06 March 2018

Seminar-2 - सेमिनार-2

सेमिनार-2
हमारी उम्मीदें
24 फरवरी 2018 को जालंधर से डॉ शिवदयाल माली जी का फोन आया. उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि वे एक सेमिनार का आयोजन करना चाहते हैं जिसमें वे मेघ भगत समुदाय के कुछ शिक्षित या विशेष रूप से शिक्षित लोगों का एक 'प्रिलिमिनरी-सा' सेमिनार मेघ जागृति फाऊँडेशन के तत्वाधान में करना चाहते हैं जहां वे इस बात पर विचार-विमर्श और चर्चा कराने की मंशा रखते हैं कि मेघ भगत समुदाय के इतिहास आदि के बारे में अलग-अलग तरह से जो विचार कुछ लोग रख रहे हैं उनमें एक समन्वय स्थापित हो. चर्चाओं से यह जानकारी प्राप्त करना अभिप्रेत है कि अपने समुदाय के बारे में शिक्षित वर्ग (बुद्धिजीवी वर्ग) का क्या विज़न (नज़रिया) है ताकि वे सभी आपस में मिल-बैठ कर अपनी जानकारियां साझा करके समग्र विज़न को बेहतर बना सकें.
पिछले दिनों सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने यह मुद्दा उठाया था कि अलग-अलग लोग मेघ समुदाय का इतिहास लिख रहे हैं जो उनकी नज़र से सही इतिहास नहीं है या वो ऐसा इतिहास है जो उन्हें ख़ुद को ‘सूट’ नहीं करता. सोशल मीडिया पर यह एक जानी-पहचानी झिकझिक थी और फ़ालतू का मामला था. उन लोगों को चाहिए कि वे अपना सही और सच्चा इतिहास ख़ुद अपने नज़रिए से लिखें न कि दूसरों को लिखने से रोकें. इतिहास में क्या सही है क्या ग़लत इसका फैसला प्रमाण और आगे की खोज करेगी. 
कोई व्यक्ति जब लेखन कार्य करता है उसके पास अपनी पठन सामग्री होती है, निजी जानकारी होती है, एक दृष्टिकोण और अनुभव होता है जिसके आधार पर वो अपना मत स्थिर करता है और फिर लिखता है. उसे कई प्रकार के प्रमाणों की ज़रूरत होती है जिसकी जिम्मेदारी वह खुद पर लेता है. सामूहिक रूप से बैठकर इतिहास लिखा गया हो ऐसा आईडिया न कहीं पढ़ा, न सुना. वो संभव भी नहीं है. अलबत्ता यह तो किया जा सकता है कि अलग-अलग लोगों ने जो कुछ लिखा हो उसमें समन्वय स्थापित किया जाए और फिर जानकार विद्वानों का समूह बैठकर चर्चा और विचार-विमर्श करके तथ्यों को क्रमबद्ध तरीके से संकलित करे. यह भी संभव है कि एक ही इतिहास के एकाधिक वर्शन तैयार हो जाएँ. कोशिश यह होनी चाहिए कि मूल लेखक की संतुष्टि का विशेष ध्यान रखा जाए ताकि उसके मूल विचार की रक्षा हो सके.
यहां एक बात का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि भारत के गरीब और पिछड़े समुदायों के लोगों ने शिक्षित होने के बाद अब अपना इतिहास खुद लिखने का काम ख़ुद करने का फैसला लिया है क्योंकि उन्हें परंपरागत इतिहास में अपना कुछ भी नहीं मिल पाता. यहां मैं विशेष रूप से जाटलैंड विकी का उल्लेख करना चाहता हूं जो जाटों के इतिहास को जाटों के नज़रिए से प्रस्तुत करती है. जाट समुदाय इस विकी पर गर्व कर सकता है. परंपरागत ब्राह्मणीकल इतिहास जाट राजा सूरजमल को एक डाकू के रूप में चित्रित करता आ रहा था लेकिन आज नए, जागरूक और खोजी जाट इतिहासकारों ने राजा सूरजमल को एक स्वाभिमानी देशभक्त और आम जन के लिए हितकारी राजा के रूप में स्थापित कर लिया है. इतिहास लेखन की शक्ति के बिना यह संभव नहीं था.
रह गई बात कि क्या इस समय अलग-अलग बैठ कर मेघजन अपने इतिहास पर जो कार्य कर रहे हैं क्या उनमें कोई आपसी मतभेद है. मुझे बिलकुल नहीं लगा कि कोई मतभेद है. वे एक-दूसरे से सहमति और असहमति शेयर करते आ रहे हैं. उन्हें एक दूसरे से कोई समस्या नहीं है. वास्तविक ज़रूरत इस बात की है कि अधिक लोग इस कार्य में लगें. इतिहास छोटी-बड़ी घटनाओं का दस्तावेज़ होता है. ऐसे दस्तावेज़ कोई भी जानकार व्यक्ति तैयार कर सकता है. ये दस्तावेज जितने अधिक होंगे उतना ही अच्छा. उनमें आपसी विसंगतियां (कंट्राडिक्शंस) हो सकती हैं. सिर्फ़ यह देखना है कि क्या उसे लिखने वाला उनसे संतुष्ट है. पंजाब के संदर्भ में जालंधर और अमृतसर जैसी जगहों पर मेघ समुदाय के संघर्ष और सफलताओं की कहानियां बिखरी पड़ी है उन्हें सहेजने वाला एक बुद्धिजीवी तबका जरूरी है.
पहले भी जालंधर में इस प्रकार के सेमिनार का एक प्रयास किया गया था जो राजनीति की भेंट चढ़ गया. जहां 10 लोग इकट्ठे हो जाते हैं वहां राजनीति की छाया मंडराने लगती है. फिर भी मुझे लगता है कि अगर किसी प्रयास में सकारात्मकता की संभावना नजर आ रही हो तो उस छाया के खतरे उठा लेने चाहिएँ. छींटाकशी, खेंचतान और झिकझिक एक सामाजिक प्रक्रिया है. और फिर अभिव्यक्ति के ख़तरे तो उठाने ही पड़ते हैं. 
मेघ जागृति मंच के प्रस्तावित सेमिनार में यह सहभागिता मेरी निजी होगी. मुझे वहाँ ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ का प्रतिनिधि न माना जाए यही ग़ुज़ारिश है.
जागृति मंच के चेयरमैन डॉ. शिवदयाल माली जी ने आश्वासन दिया है कि यह कार्यक्रम पूरी तरह से गैर-राजनीतिक है. इस बात को लेकर मैं उत्साहित हूं. 

2
आयोजन का दिन 
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जागृति फाउंडेशन (रजिस्टर्ड) पंजाब, जालंधर द्वारा आयोजित मेघ भगत समुदाय के बारे में सेमिनार 4 मार्च 2018 को संपन्न हुआ. इस सेमिनार के बारे में मैं आशावान था और यह सेमिनार मेरी अधिकतर आशाओं के अनुरूप रहा. कुछ वक्ताओं के वक्तव्यों में कहीं-कहीं राजनीति के स्वर उभरे लेकिन वो धीमे सुर (Low tone) थे और उनकी कुछ प्रासंगिकता थी.
इस सेमिनार का जारी किया गया एजेंडा निम्नानुसार था- 
“AGENDA: -
1. DISCUSSION/ DELIBERATION / PAPER READING ON VARIOUS ASPECTS OF MEGH / BHAGAT COMMUNITY CULMINATING IN TO BOOK PROBABLY TO BE RELEASED BY YEAR END, UNDER THE PATRONAGE OF MEGH JAGRITI FOUNDATION.
2. FIXING PRIORITY AREAS OF ACTIVITIES FOR MEGH JAGRITI FOUNDATION REGD. PUNJAB, JALANDHAR.”
एजेंडा से स्पष्ट है कि मेघ जागृति फाऊँडेशन मेघ-भगत समुदाय से संबंधित विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श आयोजित करके पूरे विमर्श को समाहित करते हुए एक पुस्तक का प्रकाशन अपने तत्वाधान में करना चाहता है. इसके अतिरिक्त मेघ जागृति फाउंडेशन अपनी गतिविधियों की प्राथमिकताएं निर्धारित करना चाहता है.
इस सेमिनार में वक्ताओं ने जो विचार व्यक्त किए उनका सार देने का प्रयास नीचे किया है. यह सार है. इसमें रही किसी प्रकार की कमी के लिए क्षमा. विद्वान व्यक्ति के विचारों का एक बड़ा दायरा होता है जो सेमिनार की समय सीमा में बंधा होता है. वहाँ सब कुछ कहा नहीं जा सकता और न उसे कुछ नोट्स में समेटा जा सकता है. अब सीधा मुद्दे पर आते हैं.
जैसा कि दिए गए विषय से स्पष्ट है यह एक प्रकार का खुला सत्र था जिसमें हर वक्ता अपनी पसंद के विषय पर बोल सकता था. जिन लोगों को सेमिनार में हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया था वे अपने विषय के जानकार थे. इस दृष्टि से हरेक वक्ता की बात का अपना महत्व था जो सेमिनार के दौरान झलका.
मेघ भगत समुदाय के सामाजिक संगठनों का अपना-अपना एक प्रभामंडल रहा है जो विभिन्न इलाकों में अपनी गतिविधियाँ चलाते रहे हैं. श्री मोहनलाल डोगरा ने उन संगठनों पर एक बृहद् दृष्टि डालते हुए इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मेघ समुदाय इतना सब होने के बावजूद धार्मिक आधार पर बहुत बँटता हुआ नजर आ रहा है. जाति व्यवस्था की वजह से हो रहे सामाजिक भेदभाव के दबाव में कुछ लोग धर्म परिवर्तन कर रहे हैं. 
क्योंकि इस सेमिनार की एक समय सीमा तय थी इसलिए इस महत्वपूर्ण विषय पर विस्तार से बातचीत नहीं हुई. आशा है आगे चलकर इस विषय पर मेघ समाज में बहस होगी और किन्ही सेमिनारों में यह विषय कवर किया जाएगा.
समाज का विभाजन केवल धार्मिक आधार पर नहीं होता वो राजनीतिक आधार पर भी होता है. इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाते हुए श्री एम.आर. भगत (सेवानिवृत्त आयकर आयुक्त) ने शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए अपने जीवन के कुछ अनुभव साझा किए कि कैसे गरीबी के कारण मेधावी छात्रों की शिक्षा प्रभावित होती है. उन्होंने कहा कि समुदाय की प्राथमिकता होनी चाहिए कि गरीबी के खिलाफ संघर्ष तेज़ हो. उसके लिए जरूरी है कि समाज में शिक्षा के प्रसार के लिए समतुल्य प्रयास हों. इसी बात को रेखांकित करते हुए श्री इंद्रजीत मेघ ने कहा कि समुदाय के बहुत से गरीब बच्चे हैं जिन्हें शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता की बहुत ज़रूरत है. उन्होंने बताया कि ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ ने इस दिशा में कार्य किया है और बहुत से छात्रों को आर्थिक सहायता दी है. इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया अब सघन प्रयास जरूरी हैं. वांछित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए समुदाय के विभिन्न संगठनों में सहयोग जरूरी होगा. (प्रसंगवश यह बताना जरूरी है कि श्री इंद्रजीत मेघ ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ के लगभग दस वर्ष तक अध्यक्ष रह चुके हैं और इस क्षेत्र में काम कर चुके हैं).
जैसा कि ऊपर बताया गया है मेघ समुदाय के कई संगठन हैं जो अपनी-अपनी कठिनाइयों के साथ जूझ रहे हैं. श्री आर.एल. भगत,........... ने इन्हीं कठिनाइयों पर विचार रखे और बताया कि बहुत से संगठन आर्थिक कठिनाइयों की वजह से अपने लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते. इसी नजरिए से यह बात उठी कि समुदाय के पास अपनी एक बड़ी निधि (फंड) होनी चाहिए जिसका उपयोग समाज के विकास के लिए किया जा सके. यह बहुत महत्वपूर्ण सुझाव था जिसके कई आयाम हैं. ऐसी निधियों का प्रयोग शिक्षा के लिए भी किया जा सकता है और राजनीति के लिए भी और सामाजिक संगठनों के विकास के लिए भी. जितना ढूंढ़ते जाएंगे उतने ही लक्ष्य आप देख पाएंगे जिन्हें प्राप्त करना आज भी एक सपने जैसा लगता है. लेकिन इसकी संभावनाएं असीमित हैं.
श्री बचन सिंह, भूतपूर्व डिप्टी मेयर ने अपनी बात रखते हुए मेघ समुदाय की कुछ अन्य अपेक्षाओं की ओर ध्यान दिलाया. शिक्षा के अतिरिक्त उन्होंने करियर गाइडेंस, वैवाहिकी (रिश्ते मिलने) की समस्याओं पर विशेष जोर दिया जिनके कारण मेघ समुदाय पर एक दूसरे प्रकार का दबाव बन रहा है. ड्रग्स के कारण कुछ युवाओं का जीवन बर्बाद होना निश्चित रूप से समाज के लिए एक गंभीर चिंता की बात है. ड्रग्स बड़ी समस्या है जिसका राजनीतिक संबंध पंजाब में साफ़ देखा गया है. इस पर विस्तृत बहस की जरूरत है.
मेघ भगत समुदाय का इतिहास इस सेमिनार का महत्वपूर्ण एरिया था. इस संबंध में पहला प्राधिकृत शोधग्रंथ डॉक्टर ध्यान सिंह ने दिया जिसके लिए उन्हें गुरुनानक देव यूनीवर्सिटी, अमृतसर ने पीएचडी की डिग्री प्रदान की है. उनके शोधग्रंथ ‘पंजाब में कबीर पंथ का उद्भव और विकास’ पर ज़बानी तौर पर कई लोगों ने यहाँ-वहाँ बहुत कुछ कहा है. कुछ मैंने भी सुना है. इस सेमिनार का एक प्रयोजन यह भी था कि ऐसी आपत्तियों पर चर्चा हो, ऐसा मुझे डॉ. शिवदयाल जी ने फोन पर बातचीत में बताया था. यह सुखद आश्चर्य था कि उक्त शोधग्रंथ के बारे में विद्वानों ने कोई गंभीर आपत्ति इस सेमिनार में नहीं उठाई. अलबत्ता कुछ वक्ताओं ने शोधग्रंथ में कही ऐसी कुछ बातों पर सहमति जताई जो अन्यथा विवादित बताई जाती थीं. अपने शोधग्रंथ के विभिन्न पक्षों की कुछ कमियों के बारे में डॉक्टर ध्यान सिंह ने स्वयं ध्यान दिलाया और कहा कि यह शोधग्रंथ पहला तो है लेकिन अंतिम नहीं है. उन्होंने स्पष्ट किया कि भगत समुदाय और उसके इतिहास के बारे में उनको पुस्तकालयों में विशिष्ट और विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी थी. इसलिए निर्णय लिया गया कि शोध के लिए फील्ड वर्क को आधार बनाया जाए और लोगों से साक्षात्कार करके सामग्री एकत्रित की जाए जो कि शोध के लिए एक स्वीकृत पद्धति (methodology) है. यह सामग्री केवल मेघ भगत समुदाय के लोगों से बात करके एकत्रित की गई थी. डॉक्टर सिंह ने बताया कि उनको शोध के दौरान इस बात पर विशेष अध्ययन करना पड़ा कि जब जन-जातियाँ मुख्यधारा में शामिल होती हैं तो वो स्वतः शूद्र कैसे बन जाती हैं.
पंजाबी साहित्य में पहचान बना चुके कवि और लेखक श्री रामलाल भगत ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि मेघ समुदाय आज भी बड़ी संख्या में ग्रामीण क्षेत्रों में बसता है जहां जागीरदारी प्रथा, सामंती प्रथा आज भी प्रचलित है. वहाँ मेघों की अधिकतर जनसंख्या कृषि और कृषि से जुड़े अन्य कामों में लगी है. वहाँ मेघों को अपने रोजगार के लिए पूरी तरह उस जागीरदारी प्रथा के तहत काम करना पड़ता है जो सदियों से चली आ रही है. शोषण, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना ऐसी बातें हैं जो उनकी ज़िंदगी का हिस्सा हैं. वो जागीरदारी प्रथा के सामाजिक-आर्थिक सिस्टम के दबाव में जीने के लिए मजबूर हैं. श्री रामलाल ने सामाजिक कार्य को लेकर भाषा का मुद्दा उठाया जब उन्होंने श्री जी. एल. भगत (जो सेवानिवृत्त इनकम टैक्स कमिश्नर हैं) उनके द्वारा लिखी हुई कुछ पुस्तकों का उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि वो पुस्तकें बहुत उपयोगी हो सकती हैं लेकिन अंग्रेजी में लिखी होने की वजह से उनका सही उपयोग मेघ भगत समुदाय नहीं कर पाता. (Foot note   1  )
एक अन्य समाज सेवी प्रो. कस्तूरी लाल सोत्रा ने इस कार्यक्रम में भाग लिया. वे 80 पार कर चुके हैं और अभी भी समाजसेवा में लगे हैं. वे राजनीति शास्त्र के विद्वान हैं और कालेज में प्राध्यापक रहे हैं. उन्होंने मेघ समुदाय के और अन्य बच्चों के लिए कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र चलाए हैं जिसमें हज़ारों बच्चे प्रशिक्षिण ले चुके हैं. श्री सोत्रा ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया कि मेघ भगत समुदाय वास्तव में कई जनजातियों का समूह है. बकरवाल और कुछ अन्य जनजातियों का उल्लेख उन्होंने किया. वे बताते हैं कि जम्मू क्षेत्र में मेघों की ख़राब सामाजिक स्थिति का प्रमुख कारण 19वीं शताब्दी में दो बार फैली प्लेग की महामारी में भी दिखता है जिसने उन्हें कई स्तरों पर तोड़ कर रख दिया. उन्होंने अन्य वक्ताओं का समर्थन करते हुए कहा कि मेघ समुदाय के उत्थान के लिए ज़रूरी है कि शिक्षा के क्षेत्र पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाए.
एक ब्लॉगर के नाते मुझे भी बोलने का मौका मिला. मैंने उपस्थितों को विनम्र जानकारी दी कि अभी तक की जानकारी के अनुसार मेघ जाति के वंशकर्ता का पता ढूंढने पर भी नहीं मिला है. वो इतिहास की सीमाओं में कहीं है ही नहीं. इतिहासपूर्व मेघों की जानकारी का अध्ययन वास्तव में श्री आर.एल. गोत्रा (सेवानिवृत्त इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर, सीबीआई) ने अपने लंबे आलेख Pre-historic Meghs और Meghs of India में किया है. वो जानकारी वेदों में उल्लिखित है और वैदिक कथाओं के रूप में उपलब्ध है. आलेख लगभग 60 पृष्ठों का है. लेकिन इस कार्य को भी अंतिम नहीं माना जा सकता. इस पर शोध की बहुत गुंजाइश है. (Foot note  2  ) श्री ताराराम द्वारा लिखित पुस्तक ‘मेघवंश: इतिहास और संस्कृति’ में मेघ सरनेम वाले राजाओं का उल्लेख है लेकिन उससे यह स्पष्ट नहीं होता कि उनका संबंध जम्मू कश्मीर और पंजाब की मेघ जाति से है या नहीं. मेघवंश और मेघ जाति के अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया गया कि मेघवंश एक रेस है जबकि हिंदूओं की जाति प्रथा के अनुसार मेघवंश के तहत कई जातियां हैं.  उन जातियों में हमारा मेघ भगत समाज एक अलग जाति है. कई अन्य मेघवंशी जातियाँ हैं जो राजस्थान सहित कई अन्य राज्यों में विभिन्न नामों के तहत अलग-अलग स्थानों पर बसी हुई हैं. आधुनिक काल के अंतर्गत डॉक्टर ध्यान सिंह का शोध ग्रंथ ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास’ मेघ समुदाय के पिछले लगभग डेढ़ सौ वर्ष का इतिहास समेटे हुए है.  उसे हम अपने इतिहास की प्राधिकृत जानकारी मान सकते हैं. डॉक्टर ध्यान सिंह उस पर अभी भी कार्य कर रहे हैं और उम्मीद है कि आगे चलकर हमें अपने 150-से 200 वर्ष के इतिहास की एक बेहतर जानकारी मिलेगी. इस सेमिनार में चर्चा के दौरान उभरी जानकारियों और प्रश्नों के आधार पर उस सुझाव की ओर विशेष ध्यान दिलाया कि हमारे समुदाय के धनाढ्य लोगों को एक निधि (फंड) की स्थापना करनी चाहिए जो समाज के उत्थान के लिए जरूरी सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में सहायक हो. इस दिशा में की गई कोई भी पहलकदमी हमारे भावी इतिहास की दिशा तय करने की क्षमता रखती है. 
कार्यक्रम के अंत में डॉ शिवदयाल माली चेयरमैन, मेघ जागृति फाउंडेशन ने सभी सहभागियों, उपस्थितों और आयोजन कार्य में संलग्न महानुभावों का धन्यवाद किया. उन्होंने कहा कि इस सेमिनार के साथ उन्होंने वास्तव में एक कार्यक्रम की शुरुआत की है. आने वाले समय में कई और सेमिनार आयोजित किए जाएंगे. अधिक से अधिक विद्वानों को जोड़ा जाएगा. सेमिनार में पधारे सहभागियों का उन्होंने धन्यवाद किया और अपने वक्तव्य में उनके द्वारा दी गई जानकारी की प्रशंसा करते हुए उसे अमूल्य बताया और कहा कि समाज इस जानकारी से लाभान्वित होगा और समाज के उत्थान के लिए एक कार्यनीति बनाने में मदद मिलेगी.
विशेष टिप्पणी - मैंने अब तक ब्लॉगर पर 400 से अधिक ब्लॉग लिखे हैं जिनके लिंक्स का विस्तार हज़ारों पृष्ठों तक है. इतना होने के बावजूद मैं मानता हूं कि ब्लॉग की अपेक्षा प्रकाशित पुस्तक कहीं अधिक मूल्यवान होती है. इस दृष्टि से मेघ जागृति फाउंडेशन का प्रस्ताव कि वे इस सेमिनार से प्राप्त जानकारी के आधार पर एक पुस्तक प्रकाशित करेंगे मुझे बहुत खुशी देता है. बहुत से पढे-लिखे मेघों का यह सपना है कि उनके समुदाय का लिखित इतिहास एक पुस्तक या पुस्तिका के रूप में उपलब्ध हो जाए ताकि महत्वपूर्ण और सकारात्मक जानकारी हरेक मेघ परिवार को मिले. मेघ जागृति फाउँडेशन की पहलकदमी ने अब उम्मीद जगाई है. मेघ जागृति फाऊँडेशन का आभार और विशेषकर डॉ. शिवदयाल माली का धन्यवाद जिनके प्रयासों से ऐसा पहला और महत्वपूर्ण आयोजन देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. सभी सहभागियों का दिल से शुक्रिया. भविष्य के लिए हमारी आशाएँ जगी हैं.
सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ.



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Foot notes:

 1 (प्रसंगवश यह बताना महत्वपूर्ण है कि यही बात मैंने भी कहीं कही है कि अंग्रेजी में लिखी श्री जी.एल. भगत की वे पुस्तकें मेरी छोटी अक़्ल के मुकाबले बहुत बड़े साइज़ की हैं. हालांकि उसके महत्व कोे मैंने कुछ समझा है और उन्हें अपने ब्लॉगों में शामिल किया है. श्री जी. एल. भगत ने स्पष्टतः एक संवैधानिक समाज (Constitutional Society) की बात की है जिसकी अवधारणा हमारी वर्तमान पहुँच से बाहर है. लेकिन संवैधानिक समाज कई शिक्षित देशों (पाश्चात्य देशों) में एक ज़मीनी सच्चाई है. वहां ऐसी सिविल सोसाइटियाँ बनी हुई हैं जो देश को ऐसा समाज देने के लिए सक्रिय रहती हैं जिससे वहाँ के संविधान की भावना के अनुरूप नागरिकों की मानसिकता और चरित्र विकसित हो. उदाहरण के लिए भारत में एक सिविल सोसाइटी बनी थी जिसने लोकपाल बिल बनाने के लिए कार्य किया था और सरकार की मदद की थी. लेकिन राजनीति ने वह मुद्दा आज तक ठंडे बस्ते में रखा हुआ है. कहने का तात्पर्य यह कि अवधारणा के तौर पर यह बहुत बड़ी बात है जिसे ज़मीन पर उतारने में कई दशक लग सकते हैं. इसकी अहमियत को समझने में अभी भारतीय समाज को समय लगेगा. (चाहता हूँ कि मेरी यह बात गलत हो. चाहता हूं कि श्री जी.एल. भगत को अपने समाज में एक कारगर मंच, कारगर संगठन मिले जो उनकी बात को सही परिप्रेक्ष में समाज तक पहुंचा सके. यह भी ज़रूरी है कि श्री जी.एल भगत अपनी पुस्तकों का अनुवाद अपनी वांछित लोकभाषा/ओं में कराएँ. यह बहुत महत्वपूर्ण है.)
 2 क्योंकि संस्कृत साहित्य और उसकी व्याख्याएँ समय-समय पर बदलती रही हैं. अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का पाठ-भेद आम बात है.

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