26 February 2017

History of Meghs - some questions - मेघों का इतिहास - कुछ सवाल

कुछ वर्ष पहले की बात है कि तीन युवा मेघों को सोशल मीडिया पर उलझते हुए देखा था. एक युवा किन्हीं बातों पर सहमत हो रहा था तो दूसरे को उसकी सहमत होने की आदत पर एतराज़ था. उन तीनों में एक युवा का नाम एकमजीत है जिसे सवाल उठाने का नेक है.

पिछले दिनों एकमजीत ने यू-ट्यूब चैनल MEGHnet देखा और उसने कुछ सवाल खड़े कर दिए. सवाल गंभीर थे और जवाब देना बनता था.

पहला सवाल था -  इन सभी वीडियो में बताई गई बातों को सच कैसे माना जाए? ये तो मनोचित्र हैं. मनोचित्र के बारे में मेरा मानना है कि हम जो कुछ भी जानते-मानते हैं वह सारी जानकारी मनोचित्रों के रूप में ही दिमाग़ में इकट्ठी हुई होती है. उसका कुछ हिस्सा हम बाहर प्रकट कर पाते हैं. अब जवाब पर आते हैं. MEGHnet चैनल पर जितने भी वीडियो हैं वो विद्वानों की पुस्तकों और नेट पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर हैं. उन्हें समेकित (consolidated) रूप में एक जगह रखने का कार्य मैंने किया है और उस कार्य की अपनी सीमाएँ हैं.

मेघ ऋषि संबंधी वीडियो कइयों के मन में सवाल खड़े करता है क्योंकि मेघ ऋषि एक पौराणिक पात्र है जिसे आज के किसी हाड़-मांस के आदमी ने नहीं देखा. मेघ ऋषि की जन्म-मरण की तिथियाँ कैसे मिलेंगी जबकि दो सौ वर्ष पहले तक भारत में जन्म तिथि याद रखने का कोई वैज्ञानिक तरीका प्रचलित नहीं था. मेघ ऋषि के माता-पिता का नाम कहीं लिखा है तो मैं नहीं जानता. वेदों-पुराणों में मेघ ऋषि का कोई स्कैच था या नहीं मुझे नहीं पता. गीताप्रेस गोरखपुर वालों ने बनवाया हो तो भी पता नहीं😀. केवल शब्दों से मनोचित्र बनाए गए हैं. जो कुछ मुझे बताने योग्य लगा मैंने बता दिया. पढ़े-लिखे लोग जानते हैं कि पौराणिक कथाएँ अनपढ़ रखे गए लोगों को भरमाने के लिए लिखी गई थीं.

मेघों और मेघवंशियों के इतिहास का जहाँ तक संबंध है एक बात स्पष्ट करनी ज़रूरी है कि स्वामी गोकुलदास और मेरे पिता श्री मुंशीराम भगत ने अपनी पुस्तकों में बहुत सी जानकारियाँ दी हैं लेकिन ये दोनों महापुरुष इतिहासकार नहीं थे. अलबत्ता आगे चलकर जब कभी कोई मेघों का इतिहास लिखेगा तो इन पुस्तकों से कुछ जानकारी वो ले सकेगा. डॉक्टर ध्यान सिंह ने अपने थीसिस "पंजाब में कबीर पंथ का उद्भव और विकास" में जो रिसर्च कार्य किया है उसमें उक्त दोनों लेखकों को उद्धृत किया है.

एकमजीत जी ने सवाल किया था कि चमार समुदाय का इतिहास उन्हें सिंधुघाटी सभ्यता का बताता है. तो क्या चमार समुदाय भी मेघऋषि का वंशज है. यह बहुत टेढ़ा सवाल है क्योंकि यह मानने की बात अधिक है. हाँ, इतना कहा जा सकता है कि कई शूद्र जातियों और लगभग सभी अनुसूचित जातियों का इतिहास उन्हें सिंधुघाटी का बताता है और अभी हाल ही की खोज ने स्पष्ट किया है कि जिसे हम सिंधुघाटी की सभ्यता कहते हैं वह वास्तव में बौध सभ्यता थी. तो इसमें संदेह नहीं होना चाहिए कि बौध सभ्यता से संबंधित सभी जातियाँ और वंश बौध सभ्यता से थे. (मैं यहाँ बाद में उपजे बौधधर्म की बात नहीं कर रहा). भारत में जितनी भी दलित जातियाँ हैं उनका इतिहास अंग्रेज़ों से पहले लुप्त था. अब शिक्षित हो कर सभी जातियां नई जानकारियों के साथ अपने गौरवपूर्ण इतिहास को ढूंढ कर ला रही हैं और लिख रही हैं. मैंने पढ़ा है कि जाट भी खुद को वृत्र (मेघ ऋषि) का वंशज मानते हैं; उन्होंने अपना इतिहास खुद लिखना शुरू किया है. अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार कई जातियां मेघवंश से निकली हैं और जाति के तौर पर वे अपनी अलग पहचान रखती हैं. उनमें इतनी भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यावसायिक असमानताएं पैदा हो गई हैं कि वे एक दूसरे को ख़ुद से अलग ही समझती हैं.
एकमजीत जी ने एक रुचिकर बात कही कि 'हमने अपना जो पुराना इतिहास देखा नहीं या समझा नहीं उसे क्यों न छोड़ ही दिया जाए?' इस सवाल से मैं पहले भी रूबरू हो चुका हूँ. ऐसा सवाल दो कारणों से पैदा होता है. 1. हमें पुराणों में दिए गए ऐतिहासिक संकेतों की समझ नहीं आती और 2. यदि आती है तो हम पाते हैं कि हमारे अतीत (गुज़रे इतिहास) को इतने गंदे तरीके से बयान किया गया है कि पढ़ कर गुस्सा आता है. इसलिए हम पूछने लगते हैं कि क्या उस इतिहास को पढ़ने या दोहराने से कोई फ़ायदा है?

एकमजीत जी के इस सवाल को मैं बहुत महत्व देता हूँ. हमारे समाज के बारे में जो इतिहास मिलता है वो हमारे समाज के लोगों ने नहीं लिखा बल्कि अन्य समाजों के लोगों ने लिखा है या फिर उनकी मदद से अंग्रेज़ों या अन्य ने लिखा है. वो जैसा भी लिखा है दूसरे उसे सही मानते-जानते हैं. हमारी मजबूरी है कि हम भी वही पढ़ते हैं. इसलिए अब अनुसूचित जातियों के लोग इस बात का प्रोपेगंडा करने लगे हैं कि पौराणिक कहानियां को इतिहास मानना बंद करो.

आज भारत की सभी अनुसूचित जातियां महसूस कर रही हैं कि उन्हें अपना इतिहास खुद ही लिखना होगा क्योंकि उनके बारे में जो दूसरों ने लिखा है वह एकतरफा और घृणा से ग्रस्त है. एक तरफ जहाँ चमार, धानक, जाट आदि समुदायों ने अपना इतिहास खुद लिखने सघन प्रयास शुरू कर दिए हैं दूसरी तरफ मेघ समाज में अभी तक इतिहास के प्रति जागरुकता की बहुत कमी है. कारण है सदियों की अनढ़ता. अभी हमारी दूसरी या अधिक से अधिक तीसरी पीढ़ी के लोग शिक्षित हुए हैं. अभी उम्मीदें जगी हैं. पंजाब के डॉक्टर ध्यान सिंह ने पंजाब के कबीरपंथियों पर रिसर्च की है जो मुख्यतः मेघ समुदाय पर केंद्रित हैं. उनकी रिसर्च में मेघों का पिछले 200 वर्षों का इतिहास मिल जाता है. उसे फिलहाल पूरा इतिहास नहीं कहा जा सकता. आगे चलकर उनसे बेहतर प्रकाशन की उम्मीद है.

अंत में एकमजीत जी का सवाल है कि क्या दलितों द्वारा दलितों के इतिहास पर की गई रिसर्च को मान्यता मिल सकती है? हाँ, मिलेगी, जब वर्तमान शैक्षिक व्यवस्था बदलेगी. उसके आसार बनने लगे हैं. आखिर नवल वियोगी अब कई जैसे इतिहासकार हैं जो दबे नहीं. उन्होंने अपने शोध को पुस्तक के रूप में छपवाया. आगे चलकर भारत सरकार ने उसे मान्यता दी और राष्ट्रीय सम्मान भी दिया.


15 February 2017

The size of a Voter - वोटर का आकार

फोटो bhaskar.com के साभार
हर चुनाव अपने पीछे कुछ सामाजिक मुद्दे, रंजिशें और नफ़रतें छोड़ जाता है. लोग कहने लगे हैं कि अब पार्टियों से ऊपर उठकर सोचना शुरू करो. वे महसूस करते हैं राजनीतिक पार्टियाँ समाज के सामान्य ताने-बाने को तबाह करती हैं. इसे ठीक होना ही चाहिए लेकेिन यह होगा कैसे? राजनीतिक पार्टियों ने अपना महिमाजाल इतना फैलाया हुआ है कि छोटी पार्टियाँ या छोटे समूह अपना एजेंडा बना ही नहीं पाते. उसे लागू करना तो दूर की बात है. कोई नया विचार या विचारधारा लेकर आए तो बड़ी पार्टियाँ तुरत उसे अपने चुनावी घोषणापत्र में थोड़े से अतिरिक्त शब्दों के साथ शामिल करके उसे हाइजैक कर लेती हैं. दरअसल वे हाइजैक नहीं करती बल्कि थोड़ा-बहुत शोर मचा कर उसे डिफ्यूज़ कर देने की ताकत रखती हैं. यह कार्य मीडिया के माध्यम से आसानी से हो जाता है जो बड़ी पार्टियों के नियंत्रण में होता है.

वैसे तो हरेक आदमी अपने, अपने परिवार या समाज के लिए जो भी सामान्यतः कर रहा होता है वह अनेक प्रकार से देश हित में होता है. लेकिन वो दिखता नहीं. जिसके पास पैसा और सत्ता है वो देश के लिए काम करता हुआ दिखता है और वो अपना विज्ञापन करता हुआ चलता है. नया चलन है कि वो अपने राजनीतिक विरोधी पर देशद्रोही का इल्ज़ाम लगाने से ग़ुरेज़ नहीं करता. अब लोग कहने लगे हैं कि "पार्टियों से ऊपर उठ कर" कार्य करो. पार्टियाँ अपनी वैचारिक लाइन से ऊपर उठ कर काम करेंगी ऐसा नहीं लगता.

तो फिर मतदाता क्या करे. लोकतंत्र में मतदाता इस कार्य की सूक्ष्मतम इकाई है. बहुत ही छोटी. उसकी उम्मीदें और प्रयास भी छोटे होते हैं. इसलिए उसे बड़ा सुझाव कोई दे भी तो क्या दे. वोटर की नियति है कि वह ‘मत दान’ कर के अपना ‘मत त्याग’ देता है. उसकी पहली होशियारी इतनी-सी हो सकती है कि भई ‘अपने मत को दान में न दे कर मत का सही उपयोग किया जाए’. अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछने की आदत डाली जाए. वादे के मुताबिक काम नहीं करता तो उसे पकड़ा जाए. आम वोटर जाति के सवाल पर तो फिलहाल कुछ नहीं कर सकता लेकिन धर्म के नाम पर हो रही राजनीति को तो वो दुत्कार ही सकता है.

आम वोटर की देशभक्ति असंदिग्ध है.

10 February 2017

Unity of Meghs - मेघों की एकता



unity.jpg
जब-जब सामाजिक-राजनीतिक निर्णयों की बात आती है तो यह सवाल मन पर लटक जाता है कि मेघों में एकता क्यों नहीं होती? ऐसी सोच रखने वाला मैं पहला व्यक्ति नहीं हूँ न ही मेघ समाज अकेला ऐसा समाज है.  पहली बात यह कि लंबी अनपढ़ता के कारण बहुत से समुदाय अपने अतीत और वर्तमान का सही विश्लेषण नहीं कर पाते. कुछ कमियां और कमज़ोरियां ऐतिहासिक होती हैं. दूसरे, धर्म की सही समझ न होने से वे समुदाय नहीं समझ पाते कि इंसानों को बांटने वाले तत्वों में धर्म सबसे बदनाम चीज़ है जो इंसान के मन और जीवन में बहुत तोड़-फोड़ मचाता है. कुछ राहत भी देता है इससे इंकार नहीं लेकिन उसके व्यावसायिक और राजनीतिक स्वरूप को समझा जाए.


पंजाब के मेघ भगत लोगों ने तथाकथित मुख्यधारा में शामिल होने की कोशिश में आर्यसमाज से लगन लगा ली. यह कुदरती था क्योंकि उन्हें शिक्षित करने में आर्यसमाज का बहुत रोल था. उन दिनों आर्यसमाज का मतलब था - कांग्रेस. इसलिए धर्म और राजनीति का एक घालमेल मेघों को मिल तो गया लेकिन आगे चल कर राजनीतिक-धार्मिक ताने-बाने और ताने-पेरे को समझने में उनको मुश्किलें आईँ.


1977 में जनता पार्टी के उदय के समय कुछ मेघजन कांग्रेस से छिटकते हुए नज़र आए. जिन्होंने ‘हलधर’ को चुना वे अन्य कांग्रेसी-आर्यसमाजी मेघों की नज़र में बिरादरी के ग़द्दार ठहराए गए. जब पूरा देश जनता पार्टी की लहर में बह रहा था तब मेघों ने कांग्रेस को जिताया. इस दौरान कई मेघ समझ गए कि आर्यसमाज ने उन्हें अपने एजेंडा से निकाल दिया हुआ था. लेकिन वे हवन से संतुष्ट और राजनीतिक नुक़सान से बेख़बर थे. आर्यसमाज-कांग्रेस की जुगलबंदी से वे ऐसा कोई समर्थन नहीं पा सके जो उन्हें विधानसभा में प्रतिनिधित्व दिला पाता.


मेघ इस ग़लतफ़हमी में रहे कि आरक्षण कांग्रेस ने दिया है. उधर आर्यसमाजियों की स्वाभाविक कोशिश थी कि मेघ डॉ. अंबेडकर की विचारधारा से दूरी बनाए रखें. आज बहुत से मेघ अंबेडकर को मानने लगे हैं लेकिन पुरानी पीढ़ी के कुछ बचे-खुचे बूढ़े आर्यसमाजी आज भी उन्हें अंबेडकरी विचारधारा से दूर रहने की सलाह देते हैं. वे नहीं जानते कि मेघों से अलग दिखने वाले अन्य समुदाय जिन्हें मेघ ख़ुद से कमतर मानते थे वे अंबेडकरी विचारधारा को अपना कर सामाजिक जागृति में पहलकदमी कर पाए और राजनीतिक तौर पर मेघों से आगे निकल गए.


1980-90 के मध्य में मेघों ने अंबेडकर को अपनाना शुरू किया था इसके संकेत मिलते हैं. लेकिन आर्यसमाजियों के विरोध के कारण वे दबाव में आ गए और 14 अप्रैल को ‘मेघ-दिवस’ के तौर पर मनाने की उनकी कोशिश को निराशा मिली. आज अंबेडकरवाद देश में एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर स्थापित हो चुका है.


मेघों में कबीर के प्रति झुकाव का कोई तारीख़वार इतिहास तो नहीं मिलता लेकिन कहा जाता है कि 1947 तक 2 प्रतिशत मेघजन कबीर को मानते थे और आज 98 प्रतिशत कबीर को मानते हैं. (मेघों ने इतने कबीर मंदिर बना लिए हैं कि अब उन्हें कबीर मंदिरों का बीमा कराना चाहिए🙂). ‘कबीरपंथी मेघ’ होना एक ऐसी पहचान है जिसमें वोट बैंक बनने की भरपूर क्षमता है. एक बार रवीश कुमार ने ऐसा ही संकेत दिया था. तो मान लिया जाए कि मेघों में एक प्रकार की धार्मिक एकता विकसित हो गई है. लेकिन केवल धर्म से काम नहीं चल सकता. सदियों की ग़रीबी से लड़ने के लिए सत्ता में बढ़ती हुई भागीदारी ज़रूरी है.

इस समय चुनाव का समय है. पंजाब में वोटिंग हो चुकी है. मेघों की राय ईवीएम में बंद है. जालंधर (वेस्ट) की सीट के लिए आप पार्टी, भाजपा और शिवसेना ने मेघों को टिकट दिया. 3 उम्मीदवार मैदान में हैं. (पूरे पंजाब में शिवसेना ने 5 मेघों को टिकट दिया है). कांग्रेसी मेघों में बहुत बेचैनी रही. अब वोट बँट जाने का भय भी सताता है. फिर भी मुमकिन है इस बार के चुनाव के नतीजे इस बात को साफ़ कर दें कि मेघों में एकता की बुद्धि विकसित हुई है.