13 December 2019

Ruler Megh Vansh - शासक मेघ वंश

इतिहास पढ़ते हुए लगता है कि यह कोई सीधी सड़क चलती आ रही है जिसमें लिखा हुआ पूर्ण है और सच है. लेकिन वंचित जातियों के अपने इतिहासकारों और अन्य ईमानदार इतिहासकारों ने समय-समय पर सिद्ध किया है कि सड़क सीधी नहीं है. वो कई जगह उखड़ी हुई है और उसके अगल-बगल में झूठी कहानियों वाले साइनबोर्ड लगा दिए.

इन दिनों डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक इतिहास का मुआयना पढ़ रहा हूँ. उसमें प्रकाशित कई पृष्ठ डॉ. सिंह ने फेसबुक पर शेयर किए थे. फेसबुक पर एक बार मैंने उनसे मेघ वंश पर जानकारी देने के लिए अनुरोध किया था. कल 12-12-2019 को उन्होंने मेघ वंश पर पोस्ट डाली है जिसे ज्यों का त्यों नीचे कॉपी-पेस्ट कर रहा हूँ. इस पोस्ट को श्री ताराराम गौतम और श्री आर.एल. गोत्रा ने भी पढ़ा है.

नागों की राजधानी पद्मावती के दक्षिण - पूरब में मघों का राज्य था. पुराणों में इन्हें मेघ वंश कहा गया है. पहले इस वंश का शासन बघेलखंड में था, फिर कौशांबी तक विस्तृत हुआ और चरमोत्कर्ष के दौर में इस वंश ने फतेहपुर तक फतह कर लिया था. इस वंश ने ईसा की दूसरी और तीसरी सदी में अपना दबदबा बनाए रखा. मघ वंश के सिक्के तथा अभिलेख हमें बंधोगढ़ और कौशांबी से लेकर फतेहपुर तक मिलते हैं. मघ वंश की प्रारंभिक राजधानी बंधोगढ़ में थी, भद्रमघ ने कौशांबी तक और वैश्रमण मघ ने फतेहपुर तक मघ साम्राज्य का विस्तार किए थे. मघ वंश के राजाओं ने बौद्ध धम्म का पताका फहराए और अपने सिक्कों पर बौद्ध प्रतीकों की छाप अंकित कराए. प्रथम सिक्का भद्रमघ का है तथा दूसरा और तीसरा सिक्का नव मघ का है. सिक्कों पर इन राजाओं के नाम लिखे हुए हैं. सिक्कों की लिपि उत्तर कुषाण ब्राह्मी लिपि है तथा भाषा पिजिन संस्कृत है, जिसमें प्राकृत भाषा के ऊपर संस्कृत के वर्ण संकोच का लेयर चढ़ा है.



मघ राजाओं के सिक्कों का उल्लेख संदर्भ सहित ताराराम जी की पुस्तक 'मेघवंश : इतिहास और संस्कृति' में भी आया है.

इतिहास की सड़क के उखड़े हिस्से पर बोर्ड लग चुका है - "कार्य चल रहा है, Work in Progress" 

   


1 comment:

  1. अच्छा इतिहास ... बहुत कुछ छुपा है कई किताबो में जिसको सहेजना भी इतिहास का हिस्सा ही है ...

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