27 March 2019

Some References from Ad-Dharmi Movement - आदधर्मी आंदोलन के कुछ संदर्भ

मार्क योरगन्समायर (Mark Juergensmeyer) एक अमेरिकी स्कालर हैं जो भारत में एक  अध्ययनात्मक दौरे पर आए थे और बाद में उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी - Religious Rebels in the Punjab - The Social Vision of Untouchables. हालांकि पंजाब में 'मेघ' एक छोटा समुदाय है लेकिन इस पुस्तक में उनका उल्लेख पर्याप्त रूप से किया गया है. इस पुस्तक को अजंता प्रकाशन, दिल्ली ने 1988 में छापा था. योरगन्समायर Theology (धर्मशास्त्र, ईश्वर मीमांसा) के विशेष जानकार हैं.

उक्त पुस्तक के पृष्ठ 27 पर इस बात का उल्लेख किया गया है कि शुद्धिकरण (जो एक विकसित और कार्यकुशल प्रक्रिया थी) के ज़रिए इस्लाम और ईसाइयत के दायरे में चले गए निम्न जातियों के लोगों को हिंदू स्वीकार्यता में लौटाना था. यह कार्य 1919 में किया गया था. वर्ष 1910 तक सियालकोट क्षेत्र के 36000 से अधिक लोग, जो अनुसूचित जातियों में तुलनात्मक नज़रिए से ऊंचा स्टेटस रखते थे, वे आर्यसमाजी हो गए थे. जाहिर है कि उस समय के युवा मेघ आर्यसमाज और उससे संबंधित संस्थाओं के संपर्क में आए और उनसे जुड़ गए. उन संस्थाओं में आर्यसमाज स्कूल और डीएवी कॉलेज शामिल थे. इस व्यवस्था ने शिक्षित अनुसूचित जातियों के युवाओं को एक नया रूप-रंग दिया. इसके पीछे यह भी मंशा रही कि वे आर्य समाज के  हक में खड़े रहेंगे. यह प्रक्रिया भी इतनी आसान नहीं थी क्योंकि जब शुद्धीकरण के नाम पर कुछ निम्न जाति के सिखों के केश सार्वजनिक रूप से काटे गए तो सिखों में ऐसे शुद्धीकरण के प्रति वितृष्णा जाग गई. 

पृष्ठ 214 पर उल्लेख है कि महाशों को भी वे आर्य समाज में लाने में सफल हुए. उन महाशों में से कईयों ने दावा किया कि वे इससे पहले मेघ ही थे जो अछूत जातियों में चमारों और अन्य के मुकाबले कुछ ऊंचा स्टेटस रखते थे.

इस पुस्तक के पृष्ठ 225 पर 1947 के भारत विभाजन के बारे में मार्क ने बहुत ही बढ़िया और सटीक टिप्पणी दी है जिसमें वे लिखते हैं - “चमार समुदाय के अतिरिक्त स्टेटस में तनिक ऊंची कुछ अन्य जातियों को भी अपने घर-बार छोड़कर खींची गई सीमारेखा के पूर्व में आना ज़रूरी लगा. जो कोई पाकिस्तान के पंजाब वाले इलाके में रहते थे उनकी पहचान हिंदुइज्म या सिखइज़्म के साथ इस तरह जुड़ी थी कि उन्हें भी पूर्व में आना पड़ा और इसके उलट जुलाहों और मोचियों को भारतीय पंजाब से उल्टी दिशा (पाकिस्तान) में जाना पड़ा.  उदाहरण के लिए अल्लाहपिंड गांव जोकि विभाजन रेखा के ज़रा पूर्व में था वहां कोई मुस्लिम नहीं रहता है. हालांकि सच्चाई यह है कि उनके पास ज़मीन थी और गांव का नाम ही 'अल्लाहपिंड' यानी 'अल्लाह का गांव' था. उनकी जगह पश्चिमी पंजाब के जाट सिख और निम्न जातियों के मेघ आ गए जो हिंदुओं में ‘कन्वर्ट’ बन गए थे.” 

(इस पैराग्राफ में हिंदू होने, हिंदू ना होने या हिंदू शब्द की अबूझ व्याख्या के साथ-साथ उसके संदर्भगत अर्थ से निकली बेघर होने की मर्मांतक पीड़ा छुपी हुई है. शुद्धिकृत लोगों के लिए ‘कन्वर्ट’ शब्द का प्रयोग एक अलग तरह का दर्द देता है.)

पृष्ठ 266 पर ‘दलित संघर्ष समिति’ की पृष्ठभूमि के साथ मार्क ने समिति के अधिकारियों और प्रायोजकों की लंबी सूची में जालंधर की उन तीन जातियों (मेघ, चमार, चुहड़ा) का मुख्य रूप से उल्लेख किया है जो इस समिति में थे. इसी संदर्भ में उन्होंने कुछ व्यक्तियों के नाम भी प्रधानता के साथ लिखे हैं जिनमें श्री सतपाल महे जिनका आदधर्म के साथ पारिवारिक संबंध रहा. उनके संबंधियों में श्री सुंदर दास रहे. उनके एक कज़िन मनोहर लाल महे का भी नाम विशेष रूप से लिया गया है जो बूटा मंडी के रहने वाले थे. (मेघ समुदाय के कौन-कौन से प्रतिष्ठित व्यक्ति इस समिति में रहे उनके नामों की जानकारी की दरकार है. क्या यह समिति आज भी सक्रिय है. उनके सक्रिय समुदायों में कौन-कौन से समुदाय हैं?)

पृष्ठ 225 पर उठाए गए महीन सवाल का जवाब पृष्ठ 298 पर खुलकर सामने आ गया है. वहां लिखा गया है कि आर्यसमाज ने कई संगठन स्थापित किए जो उपदेशात्मक कार्य करते थे और उन्होंने कई समितियां बनाईं और रीकन्वर्शन (शुद्धि) का सारा आंदोलन शुरू किया. उन्होंने अछूतों का अभिलोपन (obliterate) करने के लिए सब कुछ किया. उन्होंने यह कहकर कि छुआछूत समाप्त हो चुकी है और कोई भेदभाव नहीं है, हजारों अछूतों को लुभा कर शुद्धीकरण के जाल में फंसा लिया. बेचारा अछूत फिर से हिंदू आर्यों के द्वारा फांस लिया गया जैसे कोई हाथी के दांतों में उलझ जाता है. वास्तविकता यही थी कि हिंदू आर्य अभी भी मनु के अनुयाई थे जिसमें बहुत भेदभाव था. अछूत जान गए थे कि हिंदू आर्यों ने उन्हें अपने जाल में फंसा लिया है इसलिए वो अब अपने संगठन बनाना चाहते थे. उन्होंने खुद अपने कल्याण के लिए रुचि लेना शुरू किया. वे ऊंची जाति के हिंदुओं का विश्वास नहीं करते थे. संगठन खड़े किए गए, समितियां बनाई गई और उन्होंने अपने गुरुओं का चुनाव भी कर लिया.

सन 1925 के शुरू में एक समिति बनाई गई थी जिसका नाम रखा गया था ‘आदधर्म’. ऋषि वाल्मीकि, रविदास, कबीर और नामदेव के नामों के तहत इसकी स्थापना की गई. पहली बैठक मंगू राम मुग्गोवालिया की अध्यक्षता में 11 से 12 जून 1926 को गांव मुग्गोवाल, थाना माहलपुर, तहसील गढ़शंकर, जिला होशियारपुर में की गई. इसमें सभी अछूत जातियों के लोगों ने हिस्सा लिया चुहड़ा, चमार, रविदासी, सांसी, जुलाहा, मेघ, कबीरपंथी, महाशा और कई अन्य जातियों के लोगों ने इसमें हिस्सा लिया. अछूतों के अलावा इसमें अन्य सम्मानित लोगों ने भी हिस्सा लिया उनमें ईसाई, सिख, मुस्लिम, आर्यसमाजी और सनातनी भी थे. इस समिति का विरोध भी हुआ. लेकिन समिति को चलाए  रखने के पक्ष में ज़रदस्त समर्थन मिला और वो सशक्त होती चली गई. इसका मुख्यालय जालंधर में बनाया गया और इसका पूरा नाम रखा गया ‘आदधर्म मंडल ऑफ पंजाब, जालंधर सिटी’. (इस आदधर्म आंदोलन के साथ एडवोकेट हंसराज भगत जुड़े थे इसका उल्लेख हमें मिल जाता है. उनके अतिरिक्त और भी मेघ यदि इससे जुड़े थे तो उसकी जानकारी इकट्ठी की जानी चाहिए.)

‘दलित संघर्ष समिति’ के संदर्भ में कुछ बातें कहने लायक हैं. उक्त समिति का मुख्यालय जालंधर में ही रहा है जहां मेघों की बहुत बड़ी न सही लेकिन काफी संख्या है. अब यह बात देखने लायक है कि इस बीच मेघों और अन्य स्थानीय अनुसूचित जातियों जैसे रविदासी, रामदासी समाज में परस्पर संबंध बढ़े हैं यानि उनमें शादियाँ होती हैं. लेकिन मेघ समुदाय के कुछ लोग जब अपनी श्रेष्ठता की हाँकते हैं तो उसे अन्य समुदायों के साथ राजनीतिक संबंध न जोड़ने तक खींच कर ले जाते हैं.  यह घातक है क्योंकि पंजाब में मेघों की अपनी जनसंख्या बहुत कम है. वे अन्य समुदायों के साथ मिलकर ही अपनी राजनीतिक शक्ति का गठन कर सकते हैं. जालंधर में देखा गया है कि मेघ समुदाय के कुछ लोग कांग्रेस से जुड़े हैं और वे रविदासी या रामदासी समुदाय के नेताओं के साथ सहयोग करते हैं. मेरा मानना है कि यह सही रास्ता है और आगे चलकर इसी से सकारात्मक नतीजे निकलेंगे. जरूरी नहीं कि राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ही रहे. पार्टी बदल भी जाए तब भी ऐसे साथ को और गठबंधन को निभाना हितकारी है.

अंत में एक महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूं कि मुझे 'रिलिजियस रिबेल्स Religious Rebels'  या 'धार्मिक विद्रोही' शब्द सही नहीं लगता. एक समय था जब राजाओं, महाराजाओं या सामंतों की व्यवस्था के प्रति विरोध करने वाले को विद्रोही या द्रोही कह दिया जाता था. अब वो समय नहीं है. अब हम लोकतंत्र में जी रहे हैं जहां बहुमत ही व्यवस्था का नियामक होता है. व्यवहारिक रूप से भले ही आज अनुसूचित जातियों, जनजातियों और ओबीसी उस व्यवस्था का नियमन (रेग्युलेशन) ना कर पाते हों लेकिन बँटे होने के बावजूद उनकी सभ्यातामूलक जीवन शैली एक है और अनेक अवसरों पर वे आपस में जुड़ा महसूस करते हैं. उक्त जीवन शैली वाले लोग जब बहुसंख्यक हैं और धर्म के प्रति उनकी अवधारणाएँ लगभग एक समान हैं तो उन्हें किसी अन्य धर्म के प्रति 'विद्रोही' कैसे कहा जा सकता है.

कुछ हिंदी साहित्यकारों ने कबीर को विद्रोही व्यक्तित्व कहा था. उनकी ही विचारधारा के लोग कबीर को छिपा हुआ बौध भी कह गए क्योंकि कबीर का संबंध सिद्ध और नाथपंथी साधुओं से रहा जो बौधमत की परंपरा से ही निकली धाराएँ थीं. कबीर को ध्यान से पढ़ें तो वे तर्कवादी (Rationalist) ठहरते हैं. तर्क करने वाले को ढीली भाषा में नास्तिक कह दिया जाता है. अब 'तर्क' करने का अर्थ 'विद्रोह' भी किया जाए तो उसे स्वीकार कैसे किया जा सकता है? आदधर्म कोई विद्रोह नहीं है बल्कि यह बहुजनों का अपने मूल के प्रति अपनी व्यापक आस्था को बेहतर तरीके से संगठित करने का प्रयास था. विद्रोही तो वो समूह थे जो आदधर्म आंदोलन का विरोध कर रहे थे. 

4 comments:

  1. समाज सुधारकों को हर समय में विद्रोही कहा गया है ... कबीर भी अछूते कहाँ हैं ...
    अच्छा आलेख है ...

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपने सही कहा. शुक्रिया आपका.

      Delete
  2. Good information on historical movement for identity.

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद. आपका आभार.

      Delete