं श्रमणवादी परंपरा ने वर्ण व्यवस्था को स्थायी करने वाली इस संकल्पना को कभी भी स्वीकार नहीं किया। अत: बौद्धमय भारत में हमें क्षत्रियों के गोत्रों का कहीं पर भी कोई सायाश उल्लेख नहीं मिलता है। बौद्ध धर्म के अपकर्ष के बाद एवं हिंदू धर्म के उत्थान के समय गोत्र की संकल्पना ने फिर दृढ़ होना शुरू किया और राजपूतों के उदय के साथ उनके हिंदू धर्म में मिल जाने पर उनके भी गोत्रों पर विचार किया जाने लगा। जिस-जिस राजपूत राजे के जो-जो पुरोहित होते थे, वे उस-उस गोत्र में अभिज्ञात किए जाने लगे। यह सरल युक्ति राजपूतों व अन्य घटक दलों को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में अंतर्भूत करने में संजीवनी का काम करने लगी और इस प्रकार से उन-उन गोत्रों से जुड़े प्राचीन क्षत्रियों से इन राजपूतों ने बड़े उत्साह से अपना संबंध जोड़कर इतिहास की रिक्तता को पूरा करने में कामयाबी हासिल की। परंतु निम्नस्तर पर जीवन यापन करने वाले वर्ग को इससे न तो कोई सरोकार था और न गौरव और न ही ब्राह्मणी व्यवस्था उन्हें गोत्र या प्रवर की परिधि में लाने की इच्छुक थी, क्योंकि गोत्र की संकल्पना जात्यायिमान और वर्णवाद से जुड़ी थी, जिसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था खंडित या कलुषित नहीं करना चाहती थी। अत: निम्नस्तर पर जीवनयापन करने वाला वर्ग कभी भी इसके प्रति कायल नहीं रहा।
जहां तक परिहार, पंवार, भाटी आदि नामों का संबंध है। ये न तो उनके गोत्र हैं और न राजपूतों की एक-एक खाप में अलग-अलग गोत्रों की अभिव्यक्ति ही इस बात का संकेत करती है कि जातीयता के दायरे में लिए जाते वक्त इन राजे-लोगों को कहां-कहां, क्या-क्या मेल-जोल करना पड़ा। कुछ विद्वान यह अवश्य कहते हैं कि राजपूतों के गोत्र भी वास्तव में उनके मूल पुरुषों के सूचक हैं, पुरोहितों के नहीं और पहले क्षत्रिय लोग ऐसा ही मानते थे अर्थात भिन्न-भिन्न क्षत्रिय वास्तव में उन ब्राह्मणों की संतान हैं, जिनके गोत्र वे धारण करते हैं। इसी युक्ति को मेघ समाज में भी फैलाने का कार्य अज्ञानतावश कुछ लोग करने लगे हैं, जिसका आशय यह है कि मेघों की फलां-फलां खाप फलां-फलां राजपूत से उत्पन्न है। यह विचार मेघों को हिंदू समाज में निम्नतर स्थिति को जायज ठहराने का कुत्सित प्रयास है। इस कूटनीति व छलपूर्ण बात को प्राचीन काल के मेघ लोग बखूबी जानते थे, अत: उन्होंने उसे कभी भी अपना गोत्र नहीं माना। अपना गोत्र तो वे मेघ ही बताते व मानते थे। जो इस जाति या वंश का मूल पुरुष था। उनका मूलपुरुष ही सदैव उनका गोत्र माना जाता था। आंख मूंदकर देखा-देखी करने की बजाय मेघों को अपने वंश को ही गोत्र के रूप में पुन: प्रतिष्ठित करना चाहिए।
जहां तक पुरोहित या गुरु के गोत्र की युक्ति का प्रश्न है, जिससे राजपूतों आदि के गोत्रों का संज्ञान किया जाता है, वह भी मेघों के समाज पर उपयुक्त नहीं बैठती है, क्योंकि आदिकाल से ही मेघ लोग अपने मूलपुरुष के रूप में मेघ नामधारी महापुरुष को ही मानते आए हैं। कई जगहों पर भाषा-भेद या प्रचलन में भेद होने से भले ही उसे मेघऋषि, मेघ सिरी, मेघरिख, मेघ कुमार या धारूमेघ आदि कुछ भी कहा जाता हो, परंतु व्यक्तिवाचक मेघ शब्द उन सब में समान रूप से स्वीकार्य है। यह मूल पुरुष ही उनका गोत्रकर्ता (वंशकर्ता) है। इसी बात को मेघों को ध्यान में रखना चाहिए और मानते रहना चाहिए। कुछ लोगों ने वशिष्ठ आदि गोत्रकर्ता ऋषियों का अभिज्ञान होने से व मेघों द्वारा भी प्राचीन काल में अपने को वशिष्ठी या वसीका कहने के आधार पर मेघों का गोत्र वाशिष्ठी बताने की सायास चेष्टा की है। परंतु यह स्पष्ट है कि मेघ लोगों का वासिष्ठी नाम वशिष्ठी ऋषि के कारण प्रचलन में नहीं आया था, बल्कि उनकी मातृशक्ति के बहुमान से प्रचलन में आया था और स्वीकार्य हुआ था। अत: मेघों को पुन: अपने प्राचीन गोत्र जिसे मेघवंश कहा गया है, उसे ही मान्यता देनी चाहिए। अन्य जो खापें हैं, उन्हें गोत्र के रूप में मान्यता नहीं देनी चाहिए, क्योंकि ये खापे किसी भी आधार पर उनके गोत्र नहीं है और न ही उन राजपूत जातियों के, जिनसे ये अपना निकास मानते हैं।



MEGHnet