15 January 2011

What happened to Bhakta Prahlada - मेघवंशी प्रह्लाद भक्त का क्या हुआ

भक्त का मूल अर्थ है जो अलग हो चुका है. किससे अलग हुआ यह संदर्भ के अनुसार है. हिरण्यकश्यपु (असुर या अनार्य) के पुत्र प्रह्लाद को भक्त के तौर पर बहुत महिमा मंडित किया गया है. भारतीय पौराणिक कथाओं (Indian Mythology) में प्रह्लाद को पौराणिक पात्र बना कर और भक्तिरस में भिगो कर परोसा गया है. ज़बरदस्ती अशिक्षित रखे गए दलितों की थाली में भी इस कथा को रखा गया. सच्चाई की कई पर्तें अब तक खुल चुकी हैं. साहित्य और संदर्भों को जानने के बाद एक जिज्ञासा रह जाती है कि सिंधु घाटी सभ्यता पर आक्रमण करके आर्यों ने यहाँ के मूलनिवासियों या मेघवंशियों (aboriginals of Indus Valley Civilization) के साथ क्या किया? हिरण्यकश्यपु को मारने के बाद प्रह्लाद का क्या हुआ? पौराणिक कथाओं पर विश्वास कर लेना कभी भी बुद्धिमत्ता की बात नहीं रही. इन कथाओं के पीछे सच्चाई को छुपाने वाली एक चालाकी रहती है जिसके बारे में लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व महात्मा ज्योतिराव फुले और फुले से पूर्व कई महात्माओं ने समझा दिया था. परंतु दलितों में अशिक्षा के कारण उसका पूर्ण प्रकाश अभी तक नहीं पहुँचा. एक सत्यशोधक के तौर पर ज्योतिबा ने प्रह्लाद की कथा के बारे में जो लिखा उसका सारांश नीचे दिया गया है:-

नृसिंह स्वभाव से लोभी, ढोंगी, विश्वासघाती, कपटी, घातक, निर्दय और क्रूर था. शरीर से सुदृढ़ और बलवान था. राज्य हथियाने के लिए उसने हिरण्यकश्यपु के वध की योजना बनाई. अविकसित बालमन प्रह्लाद के अध्यापक के तौर पर गुप्त रीति से एक द्विज को भेज दिया और उस पर अपने धर्म तत्त्वों का प्रभाव जमा दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि प्रह्लाद ने अपने कुल देवता हरहर की पूजा करना बंद कर दिया. हिरण्यकश्यपु ने उसके भटके हुए मन को कुलस्वामी की पूजा की ओर लाने के लिए प्रयास किए परंतु नृसिंह भीतर ही भीतर प्रह्लाद को उकसा रहा था. बालक को इतने झूठे भुलावे दिए गए कि उसके मन में पिता की हत्या करने का विचार आने लगा परंतु साहस नहीं हुआ. अवसर पाकर नृसिंह ने शेर का स्वाँग (मेकअप) करके कलाबत्तू वाली मँहगी साढ़ी पहन ली और हिरण्यकश्यपु के महल के खंभों के बीच छिप गया. शाम को राजपाट का कार्य निपटा कर हिरण्यकश्यपु जब थका-माँदा लौटा और एकाँत में आराम करने के लिए लेटा तब नृसिंह बघनखा लेकर अचानक उसे दबा कर बैठ गया और पेट फाड़ कर उसे मार डाला और स्वयं द्विजों सहित दिन-रात भागता ही चला गया और अपने प्रदेश में पहुँच गया. उधर क्षत्रियों को पता चला कि नृसिंह ने प्रह्लाद को मूर्ख बना कर ऐसा घिनौना कर्म किया है तो उन्होंने आर्यों को द्विज कहना छोड़ दिया और उन्हें विप्रिय कहने लगे. क्षत्रियों ने नृसिंह को नारसिंह जैसा निंदनीय नाम दिया. अंत में हिरण्यकश्यपु के कई पुत्रों ने कई बार प्रयत्न किए कि नारसिंह को बंदी बना कर उसे यथायोग्य दंड दिया जाए, परंतु नारसिंह ने तो हिरण्यकश्यपु का राज्य जीतने की आशा कतई छोड़ दी थी सो वह जैसे-तैसे बचता-बचाता रहा और बाद में आगे कोई उपद्रव किए बिना मृत्यु को प्राप्त हुआ.

विप्रों ने प्रह्लाद का राज्य हथियाने के लिए चोरी-छिपे कई प्रयत्न किए, किंतु सभी यत्न व्यर्थ हुए. आगे चल कर प्रह्लाद की आँखें खुल गईं और उसने विप्रों के छल-कपट को ताड़ लिया. इस प्रकार प्रह्लाद ने विप्रगणों का थोड़ा भी भरोसा नहीं किया. सबके साथ ऊपरी स्नेह जतलाकर अपने राज्य का उसने समुचित प्रबंध किया और अंत में मृत्यु को प्राप्त हुआ. उसका पोता (विरोचन का पुत्र) बली बहुत पराक्रमी निकला.

ग़ुलामी’, पृष्ठ 56-59, लेखक महात्मा ज्योतिराव फुले (यह पुस्तक महाराष्ट्र सरकार द्वारा भी प्रकाशित की गई थी.)
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16 comments:

  1. Good to educate about mythical stories.

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  2. i didn't know all this ...good post Bhushan Ji Thanx

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  3. जानकारी अच्छी लगी।मकर संक्रांति की शुभकामनाएं।

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  4. बहुत अच्छी जानकारी । धन्यवाद।

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  5. अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद !

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  6. बहुत अच्छी जानकारी । धन्यवाद।

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  7. आपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं

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  8. @ Gottra Ji
    @ Gopal Mishra Ji
    @ Prem Sarovar Ji
    @ Nirmala Kapila Ji
    @ Uday Ji
    @ Dr.Hardip Ji
    @ Navin Bhoiya Ji
    @ Sanjay Bhaskar Ji
    आप सभी की टिप्पणियों के लिए आभार.

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  9. बहुत अच्छी जानकारी । धन्यवाद।

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  10. Gyanverdhak jankari dene k liye shukriya ......
    http://amrendra-shukla.blogspot.com

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  11. @ Patali-the-Village
    @ Amrendra Aks

    आप दोनों का आभार.

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  12. Indian Mythology stories certainly represent history , if they are not completely true then they are not completely false too. Fact of the matter is that we have to dig and refine the history from those stories . Babasaheb himself backed the idea that these stories represent history and he himself used these mythological stories to prove many things in his books viz."who were shudras " , "who were untouchables and how they became untouchables" ,"Riddles in Hinduism" .

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  13. It is absolutely right that Aryan invaders destroyed the culture of aboriginals by conspiracies. But saying that these aboriginals were Meghvanshi, I think it is absolute distortion of the theory of conflict of Aryans and Aboriginals. The aboriginals were Daityas, Rakshs, Asur, NAg Anarya Vanar and also many more names. Please do not spread more confusion, because to fight the curse of Aryan Brahmins we must build sound historical factual platform to counter Aryan misdeeds.

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  14. @ DR R Sammauria

    Agreed . But I think , nobody here has said that Meghvanshis are the sole heirs of the Aboriginal Indians , they are one of those . As Meghvanshis are trying to find their roots , others indigenous should also do the same and combinedly should overthrow the Vulture Manuwadi Culture which is sucking the blood of Humanity from last 2000 years.

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