06 January 2018

Bhima Koregaon-2 - भीमा कोरेगांव-2


इस बार की 01 जनवरी 2018 की तारीख़ एक ऐतिहासिक घटना का रूप ले गई. इसकी शुरुआत वहाँ से हुई थी जहाँ 01 जनवरी, 1818 को एक लड़ाई लड़ी गई थी जो पिछले 200 साल से लगभग गुमनाम-सी थी. यहां अंगरेज़ों की सेना की लड़ाई (Battle) दूसरे ब्राह्मण पेशवा से हुई थी. स्थान का नाम था - भीमा कोरेगांव. 
पेशवा की सेना बहुत बड़ी थी लेकिन अंगरेज़ों की रणनीति ने उन्हें हरा दिया. पेशवा की सेना में अछूत जातियों के लिए जगह नहीं थी लेकिन बाकी कई जातियों के योद्धा थे. अंगरेज़ों की सेना में कई जातियों के लोग थे लेकिन उन्होंने महाराष्ट्र की उस महार जाति से भी योद्धा भर्ती किए जिनकी सामाजिक स्थिति पेशवा राज्य में छुआछूत के निकृष्टतम व्यवहार को झेल रही थी. ये योद्धा स्वभाविक ही पेशवा के प्रति शत्रुता का भाव रखते थे और वे उसी भावना के साथ पेशवा की सेना से लड़े. अंगरेज़ों ने महारों के हाथ में बंदूक थमाई जो अन्यथा भारत में नहीं होता था. सदियों पहले एक जात-पात की पुरानी व्यवस्था ने उनके हाथों से शस्त्र छीन लिए गए थे जिसका नतीजा यह हुआ कि बाहर से आए आक्रमणकारियों का मुकाबला हमेशा कमज़ोर रहा. टिकाऊ समाज की कमी बाहरी आक्रमणकारियों के लिए वरदान साबित होती रही. ऐसा आप अटलबिहारी बाजपेयी के एक भाषण से जान सकते हैं.
हालांकि भीमा कोरेगांव की लड़ाई महारों ने अन्य जातियों के योद्धाओं के साथ मिल कर लड़ी थी लेकिन सदियों बाद हाथ में हथियार लेकर लड़ने का उनका अनुभव उनके आत्मगौरव को जगा गया. युद्ध में महार सैनिकों सहित मारे गए कई योद्धाओं के सम्मान में अंगरेज़ों ने भीमा नदी के पार कोरेगांव में एक स्तंभ बनवा दिया जैसे कि उनकी परंपरा थी. उस पर महार सैनिकों के नाम भी थे. उनकी पहचान उनके नाम के साथ लगे सरनेम 'नाक' (नाग, नागवंशी). से हुई.  डॉ. आंबेडकर ख़ुद महार जाति से थे. वे हर साल पहली जनवरी को कोरेगांव में अपनी जाति के योद्धाओं और उनके शौर्य को नमन करने उस स्तंभ पर आते रहे. धीरे-धीरे मराठों समेत कई जातियों ने अपने-अपने योद्धाओं के सम्मान में वहाँ जाना शुरू कर दिया. वे इसे तीर्थ जैसा सम्मान देने लगे. पेशवा की हार मराठों के लिए खुशी की बात थी. आखिर वे कैसे भूल सकते हैं कि शिवा जी महाराज के दरबार में नौकरी करने वाले पेशवाओं ने शिवाजी महाराज के वंशजों को हटाकर महाराष्ट्र पर कब्जा कर लिया था. मराठा साम्राज्य को अंग्रेजों ने नहीं, पेशवाओं ने खत्म किया था. भीमा कोरेगांव में जातिवादी, आतंकवादी, बर्बर पेशवाई हारी थी. जिसकी हार पर कोई रोया हो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता.
लेकिन 01 जनवरी, 2018 की परिस्थितियाँ अलग हैं. भाजपा के सत्ता में आने के बाद देश भर में दलितों के विरुद्ध अत्याचारों में अचानक कई गुणा वृद्धि हो गई है. हिंदुत्व का एजेंडा अपनी दहशत के साथ हाज़िरी देने लगा है.  यह मुख्य फैक्टर है जिसकी वजह से इस बार दलित संगठनों ने बड़े पैमाने पर कोरेगाँव में कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया जिसकी जानकारी सार्वजनिक कर दी गई थी. ज़ाहिर था कि हिंदुत्ववादी संगठन इस आयोजन पर नज़र रखे हुए थे. वहाँ दंगे-फ़साद का वातावरण बनाना शुरू कर दिया गया. जैसे ही पत्थरबाज़ी और हिंसक घटनाएँ शुरू हुईं तभी मनुवादी, जातिवादी, पुरुषवादी, सवर्ण मीडिया ने कुछ ज़्यादा ही उत्साह दिखाया और हिंदुत्ववादी संगठनों के द्वारा दलितों पर पत्थरबाज़ी किए जाने की पूरी घटना को ऐसे चित्रित करना शुरू कर दिया जैसे यह दलित बनाम मराठा की लड़ाई हो. एक न्यूज़ चैनल, जिसके स्क्रीन शॉट सोशल मीडिया पर लगाए गए हैं, ने तो इसे पूरी बेशर्मी के साथ 'दलित बनाम हिंदू' का संघर्ष कह दिया. यानि कह दिया कि दलित हिंदू नहीं हैं. उससे उस विचारधारा को बल मिला जो मानती है कि दलितों को केवल चुनावों और दंगों के दौरान हिंदू माना जाता है अन्यथा वे शूद्र होते हैं. एक सेक्युलर से दिखने वाले चैनल (एनडीटीवी इंडिया) ने कह दिया कि दलित कोरेगांव में अंगरेज़ों की जीत का जश्न मनाने जाते हैं. यह चैनल सीधे तौर पर दलितों, शूद्रों को देशद्रोही कह रहा था. इसने आग में घी का काम करना ही था. इस देश के मूलनिवासियों ने बहुत कुछ सहा है. विदेशी आक्रमणकारियों की ज़्यादतियों को सदियों से सहा है लेकिन वे अपनी ज़मीन और अपनी सभ्यता के प्रति सच्चे और ईमानदार रहे हैं. देश के प्रति ग़द्दारी की वे सोच भी नहीं सकते. कोई उन्हें देशद्रोही कहे तो वे प्रतिकार ज़रूर करेंगे. यह उनका कर्तव्य भी है.
कोरेगाँव की इस घटना का 'मीडिया के सौजन्य' से दूरगामी प्रभाव अवश्य हुआ है. कुछ वर्ष पहले तक उत्तर भारत में भीमा कोरेगांव या उसके इतिहास को शायद ही कोई जानता था. दूरसंचार के साधनों के विकास ने इस घटना की जानकारी को बहुत तेज़ी से उत्तर भारत के गांव-गांव में पहुँचा दिया. तीन जनवरी 2018 तक उत्तर भारत के लोग जान गए कि पेशवा की हार मराठों के लिए जश्न मनाने की बात है क्योंकि शिवाजी मराठा के दरबार में नौकरी करने वाले पेशवाओं ने उनके वंशजों को हटाकर महाराष्ट्र पर कब्जा कर लिया था. महाराष्ट्र के उन ब्राह्मण पेशवाओं के राज में दलितों पर बहुत अत्याचार किया गया था. वे कमर के पीछे झाड़ू और गले में थूकने की हाँडी लटकाए बिना शहर की ओर नहीं आ सकते थे. दिन में बाहर नहीं निकल सकते थे कि कहीं उनकी परछाईं 'ऊँच' पर न पड़ जाए. अब उत्तर भारत के गाँव-गाँव में लोग यह भी जान गए हैं कि अंगरेज़ों ने महारों, दलितों और शूद्रों को अपनी सेना में भर्ती करके रोज़गार दिया था और सब के साथ मिल कर महारों ने अपनी प्रोफेशनल मार्शल योग्यता साबित की थी. इससे कई लोगों में कोरेगांव के उस स्तंभ पर जा कर उन शहीद सेनानियों को सम्मान देने की इच्छा जाग गई है. पहले वे सैनिकों के शौर्य को नमन करने जाते थे अब वे पेशवा की हार का जश्न मनाने भी जाएँगे. ज़ाहिर है कि अंगरेज़ों से रोजगार पा कर उनके सैनिक के रूप में लड़ना पेशवा की ग़ुलामी करने से बेहतर था. ये बातें सोशल मीडिया अब लगातार कह रहा है. 
मराठा क्रांति मोर्चा, मराठा सेवा संघ, संभाजी ब्रिगेड तक हरेक मराठा संगठन ने भीमा कोरेगांव में शौर्य-दिवस के आयोजन को समर्थन दिया है. शरद पवार ने पूछा है कि इतने साल से जो शौर्य-दिवस शांति के साथ मनाया जाता रहा है, उस पर हमला कैसे हो गया? इस बीच प्रधानमंत्री मोदी कुछ नहीं बोले. अशिक्षित मीडिया ने उनके वोट बैंक को काफी नुकसान पहुँचाया है. सोशल मीडिया पर लोग यह कहते देखे गए हैं कि ऐसे मीडिया का बहिष्कार किया जाए, देखना बंद कर दिया जाए और ‘अपना मीडिया’ विकसित करने का उपक्रम किया जाए. फिहाल हिंदुत्ववादी संगठनों और मीडिया ने भारतीय समाज को आंदोलित करने का अपवित्र कार्य तो कर ही दिया है.
कोरेगांव के आयोजन में सहभागिता करने जा रहे लोगों पर पथराव और हमलों के बीच समता सैनिक दल का शांतिपूर्ण बावर्दी मार्च ध्यान खींचता है. इसका गठन डॉ. आंबेडकर ने किया था. 

भीमा-कोरेगांव-1

कुछ वीडियो लिंक्स:-