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में
मेघों का उल्लेख इस प्रकार
मिलता है:-
There
is also found settled in Kashmir the class of Harijans called Meghs,
Ghamiars and Dumbs. They form a more than fair proportion of the
population and have undergone numerous disabilities, civic and
religious. The equalizing influence of education, which brings about
tolerence and fellow-feeling, has, however, paved the way for a
steady improvement of their social status. There are several
interesting theories regarding the origin of the Meghs. According to
one, they were originally Kshatriyas but, in order to escape
destruction at the hands of Paras Ram Brahmin of the Ramayana period,
they adopted the profession of weaving and called themselves Meghs.
Another theory holds that their proginitors were Brahmins but a cow
once died in the house of one of them and, there being nobody to
remove the carcass, this loathsome task was undertaken by a member of
the caste who was subsequently expelled from the community. Others
also suffered a similar fate for one reason or another and the
expelled individuals came to form the separate caste of Meghs.
मेरे
नोट्स-
किसी
भी मानव समूह की सामाजिक स्थिति
उसकी नागरिक और धार्मिक योग्यता
ही तय करती है.
इस
दृष्टि से मेघों की स्थिति
उस योग्यता की शर्तें पूरी
नहीं करती थी या उनकी योग्यता
को बलपूर्वक निम्न स्थिति
में रख कर उनसे निम्न कार्य
लिया जाता रहा.
शिक्षा
की समाज में एक भूमिका यह होती
है कि वह सहनशीलता और भ्रातृत्व
की भावना लाती है.
यह
सर्वविदित है कि मेघों को धर्म
के तहत बनाए गए प्रावधानों
के कारण शिक्षा से वंचित कर
दिया गया था ताकि वे बेहतर
कार्य की योग्यता प्राप्त न
करें.
अब
उनकी सामाजिक स्थिति में काफी
सुधार आया है हालाँकि वह अभी
भी अपेक्षानुरूप नहीं है,
विशेषकर
ग्रामीण इलाकों में.
मेघ
कहाँ से आए हैं यह एक प्रकार
का कठिन प्रश्न रहा है.
इनके
मूल को ढूँढने और पहचानने की
कोशिशें अठारहवीं शताब्दी
में तेज़ हो गई थीं.
लेकिन
यह कार्य मेघों के द्वारा नहीं
बल्कि अन्य के द्वारा ही किया
गया.
ऊपर
के संदर्भ में एक बात स्पष्ट
होती है कि जिस प्रकार से भी
हुआ हो या किया गया हो मेघों
में अपने मौखिक इतिहास या
पौराणिक कहानियों के आधार पर
मूल को बताने की परंपरा रही
है.
चाहे
वे स्वयं को ब्राह्मणों से
निकला बताते हों या परशुराम
से त्रस्त क्षत्रियों से निकली
जाति बताते हों वे दोनों
स्थितियों में ब्राह्मणों
और क्षत्रियों की श्रेष्ठता
को स्वीकार करते दिखते हैं.
इसी
संदर्भ से यह भी पता चलता है
कि परशुराम के भय से मेघों ने
शस्त्र त्याग कर वस्त्र बुनने
का कार्य करना शुरू किया और
स्वयं को मेघ कहने लगे.
रामायण
की यह पौराणिक कथा कितनी
विश्वसनीय है इसके बारे में
इतिहासकार स्पष्ट हैं कि
इन्हें इतिहास नहीं कहा जा
सकता.
अविश्वसनीय
संदर्भ से विश्वसनीय जानकारी
मिलने की संभावना कितनी हो सकती
है.
दूसरे
सिद्धांत/मतानुसार मेघ ब्राह्मण थे.
उन्हीं
में से एक ब्राह्मण ने अपनी
मरी हुई गाय को,
किसी
की सहायता न मिलने के कारण,
खुद
ही ठिकाने लगाया.
उसे
आगे चल कर समुदाय से निकाल
दिया गया.
कई
अन्य लोगों को भी एक या दूसरे
कारण से समुदाय से निकाला गया.
ऐसे
में इन निकाले गए लोगों ने आगे
चल कर अपना एक समूह बना लिया
जो मेघ जाति कहलाई.
इस
कहानी से कुछ सवाल स्वाभाविक
उठते हैं:-
जब
मरी गाय को ठिकाने लगाने का
कार्य इतना घटिया माना जाता
था कि उन्होंने अपने बिरादरी
भाई को ऐसा काम करने पर जाति
से निकाल दिया तो ज़ाहिर है
कि ऐसा कार्य करने (मरे
पशुओं को उठाने)
वाले
लोग ब्राह्मणों से अलग लोग
रहे होंगे.
वे
कौन थे?
क्या
वे भी मेघ थे?
यदि
नहीं तो ब्राह्मण जाति से
निकाले गए ये लोग मरे पशुओं
को उठाने वाले उन लोगों से
ऊँची जाति में रखे गए,
बराबर
रखे गए या उनसे नीचे रखे गए?
जातिवाद
की परंपरा में इसके कई झूठे-सच्चे तुके-बेतुके जवाब
दिए जा सकते हैं. इसी
कहानी के क्रम में कहें तो यदि
एक प्रभावशाली भाई ने दूसरे
भाई के हिस्से पर कब्ज़ा करने
के लिए उसे जाति से निष्कासित
किया/कराया होगा और लोगों ने मान भी
लिया होगा तो यह किस काल में
हुआ इसका उल्लेख उक्त संदर्भ
में नहीं है.
अतः
इस वर्णन को हम इतिहासपूर्व के (Prehistoric) मेघ कह कर आगे चल सकते हैं. लेकिन इतने से तसल्ली तो नहीं ही
होती है.
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