11 April 2012

When we became independent in 1947... - जब हम 1947 में आज़ाद हुए थे.....


.....उससे पहले एक कानून था कि यदि कोई शराब पीकर किसी की हत्या कर दे तो उसे कम सज़ा दी जाती थी क्योंकि माना जाता था कि नशे में होने के कारण उससे ग़लती हो गई.

यह कानून अंग्रेज़ों ने बनाया था. ज़ाहिर है उन्होंने अपने भले के लिए बनाया था. हत्या या कई अन्य अपराध पियक्कड़ अंग्रेज़ों से हो जाते थे. उनके कारकुन भी इसी मर्ज़ के शिकार थे. लेकिन इस कानून के कारण वे दोनों काफी कम सज़ा के भागी होते थे. कानून ज़िंदाबाद. चलो हो गया. हम आज़ाद हो गए.

अब हुआ यह है कि आज़ादी के बाद अंग्रेज़ों के बनाए कानूनों की किताब यहीं हमारे सिर पर रखी रह गई और विदाई के समय हम उन्हें देना भूल गए. आज टीवी पर खबर थी कि एक बाप ने अपनी नन्हीं-सी बेटी को शराब के नशे में नीचे पटक दिया और फिर उसे मरा समझ नाले में डाल आया. अरे वाह!! क्या बात है सर जी!! उसे पक्की उम्मीद थी कि वह सस्ते में छूट जाएगा क्योंकि मेरे देश का प्रत्येक पियक्कड़ अंग्रेज़ों के उक्त कानून को जानता है.


MEGHnet

24 comments:

  1. उसका बच्चा
    क्यों बोलेगा कोई सरकार- वरकार!

    ReplyDelete
    Replies
    1. सच्ची बात है. अब इसका बच्चा 'माई-बाप' तो नहीं ही बोलेगा.

      Delete
  2. बेहतरीन प्रस्‍तुति।

    ReplyDelete
  3. बिलकुल सही सर जी ! आज भी कई क्षेत्रो में हम अंग्रेजो के बनाये कानून ही रट रहे है !

    ReplyDelete
  4. गंभीर विषय पर सार्थक पोस्ट .......

    ReplyDelete
  5. कई क्षेत्रों नहीं। भारतीय दंड संहिता 1860 से लागू है, वही चलती है यानी पूरा कानून ही समझिए।
    पुलिस की स्थापना भी उसी समय हुई।

    ReplyDelete
    Replies
    1. आप सही कह रहे हैं. भारतीय पुलिस की ट्रेनिंग अंग्रेज़ों के कानून के अनुसार ही होती है :))

      Delete
  6. कल 13/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  7. Vijai Mathur ✆ to me

    जिस प्रकार एडमंड बर्क के नेतृत्व मे ब्रिटेन मे कानून सुधार आंदोलन चला था और वहाँ क़ानूनों मे सुधार हुआ था। नकल करने के आदि हम भारतीयों को भी उसी तरह 'कानून सुधार आंदोलन' चला कर सभी कानूनों को इस प्रकार सुधार लेना चाहिए कि उनसे गुलामी की सारी बू समाप्त हो जाये।

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपसे पूरी तरह सहमत हूँ माथुर साहब. मुश्किल यह है हमारे सत्ताधारी इन गुलामियत स्थापित करने वाले कानूनों के साथ ही स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं. पता नहीं स्वतंत्रता की पवित्र भावना के साथ ये देश की जनता को कब देखना चाहेंगे.

      Delete
  8. A very well-written post. I read and liked the post and have also bookmarked you. All the best for future endeavors
    IT Company India

    ReplyDelete
  9. there r so many loop holes in our legal system and ppl never leave a chance to tyake advantage of it

    ReplyDelete
    Replies
    1. In north we celebrate after defying law. :))

      Delete
  10. आदरणीय भूषण जी कहाँ बदल पाए हम अपना कानून चोला नया है आत्मा वही पुरानी.सब वही एक्ट गुलामी के कारनामे भी तो वैसे ही --सार्थक लेख ..मन को छूता हुआ ..जय श्री राधे
    भ्रमर ५

    ReplyDelete
  11. तभी तो हम अभी तक मानसिक रूप से गुलाम ही हैं ...

    ReplyDelete
  12. भले ही आज हम आजाद है पर मानसिक रुप से तो गुलाम ही है..इसी लिए कुछ नहीं बदल पारहे है......सार्थक पोस्ट..

    ReplyDelete
  13. Rajesh Kumari ✆ to me

    भूषण जी आप सच कह रहे हैं हम आज भी अंग्रेजों के बनाए ढर्रों पर ही चल रहे हैं चाहे क़ानून की बात ले लो या रक्षा मंत्रालय की बात ले लो अंग्रेज चले तो गए पर अपने भूत यहीं छोड़ गए |

    ReplyDelete
  14. Pallavi ✆ to me

    गंभीर विषय पर बहुत ही आसान शब्दों में सार्थक पोस्ट....

    ReplyDelete
  15. यह सड़े गले कानून कब जायेंगे ??
    आभार जागरूक पोस्ट के लिए भाई जी !

    ReplyDelete
  16. सार्थक आलेख. आजकल तो कानून को लोग अपने पॉकेट में रखते हैं.

    ReplyDelete
  17. बिलकुल सही कह रहे है श्री भारत जी. हम आज भी केवल प्रत्यक्ष रूप से आजाद हुए है. मानसिक रूप से से तो आज भी गुलाम है. अंग्रेजो के तीन virus- चाय, क्रिकेट और अंग्रेजी हमारे देश को खोकला कर रहे है. आने वाले कुछ सालो में पुरुषो का पारंपरिक परिधान धोती तो फोटो में ही दिखाई देगी.

    ReplyDelete