17 May 2011

Baba Faqir Chand and The Secret-1


Two years ago I had read Rhonda Byrne’s book 'The Secret'. I liked it very much. It described mystery of power of thought in great detail. Wikipedia showed that in the background of the book, there was literature of William Walker Atkinson, a lawyer. Atkinson was influenced by an Indian yogi. Two names emerged there, a yogi Ramachakar and another Bharat. In article it was written that the two individuals had no record in the United States. Well!! He must have known the mystery from somebody. This secret can be lost but cannot be unknown to humanity.

Few days ago I was working on Baba Faqir Chand's book ‘Sachchai’ (The Truth) that I again came across the same 'secret' and that too in a very simple form. Atkinson had not learnt the first part of the mystery and had much troubled life. I am dedicating this 'secret' in two installments through Baba Faqir Chand.

The Secret -1
Body Life – It is sense (Sensation) of the body. This awareness substance of life will be according to the material which made the body. Climate and food the parents had during the pregnancy and the food he takes during life play a big role in physical senses. Physical sufferings which people have are due to irregular and adverse food habits i.e. light, air, water and vegetables etc. Such individuals cannot attain any peace or happiness by Naam only as they live in bodies developed through irregular and adverse food. Therefore, the right way to get rid of all the physical suffering is that they should live in such way that leads to healthy life. This understanding or knowledge and its practice are part of "Naam". The main rules are that: –

1. Take less food – Do not eat for taste but eat to survive. Do not live to eat.
2. Protection of Life force (celibacy) – No individual should unnecessarily waste his life force which keeps the body healthy, disease free and in peaceful state.

Even if a person does repetition of holy name and goes to gurus and does inner practices as per their directions, his physical suffering will not go away until he protects his life force.

Ancient books of our great men and scriptures, in various forms, support the above statement.


*******

मैंने रॉण्डा बर्न (Rhonda Byrne)  की पुस्तक The Secret’ दो वर्ष पूर्व पढ़ी थी. बहुत अच्छी लगी. इसमें विचार शक्ति के रहस्य को काफी विस्तार से बताया गया है. विकिपीडिया से पता चला कि इस पुस्तक की पृष्ठभूमि में विलियम वॉकर एटकिन्सन (William Walker Atkinson) नामक वकील का लिखा साहित्य था. एटकिन्सन किसी भारतीय योगी से प्रभावित था. वहाँ दो नाम उभर कर आए हैं, एक बाबा भारत और दूसरा योगी रामचाकर. आलेख में लिखा है कि इन दोनों व्यक्तियों के अमेरिका में होने का कोई रिकार्ड नहीं मिला. चलो सही. किसी से तो उन्होंने इस रहस्य को जाना होगा. मानवता के लिए यह रहस्य कभी खोया हुआ हो सकता है परंतु अनजाना नहीं है. 

पिछले दिनों बाबा फकीर चंद की पुस्तक सच्चाई पर कार्य कर रहा था तो वही रहस्य फिर सामने आया और बहुत ही सरल रूप में. पढ़ कर लगा कि एटकिन्सन ने इस रहस्य के प्रथम भाग को नहीं सीखा था और बहुत कष्ट उठाया. ये रहस्य बाबा फकीर चंद के माध्यम से दो किस्तों में समर्पित कर रहा हूँ.

रहस्य-1

"शारीरिक जीवन - यह देह का बोध (Sensation) है. जीवन का यह बोध भौतिक पदार्थ, जिससे यह देह बना है, के अनुसार होगा. जलवायु और खाद्य पदार्थ जो माँ-बाप ने गर्भ के समय खाये हों तथा वह पदार्थ, जिनको खाकर वह जीवन व्यतीत करता है, शारीरिक बोध में बहुत बड़ा कार्य करते हैं. देह के कष्ट, जिनसे लोग दुखी हैं, अनियमितता और प्रतिकूल भोजन अर्थात् प्रकाश, वायु, जल और साग-सब्जी आदि के कारण से हैं, केवल नाम, ऐसे व्यक्ति को, जो अनियमितता और प्रतिकूल भोजन से विकसित देह में रहता है, किसी प्रकार शान्ति अथवा सुख चैन नहीं दे सकता. अतः समस्त शारीरिक कष्टों से छुटकारा पाने या उनको दूर करने का सच्चा मार्ग यह है कि ऐसे ढंग से जीवन व्यतीत करे कि जिससे उसका जीवन स्वस्थ रह सके. यह समझ या ज्ञान तथा इसका अभ्यास नाम का एक अंग है. इसके लिए मुख्य नियम ये हैं-

(अ) कम खाना - स्वाद के लिए न खाओ किन्तु जीवित रहने के लिए खाओ. खाने के लिए मत जीओ.
(ब) जीवन शक्ति (ब्रह्मचर्य) की रक्षा - किसी व्यक्ति को अपनी जीवन शक्ति को जो शरीर को स्वस्थ, नीरोग और शांतमय अवस्था में रखती है, व्यर्थ नष्ट नहीं करना चाहिए.

कोई व्यक्ति चाहे नामका सुमिरन करे अथवा गुरुओं के पास जाय और उनके आदेशानुसार अभ्यास करे किन्तु जब तक वह अपनी जीवन शक्ति की रक्षा नहीं करेगा, उसके शारीरिक कष्ट दूर नहीं होंगे.

प्राचीन काल के महापुरुषों की रचनाएँ व हमारे ग्रंथ विभिन्न रूपों में उपरोक्त कथन का समर्थन करते हैं."


नोट- (पुस्तक सच्चाई प्रथमतः 1948 में अंग्रेज़ी में छपी फिर उसका उर्दू अनुवाद 1955 में छपा. हिंदी अनुवाद का प्रकाशन अलीगढ़ की शिव पत्रिका ने 1957-58 में किया.)

MEGHnet

19 comments:

  1. आदरणीय भूषण जी
    प्रणाम !

    बाबा फकीर चंद के नाम से अवश्य परिचित था…
    लेकिन आपने यहां जो जानकारी जुटाई है , बहुत उपयोगी है ।

    कोई व्यक्ति चाहे ‘नाम’ का सुमिरन करे अथवा गुरुओं के पास जाय और उनके आदेशानुसार अभ्यास करे किन्तु जब तक वह अपनी जीवन शक्ति की रक्षा नहीं करेगा, उसके शारीरिक कष्ट दूर नहीं होंगे.

    'अभ्यास'का अभ्यास करने का प्रयास करेंगे … :)


    पिछली पोस्ट भी पढ़ कर गया था … योगिनी माता पर लिखा आलेख मेरे लिए बिल्कुल नई जानकारी थी। उसके लिए भी आभार!

    समाज और जीवन के लिए उपयोगी आलेखों के लिए आपके प्रति आभार सहित हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  2. नाम का अभ्यास हुक्म की पाबंदी के साथ करना अनिवार्य है
    आदरणीय भूषण जी ! मैं बाबा फ़क़ीरचंद जी को नहीं जानता लेकिन उनकी कुछ बातें सही हैं कि शारीरिक कष्टों के पीछे इंसान का ग़लत खान-पान और ग़लत रहन-सहन है। ये कष्ट केवल ‘नाम‘ के अभ्यास से दूर नहीं हो सकते।
    मैं यह कहना चाहूंगा कि इन आधिभौतिक कष्टों के अलावा हमारी इन्हीं ग़लतियों के कारण आध्यात्मिक और आधिदैविक कष्ट भी मानव जाति पर और स्वयं हम पर सामूहिक रूप से और व्यक्तिगत रूप से आते रहते हैं , ये कष्ट भी ‘नाम‘ के अभ्यास से दूर नहीं हो सकते।
    कष्ट के यही तीन प्रकार हैं और यही तीनों ‘नाम‘ के अभ्यास से दूर नहीं होते तो फिर ‘नाम‘ के अभ्यास से दूर कौन से कष्ट होते हैं ?
    यह विचारणीय है।
    दरअस्ल बात यह है कि नाम को जब भी पैग़ाम और अहकाम (आदेश) से काटा जाएगा तो वह धर्म के बजाय एक दर्शन बन जाएगा और फिर एक के बाद एक बहुत से दर्शन बनते चले जाएंगे। एक दर्शन जिस बात को वर्जित बताएगा, दूसरा दर्शन उसी में मुक्ति बताएगा। भारत में अर्से से यह खेल चल रहा है और आज भी जारी है।
    ईश्वर का नाम उसके बताए तरीक़े से लीजिए और उसके हुक्म पर चलिए और ऐसा हमें सामूहिक रूप से करना होगा। समाज का कष्ट अपने न्यूनतम स्तर तक पहुंच जाएगा।
    यह तय है।
    अब हम आपको कुछ ‘नाम‘ के अभ्यास के बारे में बताते हैं।
    ईश्वर का कोई भी नाम आप ले लीजिए।
    चाहे आप ‘ऊँ‘ का जाप करें या फिर ‘अल्लाह-अल्लाह‘ का।
    आप एक समय नियत कर लीजिए और मन ही मन ‘नाम‘ का जाप कीजिए आधा घंटा या एक घंटा। इसके बाद जब आप दैनिक कार्य करें तब भी आप अपनी तवज्जो अपने मानसिक जाप की ओर बनाए रखें। महीने भर के बाद ही आपकी यह स्थिति हो जाएगी कि यह ‘नाम‘ अब आपकी कोशिश के बिना भी आपके दिल में ख़ुद-ब-ख़ुद चलता रहेगा।
    इसे हमारे सूफ़ी सिलसिलों में ‘क़ल्ब का जारी होना‘ कहते हैं। जब साधक की स्थिति यह हो जाती है तो चाहे वह हंस रहा हो या फिर रो रहा हो या लोगों से बातें कर रहा हो, उसका ‘ज़िक्र‘ अखंड रूप से उसके दिल में चलता रहता है, जिसे वह ख़ुद सुनता रहता है। मेरे एक पीरभाई हैं जब वे ज़िक्र करते हैं तो उनके दिल की आवाज़ को हॉल में मौजूद में दूसरे लोग भी सुनते हैं। आप चाहें तो आप भी सुन सकते हैं।
    यह मक़ाम हमारे नक्शबंदी सिलसिले में पीर की तवज्जो की बरकत से बहुत जल्द हासिल हो जाता है।
    फिर साधक अपने सीने में मौजूद चार और लतीफ़ों से ज़िक्र करता है और उसके बाद वह अपने दिमाग़ के बीच में मौजूद ‘लतीफ़े‘ पर ध्यान केंद्रित करके ‘नाम‘ का अभ्यास करता है और तब बहुत जल्द उसके तमाम बदन से ‘ज़िक्र‘ जारी हो जाता है। उसके बदन का एक-एक रोआं और उसके ख़ून का एक एक अणु ‘अल्लाह-अल्लाह‘ कहता है जिसे नाम लेने वाला साधक ख़ुद सुनता है। इस मंज़िल तक कामिल पीर अपने मुरीद को तीन-चार माह में ही ले आता है। इसके बाद अगली मंज़िलें शुरू हो जाती हैं।
    इस अभ्यास के साथ अल्लाह के हुक्म की पाबंदी अनिवार्य है। वह है तो यह भी सफल है और अगर वह नहीं है तो यह सिर्फ़ एक तमाशा है। इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। अस्ल चीज़ है ‘मालिक की रज़ा‘। मालिक राज़ी है तो हर चीज़ सार्थक है और अगर वह नाराज़ है तो फिर हरेक सिद्धि निरर्थक है।
    मुस्लिम सूफ़ी और ग़ैर-मुस्लिम साधकों में अभ्यास और सिद्धि का अंतर नहीं है। उनके दरम्यान मूल अंतर यही है कि ग़ैर-मुस्लिम साधक धर्म के बजाय दर्शन का अनुसरण कर रहे हैं क्योंकि उनके पास ईश्वर की वाणी अब है नहीं जबकि मुस्लिम सूफ़ी सिलसिलों के संस्थापकों ने ‘ईशवाणी‘ की पाबंदी ख़ुद भी की और अपने मुरीदों को भी करना सिखाया।
    जैसे ईश्वर का स्थान कोई मनुष्य नहीं ले सकता वैसे ही ईश्वर के विचार और उसके बनाए नियम की जगह इंसान का कोई विचार या उसका बनाया कोई नियम नहीं ले सकता। धर्म के अधीन हो तो दर्शन और विज्ञान हर चीज़ नफ़ा देगी लेकिन अगर ईश्वरीय व्यवस्था को छोड़कर उन्हें ग्रहण किया जाएगा तो कभी कल्याण होने वाला नहीं है।
    दुख के नाश के लिए ईश्वर का केवल ‘नाम‘ लेना ही काफ़ी नहीं है बल्कि अपने मन-बुद्धि और आत्मा हरेक स्तर पर उसके प्रति पूर्ण समर्पण करते हुए उसकी शरण में जाना ज़रूरी है, उसकी भेजी हुई वाणी के आलोक में उसके आदेश का पालन ठीक वैसे ही करना ज़रूरी है जैसे कि उसके ऋषि और पैग़म्बरों ने करके दिखाया है।

    http://ruhani-amaliyat.blogspot.com/

    ReplyDelete
  3. जी हाँ सङी फरमाया आपने!
    नाम का अभ्यास हुक्म की पाबंदी के साथ करना अनिवार्य है!

    ReplyDelete
  4. कोई व्यक्ति चाहे ‘नाम’ का सुमिरन करे अथवा गुरुओं के पास जाय और उनके आदेशानुसार अभ्यास करे किन्तु जब तक वह अपनी जीवन शक्ति की रक्षा नहीं करेगा, उसके शारीरिक कष्ट दूर नहीं होंगे.

    ...jeewan yahee sachchaai hai!..bahut hi upayukt aalekh...dhanyawaad!

    ReplyDelete
  5. @कोई व्यक्ति चाहे ‘नाम‘ का सुमिरन करे अथवा गुरुओं के पास जाय और उनके आदेशानुसार अभ्यास करे किन्तु जब तक वह अपनी जीवन शक्ति की रक्षा नहीं करेगा, उसके शारीरिक कष्ट दूर नहीं होंगे।
    बाबा फकीर चंद के विचारों का हमारे आर्षग्रंथ समर्थन करते हैं।
    अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह भारतीय दर्शन के मूलभूत विषय वस्तु हैं।

    ReplyDelete
  6. आदरणीय भूषण जी,
    सादर अभिवादन
    श्री बाबा फकीर चंदजी की जो जानकारी कराने इस हेतु आपका आभार और आपको बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएँ!

    ReplyDelete
  7. ek dum sahi baat kahi hai aap ne apni es post ke through,sir khaas kar main aap ki es baat se poornth shmt hoon ki प्राचीन काल के महापुरुषों की रचनाएँ व हमारे ग्रंथ विभिन्न रूपों में उपरोक्त कथन का समर्थन करते हैं...आभार

    ReplyDelete
  8. all is absolutely right what all of you have written. a more enjoyment can be possible if disciple is only translated as duty

    ReplyDelete
  9. भूषण जी ,
    आपका लिखने का ढंग अनोखा है और विषय भी हर बार नया होता है ! आपके लेख नई जानकारी से ओतप्रोत होते हैं !
    बहुत अच्छी शिक्षा आज मिली ...जीने के लिए खाओ न कि खाने के लिए जिओ !

    ReplyDelete
  10. आदरणीय भूषण जी
    प्रणाम !
    ...बाबा फकीर चंदजी की जो जानकारी कराने इस हेतु आपका आभार

    ReplyDelete
  11. @ Dr. Aruna Kapoor ji se sehmat hoon
    कोई व्यक्ति चाहे ‘नाम’ का सुमिरन करे अथवा गुरुओं के पास जाय और उनके आदेशानुसार अभ्यास करे किन्तु जब तक वह अपनी जीवन शक्ति की रक्षा नहीं करेगा, उसके शारीरिक कष्ट दूर नहीं होंगे.

    ...jeewan yahee sachchaai hai!..bahut hi upayukt aalekh...dhanyawaad!

    ReplyDelete
  12. बाबा फकीर चंदजी के बारे में अच्छी जानकारी प्राप्त हुई! बहुत बढ़िया पोस्ट!

    ReplyDelete
  13. Dear Bhusanji , i like Baba fakir chand"s philosophy for secret of Life,good post on purification of body and mind,Perception is important for purified body and mind,purity and impurity depend on oneself, by one self. indeed.is evil done,by oneself is evil left undone,by oneself,indeed,is one purified.No one purified other.

    Nitin...Jamnagar..........
    Nitin......Jamnagar.....

    ReplyDelete
  14. Beautiful post Bhushan ji , Nice to know about Baba Fakir Chand . We have a lot to learn from him.

    ReplyDelete
  15. बाबा फकीर चंदजी के जीवन मर्म की जानकारी बेहद अनुकरणीय है. आभार.

    ReplyDelete
  16. आदरणीय भूषणजी,

    जय मेघ - जय भारत,

    काफी दिनों से आपसे कोई वार्तालाप नहीं हुई है. मुझे क्षमा करे कुछ समय से मैं अति व्यस्त हूँ. आशा करता हूँ आपकी तबियत ठीक होगी. सीक्रेट शीर्षक की पोस्ट पड़कर अच्छा महसूस किया. बाबा फकीरचंद का 'रहस्य' हमारी (भारत की) पुरातन जीवनशैली और नैतिक मुल्योको प्रकट करती है. आपके ब्लॉग अपडेट करने के नित्य क्रम को वंदन करता हूँ. रविवार को आपको फ़ोन करूँगा. धन्यवाद.

    ReplyDelete
  17. बेहतरीन जानकारी आपके ब्लाग से,

    ReplyDelete
  18. Dear Bhushanji...Dhammachar.....
    Good informative post on Baba Fakir chand i like this post.
    Please visit our website for new post on prediction of the Mamaidev on end of world and end of Kaliyuga and Annihilation of caste system in India....http//www.vinzoda.weebly.com
    Nitin.......Jamnagar.

    ReplyDelete
  19. स्वतंत्र इकाई होने के कारण हम अपने हर-एक विचलन के उत्तरदायी स्वयं होते हैं इसलिए सजगता का इतना महत्व है ..इससे किसी भी कष्ट से रहत जरुर मिलती है ..फिर भोग का भी अपना महत्त्व है जो भोगा कर ही छोड़ता है ..इससे बचा नहीं जा सकता है ..

    ReplyDelete