03 May 2018

The Stupa of Sirsa - सिरसा का थेहड़ (स्तूप)

जब पिताजी की तब्दीली टोहाना से सिरसा हुई तो उस समय टोहाना में बीती अपनी किशोरावस्था की बहुत सारी चमकती और रोशनी में दमकती यादें लेकर मैं सिरसा गया था. पिता जी पीडब्ल्यूडी में सब-डिविज़नल इंजीनियर थे. उनके कार्यालय के साथ ही बना एक साफ़-सुथरा रिहाइशी आवास मिला. सामने बंसल थिएटर और पीछे गिरजाघर. सिरसा के एक अच्छे (आर.एस.डी.) हाई स्कूल में मेरा दाखिला हुआ. वहाँ के स्कूली जीवन में एक सहपाठी केवल कृष्ण नारंग के साथ विशेष मित्रता रही. काफी वर्षों बाद उन्होंने चंडीगढ़ में मुझे ढूंढ लिया था. जहाँ तक सिरसा में रिश्तेदारी का संबंध था तो वहाँ मेरी सबसे बड़ी बहन श्रीमती कांता के जेठ श्री संतराम जी थे जो वहाँ पोस्टमास्टर के पद पर थे. 

एक बार केवल कृष्ण सहित हम तीन मित्र बैठे थे. अचानक कार्यक्रम बना कि सिरसा के दूसरे किनारे पर घूम कर आया जाए. वहां गए तो वहां एक टीला-सा था. केवल कृष्ण ने बतलाया कि वह थेहड़ है. थेहड़ का मतलब मैंने टीला समझा. हम तीनों ने फैसला किया थेहड़ के ऊपर जाएँगे. हालांकि ऊपर जाने का कोई रास्ता नहीं था लेकिन चढ़ाई का एक आसान रास्ता जाँच कर हम जैसे-तैसे टीले पर चढ़ गए. ऊपर थोड़ी-सी सपाट जगह थी. वहाँ से नज़रें घुमा कर ‘फतेह’ किए टीले पर से शहर को देखा और फिर नीचे उतरना शुरू करने वाले थे कि दाएँ हाथ थोड़ा नीचे थेहड़ में एक दरार या कह लीजिए कि एक खोह बनी हुई थी जिसमें पत्थर की मूर्ति जैसा कुछ नजर आया. लेकिन वह ऊपर की सतह से 10-15 फीट नीचे रहा होगा, ऐसा कुछ याद है. मैंने दोनों साथियों से कहा कि वहां कोई मूर्ति नजर आ रही है. लेकिन वो कोई पहुँचने लायक जगह नहीं थी क्योंकि वहाँ ढलान सीधी थी जिसे देखते ही गिरने का डर लगता था.

ख़ैर! हम लोगों ने टीले से उतरना शुरू किया. ढलान पर हमारी चाल तेज़ होने को हो रही थी और सँभलना पड़ रहा था. केवल कृष्ण का हाथ मैंने थामा हुआ था. जब अधिकतर ढलान हम उतर चुके थे तो केवल ने तेज़ चलने का रिस्क ले लिया. वे नियंत्रण खो बैठे और आखिर वे गिर कर घिसटते हुए सपाट जमीन तक गए. उनके चेहरे पर भी कुछ खरोंचे आई थीं. वहां से संतराम जी का निवास नज़दीक था. वहाँ गए जहाँ संतराम जी ने एक पड़ोसी डॉक्टर से उनकी मरहम-पट्टी कराई. थेहड़ पर चढ़ने के एडवेंचर की यादें आज भी काफी गहरी हैं.

पिछले दो-तीन साल के दौरान 'थेहड़' शब्द का असली अर्थ पता चला. मेघों के इतिहास के जानकारों को पढ़ते हुए पता चला कि थेहड़ का संबंध बौध सभ्यता और बुद्धिज़्म  से है. इसका साधारण अर्थ स्तूप है. इसीलिए यह मन में कभी-कभी उभरता रहा. कल 02-05-2018 को प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी और इतिहास के जानकार डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने फेसबुक पर सुजाता (जिसने बुद्ध को खीर खिलाई थी) के स्तूप पर पोस्ट डाली तो मेरी स्मृतियाँ झनझना उठीं. थेहड़ की यादें काफी तेज़ी से मन पर उभर आईं. उस पोस्ट पर काफी जानकारी देने के बाद डॉ. सिंह ने लिखा था कि- “इतिहास में विहारों के जलाए जाने पर विमर्श होते रहे हैं, मगर स्तूपों को मिट्टी से ढँकवाए जाने का विमर्श शेष है.”

उनकी फेसबुक पोस्ट पर मैं सिरसा के थेहड़ का ज़िक्र करने के लिए जैसे मजबूर-सा हो गया. मैंने लिखा, “सन 1966 में मैं सिरसा में था. विद्यार्थी था. तब शहर के बाहर एक बड़ा-सा टीला था जिसे स्थानीय भाषा में 'थेहड़' कहा जाता है. पता नहीं आज वह किस हालत में है. उसमें एक जगह दरार में मैंने सफेद पत्थर की एक मूर्ति सी देखी थी. अधिक जानकारी नहीं है. वहां कुछ खुदाई हुई या नहीं मैं नहीं जानता.” वहीं श्री जसवीर सिंह नाम के एक युवा ने मुझ से उस स्थान का ब्यौरा माँगा. जो याद आया वो सब बता दिया. यह भी बता दिया कि बहुत अधिक जानकारी नहीं है फिर भी एक पुराने मित्र से पूछ कर कुछ बता सकता हूँ. फिर मैंने केवल कृष्ण नारंग से फोन पर बात की और जो जानकारी उनसे मिली वो इन शब्दों में वहीं पोस्ट कर दी, “धन्यवाद जसवीर सिंह जी. अभी-अभी मेरे बचपन के दोस्त केवल कृष्णा नारंग से मेरी बातचीत हुई है और उन्होंने बताया है कि उस मोहल्ले का नाम थेहड़ मोहल्ला ही है. वह क्षेत्र कुछ साल पहले ASI की नजर में आ गया था और डेढ़ महीना पहले वहां पर खुदाई का काम हुआ है. थेहड़ के पास 400-500 घरों की एक बस्ती बस गई थी जिसे वहां से हटाकर कहीं शिफ्ट किया गया है. और जैसा कि अक्सर होता है 15 साल पहले वहां किसी आदमी ने एक मूर्ति के पाए जाने की बात उड़ा दी थी जिसे (उस मूर्ति को) सारे शहर में घुमाया गया था. शायद मंदिर भी बना लिया गया हो.” थेहड़ वाली ज़मीन पर रह रहे लोगों ने आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा खुदाई के खिलाफ कोर्ट केस किया हुआ है जिससे संबंधित एक लिंक नीचे दिया गया है. जसवीर सिंह जी ने गूगल मैप पर जा कर पुष्टि की कि अब वहाँ पीर बाबा थेहड़ मोहल्ला है और ये स्थान घग्गर नदी (जिसे कुछ विद्वान सरस्वती भी मानते है) से मात्र 10 किमी की दूरी पर ही है.
अमर उजाला में छपा चित्र 
केवल कृष्ण जी से पता चला कि बंसल थिएटर और हमारे निवास के बीच जो सड़क थी वहाँ फ्लाईओवर बन चुका है जबकि बंसल थिएटर की जगह अब एक मॉल बन गया है. जहाँ हम रहते थे वो बिल्डिंग लगभग वैसी ही है. उसके लॉन को बढ़िया बना दिया गया है. गिरजाघर वहीं है और वैसा ही है. उम्मीद है वहाँ के राडार जैसे मोर अभी वहीं होंगे.

थेहड़ भी तो वहीं है. उसका अतीत अब पहचान पा रहा होगा. बौध सभ्यता के कदमों के निशान ढूँढे जा रहे होंगे. श्रमण संस्कृति झाँक रही होगी.



लिंक-

No comments:

Post a Comment