11 March 2018

Past window - अतीत का झरोखा

09 मार्च को श्री आर. एल. गोत्रा जी से फोन पर लंबी बातचीत हुई. वे आज कल सिडनी में है और उनका काफी समय पढ़ने-लिखने में व्यतीत होता है. 4 मार्च 2018 को मेघ जागृति फाउँडेशन, जालंधर द्वारा बड़ा आर्यसमाज मंदिर, गढ़ा में किए गए सेमिनार का हाल-चाल बताते हुए उनसे कई बातें हुईं विशेषकर वैदिक साहित्य की वैदिक कहानियों में मेघ समाज के इतिहासपूर्व वृत्तांत के बारे में चर्चा हुई.
वैदिक संस्कृत की भाषा-प्रकृति ऐसी है कि एक-एक शब्द की कई-कई अर्थ छटाएँ दिखती हैं और समय-समय पर हुए उनके प्रकाशनों में पाठ भेद भी हैं. उक्त सेमिनार में यह बात मैंने कही थी कि गोत्रा जी के लिखे हुए लंबे आलेखों से इस बात का खुलासा नहीं होता कि मेघों का वंशकर्ता कौन है. वृत्र या मेघासुर के वंश का संकेत मिलता है लेकिन उससे पहले का हाल वहाँ बयान नहीं होता. यहीं उसकी एक अनिवार्य सीमा है. जो भी हो उसे एक ऐतिहासिक संकेत माना जा सकता है. 
उनसे चर्चा के दौरान यह बात भी उठी कि जब हम भाषा और साहित्य के माध्यम से किसी समुदाय का इतिहास ढूंढते हैं तो उसमें मिलते-जुलते शब्दों पर विशेष ध्यान जाना स्वभाविक होता है कि वे शब्द कैसे बने हैं और उनसे मिलते जुलते शब्दों में अर्थ की कितनी विविधता है और कि क्या उन शब्दों का मूल वास्तव में एक ही है वग़ैरा. शब्दों के सफ़र में उनका इस्तेमाल करने वालों के सफ़र का इतिहास छिपा होता है.  इस प्रक्रिया में गलतियों की बहुत सी गुंजाइश होती है. यहाँ भाषाविज्ञानियों (Philologists) और वैयाकरण (Grammarian) की भूमिका बहुत अहम हो जाती है. यह कार्य कई विद्वान कर रहे हैं. इस संबंध में डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह का नाम विशेष रूप से लेना चाहूँगा. 
लोक स्मृति में कहीं ना कहीं यह दर्ज है कि मेघ समुदाय का किसी रूप में सिकंदर से संबंध रहा है वह संबंध कैसा था पता नहीं. दोस्ती का था दुश्मनी का था या दोस्ती-दुश्मनी का था यह ज्ञात नहीं होता. लोक गायक श्री रांझाराम की बात हो या उन लोगों की जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बताते रहे हैं कि सिकंदर मेघों को ढूंढता हुआ भारत की ओर आया था, एक संकेत तो करता है. कुछ का कहना है कि सिकंदर यूनान के कुछ विद्वानों को अपने साथ ले कर आया था जो संभवतः बुद्धिज्म का अध्ययन करने और उसके स्रोत का पता लगाने यहां आए थे. यह तो ज्ञात सत्य है कि बुद्धिज्म का प्रसार यूनान तक हुआ था. 
लॉर्ड कन्निंघम जैसे कुछ विद्वानों का मत है कि मेघ जनजाति का आगमन कभी मध्य एशिया से अविभाजित असम के अलावा ईरान-अफ़गानिस्तान की ओर से होकर सप्तसिंधु क्षेत्र में हुआ था. उस हालत में मेघ जनजाति की बड़ी आबादी सिकंदर के रास्ते में आई होगी. जब हम ऐसा सोचते हैं तो अपने समुदाय के किसी व्यतीत गौरव को ढूंढने की कोशिश कर रहे होते हैं, जिस गौरव को प्राकृतिक ऐतिहासिक प्रवाह (natural flow of history) से बाहर कर दिया गया है. 
इसी संदर्भ में कहीं अस्सीरिया की बात उठती है और वहां के राजा अशुर-डेन(Ashur-dan) का नाम भी आ जाता है जिसे लेकर मन में विचार उठता है कि अस्सीरिया और असुर शब्द का कोई आपसी संबंध रहा है क्या. अस्सरिया एक गोत्र भी है. मेरी जानकारी के अनुसार इसमें प्रश्न अधिक है और उत्तर कम. मन में विचार तो आता है कि इतनी सारी कड़ियां हैं लेकिन इतिहास का स्वभाविक प्रवाह इसमें क्यों उपलब्ध नहीं होता. उस प्रवाह को कहां रोका गया, कहां उसकी दिशा बदल गई, कहां जा कर वो धरती के नीचे बहने लगा. धरातल पर वो दिखता नहीं. क्या हमारा इतिहास यूनान, अस्सीरिया और उसके आसपास के अन्य देशों के इतिहास में कहीं मिल पाएगा? यह ऐसा विषय है जिसे इतिहासकारों की अगली पीढ़ी पर छोड़ना होगा. बहुत से लोगों का मत है कि बहुत पुराने इतिहास को ढूंढ कर लाने से और बताने से आज क्या मिलेगा. उनकी बात सही है. लेकिन जब से गरीब समुदायों में शिक्षा का प्रसार हुआ है तब से उनके मनों में ऐसे सवाल उठने लगे हैं. तो इन सवालों का क्या किया जाए - यहीं छोड़ दिया जाए या यहीं मार दिया जाए या इनको उठा कर चलते रहा जाए जब तक DNA और प्राचीन जनसांख्यिकी (demography) की रिपोर्टें इन सवालों का फैसला नहीं कर देतीं.
हमारे समुदायों और उनकी जनसंख्या का क्रमिक प्रयाण मध्य एशिया या मेडिटेरेनियन क्षेत्र, जो भी हो, वहाँ से लेकर हमारी वर्तमान आबादियों तक कैसे हुआ है? हमारी आबादियों के बसने, उजड़ने, उखड़ने और फिर बसने की अंतर्कथा के कितने पड़ाव हैं? इनका कोई उत्तर है? उत्तर की कोई ज़रूरत है क्या? इसका फैसला वे विद्वान करेंगे जिनमें जवाब पाने की ज़बरदस्त तलब होगी. वही मेघों के अतीत का झरोखा खोलेंगे.