10 May 2011

Why your name should have Megh with it - अपने नाम के साथ मेघ क्यों लिखा जाए

यह सवाल कई रूप बदल कर मेघ जाति के सामने आता रहा है. अभी हाल ही में एक से अधिक एसएमएस संदेश आए कि आगामी जनगणना में सभी मेघ अपने आपको कबीरपंथीआर्य आदि न लिखवा कर मेघ लिखवाएँ. इसी बात को लेकर काफी चर्चा हुई. ग़रीब जातियों में यह समस्या आती है कि वे स्वयं को विस्तृत समाज से जोड़ने के लिए ऐसे धार्मिकसामाजिक या राजनीतिक समूहों के साथ जुड़ना चाहते हैं जहाँ उन्हें पहचान मिल सके. हमारा विभिन्न धर्मोंपंथों और राजनीतिक दलों में बँटा होना इस बात को दिखाता है कि हम अपनी पहचान खोज रहे हैं. यह समस्या केवल मेघों की नहीं बल्कि सभी ग़रीब मानव समूहों की है.  इनके सदस्य लाभ के लिए अपने जातिगत नाम और धर्म बदल कर अन्य समूहों में समा जाते हैं. यह बात मान लेनी चाहिए कि मेघों का इतिहास उपलब्ध नहीं है. कभी रहा होगा परंतु उसे या तो नष्ट कर दिया गया है या भ्रष्ट कर दिया गया है. पुरानी कथाओं से हम कुछ काम चला सकते हैं परंतु उन पर भरोसा नहीं कर सकते. अपने जड़-मूल के संबंध में हम इतना ही विश्वास से कह सकते हैं कि हम मेघ हैं और दूसरे यह कि हम मेघ ऋषि की संतान हैं. इससे अधिक आप जानना चाहते हैं तो इतिहास कोई मदद नहीं करता. ऐसी हालत में अपने वर्तमान पर ध्यान दे कर उसे सुधारना बेहतर है. इतिहास अपने आप बन जाएगा. हम आर्य समाजी बने यह बहुत पुरानी बात नहीं है. शुद्धिकरण जैसी की प्रक्रिया से गुज़र कर हम हिंदू कहलाए. सनातनी भी बने. बाबा चरण सिंह जी के समय राधास्वामी मत में गए. वहाँ बाबा जी की उदारवादी विचारधारा को ब्यास नदी में डुबोने वाले बहुत लोग थे. मेघों और अन्य ग़रीब जातियों को निराशा हाथ लगी. हम कबीरपंथ में भी अपनी पहचान बनाते हैं. ज़रूरतन हम ऐसे धर्मगुरुडेरेसमूह आदि के साथ जुड़ जाना चाहते हैं जो हमें समतावादी समाज का सपना दिखाता हो. क्या हमारी वास्तविक पहचान उस चीज़ में नहीं है जो हम परमेश्वर से अपने लिए माँगते हैंराजनीतिक रूप से हम पहले काँग्रेसी कहलाए. फिर बीजेपी में स्वयं को ढूँढा. अब बीएसपी में भी हम अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं. हम बँट गए. हमारी प्रार्थनाएँ बंट गईं. जो चीज़ अभी तक नहीं बँटी है वह यही है कि हम मेघ हैं और मेघ ऋषि की संतान हैं. यदि हम मेघ के रूप में अपनी पहचान को मज़बूत करते हैं तो हमारी एकता को दिशा मिलती है. सामूहिक प्रयासों को शक्ति मिलती है. संभव है कि इस वर्ष हो रही जनगणना में जातियों के आधार पर भी गिनती की जाए. इससे मेघों की सही संख्या और उनके वोटों की सही संख्या का पता लग सकेगा. जानकारी बताती है कि भारत में मेघ जाति के लोग कश्मीर से कर्नाटका और महाराष्ट्र से पूर्वोत्तर तक बिखरे हुए हैं. बिहार और ओड़िशा में भी वे बसे हैं. हिमाचलपंजाबउत्तर प्रदेशहरियाणामध्यप्रदेशछत्तीसगढ़ में भी उनकी उपस्थिति है. लगभग 28 लाख की संख्या आँकी गई है. जोशुआ प्रोजेक्ट की रिपोर्ट यही दर्शाती है हालाँकि यह बहुत पुरानी है. इससे मेघों की सही संख्या का पता नहीं चलता जो वास्तव में बहुत अधिक है. सरकारी प्रयासों और बदलती सामाजिक सोच के कारण अब जातिगत पूर्वाग्रह ढीले पड़े हैं. ऐसे में किसी प्रकार के दुराग्रह से बचना होगा. परंतु जिस प्रकार अन्य जातियों ने अपनी पहचान बनाई है उस रास्ते को अपनाने में भलाई है. अपनी जनशक्ति को जानेअपने समूह के प्रति आशावान रहेंसार्वजनिक मंचों से अपनी एकता का डंका बजाएँपढ़ें-पढ़ाएँबिरादरी का विश्वसनीय साहित्य और आंकड़ा कोष (data base) तैयार करेंव्यापारी समूह अपना परस्पर-सहायता कोष तैयार करेधार्मिक और सामाजिक दिखावे के कामों पर ख़र्च न करके सामाजिक सुरक्षा और सहायता के नए तौर-तरीकों पर ख़र्च करें. मेघ जाति की आंतरिक समस्याओँ के निदान के लिए एनजीओ बनाएँ. एक-दूसरे का बहिष्कार करने की प्रवृत्ति को दूर करके भाईचारे को बढ़ावा दें. इससे मेघ महिलाओं के भी कष्ट दूर होंगे. सक्रियगतिशील और परिणाम उन्मुख नेतृत्व की कमी है. उसके लिए सभी मिल कर मालिक से प्रार्थना करें. हम सच्चे मेघ हैं. मेघ बन कर रहें. अपनी और संपूर्ण जाति की निरंतर संपन्नता के लिए प्रार्थना करें.

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