28 May 2011

Peacock and my wild imagination - मोर का सच और मेरी जंगली कल्पना

After retirement many memories return to us which we would not have consciously remembered otherwise. Few days back, same sort of memory regarding peacock, our national bird, occurred to me, a memory I want to share.

In 1965, we lived in Sirsa in Haryana State. Our residence was located in the office of Public Works Department which was in front of Bansal Theatre and had a very large courtyard. My father worked as Sub Divisional Engineer there. There was a Church at the rear of the office building containing big number of trees and many peacocks.

The same year there was Indo-Pak war. In accordance with guidance received from news papers, we had dug trenches in the courtyard and moved in there whenever there was sound of sirens. One day we heard big blasts. Next day there was news regarding bombing In Kutte Vadd village, 14 kilometers away from Sirsa, where two buffaloes reportedly died.

Families of other staff stationed there had a unique experience of peacock making sound much before the sirens did. One day my father woke up after hearing the sound of peacocks and smilingly said, "Let us go in trenches." In fact we were all awake due to the sound of peacocks. Sirens sounded later.

The 'Nationalism' (instinct) of our national bird is noticeable. God forbid there should be war but we must study this unique feature of peacocks.

 Vigilant sentry सजग प्रहरी


रिटायर होने के बाद कई बार ऐसी बातें याद आती हैं जिन्हें अन्यथा हमने कभी मुड़ कर याद नहीं किया होगा. राष्ट्रीय पक्षी मोर की एक ऐसी स्मृति मैं आपसे साझा करना चाहता हूँ.

वर्ष 1965 में हम हरियाणा के सिरसा (तब एक कस्बा) में रहते थे. हमारा घर बंसल थिएटर के सामने पीडब्ल्यूडी के कार्यालय के बड़े से प्रांगण था. यहाँ पिता जी एस.डी.ई. थे. घर के पीछे चर्च था जहाँ खूब पेड़ थे और बहुत से मोर.

उसी वर्ष भारक-पाक युद्ध हुआ. समाचार-पत्रों में दिए मार्गदर्शन के अनुसार हमने प्रांगण में खाइयाँ (trenches) खोद लीं ताकि सायरन की आवाज़ आते ही उनमें शरण ली जाए. उन दिनों कई बार हमारे क्षेत्र में सायरन बजा और एक दिन तो बमों के फटने की भयंकर आवाज़ भी आई. अगले दिन पता चला कि सिरसा से लगभग 14 किलोमीटर दूर कुत्ते वड्ड गाँव में दो भैंसें उस बमबारी में मारी गईं.

हमारे वाले प्रांगण में रहने वालों ने विशेष बात यह नोटिस की कि मोरों की आवाज़ें सायरन से पहले ही शुरू हो जाती थीं. वहाँ तैनात अन्य स्टाफ़ के परिवारों का यही अनुभव था. एक दिन मोरों की आवाज़ सुन कर पिता जी ने नींद टूटने पर मुस्कराते हुए कहा, चलो भई ट्रेंच में. उससे पहले हम सभी की नींद मोरों की आवाज़ से टूट चुकी हुई थी. सायरन उसके बाद बजा.

हमारे राष्ट्रीय पक्षी की राष्ट्रीयता (instinct) ध्यान देने योग्य है. ईश्वर न करे कि कहीं युद्ध हो परंतु मोरों की इस विशेषता पर ग़ौर करना चाहिए.

 Radar dances in the woods जंगल में राडार नाचा किसने देखा 


   May be peacocks have very sensitive ear and crest शायद मोर के कान और कलगी अति संवेदनशील हैं






24 May 2011

In search of inner peace - इसे भी शांति की तलाश है


नेट पर 'आत्मिक शांति (spiritual peace)' तलाशने के दौरान यह मिल गया. सुखद आश्चर्य हुआ और परेशानी भी. परंतु इसकी शान में कुछ कहना चाहता हूँ.
हैलो डॉगी, ध्यान से देखने पर तुम किसी फोटोशॉपियन की दुम लगते हो और सीधे मेरुदंड के पीछे तुम्हारी अपनी दुम बाँकी प्रतीत होती है. तुम्हारे बैठने का स्थान उसी फोटोशॉपियन ने अपनी दुम से बुहारा लगता है.
तथापि हे स्वर्गातुर कुत्ते....! तुम त्याग-मार्ग पर गए तो कैसे चलेगा. घर की रौनक गई कि गई. बच्चों का टाइगर....लुप्त. मोहल्ले के परहरेदार निद्रा में और तुम समाधि में....तो हो गया समझो.
पाप की गठरी किस की भरी यह दुनिया जानती है. तुमने वैसा कुछ नहीं किया, बिलकुल नहीं किया......अहो निष्पाप! तुम्हें आदमी ने काटा है अथवा सताया है. अन्यथा इस मुद्रा में कोई नहीं बैठता. यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता......कुछ-कुछ वैसा.
ध्यानस्थ हो कर तुमने इस सनातन सूत्र को, जो मैंने लगनपूर्वक शर्मा सर की क्लास में पढ़ा था, तार-तार कर दिया-
काक चेष्टा बको ध्यानं श्वान निद्रा तथैवचः....
तुमने अपनी विशेषता बनाए रखी लेकिन बगुले की ध्यानधर्मिता को हाईजेक कर ले गए......तुम्हें रास्ते पर लाने के लिए 'शोले' वाले धर्मेंद्र सर ही कुछ कहें तो कहें....'कुत्ते'....'कमीने'.....
परंतु मैं उस फोटोशॉपियन को भूल नहीं पा रहा. हाथ आ जाए तो उसे भी 'शराबी' वाले अमिताभ बच्चन सर के हवाले करूँ ताकि वे उसे कह सकें कि 'कहाँ तुम शरीफ़ कुत्ते कहाँ वो योगमुद्रित आदमी....ढिश्शूँ....ढिश्शूँ....ढिश्शूँ....'

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22 May 2011

Doomsday - Prophecies of Saints - प्रलय - सन्तों की भविष्यवाणियाँ


Bhagat Munshi Ram
Here is gist of an article written by Bhagat Munshi Ram. It is regarding prophecies made by saints including Baba Faqir Chand.

In 1976 Baba Faqir Chand, in Vaisakhi discourses said that within 5-6 years world population would be reduced to 30-40 percent. That time has passed. The world population did not reduce in India or in the world. Why did he say so?
In Islam it is written that after thirteenth century Doomsday will come. But nothing happened. Lord Buddha had estimated life of Buddhism to be 500 years. Today, the number of followers of Buddhism in the world is higher.
The thought of reduction in world population keeps occurring to people doing inner practices, yogis, sages and saints. Such views come during dreams, inner practices or lower level Samadhi. In year 1966-67, my friend Yogiraj Rameshwar Giri had predicted the world ending up with one third of population remaining.
It rather reveals a mystery. At the time these great men experienced such visions their bodies were in the process of dying. Possibly that was the cause behind such visions. It is a popular saying- ‘It is dooms day when one dies himself’. When the last day falls on someone he thinks the whole world is going to end. It's natural.
Prof. Vashishth of Chandigarh asked Baba Faqir Chand what would happen to the world. His own body was about to end and he died. There could have been its effect on the brain of Baba Faqir.
While making such prophesies saints have good intentions and there is nothing against the world.”

Hope it explains the truth of prophecies as the world continues.
  
संतों की भविष्यवाणियों के बारे में भगत मुंशीराम जी के एक आलेख का सार नीचे दिया है. यह बाबा फकीर सहित अन्य संतों की भविष्यवाणियों के बारे में है.

सन् 1976 के वैसाखी सत्संगों में बाबा फकीर चंद ने कहा था कि 5-6 वर्ष में जनसंख्या 30-40 प्रतिशत रह जाएगी. वह समय गुज़र चुका है. दुनिया की जनसंख्या में कमी नहीं आई. न भारत में और न संसार में. उन्होंने ऐसा क्यों कहा.
इस्लाम धर्म में लिखा है कि तेरहवीं सदी के बाद कयामत आ जाएगी. मगर कयामत नहीं आई. महात्मा बुद्ध ने कहा था कि बौद्धधर्म 500 साल चलेगा. आज संसार में बौद्धधर्म मानने वाले लोग बहुत अधिक हैं.
विश्व की जनसंख्या कम हो जाने के विचार अभ्यासियों, योगियों, साधुओं और सन्तों को आते रहते हैं. स्वप्न में, अभ्यास में या नीचे की समाधियों में ऐसे दृश्य आते हैं. वर्ष 1966-67 में मेरे मित्र योगीराज रामेश्वर गिरी ने कहा था कि संसार की आबादी एक तिहाई रह जायेगी.
इससे एक गहरा रहस्य समझ आता है. इन महापुरुषों ने जब ये दृश्य देखे तो इनके शरीर छूटने वाले थे. संभव है ये दृश्य इसी कारण से हों. कहा भी गया है कि आप मरे जग परलो. जब किसी के अंतिम दिन आते हैं तो वह समझता है कि सारी दुनिया मर गई. यह स्वाभाविक बात है.
चंडीगढ़ के प्रोफैसर वसिष्ठ ने परम दयाल जी से पूछा था कि महाराज दुनिया का क्या होगा. उनका अपना शरीर समाप्त होने को था और वह चला गया. हो सकता है इसका प्रभाव परम दयाल जी के मस्तिष्क पर रहा हो.
जब संत ऐसी भविष्यवाणी करते हैं तो उनकी भावना शुभ होती है. वे संसार के अहित में कोई विचार नहीं रखते.

इससे भविष्यवाणियों की सच्चाई स्पष्ट हो जानी चाहिए क्योंकि दुनिया चल रही है.

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20 May 2011

Baba Faqir Chand and The Secret-2

Baba Faqir Chand
 

(The previous post contained the secret and the importance of physical vitality. Rhonda Byrne’s book 'The Secret' did not give it a special importance. This post opens the mystery of mental power which was main point of Ronda Byrne’s book. The explanation of texture of thought and resolution by Baba Faqir is a shining example of his maturity regarding his internal analysis, which I'm convinced of).

(पिछली पोस्ट में शारीरिक जीवन शक्ति का महत्व और उसका रहस्य था. इसे रॉण्डा बर्न (Rhonda Byrne) की पुस्तक ‘The Secret’ में कोई विशेष महत्व नहीं दिया गया. इस पोस्ट में मानसिक जीवन शक्ति के रहस्य का उद्घाटन है जिसे रॉण्डा बर्न ने अपनी पुस्तक का मुख्य बिंदु रखा है. विचार और संकल्प की जो बनावट बाबा फकीर ने बताई है वह उनके आंतरिक विश्लेषण की परिपक्वता का ज्वलंत उदाहरण है जिसका मैं कायल हूँ.)


The Secret-2

Mental life - The resolution originates formation of the matter. Mind is made up of the same elements that made the body. The only difference is that body is made of gross matter and the mind is made of subtle matter. The way tasty food destroys physical health, same way the mental health is lost if there is concentration on romantic ideas, which are sexually explicit or meaningless gossip. To maintain the health of mind saints have prescribed unspoken repetition of holy name, the purpose being good and less thinking.

A person habitual of erotic thoughts or mental immorality or chewing unnecessary thoughts can never attain real mental peace. Finally, yes, he may become victim of misfortune.

I have, in many ways, experienced this quote “As you sow, so shall you reap” and found it true. Here, sowing means thinking.

The actual meaning of hating, criticizing others and thinking against them is that we are sowing seeds of those thoughts within us and we are sure to get the result of that.  Thoughts are more powerful than our deeds because they have the power to generate gross physical substance. So, entertaining unfair, dirty and nasty thoughts lead to bad results. Therefore, the Saints have set the following rules: -

So think purposefully. Eat for appetite. Work to the purpose and think of only such things which are necessary and lead you to the goal.

If, people, those have taken shelter in Nam (holy name), do not follow the above principles, they will not achieve anything. They will actually destroy themselves, because, in case, their wishes are not fulfilled by holy name, they will say badly about Saints or have hateful feelings for them and complain against their teaching, which will again because of their own ignorance. Finally in accordance with the philosophy of thoughts, their own thoughts will destroy them.
People of the present day are absolutely ignorant of the power of thought.  I will try to describe briefly the subject- ‘What are thoughts’?


Thought

The present day science has reached atoms i.e. an energy which produces gross matter found in the entire universe. Now, I have to say that the readers must think about their origin. Before entering the womb of your mother you were in father's brain in the form of a germ in his semen. The germs were formed from the blood and semen produced by food eaten by your father. The food had been received from the earth. The earth cannot produce food without heat and light. Sun and other stars are the origin of heat and light. Therefore your physical life is nothing but light and heat mixed in gross matter and makes other organs of body. Your mind is the creator of your body. Similarly universal mind, also called the form of light is the creator of the five gross matters (Panch Mahabhoot). Therefore, whatever man thinks in a state of concentrated mind, whether in anger or in happy mood, it will create the same sort of effect because the power of thought is sure to transform into gross matter. So, what you sow, so shall you reap or your thinking will transform into you. I hope you know that and must have understood what I said. I have fully realized that whatever happens to us or the creation is the result of our own thoughts.


रहस्य-2

मानसिक जीवन - संकल्प से ही भौतिक पदार्थ की उत्पत्ति होती है. मन भी उन्हीं तत्त्वों से बना है जिनसे कि देह बना है. अंतर केवल इतना है कि देह के बनाने वाले तत्त्व स्थूल पदार्थ के होते हैं और मन के बनाने वाले तत्त्व सूक्ष्म पदार्थ के होते हैं. जिस प्रकार स्वाद के वशीभूत अधिक खाने से शरीर की आरोग्यता नष्ट हो जाती है, ठीक उसी प्रकार मन रसिक विचारों पर, जो कामोत्तेजक हों या व्यर्थ की गपशप के हों, ध्यान करने से अपनी आरोग्यता नष्ट कर बैठता है. मन के स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए संतों ने अजपा-जाप का साधन बताया है जिसका प्रयोजन कम और श्रेष्ठ बातों का सोचना है.
जो कामोत्तेजक विचारों के ध्यान में निमग्न रहता हो अथवा मानसिक व्यभिचारी हो अथवा जो अनावश्यक बातों पर मनन करता है, वह वास्तविक मानसिक शान्ति कभी प्राप्त नहीं कर सकता. हाँ, अंत में आपत्ति-विपत्ति का शिकार अवश्य होगा.
मैंने इस कहावत - ‘‘जैसा बोओगे वैसा काटोगे’’ का अनुभव अनेकों प्रकार से किया है और इसे सच पाया है. यहाँ बोने से अभिप्राय सोचने से है.
दूसरों से घृणा करना, दूसरों की चुगली करना और दूसरों का बुरा सोचने का वास्तविक अर्थ यही है कि उन विचारों का बीज हम अपने अंतर में बोएँ और अनजान रूप से उनका फल पाएँ. विचार स्वयं हमारे कार्यों से अधिक शक्तिशाली है क्योंकि यह स्थूल भौतिक पदार्थ का उत्पन्न करने वाला है. अतः अनुचित विचार और मलिन व गंदी बातों के ध्यान से मनुष्य पर आपत्तियाँ आती हैं. इसलिए संतों ने निम्नलिखित नियम निर्धारित किए हैं: -
इतना सोचो जिससे प्रयोजन सिद्ध हो. इतना खाओ जितने से आवश्यकता की पूर्ति हो. इतना काम करो जिससे प्रयोजन पूरा हो सके अथवा वही सोचो जो आवश्यक और लक्ष्य तक हो.
जिन्होंने नाम का आश्रय लिया है, यदि वे उपरोक्त सिद्धान्तों का पालन नहीं करते तो उनको कुछ प्राप्त नहीं होगा. वे वास्तव में अपने आपको नष्ट-भ्रष्ट कर लेंगे, क्योंकि जब नाम द्वारा उनकी वासनायें पूरी न होंगी, जो यह उनके अपने अज्ञान का कारण होगा, तो वे या तो संतों के बारे में बुरा-भला सोचेंगे या घृणित भावों से उनकी शिक्षा की शिकायत करेंगे. अन्त में विचार की फिलॉसफी के अनुसार उनके अपने विचार ही उन्हें नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे.
वर्तमान समय के लोग विचार की शक्ति से नितान्त अनभिज्ञ हैं. विचार क्या है इस विषय पर मैं आगे संक्षिप्त रूप में वर्णन करने का प्रयत्न करूँगा.




 विचार

वर्तमान विज्ञान अणुओं यानि एक प्रकार की शक्ति तक पहुँचा है जो ब्रह्माण्ड व्यापी स्थूल पदार्थ को उत्पन्न करने वाली है. अब मेरा का यह कहना है कि पाठक अपनी उत्पत्ति के विषय पर विचार करें. तुम अपनी माँ के गर्भ में प्रवेश करने से पहले अपने पिता के मस्तिष्क में वीर्य के कीटाणु थे. वह कीटाणु उस भोजन से बने जो तुम्हारे पिता ने खाया और जिससे रक्त और वीर्य बना. यह खाद्य पदार्थ पृथ्वी से प्राप्त किये गये थे. गर्मी और प्रकाश के बिना पृथ्वी खाद्य पदार्थ उत्पन्न नहीं कर सकती. सूर्य और अन्य तारागण गर्मी और प्रकाश के मूल उद्गम हैं. इस प्रकार तुम्हारा शारीरिक जीवन वास्तविक रूप से स्थूल पदार्थ से मिला हुआ गर्मी और प्रकाश है और शारीरिक इन्द्रियों को उत्पन्न करता है. तुम्हारा मन ही तुम्हारे शरीर का रचने वाला है. इसी प्रकार ब्रह्माण्डी मन, जो ज्योति स्वरूप कहलाता है और सारी सृष्टि का रचने वाला है, स्थूल पदार्थों (पंच महाभूतों) को उत्पन्न करता है. इसलिए मनुष्य जो कुछ मन की एकाग्र अवस्था में सोचता है, चाहे वह क्रोध की सूरत में हो अथवा प्रसन्नता के रूप की दशा में हो, उसका वैसा ही प्रभाव अवश्य उत्पन्न होगा, क्योंकि विचार जो एक शक्ति है स्थूल पदार्थ में बदल जाती है. अतएव जो व्यक्ति जो कुछ बोएगा वैसा ही काटेगा अथवा जैसा तुम सोचोगे वैसा ही बनोगे. तुमको इन बातों का भली प्रकार ज्ञाता समझकर मैं यह आशा करता हूँ कि तुमने मेरे मन्तव्य को समझ लिया होगा. मैंने पूर्णतया यह अनुभव कर लिया है कि जो कुछ हम पर या सृष्टि पर गुज़रती या पड़ती है वह हमारे अपने ही विचारों का फल है.


नोट- (पुस्तक सच्चाई प्रथमतः 1948 में अंग्रेज़ी में छपी फिर उसका उर्दू अनुवाद 1955 में छपा. हिंदी अनुवाद का प्रकाशन अलीगढ़ की शिव पत्रिका ने 1957-58 में किया.)

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17 May 2011

Baba Faqir Chand and The Secret-1


Two years ago I had read Rhonda Byrne’s book 'The Secret'. I liked it very much. It described mystery of power of thought in great detail. Wikipedia showed that in the background of the book, there was literature of William Walker Atkinson, a lawyer. Atkinson was influenced by an Indian yogi. Two names emerged there, a yogi Ramachakar and another Bharat. In article it was written that the two individuals had no record in the United States. Well!! He must have known the mystery from somebody. This secret can be lost but cannot be unknown to humanity.

Few days ago I was working on Baba Faqir Chand's book ‘Sachchai’ (The Truth) that I again came across the same 'secret' and that too in a very simple form. Atkinson had not learnt the first part of the mystery and had much troubled life. I am dedicating this 'secret' in two installments through Baba Faqir Chand.

The Secret -1
Body Life – It is sense (Sensation) of the body. This awareness substance of life will be according to the material which made the body. Climate and food the parents had during the pregnancy and the food he takes during life play a big role in physical senses. Physical sufferings which people have are due to irregular and adverse food habits i.e. light, air, water and vegetables etc. Such individuals cannot attain any peace or happiness by Naam only as they live in bodies developed through irregular and adverse food. Therefore, the right way to get rid of all the physical suffering is that they should live in such way that leads to healthy life. This understanding or knowledge and its practice are part of "Naam". The main rules are that: –

1. Take less food – Do not eat for taste but eat to survive. Do not live to eat.
2. Protection of Life force (celibacy) – No individual should unnecessarily waste his life force which keeps the body healthy, disease free and in peaceful state.

Even if a person does repetition of holy name and goes to gurus and does inner practices as per their directions, his physical suffering will not go away until he protects his life force.

Ancient books of our great men and scriptures, in various forms, support the above statement.


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मैंने रॉण्डा बर्न (Rhonda Byrne)  की पुस्तक The Secret’ दो वर्ष पूर्व पढ़ी थी. बहुत अच्छी लगी. इसमें विचार शक्ति के रहस्य को काफी विस्तार से बताया गया है. विकिपीडिया से पता चला कि इस पुस्तक की पृष्ठभूमि में विलियम वॉकर एटकिन्सन (William Walker Atkinson) नामक वकील का लिखा साहित्य था. एटकिन्सन किसी भारतीय योगी से प्रभावित था. वहाँ दो नाम उभर कर आए हैं, एक बाबा भारत और दूसरा योगी रामचाकर. आलेख में लिखा है कि इन दोनों व्यक्तियों के अमेरिका में होने का कोई रिकार्ड नहीं मिला. चलो सही. किसी से तो उन्होंने इस रहस्य को जाना होगा. मानवता के लिए यह रहस्य कभी खोया हुआ हो सकता है परंतु अनजाना नहीं है. 

पिछले दिनों बाबा फकीर चंद की पुस्तक सच्चाई पर कार्य कर रहा था तो वही रहस्य फिर सामने आया और बहुत ही सरल रूप में. पढ़ कर लगा कि एटकिन्सन ने इस रहस्य के प्रथम भाग को नहीं सीखा था और बहुत कष्ट उठाया. ये रहस्य बाबा फकीर चंद के माध्यम से दो किस्तों में समर्पित कर रहा हूँ.

रहस्य-1

"शारीरिक जीवन - यह देह का बोध (Sensation) है. जीवन का यह बोध भौतिक पदार्थ, जिससे यह देह बना है, के अनुसार होगा. जलवायु और खाद्य पदार्थ जो माँ-बाप ने गर्भ के समय खाये हों तथा वह पदार्थ, जिनको खाकर वह जीवन व्यतीत करता है, शारीरिक बोध में बहुत बड़ा कार्य करते हैं. देह के कष्ट, जिनसे लोग दुखी हैं, अनियमितता और प्रतिकूल भोजन अर्थात् प्रकाश, वायु, जल और साग-सब्जी आदि के कारण से हैं, केवल नाम, ऐसे व्यक्ति को, जो अनियमितता और प्रतिकूल भोजन से विकसित देह में रहता है, किसी प्रकार शान्ति अथवा सुख चैन नहीं दे सकता. अतः समस्त शारीरिक कष्टों से छुटकारा पाने या उनको दूर करने का सच्चा मार्ग यह है कि ऐसे ढंग से जीवन व्यतीत करे कि जिससे उसका जीवन स्वस्थ रह सके. यह समझ या ज्ञान तथा इसका अभ्यास नाम का एक अंग है. इसके लिए मुख्य नियम ये हैं-

(अ) कम खाना - स्वाद के लिए न खाओ किन्तु जीवित रहने के लिए खाओ. खाने के लिए मत जीओ.
(ब) जीवन शक्ति (ब्रह्मचर्य) की रक्षा - किसी व्यक्ति को अपनी जीवन शक्ति को जो शरीर को स्वस्थ, नीरोग और शांतमय अवस्था में रखती है, व्यर्थ नष्ट नहीं करना चाहिए.

कोई व्यक्ति चाहे नामका सुमिरन करे अथवा गुरुओं के पास जाय और उनके आदेशानुसार अभ्यास करे किन्तु जब तक वह अपनी जीवन शक्ति की रक्षा नहीं करेगा, उसके शारीरिक कष्ट दूर नहीं होंगे.

प्राचीन काल के महापुरुषों की रचनाएँ व हमारे ग्रंथ विभिन्न रूपों में उपरोक्त कथन का समर्थन करते हैं."


नोट- (पुस्तक सच्चाई प्रथमतः 1948 में अंग्रेज़ी में छपी फिर उसका उर्दू अनुवाद 1955 में छपा. हिंदी अनुवाद का प्रकाशन अलीगढ़ की शिव पत्रिका ने 1957-58 में किया.)

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