26 September 2010

Why religious places, why not education - धार्मिक जगह क्यों, शिक्षा क्यों नहीं

भारत के जातिवाद की शिकार ग़रीब जातियों को धर्म ने भी शोषित किया है. धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाज़ इनके हाथों से धन खीचते रहते हैं. इसके लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं, जैसे 1. यह प्रचार कि धार्मिक स्थल पर जाने से ही मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, 2. यह प्रचार कि यह विशेष धार्मिक स्थल समतावादी समाज का निर्माण करेगा, 3. यह प्रचार कि यही डेरा मानवतावादी है, 5. यह अनुष्ठान न करने से पूर्वजों को कष्ट होगा, 6. यह यज्ञ करने से पवित्रता आएगी, 7. यह दान देने से यश और समृद्धि प्राप्त होगी आदि. यह किसी का व्यवसाय हो सकता है. आप उसमें मदद कर सकते हैं परंतु शोषण के प्रति होशियार रह कर.

धर्म या संप्रदाय के झंडे पर ऐसे आकर्षक और संकेतात्मक नारे लिख दिए जाते हैं कि ग़रीब जातियों के लोग किसी आशा में आकर्षित हो जाते हैं. अंतिम परिणाम वही- आर्थिक शोषण. चढ़ावा चढ़ाओ, मन्नत माँगो और घर चले जाओ. मन्नत तो घर पर भी माँगी जा सकती है. लोगों का अनुभव है कि धार्मिक जगहों पर की गई सभी मनोकामनाएँ पूरी नहीं होतीं. मनोकामना वह भी पूरी हो जाती है जो गली या पार्क में की जाए, वह भी बिना पैसा-प्रसाद चढ़ाए.

इधर धार्मिक स्थल इतने बना दिए गए हैं कि राह चलते सिर से टकराते हैं. एक सावधानी बरती जा सकती है कि जैसे ही धर्म स्थल सामने आए उसी समय अपने बच्चों की शिक्षा और उन्नति का ध्यान करें और अपनी मेहनत का पैसा उनकी शिक्षा पर व्यय करें. बच्चों को अच्छी शिक्षा देना देशभक्ति है, पूजा का बेहतर स्वरूप है. हालाँकि इस भक्ति (शिक्षा) को मँहगा किया जा रहा है जो ग़रीब जातियों के विरुद्ध षड्यंत्र से कम नहीं है. हम मिलकर प्रार्थना कर सकते हैं कि ईश्वर उनका भला करे.

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