01 September 2010

Religious Unity - धार्मिक एकता

If someone thinks that his religion or his Guru is the best in the world, he is sadly mistaken. Best is man's faith, which may fortify itself at a place of one's choice.

Man made religion is a fake external fear. Real faith is to hold good qualities (virtue) within you. The work of worldly religion is to tell the people interesting, terrifying and fascinating things and exploit them to accumulate wealth. Some money is spent on social welfare to make the people happy. Remaining funds are used in order to keep people under the pressure to come to religious places. The game of politics is played. These things are linked. Take a look at this with open eyes and try to understand.

The inner religion of man (i.e. virtue and good qualities) is the real religion. A man drinks alcohol and goes to pilgrimage places and religious centers, he may be anything but cannot be a religious person.

A person with inferiority complex cannot be a religious person because he does not hold within himself the divine attribute to become Brahma or progress further. You are a nice human being like others. Make your life full of work.

In order to create religious timidity many uneducated people use the phrase of 'fear the religion', which means fear of external religion. Inner and the real religion need not be feared. A religious person is he who wears religion and the virtue. One who fears religion cannot be religious. The people who swear by religion are mostly liars.

Religion is to perform for the betterment of family and community. To work and donate for the cause of community is religion. External religion or religious places come afterwards. If this is understood there should not be any problem of religious unity. When we know our duties towards the society, there cannot be any problem of religiosity or religious unity.

यदि कोई समझता है कि उनका धर्म या उसका गुरु दुनिया में सर्वश्रेष्‍ठ है तो वह गंभीर गलती पर है. व्‍यक्ति का अपना विश्‍वास सर्वश्रेष्‍ठ है, जहाँ भी आ जाए.
    
बाहरी धर्म मनुष्‍य का बनाया हुआ एक नकली हौवा है. वास्तविक धर्म अच्‍छे गुणों को अपने भीतर धारण करना है. बाहरी धर्म का कार्य लोगों को रोचक, भयानक और आकर्षक बातें सुना कर उनका दोहन या शोषण करना और धन एकत्रित करना है. कुछ धन सामाजिक कार्यों पर खर्च करके लोगों को प्रसन्न रखा जाता है. शेष धन ऐसी जगह इस्तेमाल होता है जिससे लोगों पर रौब और धौंस जमाई जा सके. तब राजनीति का खेल खेला जाता है. ये बातें जुड़ी हुई हैं. अनपढ़ साथी भी आखें खोल कर इसे देख चुके हैं.
    
मनुष्‍य के भीतर का धर्म (अच्‍छा गुण भंडार) ही वास्‍तविक  धर्म है. कोई व्‍यक्ति शराब पीता है और धार्मिक जगहों और तीर्थ स्थलों पर भी जाता है तो जान लें वह कुछ भी हो सकता है, परन्‍तु धार्मिक नहीं हो सकता.          
    
जिस व्‍यक्ति में हीनता की भावना है वह भी धार्मिक नहीं कहला सकता क्‍योंकि उसने अपने भीतर ब्रह्म बनने या बढ़ने का गुण धारण नहीं किया. अपने आपको सब के जैसा अच्‍छा मानव समझें और जीवन का कार्य करें.
    
दूसरों को धर्मभीरू बनाने के लिए कई चालाक लोग कहते हैं कि 'धर्म से डरो'. जिसका अर्थ है बाहरी धर्म से डरो. भीतरी और असली धर्म से डरने की तो आवश्यकता ही नहीं है. धर्म को धारण करने वाला धार्मिक है. धर्म से डरने वाला धार्मिक नहीं हो सकता. धर्म की सौगंध खाने वाले अक़सर झूठे पाए गए हैं.
    
परिवार और समुदाय की बेहतरी के लिए कर्म करना धर्म है. समुदायिक कार्य के लिए दान देना भी धर्म है. बाहरी धर्म या धर्मस्‍थल बाद में आते हैं. इस बात को समझ लेने पर धार्मिक एकता की कोई समस्‍या रह जाएगी. समाज के प्रति अपने धर्म का पता हो तब धार्मिक एकता या धार्मिकता की समस्‍या कैसी?


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