05 October 2012

Aryans do not belong to Indus Valley Civilization – आर्य सिंधुघाटी सभ्यता के नहीं हैं.


जब से महात्मा ज्योतिराव फुले ने आर्य आक्रमणों का अपने अध्ययन के अनुसार विवरण दिया तभी से कई आर्यों/ब्राह्मणों के द्वारा गठित संस्थाओं ने हर कहीं तर्क-कुतर्क से प्रमाणित करने की कोशिशें शुरू कर दीं कि आर्य सिंधुघाटी सभ्यता के ही हैं, न कि यूरेशिया से आए हैं. यह भी प्रमाणित करने की कोशिश की जाने लगी कि 'आर्य आक्रमण' अंग्रेज़ों का फैलाया हुआ भ्रम है. अब बामसेफ (BAMCEF) के साहित्य में भी इस बात का खुला उल्लेख होने लगा है कि आर्य बाहर से आए हैं और ये भारत के नहीं हैं. ये यहाँ के मूलनिवासियों के साथ आज तक घृणा का व्यवहार करते आए हैं. इन्होंने ही अन्य बाहरी आक्रमणकारियों जैसे मुग़लों, अंग्रेज़ों आदि को यहाँ लूट मचाने के लिए आमंत्रित और उत्साहित किया और हर प्रकार से उनका साथ देते रहे. ऐसे संदर्भ हैं कि आर्य ब्राह्मणों ने मुग़लों और अँग्रेज़ों को बताया था कि ये ख़ुद भी भारत के नहीं हैं अतः मिल कर यहाँ के लोगों और संसाधनों का शोषण और उपभोग कर सकते हैं.

देश में आर्य ब्राह्मणों के विरुद्ध बन रहे वातावरण के कारण अब ये ऐसा साहित्य लिख रहे हैं जिसमें सिद्ध करने की कोशिश की जाती है कि आर्य ब्राह्मण सिंधुघाटी की संतानें हैं. इसके लिए इंटरनेट का जम कर प्रयोग किया गया है.

इसी सिलसिले में अनार्यों (एससी, एसटी, ओबीसी आदि) की ओर से तर्क जुटाए गए हैं कि आर्य ब्राह्मण वास्तव में भारत के नहीं हैं और इन्होंने देश को न केवल लूटा है बल्कि लुटाया भी है.

फेस बुक के माध्यम से एक और तर्क सामने आया है जो प्रदीप नागदेव के माध्यम से पहुँचा है :-

'सिंधुघाटी की सभ्यता जिसे आर्य अपनी सभ्यता बताते हैंयदि ये इनके पूर्वजों की सभ्यता है तो ये अपनी (सिंधुघाटी की) लिपि को आज तक पढ़ क्यों नही पाए? आर्य तो संस्कृत भाषी थे कितु ये सभ्यता संस्कृत भाषी नहीं थी. आर्यों से काफी विकसित और उन्नत सभ्यता थी. इन विकसित सभ्यता के लोगों को इन विदेशी आर्यों ने दैत्यदानवअसुर और राक्षस कहा. क्योंकि इनकी सभ्यता आर्यों से भिन्न और विकसित तथा उन्नत भी थी, सिंधुघाटी के लोग नाग तथा प्रकृति की पूजा करते थे. खुदाई में आज तक किसी भी हिंदू देवी-देवता की मूर्ति नहीं मिली है. फिर भी विदेशी आर्यों का इसे अपनी सभ्यता कहना पागलपन की हदें पार करना ही है. दरअसल सिंधुघाटी की सभ्यता आर्यों से पृथक है. इसी कारण आर्यों और सिन्धुघाटी सभ्यता के लोगों की दो भिन्न संस्कृतियों के कारण अनेकों युद्ध होते आये हैं. सिंधुघाटी के लोगजिन्हें आर्य लोगदैत्यराक्षसअसुरदानव कहते आ रहे हैं वे सब SC/ST/OBC के पूर्वज हैं जिन्हें आज तक शूद्र कहकर प्रचारित किया गया है. सिंधुघाटी तथा मोहंजो दाड़ो की विकसित और उन्नत सभ्यता हमारी सभ्यता थी.'
इसमें सिंधुघाटी सभ्यता की लिपि वाला तर्क ध्यान देने योग्य है. इसके अनुसार यदि आर्य जाति के लोग और उनके पूर्वज वाकई सिंधुघाटी के थे और उस भाषा/लिपि का प्रयोग करते थे जो वहाँ की खुदाई में मिली है तो वे उसे आज स्वयं ही पढ़ क्यों नहीं पाते? वे संस्कृत में लिखे वेदों को धरती का प्राचीनतम ग्रंथ कहते हैं और संस्कृत को देवभाषा कहते हैं.

प्रमाण मिल चुके हैं कि सिंधुघाटी सभ्यता की लिपि सबसे पुरानी है जिसे डी-कोड करने के प्रयास अमेरिका आदि देशों में अभी हो रहे हैं. कई प्रकार की उपलब्ध जानकारी के आधार पर कंप्यूटरों की से कोशिशें की जा रही है. 

सिंधुघाटी या हड़प्पा सभ्यता को यदि आर्य ब्राह्णों ने ही विकसित किया था तो परंपरागत रूप से स्वयं को सदा शिक्षित कहने वाले आर्य अपनी लिपि कैसे भूल गए जबकि देवनागरी लिपि में लिखी संस्कृत इन्हें याद रह गई जिसे ये विश्व की प्राचीनतम भाषा कहना कभी नहीं भूले.
इस बीच भारत में असुरों/राक्षसों को भी गोरे रंग में पेंट किया जाने लगा है. रामायण और महाभारत पर आधारित सीरियलों के कई परंपरागत रूप से काले माने गए पात्र गोरा रंग पा गए हैं. असुरों को भी आर्यों की एक जाति बताने के प्रयास शुरू किए गए हैं. ऐसी बातें अब पढ़े-लिखे (ब्राह्मण भी) कहने लगे हैं. बधाई. कुछ सच्चाई का सामना करने की बजाय मिथकों को नए रंग देने के प्रयास में लगे हैं.

अब समय आ गया है कि ऐसी बातों को भूल कर ये आर्य ब्राह्मण (जो देश की राजनीति, उद्योग, अफसरशाही, शिक्षा, न्याय व्यवस्था आदि में बहुतायत से बैठे हैं) देश में हो रहे भ्रष्टाचार को समाप्त करने में अधिक सहयोग करें. वे इस देश को अपना मानने लगे हैं तो आम लोगों के लिए बनी विकास योजनाओं को उन तक पहुँचने दें. भारत में अधिकतर कुपोषित बच्चे काले हैं.

What genetic research says 
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