09 December 2010

Human Rights Day special - (Jotiba Phule) - मानवाधिकार दिवस पर विशेष- महात्मा जोतीबा फुले


Mahatma Jotiba Phule (Photo Wikipedia)
महात्मा जोतीबा फुले को सत्य शोधक समाज’ (Satya Shodhak Samaj) की स्थापना, महिलाओं के अधिकारों (Women Rights) के लिए संघर्ष और श्रमिक जागृति के लिए किए गए कार्य के लिए जाना जाता है. उनकी पुस्तक गुलामी’ (Slavery) की चर्चा मैंने सुनी थी परंतु इसे तभी देखा जब बलीजन सांस्कृतिक आंदोलन (Balijan Cultural Movement) के बारे में जानकारी प्राप्त हुई. हाल ही में इसे पढ़ने का मौका मिला. इसे पढ़ कर अहसास हुआ कि मेरी जानकारी कितनी कम थी जब मैं मेघनेट और मेघ भगत पर आलेख लिख रहा था. उन आलेखों में कई ऐसे थे जो मुझे अपना आइडियालगे. परंतु उनमें से बहुत से आइडियामहात्मा फुले की सन् 1873 में लिखी पुस्तक में उपलब्ध थे. पुस्तक के कई पृष्ठ एक ही बैठक में पढ़ गया. इसमें राजा बली (Mahabali, Maveli), उसके पूर्वजों, उसके उत्तराधिकारियों, उसकी प्रजाओं और उनकी आज की स्थिति के बारे में एक साफ़ तस्वीर उभर कर आई. देश की बहुसंख्यक आबादी (majority of the people) के ग़रीब होने और उनकी दासता की बेड़ियों का ताना-बाना और ताना-पेरा समझ में आने लगा. आर्य (Aryans) आक्रमणकारियों ने इस देश के मूल निवासियों (aboriginals) को ग़ुलाम बनाने के लिए कैसे-कैसे हिंसक तरीके (violence) अपनाए इसका खुलासा मिला. साथ ही उन्होंने अपने हिंसक तरीकों को कैसे धर्म’ (Religion) में लपेटे रखा उसका भी पता चला. महात्मा फुले आगे चल कर डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर (Dr. Baba Sahab Ambedkar) के वृहत् कार्य का आधार बने.  इस बीच महेश्वरी समाज की वेबसाइट पर एक आलेख मिला जिसे प्रोफेसर वी.जे. नाइक (Prof. J.V. Naik, Renowned Scholar-Historian and Ex-Chairman, Indian History Congress) ने लिखा था- Mahatma Phule – India’s First Social Activist and Crusader for Social Justice.

इस आलेख को पढ़ कर भारत के मेघ समुदाय (Meghvansh) का ध्यान आया जो अभी तक इस प्रश्न के साथ जूझ रहा है कि वह कौन है, उसका इतिहास क्या है, उसकी जनसंख्या कितनी है, उनकी शिक्षा का स्तर क्या है, उसका धर्म क्या है आदि. उसे आज तक कुछ भी तो पता नहीं. महात्मा फुले को उक्त पुस्तक लिखे 138 वर्ष हो चुके हैं. शिक्षा से वंचित रखे इस समुदाय के 98 प्रतिशत लोगों (जिसमें SC,ST और OBC शामिल हैं) को महात्मा फुले का नाम पता नहीं होगा. ऐसे समाज को अपनी गुलामी का अहसास कराना कितना कठिन है. अब शिक्षा इतनी मँहगी कर दी गई है कि ये मेघवंशी समुदाय शताब्दियों तक इसके साथ कदम मिला कर नहीं चल सकते. नतीजा यही कि वे लंबी अवधि के लिए ग़ुलामी का जीवन जीते हुए सस्ता श्रम बन कर रह जाएँगे. इस कुचक्र का नाम है:-
'Costly education in India helps continuity of system of slavery in the form of cheap labor.' (भारत में मँहगी शिक्षा दासता की प्रथा को सस्ते श्रम के रूप में जारी रखने में सहायता करती है.) 
A link for information on Human Rights Day (10-12-2010)


All links retrieved on 09-12-2010
MEGHnet  

3 comments:

  1. सही कहा आपने। ज्योति बा के बारें में कितने लोग जानते हैं। अभी तो उनके अनुसरणकर्ता डॉ. अम्बेड़कर को भी नहीं जानते। जो नहीं पढ़ पाए,वे तो पेट की चिंता में डूबे रहते हैं और जो पढ़ लिए वे कमाने में रहते हैं। फिर इन महापुरूषों के बारें में जानने,पढ़ने व समझने का वक्त किस के पास हैं। शिक्षा महंगी हो गई,तो उसका खामियाजा गरीब भुगते। इसी गरीबी से अमीर बन गए,उनके नौनिहाल तो कान्वेंट में जा रहें हैं। कौन किसकी चिंता करें। समूचा दलित समाज दो ध्रुवों पर दिखाई दे रहा हैं। इसको सूचना,शिक्षा एवं संचार ही पाट सकता हैं। लेकिन इसमें अभी भी व्यापक भागीदारी दिखाई नहीं दे रही हैं। समाज की जिज्ञासाएं असिमित हैं,लेकिन शोध की गति धीमी हैं।

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  2. My sincere tribute to Gautam Buddha and The Mamai and Dr Ambedkar and Jayotiba phulle, for their principles, and dharma for human right and social justices;which are the universal solution for today"s burning world. The are admired by the entire universe,

    Dr Nitin.
    Jamnagar Gujarat India

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  3. बहुत अच्छी जानकारी।
    किसी स्कूल की किसी भी कक्षा में ऐसा कुछ नहीं पढ़ाया जाता ।
    आप का ब्लॉग अपने-आप में एक स्कूल है ।

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